वर्तमान में कितने नक्षत्रों को मान्यता प्राप्त है?

27 नक्षत्र 12 राशियाँःः एक माह में कुल 28 नक्षत्र होते हैं जिनमें से 27 नक्षत्र +1नक्षत्र मिलकर 28 नक्षत्र बैठते हैं चंद्र कलाओं के अनुसार । और एक वर्ष में 12 राशियाँ होती हैं सूर्य कलाओं के अनुसार । अक्सर लोग राशि फल देखते हैं ,उन्हें ग्रह नक्षत्र का पता नहीं होता है जबकि जन्म मूलक नक्षत्र का प्रभाव बलवान होता है आजीवन स्थिर स्थाइ होता है राशि की तुलना में कम परिवर्तन शील होता है ।। जन्माष्टमी को सूर्य सिंह राशि में और चंद्रमा रोहिणी नक्षत्र में होना चाहिए ।
माह मे 27 नक्षत्र होते हैं जिनके अधिष्ठाता 27 देवता होते हैं जिनके चरण प्रभाव के अनुसार संतान पैदा होती है । क्रूर नक्षत्र में पैदा होने वाला बालक बालिका क्रूर स्वभाव के होते हैं जैसे भरणी ,कृतिका नक्षत्र , श्रेष्ठ नक्षत्र में पैदा होने वाले बालक श्रेष्ठ स्वभाव के होते हैं जैसे रोहिणी (प्रजापति), पुष्य (वृहस्पति) ,मघा (पितर ) ,हस्त (सूर्य ), निकृष्ट खराब नक्षत्र में जन्म लेने वाला बालक अक्सर नालायक निकलता है जैसे रेवती (पूषा ) ,जेष्ठा (इन्द्र) पूर्वाभाद्रपद का (अजैकपात ) उत्तराभाद्रपदा का (अहिर्बुधन्य ) मूल का ( निऋर्ति ) .
वैसे मूल कोई नक्षत्र नहीं है ब्लकि वह नक्षत्रों का वह काल गणना बिन्दु शून्य है जहां से नक्षत्रों की गिनती शुरू की जाती है इसे अषाड़िया मूल या गंड मूल , भर मूल के नाम से जानते हैं । इस दिन अषाढ़ मास की प्रथम मूलिया पड़वा के नाम से जानते हैं इस दिन दिन में सोना ,शयन करना वर्जित है कि कहीं कोई सोते वक्त अनिष्ट शक्तियों कुछ बुरा असर न कर जाय ।बाकी सभी तिथि नक्षत्रों के अधिष्ठाता मानव को सुरक्षा देने वाले 27 देवता 27 तिथि यों में विधाता ने मानव की सुरक्षार्थ नियुक्त कर रखे हैं । जिनके प्रभाव के अनुसार अनेक प्रकार के जीव सृष्टि में पैदा हो रहे हैं ।
जिस कारण कि इसमें मूल नक्षत्र में जन्म लेने वाला बालक /बालिका बिना देवी देवता के रक्षित होता है । स्व पराक्रमी बच गया तो , नहीं बचा तो , काल कवलित काल भक्षित हो जाता है । और यदि काल प्रकोप से बच गया तो असाधारण पराक्रमी होने से अक्सर कुल नाशक कुल घातक सिद्ध होता है जैसे रावण पुत्र अहिरावण, बिहवालक , नारान्तक , पुत्री सीता जो राम से ब्याही और रावण कुल को काल बनी , मूल नक्षत्र में जन्मे पुत्रों नारान्तक ,अहिरावण ,बिहवालक , पुत्री सीता का रावण ने अपने कुल नष्ट होने के भय से शिशु अवस्था में त्याग कर दिया था और जब ये तीनों पुत्र चौथी पुत्री सीता लंका पहुँच गये तो रावण के कुल नष्ट होने में समय नहीं लगा । यह किस्सा महर्षि बालमिकीय रामायण में दर्ज है ।
