क्या "प्रजाति" एक मिथक है? वर्तमान समय में इसकी क्या प्रासंगिकता है?

जातिके बारे में यदि चौरासी लाख जाति की संख्या की जानकारी प्राप्त करनी है तो रामचरित मानस बंंम्बई वाली वैंकटेश्वर स्टीम प्रैस में देखें ।
विज्ञान की जैविक जातियों की संख्या जो पौधे और प्राणियों को मिलकर बनती है उसकी संख्या जैवविविधता के अनुसार लाखों में नहीं ,करोड़ों में हैं जिनमें से कुछ जातियों पूरी तरह से विलुप्त हो चुकी हैं ,कुछ विलुप्ती के कगार पर हैं।रैड डाटा बुक में दर्ज हैं आशा है कि यदि इन्हें बचाने का प्रयास नहीं किया गया तो ये भी भविष्य में लुप्त हो जायेंगी डायनासोर की तरह ।
अब जाति की वह धारणा जिससे मैं सहमत हूँ जरूरी नहीं कि आप सहमत हों ::::—-पतंजलि योग दर्शन के अनुसार चौथे पाठ कैवल्य मत के अनुसार ? ,ईश्वर बड़ा किषान है और धरती का किषान छोटा सा ईश्वर है जैसे किषान अपनी मर्जी के अनुसार एक जाति के पौधे फसल को बोता है और बिना अपनी मर्जी के उगे पौधों खरपतवार को नष्ट करता रहता है उसी प्रकार से ईश्वर भी अप्रिय पौधे जीव धारियों को समय असमय समय उपयोगिता के अनुसार नष्ट करता पैदा करता रहता है एक खेत /एक क्षेत्र में । कोई किषान किसी फसल को बोता है तो किसी को कोईऔर फसल पसंद है क्षेत्र की मिट्टी के अनुसार सभी किषान एक फसल नहीं पैदा करते फसल विविधता किषान को पसंद है उसी प्रकार से ईश्वर को सभी जीवों की जातियों की उपस्थित पसंद है ।अब एक जैसे जीव समूह की एक जाति पर ।। किषान एक खेत में एक जैसे पौधे बोता है सभी को एक जैसी मौलिक सुविधा समान जल खाद देता है सूर्य सभी को एक जैसी धूप देता है वायु सभी को एक समान स्पर्श दबाव देती है ,लेकिन सभी पौधों का जीवन/भाग्य एक समान नहीं होता है कुछ सामान्य से ज्यादा बढ़ जाते हैं कुछ सामान्य ,कुछ सामान्य से कम बढ़ते हुए अपना जीवन पूरा करते हैं तो कुछ का जीवन भी पूरा नहीं होता है अकाल मौत असमय मरते हैं तो कुछ को समय्क पानी नहीं मिल पाता क्योंकि वो खेत में ऊँची जमीन टीले पर उगे हैं तो कुछ सिंचाई के समय निंचले स्थान में उगने से पानी की अधिकता से भी मर जाते हैं ।। कुछ ऐसी ही कहानी मनुष्य की और अन्य जीवन धारी पेड़ पौधे प्राणी धारिओं की होती है आपत्तिजनक हालत में शिकायत करने चीखने चिल्लाने के बावजूद मरने /क्षतिग्रस्त होने की ।और कुछ पर आपत्तियाँ आती ही नहीं ।
बृहदारण्यक उपनिषद के अनुसार जाति की परिभाषा कुछ इस प्रकार से है क्षत्रिय राजा प्रवाहण और ब्राह्मण पुत्र श्वेत केतु संवाद के अनुसार जो जीवन विज्ञान के जैव विकास पाठ से आंशिक तौर पर से मिलती है और पतंजलि योग दर्शन का कैवल्य पाठ में दर्ज है कि :::——- हम सभी इस भूमंडल के स्थिर स्थाई निवासी नहीं हैं यदि हम इस भूमंडल के स्थिर स्थाई निवासी होते तो हम जन्म मरण और रोग के दोषों से मुक्त अमर होते ।। हम किसी अज्ञात स्थान से यहां भूमंडल पर अपनी इच्छाओं के प्रभाव से आये हैं और अपनी इच्छा पूरी होने के बाद इच्छानुसार इच्छाशक्ति से इस लोक को परिवार को वंश को जाति समाज को धर्म को छोड़कर अवश्य जायेंगे जिसे मर या मौत, मृत्यु कहा गया है ।