क्या भारत में हिन्दुओं की जनसंख्या कम हो जाएगी?

यदि यही हाल यही सोच बनी रही कि हम अमर होने का वरदान लेके आये हैं सनातनी अकलिया । समय के अनुसार,अपने मानसिक ढांचे विचारों में खुद अपने आप बदलाव करना नहीं सीखे अपने जीवन के लिए और अपने जीवन का नियंत्रण विचारों से कर्म से दूसरों के हाथों में रखा पंडितों के ,पुरुखों के ,अपने बुजुर्गों के तो .. जनसंख्या की बात बाद में है हिन्दू जनसंख्या में कम होने से पहले विलुप्तता के कगार पर पहुंच चुके हैं ।
हिन्दू संस्कृति धर्म में हिन्दू नारीओं की नारी उर्वरता /फर्टिलिटी का न्यूनतम उपयोग होता है नारी धर्म विषयक कठोर धार्मिक नियम /कानून ओं द्वारा जबकि अन्य धर्मों जैसे इस्लाम ईसाई धर्मों में नारी विषयक कानून थोड़े लचीलापन युक्त होने से इन धर्मों में नारी की उर्वरा शक्ति /फर्टिलिटी का अधिकतम उपयोग होता है इन धर्मों की नारियाँ अपने प्रज्या धर्म संतान उत्पादन का अधिक तम उपयोग करतीं हैं । इन धर्मों में नारी का पुरूष विहीन पुरुषों से अलग जीवन जीना अच्छा नहीं समझा जाता है । विधवा (पति हीन )और सधवा (पति युक्त ) में समाज में अंतर नहीं है ,जबकि हिंदू धर्म संस्कृति में यह अन्तर बहुत ज्यादा है विधवा स्त्री के पुनः विवाह पश्चात सधवा बनु स्त्री को सामान्य सधवा के बराबर नहीं समझा जाता है ।
जब जनसंख्या उत्पादन कर्ता नारी की उर्वरा शक्ति /फर्टिलिटी में अन्तर जब न्यूनतम और अधिक तम का होगा तो ऐसे में हिन्दू कैसे अन्य जाति धर्म संस्कृति में के लोगों से बराबर विस्तार वृद्धि कर पायेंगे ? यह मेरे समझ से परे है ।वाहय संस्कृति पहले कुरान बाईबल में वर्णित मिश्र के राजा फिरोंन के राज्य में गौ पूजा , थी ।आज गौ पूजन और गौ पूजक भारत में छोटे सीमित क्षेत्र उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा क्षेत्र तक सिमट गई हैअसल पुरातनकालीय हिन्दू इसी क्षेत्र में रह गये हैं घटते घटते ,शेष भारत में हिन्दू गौपूजक नहीं रहे ।
आप हिन्दू ओं की जनसंख्या कम का सवाल कोरा पर डाल कर आश्वस्त बेफिक्र हैं ।कुरान में से पढ़िये कि 1400 वर्ष पूर्व की जो सामाजिक कुरीतिया् कमियाँ आज भारत समाज में हैं वही कुरीतिया् कमियाँ अरब समाज में थीं ।जीवन आवश्यक सामग्री दहेज की संपूर्ण व्यवस्था नहीं हो पाने की वजह से दहेज़ का उत्तरदायी स्त्री को मानते समझते हुए स्त्रियों की बाल्यकाल में हत्या, युवावस्था में हत्या, स्त्रियों के शादी योग्य होते हुए भी दहेज व्यवस्था न होने से स्त्रियों का आजीवन शादी हीन /कुँवारी रहना । ऐसे समय में अरब में जीव जाति अनुपतिक व्यवस्था गड़बड़ हो गई मनुष्य ओं में जगह जगह यौन अपराध होने लगे धनी अरब लोगों में बहुपत्नी जैसी कुप्रथा उत्पन्न हुई ,बहुपत्नी प्रथा में बूढों की जवान पत्नीओं में आयु अंतर से अवैधसंबंध प्रथा चल पड़ी ,घर घर स्त्री पुरुषों के झगड़े वैध ,अवैध संबंध के शुरू हो गए ।तब अरब वालों के झगड़ों की समस्या ओं का निदान मुहम्मद साहब ने ढूँढ ढूँढ कर उनको समझाने का शुरू किया ।
अब समाज के परम आवश्यक घटक अपूर्ण भाग ,समाज निर्माणी ।तत्व नारी की शोचनीय चिंतन स्थिति ..नारी अशिक्षा, नारियों को गलत / भ्रमित करने की पुराणिक शिक्षा , पतिव्रता जैसे शब्द सारे सामाजिक न्याय नियम कानून औरत को बने हैं पुरुषों को स्त्री व्रता जैसे शब्दों का कहीं चर्चा /वर्णन नहीं है । पुरुष जब चाहे सामाजिक नियम /कानून को अपनी आवश्यकताओं के अनुसार बदल लें । हर सामाजिक अपराध /दोष का नारी को अधिकतम दंड अहिल्या वाला , नारी की बाल अवस्था में ,बाल अवस्था पूर्व ,बालिका अवस्था बाद में हत्या , नारी को अपनी मानसिक संरचना /विचारों में परिवर्तन का कोई मौका नहीं ।उसको सामाजिक अपराध के पश्चात पश्चाताप का कोई अवसर /मौका नहीं ।