हिन्दू संस्कृति ज्योतिष में भर अषाढ़िया गंड मूल नक्षत्र में जन्मे बालक / बालिका को अच्छा नहीं माना जाता है जब से हमारे कुल में जिस जिस के वंश में मूल नक्षत्र और दुष्ट क्रूर नक्षत्र में बालक पैदा होते गये उनके पिता की प्रगति रुक सी गई है जबकि उन्होंने भोपा भड़ारे पंडितों ज्योतिषी जनों से शास्त्र सम्मत उपाय कराये परिवार की आर्थिक स्थिति जस की तस हैकारण का जब वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अध्ययन किया गया तो पता चला कि उनकी माँँये उग्र स्वभाव की चंडूलिका वैरायटी की दुष्ट कुलों से हैं जिनका भारतीय संस्कृति विचारों से वैर है जिन्हें श्रेष्ठ मानवीय समाज मूल्यों सहकार , सहयोग ,मिलनसारिता के प्रति अरुचि है और असामाजिक कृत्य चोरी चकोरी बेईमानी भ्रष्टाचारी तरीकों से निजी प्रगति को श्रेष्ठ समझती हैं , जिन्हें ज्ञानी जनों का अपमान करने में गौरव अनुभव होता है जो ज्ञान चर्चा में बाधा डाल कर ज्ञान चर्चा बंद करा देने में खुद को गौरवान्वित महसूस करती हैं ।ज्ञानी लोगों ,ज्ञानी कुलों से उन्हें सख्त नफरत /घृणा है ज्ञान दायक साहित्य को देखते ही उनका मिजाज मूँड़ खराब हो जाता है तो जाहिर है ऐसे परिवार में मूलिया संतति ही उत्पन्न होगी । अतः ज्योतिष शास्त्र के मूल पर इतना मानसिक रूप से निर्भर होने की आवश्यकता नहीं है जरूरत अपने दृष्टिकोण के बदलने की है।
द्रुपद नरेश के पुत्री द्रौपदी और पुत्र धृष्टद्युम्न का जन्म क्रूर नक्षत्र रेवती में हुआ था ,जिन्होंने जन्म पश्चात पिता द्रुपद को चिंतित त्रासित रखा अपने उज्जड्ड व्यवहार से शिक्षित होने के बावजूद और पांडव कुल को त्रासित किया , धृष्टद्युम्न ने गुरु द्रोणाचार्य को उस समय मारा जब वो युद्ध से विरक्त होकर इच्छा मृत्यु प्राप्त करने के लिए समाधिस्थ होकर बैठ चुके थे ।उसके इस कुकृत्य की सभी ने मिलकर निंदा की ,लेकिन वो शिक्षित उज्जड्ड बेपरवाह था उसने लोकनिंदा की परवाह नहीं की ।
अब इन नक्षत्र और उनके अधिष्ठाता प्रभाव दायी देवताओं के बारे में समुचित जानकारी फिर से ःः…
अषाढ़िया मूल का निऋर्ति (गंडमूल ), पूर्वाषाढ़ा का आपः (जल ) , उत्तराषाढ़ा का विश्वेदेवाः , श्रावण का विष्णु , धनिष्ठा नक्षत्र का वसु ( अषटवसु भीष्म वर्णा ) शतभिषा नक्षत्र का वरुण (शत्रु पीड़क ) , पूर्वाभद्राका अजैकपात (अकारण आपदा लाने वाला कृष्ण वर्णा ) उत्तराभाद्रपदा का अहिर्बुधन्य ( अक्ल के होते बेअकली के जैसे काम करनेवाला ,शिक्षित गँवार ) रेवती नक्षत्र का पूषा (मलीया ढाँचू ट्टीका खिलौना ,निकम्मा आलसी भीरु डर्रू /शत्रुओं को हितकारी ) अश्विनी नक्षत्र का चरक ( पोंनपा मुफ्त में इलाज करके दरिद्रता में जीवन जीने वाला ) भरणी नक्षत्र का ( यम /अमर्यादित व्यवहार से खुद पर कुल पर आपत्तियाँ लाने वाला झगड़ू ) कृतिका नक्षत्र का अग्नि (खुद को कुछ को