वयस्क होने का सबसे बड़ा नुकसान क्या है?

प्यार में ,सहानुभूति में , सामाजिक संवेदनशीलता में कमी
परिणाम अकेलापन, एकांकी फील /महसूस करना समाज में परिवार में सामूहिकता में रहते हुए भी अपने को अकेला असहाय महसूस करना । जी हाँ यही है मेरे विचार /मति से वयस्क होने की सबसे बड़ा नुकसान ,जिसके बारे में कहा जाता है कठिन उमर किशोरी /किशोरों की ।
मानव ने बुद्धि विकास की एवज में मनुष्य होकर जो हानि उठाई वह जीवा जीवंत जीवानंद में इतना गिर गया कि जीवन का आनंद लेने में मनुष्य पशुओं से भी पिछड़ गया। प्रमाण है आत्महत्या गुँण जो जीवन से निराश होकर मनुष्य में पाया जाता है ,अधिकतर आत्महत्या मनुष्य / लोग अपनी वयस्क अवस्था में जवानी के दौर में जीवन से निराश होकर मनुष्य किया करता है कोई भी पशु जीवन से निराश होकर जीवन में हानि /नुकसान से दुखी होकर आत्महत्या नहीं करता है ।सभी पशु आत्मविश्वास से भरपूर होकर जीवन आनंद से जीते हैं शान से अपने परिवार में ,अपने समाज में । ऐसे कोई नियम नहीं बनाते हैं पशुओं ने अपने समाज में कि जिससे जवानी अभिशाप बन जाए जीवन में ।जवानी के अहम् कार्य को जवानी की भूल का खिताब देकर जीवन में जवानी से जवानों से घृणा /नफरत की जाए । पशु अपने जीवन में किसी तरह की कोई भूल नहीं करते जवानी में ,पशुओं की हर संतान वैध है पशुओं में अवैध संतान नहीं होती है ।। इस क्षेत्र में जवानी के जलवे दिखाने में पशु सदियों से आगे हैं मनुष्य से ।
इसका कारण है प्रकृति और समाज का अपूर्णता का नियम जिसके कारण आपको एक चीज देने से पहले ही आपसे उसकी पूरक एक चीज ले ली जाती है और एक चीज मिलने के बाद आपसे उसकी दो पूरक /सहायक /आवश्यक चीज छीन ली जाती हैं ताकि आप सदैव कमी अनुभव करते हुए अपना जीवन अनमने ढंग से उदास भाव से उद्देश्य हीन भ्रमित होकर भ्रमण करते जियें जीवन में पूर्ण आनंद लेकर अपने जीवन की स्वाभाविक गति को न रोक दें ।
जैसे भूख लगने पर मन चाहा प्रिय भोजन मिलने पर अधिक परिमाण में खा लिया जाता है तो नींद /सूक्ष्म मृत्यु आकर लम्बे समय तक भोजन इच्छा कर्म इच्छा को रोक देती है । ।,मन चाही मनपसंद सुन्दर पत्नी /पति मिल जाये तो वे दोनों अपूर्ण लिंग नर नारी एक दूसरे को मित्थया भक्षण कर्म मिथुन /मैथुन क्रिया द्वारा पूर्ण युगल अवस्था में लम्बे समय तक अपना जीवन अपना समाज अपनी जिम्मेदारी अपना दायित्व भूलकर दोनों एक दूसरे में खो जाते हैं एक दूसरे में समाने का प्रयास करने लगते हैं यौनसंबंध ओं के दौरान यौनक्रिया यौनव्यवहार से संतुष्ट होते हुए यौनाकांक्षा प्रभाव से यौनानुभूतियों द्वारा यौनानन्द में सिमट कर भूमा अवस्था में क्षणिक मृत्यु सूक्ष्म निद्रा में चले जाते है गिर जाते हैं भूमि पर दोनों ही ,दोनों नर नारी लिंग धारियों की क्षणिक मृत्यु यो जाती है ।
जिससे जीवन में कुछ न कुछ कोई न कोई कमी बनी रहेऔर आप अपने जीवन को रिक्तता की पूर्ति की चाह में आगे की सोच निरंतर जारी बनाये रखें , इच्छाएँ हमारे मन में बनी रहें इच्छाओं को को पूरा करने की इच्छाशक्ति हमारे जीवन नियंत्रण कर्ता मन में बनी रहे मन दुनिया में समाज में परिवार में इच्छा पूर्ति करने में लगा रहे ।
