योग से संबंधित कुछ मिथक क्या हैं?

इसके लिए आपको पतंजलि योग दर्शन की गीत प्रैस गोरखपुर वाली छोटीसी किताब स्वयं खरीद कर पढनी चाहिए ,विस्तार से योग का सही प्रमाणिक अध्ययन के लिए पातंजल योग प्रदीप स्वामी ओमानंद वाली पढ़नी चाहिए । ये दोनों पुस्तकों में योग के चार विशेष खंड /पाठ पाद रुप में हैं ,इनमें चौथा विभूति पाद उर्फ सिद्ध पाठ मन में अनेक शंका /संदेह पैदा करता है जिसमें अष्ट सिद्धधी ओं का विवरण जैसे अणिमा शरीर को अणु समान सूक्ष्म स्वयं को अदृष्य कर लेना पूर्णतः मित्थया है विज्ञान के प्रकाश का अपवर्तनांक के एक या एक से कम होने पर संभव है ।वायु का अपवर्तनाँक एक है ,जल का अपवर्तनाँक 1.3है ,पारदर्शी काँच का अपवर्तनाँक 1.5 है जबकि अपारदर्शी वस्तुओं से प्रकाश का परावर्तन होता है ।अपवर्तन नहीं ।
परावर्तन के नियमों में प्रकाश अपारदर्शी वस्तुओं से टकरा कर प्रकीर्णनित होकर वस्तु के चारों ओर बिखर कर वस्तु को दिखा देता है ,जबकि पारदर्शी वस्तुओं के काँच जल आदि के दूसरी ओर पार निकल जाता है जिसे प्रकाश का अपवर्तन/ तथा तुलनात्मक दो माध्यमों के अपवर्तन को एक के सापेक्ष दूसरे का अपवर्तनांक कहते हैं जिसमें प्रकाश किरणें एक से दूसरे में आरपार निकल जाती हैं जिससे वस्तु के पारदर्शी होने का भ्रम होता है पर दूर से । पास आने पर यह भ्रम दूर होता जाता है जैसे जैसे हम वस्तु के निकट पहुंचने लगते हैं जल ,वायु,काँच का अलग अलग विवेक उत्पन्न होने लगता है । अर्थात कोई भी वस्तु तब तक अदृष्य नहीं हो सकती जब तक प्रकाश उसके अंदर से आरपार जाने से रुक नहीं जाता ।वस्तु के अदृश्य होने के लिए प्रकाश का उसके अंदर से आरपार एक ओर से दूसरी ओर निकल जाना जरूरी होता है । यह योग सिद्धधी अभी तक प्रमाणित नहीं हुई है ।
लघुमा सिद्धधी शरीर को अपनी ईच्छा नुसार सामान्य आकार से छोटा कर लेना ,अभी तक प्रमाणित नहीं हुई है हनुमान सुरसा प्रकरण ।
महिमा सिद्धधी शरीर के सामान्य आकार को विस्तारित करके बढ़ा लेना ,रामायण में हनुमान का कुम्भ कर्ण से युद्ध,अहिरावण वध आदि सिद्धधी याँ प्रमाणित नहीं हुई हैं ।सभी जीवों के शरीर का एक निश्चित आकार होता है जो एक क्षण में एक सेकेंड में नहीं बदल जाता ।शरीर के आकार को बढ़ने का एक निश्चित समय सीमा होती है ।यह सिद्धधी विज्ञान के नियम मानकों पर फेल है
विशेष पेन्ट लगे स्टैल्थ विमान को रडार से अदृश्य होने के लिए निरंतर अति आवश्यक उच्च गति से उड़ना पड़ता है ।मानक स्पीड कम होने पर, या स्पीड मंदी होने पर, भूमि पर खड़ा होने पर पह अदृश्य विमान दृष्टि में आजाता ह ।
इसी प्रकार से साधन पाद /पाठ में भी अनेक खतरनाक हानिकारक आसान आदि क्रियाएं हैं ,जिनको अपनाकर करते रहने पर उनका हानिकारक प्रभाव वृद्ध आयु में आता है ।जैसे वज्रोली .अमरोली, धौति ,नेति ,वस्ति आदि ।यदि मैं कहूँ कि योग का अध्ययन, अभ्यास, किताब में से पढ़ने के बाद बिना किसी अनुभवी गुरु से सीखे करना ठीक नहीं ह ।और योग की निरंतर बुराई करना, योग योगी में कमी ढूंढना बिना योग का अध्ययन अभ्यास किये ठीक नहीं है ।