दूसरों की क्रोधाग्नि में जलाकर खुश होने वाला इसे लड़ाई में मजा आता है अति प्यासा ) रोहिणी नक्षत्र का प्रजापति (शासकीय सेवा सुविधाएं मुहैया कराने वाला ) मृगशिरा नक्षत्र का चंद्रमा (भीरु शीतल पराक्रम हीन ) आद्रा का रुद्र (उग्र प्रचंड स्वभाव विशेष ज्ञानी राहु वर्णा ) पुनर्वसु नक्षत्र का अदिति (अच्छे हों या बुरे सभी की मंगल कामना करनेवाला) पुष्य का वृहस्पति (विशेष ज्ञानी विस्तार वादी भावना से युक्त ) आश्लेषा का सर्प (सभी को नियंत्रित करने में दक्ष ) मघा नक्षत्र के पितर (बड़े कुल की कामना /इच्छा रखने वाले राजनीतिक ) , पूर्वाफाल्गुनी का भग ( विशेष मिलनसार ) , उत्तराफाल्गुनी का अर्यमा (हर समय लड़ाई को/मिलन को आतुर ) , हस्त नक्षत्र का सूर्य (स्वामी वर्ण ) चित्रा का त्वष्टा (कलाकार) , स्वाती का वायु ( फुर्तीला भ्रमणशील ) , विशाखा नक्षत्र का इन्द्राणी ( दूसरों को ऊर्जा वान /कार्यों में व्यस्त रखने वाली /वाला ) , ,अनुराधा नक्षत्र का मित्र ( राधा भाव अकेले न रहने वाला ), जेष्ठा कि इन्द्र ( सिंह वर्णा , सिंह स्वभाव ) ॥
उल्लेखनीय बात यह है कि गीदड़ों के घर हिरनों के घर माँसाहारी/धावक होते हुए कभी भी सिंह और व्याघ्र जैसे पराक्रमी विद्युत वर्ण संतान पैदा नहीं होती है चाहे गीदड़ी / हिरणी पूष में ब्याये या जेष्ठ में ब्याये । सिंह और बाघों के कुल में कभी भी हिरण /गीदड़ जैसे डरपोक पैदा नहीं हो सकते जो कुत्तों भेड़ियों और लकड़बग्घा से डर कर भागने लगें ।अतः नक्षत्रों को इतना बलवान न माना जाय कि पुष्य नक्षत्र में कंगाल भीरू के घर वृहस्पति और शुक्राचार्य पैदा होंगे ।
यह ज्योतिष नियम प्राकृतिक रूप से जन्म लेने वालों के लिए हैं ।
उनके लिए नहीं जो समर्थ समृद्ध होने पर बल पूर्वक डाक्टर के द्वारा शल्य चिकित्सा /सर्जरी से बच्चों को इच्छाशक्ति नक्षत्र में पैदा करवाने लगें ।मेरे एक परिचित के साथ धोखा हो चुका है उसके घर पुष्य नक्षत्र में कम दिमाग पुत्र पैदा हो चुका है । इस लेख को पढ़कर अपनी पत्नी /स्त्री पर अकाल अकारण समय पूर्व संतान पैदा करने का दबाव न बनाया जाय । विधाता सबसे बड़ा नियंत्रक है । बच्चे में सामान्य प्रसव के दौरान ही संघर्ष करने कुछ नया जन्म जीवन विकल्प ढूंढने की खोजी प्रवृत्ति का विकास होता है ।जो बच्चे बिना संघर्ष के आपरेशन से पैदा होते हैं वे उतने संघर्ष शील नहीं होते है ।जितने जुझारू कर्मठ बच्चे सामान्य प्रसव से पैदा होते हैं ।
अतः इस लेख को पढ़कर अमानवीय कृत्य बच्चों को उत्तम नक्षत्र में पैदा करने का रिस्क न लिया जाय मेरे सुझाव और चेतावनी के बाद भी यदि कोई ऐसी मूर्खता पूर्ण कार्य करता है तो वह अपने बुरे हाल हवाल का खुद जिम्मेदार होगा ।

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