मनुष्य पशुओं से कितना ज्यादा खतरनाक है ?यदि इसका कोई मानक होता तो मै गणित के शब्दों में एक अंक लिख ने के बाद जितनी अधिकतम शून्य हैं वो लगाता 19 और फिर बाकी शून्य लगाने को तुमको छोड़ देता खाली जगह …….लगाये रहो तुम भी ।जिसका मतलब है ःः मनुष्य पशुओं की तुलना में अनन्त हिंसक है । पशु तो केवल अपने जीवन के जीने के लिए अति आवश्यक होने पर भूख लगने पर , प्राण संकट में अनुभव होने पर हिंसा कर्म को उद्यत /तैयार होते हैं । जितना अपने भोजन के लिए हिंसा कर्म /दूसरे के प्राण लेना जरूरी है उतने शाकाहारी पशुओं को माँसाहारी मारते हैं । पेट भरा होने पर भूख न होने पर शेर बाघ दूसरे शाकाहारी पशुओं की अकारण निर्दोष हत्या नहीं करते हैं वे माँस का व्यापार नहीं करते । केवल कुत्ता भेड़िया में अकाल भूख जींस होने से ये पेट माँस से भरा होने पर भी तृप्त नहीं होते ।परन्तु अति भूख की अवस्था में ही शिकार को चलते हैं ।सामान्य अवस्था में पेट भरा होने पर ये दूसरे पशुओं को अकारण नहीं मारते हैं ।
अब शाकहारियों की वनस्पति हिंसा ःःशाकहारी पशु पेट भर होने पर वनस्पति हिंसा नहीं करते भरा पेट होने पर घास नहीं चरते ,वनस्पति क्षेत्र से बाहर निकल कर आराम से घास चबाते ,जुगाली करते हैं ।बकरी को छोड़कर ।
सभी जीव मात्र भोजन के लिए विजातीय जीव की हिंसा करते हैं ।स्वजातीय जीव को कोई भी जीव निजी हित के लिए नहीं मारते । जबकि मनुष्य स्व हित भोजन लिए विजातीय जीवों की हिंसा करते हैं यदि स्वयं हित की पूर्ति में कोई अपना स्वजातीय मानव बाधा बनता है तो उस स्वजातिय बंधु संबंधी की हत्या करने में देरी नहीं कर ते ।स्वजातिय अक्सर प्रोपर्टी विवाद में अपने परिवार के जाति के ,धर्म के मानव की हत्या करने में देर नहीं लगाते हैं ।
युद्ध हिंसा पशुओं में नहीं होती ,यदि पशुओं में आपस में स्वजातीय युद्ध होता है तो दो नरों के बीच अपने को श्रेष्ठ साबित करने के लिए होता है कारण कि मादा विजेता श्रेष्ठ पशु को ही अपने साथ शादी संबंध बनाने देती है ताकि श्रेष्ठ नस्ल के नर से श्रेष्ठ संतान उत्पन्न हो अश्रेष्ठ /नर से मादा पशु शादी संबंध नहीं बनाती हैं । नर पशुओं के युद्ध /लड़ाई के दौरान सभी नर मादा पशु दर्शकों की अवस्था में खड़े होकर तटस्थ भाव से युद्ध देखते रहते हैं कोई भी लड़ने वाले नरों की किसी तरह की मदद हौंसला अफजाई नहीं करता ।
जबकि मानव /मनुष्य ओं में इसका ठीक उल्टा व्यवहार दखने को मिलता है सामूहिक युद्ध स्वजातिय जनबंधु हो या विजातीय जन बंधु अनेक बार अनेक मनुष्य मिलकर एक को मारदेते हैं अभिमन्यु युद्ध पद्धति , तो कभी कभी एक मनुष्य पूरे के पूरे समूह को नष्ट कर दिया करता है अर्जुन युद्ध ,अश्वत्थामा युद्ध ।
पशु इतने बड़े स्तर की सामूहिक हिंसा नहीं करते । ग्रह युद्ध , समाज युद्ध , सामूहिक युद्ध , राष्ट्रीय स्तर का युद्ध ,विश्वयुद्ध विश्वस्तरीय । इतने बड़े स्तर पर राष्ट्रीय और विश्वस्तरीय विनाश की हिंसा मनुष्य /मानव करते हैं ।
अब यौनहिंसा जैसा अनैतिक अपराध पशु नहीं करते ,जब पशुकी स्वजातीय मादा मिलने के लिए पूरी तरह तैयार होती है उसके मिलन हार्मोन का स्तर उच्च अवस्था में होता है तभी नर उससे यौनिक क्रियाएं करते संबंध बनाते हैं ।विजातीय मादा से सामान्य परिस्थितियों में संबंध बनाने का सवाल ही नहीं होता है । पशुओं. में बाल मैंथुन वृद्ध मैथुन जैसे अपराध नहीं होते । पशु अपनी स्वजातीय अल्प छोटी आयु की या फिर र वृद्ध आयु की मादा से मैथुन अपराध यौनाचार नहीं करते हैं ।
जबकि मानव में अल्प आयु की मादाएं अबोध बच्चियां हो अल्प आयु की बलिकाएं या अधिक आयु की वृद्ध महिलाएं मनुष्य ओं के ऐसे अनैतिक अपराध अखबार ओं की अक्सर सुर्खियां बनते हैं ।अब विजातीय पशुओं के साथ यौन हिंसा की भी खबरें अखबार में आने लगीं हैं ।इस मामले में पशुओं के साथ यौन हिंसा संबंध बनाने में मनुष्य ओं ने पहल की है पशू स्वेच्छा से मनुष्य ओं से यौन हिंसा संबंध नहीं बनाते हैं ।
जब से विज्ञान का विकास हुआ है मनुष्य ओं ने अन्य जीव जाति के जीवोका अकारण निरदोष होने पर भी उनकी हत्या का व्रत ले रखा है यदि कृषक कर्मा किसानों के दूसरे जीवों को जहर से मारने का शिकार से मारने का रिकॉर्ड /फाईल बनायी जाती है तो आँकड़ा अनन्त हत्या का होता है । कसाई के द्वारा की गई हत्या , शिकार के लिए की गई हत्या , वैद्य ओं के लिए वन्यजीवों की हत्या वन सम्पदा /वन्य तस्करी की हत्या , शहद के लिए मधुमक्खियों की कालोनी की हत्या,रशम के लिये रेशम कीट के लार्वा की हत्या . मोती के लिये सीप की हत्या ,डिस्कवरी पर देख लेना मछली उद्योग में मछलियों की हत्या ,मच्छर की सरेआम दिन हो या रात हत्या ही हत्या , मक्खी काकरोच की हिट से हताश ,
मानव की भोजन आपूर्ति के लिए गाय भैंस ऊँट बकरी, भेड़ पक्षियों के अंडे पक्षियों का माँस ,जो मानव के निकट आया मानव ने वही चबाया ।
हत्या ही हत्याकांड यही है मानव का संपूर्ण धरती पर प्रसार ।और सभी जीवों का जीवन खतरे में और यदि जीव अपना जीवन जिना चाहें तो जियेंगे मानव अनुमति से ।
यही है मानव की पशु हिंसा जो सक्षेप में लिखी है ।
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