इस जन्म जीवन मृत्यु के बीच में हमें कुछ समय जीवन जीने का ऐसा मिलेगा जिसमें हम कुछ समय रुक कर स्थिरजीवी का अहसास स्थिरता स्थाई ,स्थिति का अनुभव करते हुए इच्छाओं की पूर्ति के लिए रुक कर कर्म करेंगे और इच्छा पूर्ति तृप्ति का अहसास फल प्राप्ति के रुप में करेंगे।
अतः जाति जीवात्माओं का वह क्षणिक स्थिर स्थाई समूह में रहने का समय है जिसमें वह एक निश्चित समय के लिए रुकता है और उस समूह घटक के अंश परिवार, वंश ,गोत्र, जाति ,धर्म क्षेत्र आदि में रुककर उस समूह के गुणों को अपने प्राणात्मा में धारण करता है जब वह एक स्तर की योग्यता को धारण/पूरित कर लेता है तो अपने अंदर विकास की रिक्ता की पूर्ति के लिए दूसरी श्रेष्ठ जाति मेंं चला जाता है या फिर प्रति शोध भावना से पूरित होकर जाति विद्वेष भावना से जाति स्तर से नींचे बैकफुट पर चला जाता है या फिर अपनी स्व जाति में रुक जाता है ।जैसे राष्ट्रीय सरकार के सिस्टम में आने के लिए सरकारी स्कूलों के पाठ्यक्रम की वार्षिक योग्यता एक कक्षा में एक साल तक अध्ययन करना पड़ता है ।जो स्कूल कक्षा की योग्यता पूरी कर लेता है वह अगली कक्षा में चला जाता है पास है जाता है जो स्कूल की एक साल की एक कक्षा की योग्यता पूरी नहीं कर पाता है उसे उसी कक्षा में योग्यता पूरी होने तक रोक लिया जाता है फेल कर दिया जाता है।स्कूल स्तर की योग्यता के साथ साथ जो अपने आप को किसी भी समाज जीवन विज्ञान विषय में पारंगत /कुशल /दक्ष कर लेता है वह अपनी दक्ष योग्यता के अनुसार प्रशासनिक, शिक्षा ,न्याय , तकनीकी ,पुलिस ,सैना आदि विभागों में नियुक्ति पाकर अपना जीवन अपनी अपनी योग्यता के अनुसार जीता हुआ जीवन में पद से आगे प्रगति करता है।पद पर बना हुआ रहता है पद से निंचे भी गिर सकता है सस्पेंड /मुअत्ततिल , टरमिनेट /बरखास्त होकर । इस प्रकार से यह जरूरी नहीं कि एक जाति जिसमें मान सम्मान मिला है उसी जाति में समय से पहले अपयश और अपमान भी मिल सकता है ।और कितनी ही सत्य निष्ठा मर्यादा से उस जाति में जीवन जिया जाय ,एक निश्चित समय बाद वह जाति छोड़नी पड़ेगी /होगी अपने आप अन्यथा सरकार रिटायर करके जीवन गुजारा भत्ता पैंशन देकर अधिकार हीन करके ,और ईश्वर रिटायर कर देगा जीवन से सतकर्म का भत्ता देकर ।