नारी के पुरुष युग्ल बंधन , शादी विवाह के लिए दहेज का उत्तर दायी मानते हुए नारी भ्रूण की पैदा होने से पहले हत्या, पैदा होने के बाद जन्म लेते समय हत्या ,इतने पर से भी काम नहीं चला तो नारी के प्रज्या समर्थ/जवान होने पर उसके उदरस्थ प्रज्या कण अन्डाणु ओं की हत्याएं प्रत्येक माहवारी पर नर युग्मक कण शुक्राणु ओं को रोकना ।अर्थात नारी के प्रज्या धर्म कर्म का नियंत्रण नर के हाथों में जबकि नारी की प्रज्या क्षमता सीमित है 12 -45 वर्ष तक ,नर की 13 - 8० वर्ष तक ।
नारी को अपनी शादी करने का अपना निर्णय नहीं, नारी की शादी करने का निर्णय नर पिता ,भाई के हाथ ।
नारी को युवावस्था मे मिलन आयु में अलग रहने अकेले रहने का दंड अधिकतम चाहे माहवारी हो या ना हो ।इसके अलावा लम्बे समय तक पुरुष सानिध्य से दूर रहना ।
अपनी शादी के लिए दहेज /विवाह के बाद ग्रहस्थी की आवश्यक वस्तुओं का संचय व्यवस्था के लिए लंबे अरसे तक शादी की आयु निकल जाने के बाद 16वर्ष के बाद 28 या 30 वर्ष तक के युग्ल समय की अवहेलना करके 30 वर्षों के बाद शादी करना ।नारी के प्रज्या धर्म का न्यूनतम उपयोग ।अपने पांव आप काटना ।
युवावस्था में हो या युवावस्था के बाद अधेड़ से वृद्धावस्था तक नारी के प्रज्या समर्थ माहवारी के जारी रहते हुए पुरुष मिलन की इच्छा सामर्थ्यवान होते हुए उसे वैधव्य /विधवा का मानसिक शारीरक अभिशाप भोगना । नारी को दूसरी शादी अभिशाप , नर को दूसरी शादी आवश्यक, वरदान , सौभाग्य ।
हिन्दू ओं में उत्पन्न नयी कुरीतिया् अब समृद्ध हिंदू ओं का मृत्यु के देवता यमराज से सीधा संबंध बन गया है अब समृद्ध हिन्दू ओं के घर परिवार में लड़के पैदा होते हैं लड़कियाँ नहीं ,और जिस किसी दयालु हिन्दू के यहाँ लड़की पैदा हो गई है वह पढ़ाई लिखाई पूरी होने के बाद अपनी जाति के ऊँचे दहेज के बुरे परिणाम भोग से बचने के लिए दूसरे विषेशकर मुस्लिम और इसाई यों से या दूसरी जाति के लोगों से शादी संबंध बनाने लगी हैं । यानी कुछ समय बाद भारत की श्रेष्ठ जाति ब्राह्मण ठाकुर के लड़कों को सवर्ण श्रेष्ठ लड़कियों की कमी पड़ जायेगी और ये दोनों जातियां बिना ग्रहयुद्ध संघर्ष के अपने आप लुप्त हो जायेंंगी ।
हर हाल में संस्कृतिक उत्पादन कर्ता प्राणी नारी पर जब इतने बड़े पैमाने पर प्रतिबंधन लगे होंगे तो संस्कृतिरक्षक नर जीवों का समुचित पूरा पूरा उत्पादन कैसे होगा? जाहिर है ऐसे कुटिलता भरे नियमों से हिन्दू धर्म, हिन्दू जाति संस्कृति कयोंकर न कम होगी । आप हिन्दू ओं के कम होने के प्रति मिथ्या आश्वासन मन में पाले हुए हैं, कि हिंदू कम नहीं होंगे जबकि मैं कहता हूँ कि हिंदू धर्म ,हिन्दू जाति ,हिन्दू संस्कृति तीनों ही विलुप्ति के कगार /किनारे पर हैं ।
हिन्दू भाई सनातन अमरता को भूल जाओ तुमसे पहले भी मैसोपोटामिया, माया ,सिंधु सभ्यता, आदि सभ्यता एं मिट चुकी हैं तुमसे पहले इस लिए कि उन्होंने नयी उभरती सभ्यता को हल्के में लिया ,अपनी सभ्यता संस्कृति की निम्नता की कम पड़ने कम होने की घटक कारण विवेचना उचित जरूरी नहीं समझी ।लुप्त हो गए छोड़ गए अपनी संस्कृति के निशान ,काश उन्होंने ने भी अपनी मानसिक रचना अपनी सोच को अपने आप बदलाव करना सीख लिया होता तो उन पुरानी सभ्यता ओं को नष्ट करके ये नयी सभ्यता एं पैदा नहीं होतींं । इस्लामी सभ्यता मैसोपोटामिया की ईराकी पुरानी सभ्यता को आगे बढ़ी ।आज भी बढ़ रही है इसका कारण है उनके पास नयी सोच और समयानुसार अपने आप में खुद को बदल ने की योग्यता ।जो औरों में नहीं । और अपना जीवन जीने को दूसरों पर आश्रित हैं ।
नारों पुरानी सोच से काम न चलेगा अभी तो हिन्दू कम ही हो रहे हैं परिवार नियोजन से आगे भविष्य में लुप्त भी होंगे यदि ना चेते चैतन्य हुए ।

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