जी हां यहीहै ःःःः जीवन जीवा मंत्र जिससे आप औंर हम सभीजीवन भर पीड़ित रहते हैं पैदा होने से लेकर मरने तक ,जैसे पैदा होते समय मन में सिर्फ इच्छाएं होती हैं कैसे पूरी होंगी?यह मूल प्रश्न उस पैदा हुए बालक में डला होता है भूखा के रुप में तभी उसकी माँ उसके सम्मुख अपना स्तन दुग्ध स्रोत प्रस्तुत करके उसे बता दिया करती है तेरी भूख इच्छा पूर्ति का संसाधन तेरे पास नहीं मेरे पास है और वह शिशु भूखा होने पर भूख इच्छा पूरी करने का संसाधन अपनी माँ को ढूंढने लगता है ।युवावस्था पूर्व जब उसे लिंगभेद का ज्ञान होता है वह सभी को अपने समान लिंगधारी नहीं पाया करता है तो उसमें विपरीत लिंगधारी के प्रति पहले जिज्ञासा फिर मिलन इच्छा भाव से आकर्षण पैदा होता है ।अब इस वयस्क /युवा अवस्था में प्रकृति उसे बल बुद्धि तो देती है लेकिन कर्म के परिणाम का विवेक हर लेती है वह गवरू आँखों के होते अन्धा कानों के होते बहरा मन के होते बेमन का बैचेन आत्मा होजाता है।और अपूर्ण लिंग धारी से मिलकर प्रसन्न होता है उसके आकर्षण प्रभाव क्षेत्र में आते ही उसकी निकटता से और प्रयास कर देता है उससे मिलकर पूरा होने का ,मिलकर भी पूरी तरह से मिल नहीं पाता और गाना /गीत शुरू हो जाता है —तुमसे मिलकर ना जाने क्यों और भी कुछ याद आता है । इसी मिलन समारोह में संशय में उन दोनों के बीच में तीसरा /तीसरी आ जाता है अब कमी का परिमाण परिणाम परिवार बढ़ता है परेशानी बढ़ती है और जीवन जीवा चल पड़ता है बुढ़ापे की ओर कर्म करता तरह तरह की जिम्मेदारी दायित्व मन में लेकर तभी प्रकृति उस जीवन जीवा से क्रूर मजाक करती है पहले बल क्षय होने से अशक्तता कमजोरी महसूस होती है फिर बुद्धि क्षय से दिमागी कमजोरी आती है जिस लिंग धारिता पर उस जीवा को गर्व था कि तू नर है मर्द है उससे उसकी अपनी लिंगधारी पहचान धूमिल होने लगती है जननांग मृतवत् क्षमता हीन हो जाते हैं ।
अब जब बुढ़ापे से पूर्व में ज्ञान विवेक पर्याप्त मात्रा में अपने जीवन जीने लायक आता है तो शक्ति हीनता आती है इच्छाएं अधिक होजाती हैं इच्छाशक्ति अधिक होती जाती है शरीर की इन्द्रियाँ धर्म हीन शरीर गति मे असमर्थ होजाता है इच्छा पूर्ति के लिए शक्ति में कमीपड़ने से यह समस्त इच्छा पूर्ति का संसाधन शरीर इच्छा धारण स्मृति में कमजोर होने लगता है अब यदि इच्छाएं हैं परन्तु इच्छा पूर्ति में शरीर समर्थ नहीं तो जीवन इच्छा धारी जीवा इच्छा छोड़ने लगता है बल बुद्धि क्षयकारी समस्या पहले से हैं तो वह जीवा राम नाम सत्य मार्ग की ओर चल पड़ता है ।
तुम जवान होने पर जवानी की हानि नुकसान का आँकलन करने में लगे हो पर । मैं । तो भाई जवानी के जलवे याद करता हूँ और जवानी की भूल सुधारने के प्रयास में हूँ कि किस कारण से जवानी गई ताकि गई जवानी फिर से आये , और मेरा प्रातःकालीन मंत्र है ःःजीवा जवानी जिन्दाबाद ःःए मुहब्बत जिन्दाबाद ःः।

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