केतु यानि रुंड धड़ सिर /शीश हीन ,विचार हीन जिसके पास अपने विचार नहीं होते हैं ।केतुप्रधान जातक छोटा सिर छोटा मुँह बड़ा शरीर शाकहारी स्वभाव अहिंसक व्यवहार श्रमिक वृत्ति केतु प्रधान जातक की पहचान है । ये केतुप्रधान स्त्री हो या पुरूष दोनों ही अपने विचार न होने से आजीवन दूसरों के विचारों पर आधारित होकर जीवन भर दास भाव से सेवक वर्णा गुलामी भरा जीवन जीते हैं दूसरों के आधीन होकर ,इसी गुँण से ये कैतुआ किंकर्तव्यविमूढ़ कहे जाते हैं । बुद्धि विवेक कल्पना शक्ति न होने पर या कम होने पर ये मूर्खों में गिने जाते हैं ।इनकी इस मूर्खतापूर्ण गुँण का उपयोग राहु प्रधान, इन्द्र वर्णा लोग अपने अपने हित के अनुसार करते हैं जिससे ये केतुप्रधान जातक भी बिना अक्ल के होते उपद्रवी झगड़ालू ओं में गिन लिए जाते हैं जबकि ये अपने लिए अपने हित की लड़ाई नहीं लड़ते ये सदैव दूसरों के लिए लड़ाई लड़ते रहते हैं ।या यूँ कहें कि इन मूर्ख जीवी लोगों की शक्ति का बुद्धिमान लोग अपने हित में उपयोग करते हुए इन्हें हानि ग्रस्त रखते हैं ।कभी धन की आर्थिक हानि ,तो कभी शारीरीक हानि, कभी मान हानि ,कभी द्रव्य /वस्तु /पदार्थ की हानि ,शरीर की हानि दूसरों की लड़ाई में अपने शरीर में चोट खाना यानि हर तरह की हानि को लेने स्वीकार करने को ही पैदा हुए हैं ये सामाजिक बैल , मनुष्य रुप में केतुप्रधान जातक स्त्री हो या पुरुष । इनका ज्योतिष विवेचन राहु विवेचना के बाद मे है ।
राहु माने मुंडी यानि सिर कल्पना शक्ति प्रधान जातक राहु की स्थिति नर लिंगीय शरीर में सिर ,सिर में नेत्र और मुख ,मुख में कृतंक दाँत है । बड़े नेत्र बड़े पुष्ट कृतंक दाँत बड़ा मुख राहु प्रधान जातक की पहचान है । हिंसक स्वभाव हिंसात्मक व्यवहार राहु का गुँण है । जातकराहु प्रधान स्त्री पर काबू पाना , राहु प्रधान स्त्री को काबू /नियंत्रण करना इन्द्र वर्णा पुरुष हो या इन्द्रणी स्त्री दोनों ही को कठिन होता है राहु प्रधान पुरुष को काबू करना /नियंत्रित करना इन्द्र वर्ण स्त्री हो या पुरुष दोनों को असंभव है क्योंकि राहु प्रधान स्त्री में पुरूष में गजब की कल्पना शक्ति होती है । फर्टाईलब्रैन , एक समस्या अनेक कल्पनात्मक संभव वैकल्पिक अनेक जबाब । इसी विशेष गुँण से राहु को राक्षसी ग्रह कहा जाता है जो अपनी रक्षा करने मेंं विशेष निपुण और उपद्रवी होता है । मानसिक वैचारिक युद्ध हो या शारीरिक शक्ति युद्ध ,राहु प्रधान स्त्री /पुरुष से जीतना आसान नहीं ये आसानी से हार नहीं मानते । एक मोर्चे पर के युद्ध में अपनी विशेष कल्पना शक्ति से अनेक युद्ध मोर्चे बना कर युद्ध आयोजन कर्ता को भ्रमित शक्ति हीन करदेते हैं । भले ही हानि उठानी पड़े ।
केतु मनुष्य को वज्र बुद्धि बना देता है ।ऐसा जातक अपने अलावा किसी की भी कोई अच्छी/बुरी ,अपने हित /अहित , दूसरों के हित/ अहित की की कोई बात सुनना पसंद नहीं करता है । उसका जीवन मंत्र घुन के समान होता है जो छिपा हुआ होकर अपनी मूर्ख बुद्धि से अपना नाश करता हुआ सदैब दुश्मनों को प्रसन्न करता है और जिससे इसकी मैत्री हो जाय या जोभी इसके साथ काल ,अकाल ,आपातकाल, आपत्ति काल में सहानुभूति पूर्वक साथ लगे उसका नाश /हानि तय /निश्चित है।राहु अपनी बुद्धि बल /कल्पना शक्ति से दूसरेओं का नाश करता हुआ अपना हित साधन करता है अपने शुभ चिंतकों / मित्रों का शुभ करता है । ये राहु कतु दोनों ही उपद्रवी राक्षस वर्णा ग्रह हैं ।जो सभी को पीड़ित करते /रखते हैं ।
