जब भी मैं किसी से मिलता हूँ तो सबसे पहले नजर उसके वाहय आवरण वस्त्र के रंगों पर जाती है यदि उसके वस्त्र का रंग मेरी पसंद का ह वरीयता क्रम हरा+नीला =बिरोजी तूतियाCuSo4वाला है तब पहले वस्त्र धारण तौर तरीके पर जाती है ।यदि बिरोजी रंग नहीं है तो बिरोजी घटक रंग पहले पीला फिर हरा बाद में क्रमशः रंग क्रम लाल से गुलाबी तक रेंज क्रम स्पैक्ट्रा में ,फिर काले स्पैक्ट्रा में ग्रे आदि म ,सबसे अन्त में मिश्रित रंग परिधान में जाती है ।तत्पश्चात वस्त्र धारण कर्ता के चेहरे पर फिर चेहरे के भावों भावनाओं पर जाती है ।यदि चेहरा पहली बार दिखाई देता है भाव भावनाओं से हीन है तो नजर हटाकर अन्यत्र को देखने में चली जाती है ।यदि चेहरा पहली बार में भाव भावनाओं भंगिमा ओं युक्त होता है तब नजर प्रथम बार भी चेहरे पर रुक जाती है यदि चेहरा पहले भी देखा जा चुका है तो आवृत्ति की अधिक ता के परिमाण के अनुसार यदि चेहरा परिचित है भाव भावनाओं से हीन है तब नजर चेहरे पर रूककर देखने वाले की प्रतिक्रिया की इन्तजार करती है । यदि अपरिचित चेहरे की प्रतिक्रिया आती है तो नजर हट जाती है यदि चेहरा सामने परिचित का है तब प्रतिक्रिया इंतजार का समय बढ़ जाता है । परिचित चेहरा होने पर , सुन्दर चेहरा होने पर , युवा चेहरा होने पर ,बालक बालिका चेहरा होने पर मन्त्वय प्रक्रिया अनुसार पहले अपने मन के भाव विचार प्रस्फुटन प्रक्रिया चल पड़ती है ।
प्रथम तः यदि चेहरा वय समान उम्र का है तब नजर विपरीत लिंगीय क्षेत्रों की ओर बढ़ जाती है ऊपर से नीचले अंगों की ओर चलने लगती है पैरों तक ,शरीर के आँकलन करने के बाद उससे भविष्य की कामना पूर्ति कर ने का विशलेषण मन में चलने लगता है कि इसका भविष्य में क्या क्ब क्यों कैसे उपयोग किया जा सकता है । दूसरी ओर से उचित सिग्नल मिलने पर भविष्य की प्रक्रिया शुरू , अनुचित सिग्नल मिलने पर भविष्य की सोच कल्पना का चैनल बन्द ।
यदि चेहरा मन माफिक सुन्दर है तो देखते रहे ने की प्रक्रिया चल पड़ती है । यदि चेहरा परिचित का है तब समाचारों की प्रक्रिया विचारों के लेने देने की प्रक्रिया चलने लगती है । यदि चेहरा बालक बालिका बच्चे का है तब पता नहीं चलता और हम बच्चों का चेहरा देखते देखते कब अपने बचपन में चले जाने हैं कि हम भी कभी ऐसे ही अबोध बालक होंगे ।लोग हमको भी इसी तरह से देखते होंगे कोई ममता से ,कोई प्यार से ,कोई रिसता शत्रु भाव से ,कोई ऋषि ता पढ़ाने समझा ने के भाव से ,कोई चिढ़ाने ,कोई पीटने ,कोई, घुड़की देने को ,कोई डराने को । और भी न जाने कैसी कैसी कल्पना एं मन में चलने लगती है बालक बालिका बच्चों को देखकर । जैसा जिसका बचपन बीता यदि कुछ बचपन की यादें मन में शेष हैं ।
जब हम किसी वृद्ध बुढढे चेहरे को देखते हैं तो डर जाते हैं उस बुढढे के चेहरे को लेकर कि एक दिन हमारी भी ऐसी शक्ल हो जायेगी जिनको कोई देखना पसंद नहीं करेगा ।जिस के चेहरे पर सुन्दर चमक नहीं . मुँह में दाँत नहीं ,चेहरे के सफेद बाल ,चेहरे की मुँह के आस पास की ,नेत्रों के आसपास की, सिकुड़ी त्वचा, झुर्रियों से भरा चेहरा ,सोचने लगते हैं कि कैसे जी रहा है ये मानव भोग हीन जीवन को ।आखिर जीवन खाने में समर्थ ता का ही नाम है ।ये जीवन कैसे जी रहा है बिना इन्द्रिय भक्षण के ।
पांच इन्द्रिय भक्षण नेत्रों से दर्शन, कानों से नाद आवाज संगीत , नाक से गंध ,जीभ से रस ,त्वचा से ,स्पर्श ।
पांच कर्म इन्द्रिय भक्षण हाथों से कर्म ,पैरों से गमन, उदर से भंडारण ,जननांगों से अपूर्ण अंश भक्षण, शुद्धि अंगों से उत्सर्जन मल मूत्र का ।
उपरोक्त इन दस इन्द्रियों की अल्पशक्ति का नाम है बुढढा,
शक्ति हीन ता का नाम है मौत जिसे हम दूसरों के चेहरा देखकर सीख ते पढ़ते हैं ।
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