मेरे विचार से योग का मतलब है अपनी आत्मा को अपने प्राण बंध द्वारा अपने शरीर से जोड़ना ।अर्थात शरीर की प्रत्येक कोशिका पर अपनी आत्मा की विद्युत शक्ति द्वारा नियंत्रण करने की कला ।और प्रत्येक कोशिका में उपलब्ध ऊर्जा पैकेट माईटोकोन्डरिया की ऊर्जा दायी आक्सीकरण क्रियाओं पर नियंत्रण सीखना ।जो शरीर में आत्मा की प्राण क्रिया संचार नियंत्रण से आती है ।योग का मतलब शरीर को प्रत्यास्थता लोच लचीला रबड़ जैसा बनाना नहीं है ।
ऐसा न समझा जाय कि में आपको योग विद्या से डराकर आपको योग से दूर करके योग से भटका ,भ्रमित कर रहा हूँ ।
मेरे कहने का आश्य यह है कि मात्र कुछ श्लोकों के पढ़ने से योगी न बना जाय अपितु योग को पूरी तरह से संक्षेप में पढ़ा लिखा समझा जाय पतंजलि योग दर्शन की छोटी किताब से ,और योग को समग्र रूप से समझने के लिए पातंजल योग प्रदीप का विधिवत अध्ययन किया जाय 1माह से अधिक का समय देकर ।
धारणा ध्यान समाधि त्रयमेब संयंमः का अर्थ है जब हम अपनी अपनी धारणा के अनुसार, अपने ध्यान स्मृति का अभ्यास करते हुए अपनी समाधि अवस्था में जिसमें शरीर निष्क्रिय और मन सक्रिय अवस्था अवचेतन स्तर पर चले जाते हैं तो हमको उस वस्तु का चतुर्थ भाव कालों का ज्ञान हो जाता है ।यह मन की पूर्ण चैतन्य अवस्था कही गई है । जिसका मुझे आँशिक रूप में अनुभव हुआ है ,पूर्ण रूप से नहीं । जिससे मुझे अब जीवों के भाव क्रिया व्यवहार की समझ हो गई है ।
वैसे भी योग विषय जीव संबंधित होने से अर्ध सत्य के नियम पर आधारित ह ।न पूरा असत्य है, न पूर्ण रूप से सत्य है ,50ःः50 प्रति शत अब जैसा जिसका अभ्यास परिचय वैसा उसका ज्ञान ।योग को जब पढ़ोगे तब कुछ मिथक मिलेंगे ,कुछ अकाट्य सत्य
मेरे कहने लिख ने मात्र से इस विषय पर अपनी धारणा बनाना ठीक नहीं है । इसे 50से500रपए खर्च करके स्वयं के निजी अध्ययन से सीखा जाय तो सर्वश्रेष्ठ रहेगा ।पुस्तक विवरण परिचय मैंने निजी अध्ययन वाला स्वयं अनुभव का दिया है ।
योग का अर्थ मात्र आसन आदि क्रियाएं नहीं हैं अपितु योग के अष्टांग चरण घटक हैं जो इस प्रकार से हैं
1यम मर्यादा हीन ता के दुष्प्रभाव, दुष्परिणाम
2नियम मर्यादा पालन का सुप्रभाव, श्रेष्ठ परिणाम
3आसन स्थिर सुख स्थिति आरामदायक शरीर मुद्रा एं
4प्राणायाम शरीर में प्राणों का आयाम अधिक तम स्थिति
5भोजनम् श्रेष्ठ अन्न सेवन से शरीर सुदृढ़ करना
6धारणा मन में उत्तम ज्ञान धारण करना पोजीटिव कनसैप्ट कलैक्शन इन ब्रैन
7ध्यान स्मरण प्रक्रियाएं नियंत्रण करना, विषय वस्तु रूप रेखा अनुसार मन में भरी वीडियो को इच्छा के अनुसार देखना ,स्मृति नियंत्रण
8समाधि किसी भी विषय वस्तु पर ध्यान जमाकर उस विषय से संबंधित सभी जानकारी की दिमागी औडियो ,वीडियो किलिप को अपने मन में देख कर किसी भी विषय वस्तु पर लम्बे समय तक धारा प्रवाह बोलने की कला । ओजस्वी मनस्वी यशस्वी वकत्व्य क्षमता ।
ये आठ यौग के घटक हैं ।जिनका अधिकतम ज्ञान होने पर ही व्यक्ति योगी कहलाता है ।
मात्र गेरूए वस्त्र धारण करना ,गले में रुद्राक्ष पहनना ,आग जलाकर भस्म रमाना ,धूनी धूँआ करना यह योग का आँशिक रुप है रंग धारणा वर्ण स्पैक्ट्रा कलर कन्सैप्ट ,धूम्रपान चिकित्सा आदि योग में रोग व्याधियों के निस्तारण के लिए है ।

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