केतु प्रधान जातक अपने शिखर कुल पितर माता पिता , सास ससुरसाहब गुरु आदि , भुज पितृ सम भाई बहन पत्नी , मूल पितृ पुत्र / पुत्री / शिष्य वर्ग /संतति पीढ़ी सभी के ऊपर आश्रित भार बनकर जीता है । यह पूरी तरह से उद्यम हीन निरुद्देश्य भीरु महा डरपोक , सदैव डर्रु कल्पना करके अपने सहयोगियों का हौसला गिराया /घटाया करता है उनको भी उद्देश्य हीन ,उद्यमहीन डरपोक बनाकर उनके जीवन स्तर को भी निंंचा /गरीब श्री हीन करके समाज में सदैव शत्रुओं को प्रसन्नता का कारण रहता है ।
समस्या तब और भी ज्यादा विकराल /भयंकर हो जाती है जब केतु प्रधान जातक कुल /परिवार में बड़ा पुत्र बनकर पैदा हो जाता है । इसकी मूर्खता बल के प्रभाव से कुल सहायक पितर बचपन में अपनी छत्रछाया छोड़ कर चले जाते हैं युवावस्था भुज पितृ साथ छोड़ दिया करते हैं इसके मूर्खतापूर्ण कर्मों से ,वृद्धावस्था में इसके मूर्खतापूर्ण कर्मों से इसके संतति पितर संतान भी इसका त्याग कर दिया करती है । पूरी तरह से यह अभिशापित जीवन जीया करता है ।अब जो भी भुज पितर पत्नी मित्र आदि या मूल पितर संतान आदि इसके साथ अपना जीवन जुड़े कर जीते हैं यह अपनी मूर्खता युति बुद्धि से उनका जीवन भी उपहास मय कर दिया करता है ।
अब चर्चा केतु की अध्यात्म ( ज्ञान अध्ययन ) क्षेत्र में जो जातक जीव बुद्धिहीन कर्महीन धर्महीन है तो गौर दें कि वह क्या आध्यात्म करेगा, उसका आध्यात्म तो जीवन भर सदैव प्रकाश में भी आधातम अर्ध अंधकार युक्त होता है । आपका आध्यात्म मेरे आध्यात्म से मेल नहीं करता है ।मेरे आध्यात्म के अनुसार जो जीव बुद्धिहीन बलहीन श्रमहीन कर्महीन धनहीन, ज्ञान हीनता से धर्महीन है वह कैसा कौनसा आध्यात्मिक प्राणी बनेगा यह मेरे दिलोदिमाग के स्तर से कुछ ज्यादा ऊपर जा रहा है। उस निकम्मे आलसी का आध्यात्मिक ज्ञान कैसा होगा जिसका जीवन दूसरों की कृपा पर निर्भर है ।केतु प्रधान जातक विशेष विपरीत लिंगीय आसक्त होता है पशुभावमय । यदि स्त्री केतु प्रधान जातक है तो उसकी सोच अक्ल पुरुष को देखते ही बंद हो जाती है और यदि पुरुष केतु प्रधान जातक है तो उसकी अक्ल सोच स्त्री को देखते ही बंंद हो जाती है अर्थात मनुष्यों में मनुष्यों का पशु , ना समाज की परवाह ना परिवार की ना जगहँसाई लोकनिंदा की ।
इस केतु प्रधान जातक के विचार पूरी तरह से अधोगामी वृत्ति के होते हैं जीवन में यह स्वयं तो प्रगति नहीं करता है न प्रगति दूसरों को करने देता है इसके पास अपने आध्यात्म की अपनी आध्यात्मिक किताब होती है इसको सारा समाज अपनी पत्नी में और सारा संसार अपने घर में नजर आता है ।यही दशा दिशा केतुप्रधान स्त्री जातक की होती है । इसमें मेरा अनुभव ज्यादा है ज्योतिष कम ।मैंने अनेक बुद्धिमान निर्धन असहयोगी कैई जातकों के जीवन का निकटता से अध्ययन किया है।
आपके मतानुसार जो भी बाबा लोग घूम रहे हैं समाज में आप उनको आध्यात्मिक मानते होंगे उनको अपने मत से ।लेकिन मैं उनको आध्यात्मिक नहीं मानता। मेरा आध्यात्म ःःकर्म करो सफल बनो परिवार का समाज का हित करो भला करो कल्याण करो ।मैं समाज को उपयोग ई मनुष्य को परम आध्यात्मिक मानता हूँ । मैं उस आदमी को कतई आध्यात्मिक नहीं मानता जिसने अपने परिवार को त्याग दिया और दूसरे परिवार ओं के बुद्धि हीन भ्रमित लोगों को अपने वाक कौशल प्रज्ञा बल से सम्मोहित कर के अपना बाबा परिवार बनाया जिसमें वह बाबा परिवार का मुखिया पिताजी है और बाकी सब शिष्य मंडली उस पिताजी बाबा की बैल है उसके पास उसका अपना निजी परिवार नहीं है । अपने निजी परिवार में न माँँ ह न बाप ह न पत्नी ह न बहन ह न पुत्र पुत्री शिष्य हैं जो समाज को ब्रह्म ज्ञान के बदले भ्रम ज्ञान देकर समाज के धन से शिष्यों के धन से अपनी जीविका चला रहा है ।सिर्फ और सिर्फ झूँठे शब्द देकर तु नः मु नः का ज्ञान देकर समाज पर परिवार पर भार /बोझ बनकर अपना जीवन जी रहा है समर्थ होते हुए ।
No comments:
Post a Comment