जी हाँ , मनुष्य का तो मैं प्रमाण नहीं दे सकता ।लेकिन एक पशु के एक्यूपंक्चर से बधिया /खस्सी करने का प्रमाण है मेरे पास ःः
घटना लगभग चालीस वर्ष पुरानी है ।मैं कृषक परिवार से हूँ हमारे घर बचपन में गाय भैंस बैल भैंसा सभी होते थे ।हमारे घर पर ही जरूरत के समय पशुओं को बधिया करनेवाले बंजारा लोग आकर पशुओं को बधिया किया करते थे ।बधिया प्रक्रिया में नर पशु के युवा अवस्था में अण्डकोश चकला बेलन द्वारा मसल कर फोड़ दिया करते थे ।पशुअस्पताल में डाक्टर पशु के अण्कोश को लोहे के शिकंजे में कसकर फोड़ते थे पशु अण्कोश के फूटने की पीड़ा से रंमभाता तड़फता था ।मुझे बुरा लगातार था बाद में मैं बड़ा होकर इसका विरोध करने लगा ।
मेरी बात मानी गई घर पर बछड़ों का बधिया करना कर्म बंद हो गया ।लेकिन अब चाचाजी ने बछड़ों को बधिया करने का दूसरा विकल्प ढ़ूंढ़ लिया था । वह था एक्यूपंक्चर मैथड जिसको करने को एक बंजारा आता था वह बछड़ों और छोटे आयु के बाल अवस्था के भैंसों के कान में एक लोहे का छल्ला कान की किसी नस को बींध कर डाल दिया करता था बाद में वह कुछ समय बाद लगभग एक साल के दौरान कान की नस बिंधा हुआ बाल बछड़ा ,बाल भैंसा अपने आप बधिया हो जाता था ।वह बाल बछड़ा बाल भैंसा इस पीड़ा दायक कर्म अण्डकोष फोड़ने की पीड़ा से मुक्त रहता था । उसके इस कान की नस को बींध कर बछड़े और भैंसा को बधिया करने से हम सभी अपने अपने कानों की सुरक्षा के प्रति जब से लेकर आज और अब तक जागरूक हैं किसी को भी अपने कान छूने ,कानों पर हाथ नहीं लगाने देते हैं ।
खस्सी की प्रक्रिया में बकरे के सूअर के अण्कोश को ब्लेड से चीरा लगाकर निकाल दिया जाता है ।
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