अतः प्रश्न कर्ता भाई जाति एक मिथक नहीं है बल्कि एक जीवन जीने की सत्य सत्ता है जो अमर अमिट स्थाई नहीं है ,क्षणिक है न जाने ,जाति एक सामाजिक व्यवस्था है समाज को समाज जनों के जीवन को चलाने की ।अब पुनः जीव विज्ञान से डरपोक बिल्लियों को क्या पता था कि एक दिन उन्हीं के कुल में से जो ज्यादा लड़ाई में विशेष योग्यता प्राप्त कर लेंगी वे शेर और बाघ मेंं बदल कर बिल्ली राजा से वन राज में बदल जायेंगी ।लोमड़ियों को क्या पता था कि लड़ाक लोमड़ी कुत्ता ,भेड़िया, लकड़बग्घा बन जायेंगी । वे तो आज और अब तक अहिंसा अल्प हिंसा ,मंद हिंसा के पाठ पर कायम हैं जबकि शेर बाघ ,भेड़िया ,लकड़बग्घा ने हिंसा में पारंगत होकर जंगल/वन्यजीवों के समाज में अपनी अलग धाक /डर /आतंक जमा रखा है कि इन्हें अकेले देखते हुए भी शाकाहारी समूहों में भगदड़ पड़ जाती है ।
एक जाति में से श्रेष्ठता के अनुसार दूसरी जाति उत्पन्न होती है जो प्रारंम्भ में प्रजाति कही जाती है और एक जाति की दो उप जाति होती हैं नर जाति ,मादा जाति । और जब जीवन संघर्ष में एक जाति दूसरी जाति को खत्म कर दिया करती है तो उस जाति पर आश्रित दो अन्य जातियों का जीवन खतरा /संकट में आ जाता है ।
जाति के बारे में विश्व प्रसिद्ध पुस्तक जो जीव विज्ञान की दी सिस्टमैटिक्स द्वारा अर्नेस्ट मायर लिखित पढ़ें ।जिसमें जाति चार चरण टाईपोलोजिकल कनसैप्ट (समान दिखाई देने वाले ) :: मौर्फोलोजिकल (एक जैसे समान शरीर वाले )कनसैप्ट :: ,लाईफस्टाइल/जीवन पद्धति (एक समान एक जैसे जीवन पद्धति खान पान ,चलने वाले ,एक निश्चित प्रकार के समूह में ,एकजैसे घरों में रहने वाले ,एक समान क्रियाओं की एक जैसी प्रति क्रिया देने वाले ,एक जाति विशेष प्रतिरूप पर एक समान क्रिया आक्रमण ,रक्षण,प्रति जागरूक, पलायन करनेवाले ,एक जैसे मलमूत्र का उत्सर्जन करनेवाले,):: जीन कनसैप्ट ( एक समान जीन संरचना 99.9 % ना कि 100% समान समरूप एक समान एक जैसा मैथुन पैटर्न अपनाने पर, शीघ्रातिशीघ्र निषेचन गर्भधारण एक समान प्रसवकाल प्रसवपद्यति , शादी पश्चात बिना डॉक्टरी इलाज के जल्दी बच्चे पैदा होना जल्दी जल्दी स्वास्थ्य संतान उत्पन्न होती है, एक समान बच्चे ,एकसमान पैतृक संरक्षण करनेवाले,विकास में एक समानसमय में परिपक्व हो गए ,एक समान नाड़ी बी एम आर और रक्त संचार पैटर्न, एक समान रक्त समूह ,एक समान पशुज योनि व्यवहार , एक समान वर्ग अभिनव अभिरूचि अभिवृत्ति ,एक समान गण मित्र मंडली , आदि अनेक गुण मिलने के बाद एक जाति का निर्धारण किया जाता है ।
जिस कारण से एक जाति में भी अनेकों कमी प्रदोष से उपजाति बनती है।उपजाति में भी अनेकों कमी विभेद प्रदोष से अनेक प्रजातियाँ बनती हैं ,जाति विषयक और ज्यादा जीव विज्ञानिक जानकारी चाहिए जाति विषयपर तो अर्नेस्ट मायर , ई एम रीड की जाति निर्माण स्पैशीएशन पढ़ें , भ्रामक जानकारी चाहिए तो समाज शास्त्र पढ़ें ।भारत के मनुष्य की जातिओं के बारे में गोत्र के बारे में बेसिक जानकारी लेनी है तो जाति भास्कर किताब पं०ज्वाला प्रसाद मिश्र लिखित पढ़ें ।
जाति का आधार वैज्ञानिक ज्यादा है सामाजिक भ्रामक अलग से है ।लगता है आपने जीव विज्ञान की अनुवांशिक शास्त्र, जीवों का जैव विकास पाठ नहीं पढ़ा है ।उसे पढ़ें जाति भ्रम धारणाओं से बचेंगे ।

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