आप निर्णय कैसे लेते हैं?

सही निर्णय लेने के लिए कुछ शब्दों की सही सटीक जानकारी का होना जरुरी है:-कर्तव्य बोध ,किंकर्तव्यविमूढ़ ,किंकर्तव् ,किंकर, किंकिनि आदि निजी मानसिक अवस्था विवेचना संबंधी जानकारी स्वयं की स्वयं को होनी चाहिए ।
सही निर्णय के लिए अपराध विवेक का ज्ञान , (सामाजिक कर्तव्य ) और प्रज्ञा (निजी कर्तव्य )तथा इन दोनों के बीच की समय्क स्थिति ( अष्टांग योग ::यम (मर्यादा हीनता ) नियम (मर्यादा शीलता ) आसन्न ( वास्तविक स्थिति ) प्राणायाम ( कर्म के समय प्राण ,आत्मा , शरीर के मध्य सहयोग ) प्रत्याहार /प्रत्याहरण (समय्क वितरण : अन्न जमीन पशु स्त्री को पुरुष /पुरुषों को स्त्री ) धारणा (हित /अहित कथन ज्ञान ) ध्यान (स्मृतियों का /नियम यम कानून का ज्ञान ) समाधि (कर्म करने के बाद परिणाम प्राप्ति पश्चात भी कर्म कर्मी की निरंतरता बनी रहना ) अर्थात समाधि के लिए नीति रीति अनीति कुरीति का परिवार कुल समाज जाति धर्म क्षेत्र प्रान्त राष्ट्र पर प्रभाव स्थायित्व की त्रिकालिक जानकारी , त्रिकालदर्शिता ज्ञान आवश्यक है ।
नीति , निजता से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक सीमित एक समान होती हैं ।
रीति , निजता से कुल और जाति तक सीमित होती हैं ।
कुरीति,निजता से कुल जाति स्तर तक सीमित होती हैं ।
अनीति, निजता से परिवार , कुल ,जाति ,धर्म ,संस्कृति, क्षेत्र राष्ट्रीय स्तर तक सीमाहीन मर्यादाहीन होती हैं । अनीति करने वाला सिर्फ अपने हित तक सीमित और दूसरों का अहित करने वाला परम स्वार्थी जीव होता है जिसे दूसरे दिखाई नहीं देते और ना ही दूसरों की चीख पुकार सुनाई देती है
पक्ष, अपने समर्थक लोग जो अपना विरोध न करें अपने अन्याय को मौन पूर्वक सहन कर लें ।
विपक्ष,विरोधी प्रवृति के संघर्ष धर्म के मानने वाले जो अपने न्याय और सही सत्य सत्ता को सहन नहीं करते हैं।
तटस्थ ;जिनके लिए पक्ष विपक्ष दोनों समान हैं, किसी से प्रेम नहीं ,किसी से वैर शत्रुता नहीं ।
अवैध (विरोध) :जिसे सभी अमान्य कहें सहर्ष स्वीकार न करें ।
वैध (सहयोग): जिसे सभी बिना तर्क वितर्क ,कुतर्क किए बिना स्वीकार कर लें
विशवसनीय ,:जिसे सभी बिना दिमाग लगाये /बिना देखे , बिना सुने स्वीकार कर लें ।
संवैधानिक व्यवस्था समर्थन % ता विवेक :-जो कभी भी 100% समर्थन की सीमा में नहीं आता ,मानव विरोध प्रवृत्ति के कारण 90 से75% पर नीति ,75 से 50% पर रीति ,50 से 25 पर कुरीति , 25 से 10%पर अनीति मानव समाज में सदैव व्याप्त विद्यमान रहा करते हैं शान्त सौम्य समय्क समाज में परिवार स्तर से आगे कुल, गोत्र, जाति, धर्म संस्कृति स्तर तक ।
परन्तु जब भी अविवेक के कारण दूसरे लोगों की अवहेलना करने से, दूसरों के प्रति सही ठीक सदभावना संवेदनशीलता न रखने से यह %ता अनुपात बदलाव होते हुए बिगड़ जाता है ।जिससे नीति रीति खतरे में आजाती हैं , नीति अनीति में बदल जाती है रीति कुरीति में बदल जाती है । लम्बे समय तक चली अनीति बाद में बदल कर नीति हो जाती है ।जब अनीति भय से लालच से स्वीकार कर ली जाती है ।वह नीति हो जाती है ।इसी तरह से कुरीति जब भय से लालच से निजी हित से स्वीकार कर ली जाती है तो रीति में बदल जाती है ।अर्थात नीति रीति रिवाज की सत्य स्पष्ट व्याख्या स्थिर स्थाई रुप में नहीं है ,दोनों ही परिवर्तन शील बदलाव गुँण युक्त हैं ।लोकतंत्र में की नीति रीति राजतंत्र में अनीति ,कुरीति कही जाती हैं जबकि राजतंत्र की नीति रीति लोकतंत्र में अनीति कुरीति कही जाती हैं ।
नीति, रीति के बदलाव होते ही परिवार कुल जाति धर्म समाज संस्कृति खतरे में आजाते हैं ।परिणामतः नीति अनीति में ,रीति कुरीतियों मं बदलने लगतीं हैं ।समाज सदस्यों का समाज पर से विश्वास कम होने ,उठने लगता है।और मानव समाज सदस्य के लोग परिवार ,कुल ,जाति, धर्म संस्कृति पर से लोगों का विश्वास हटने से लोग परिवार का, कुल का ,जाति का, धर्म का, संस्कृति का त्याग करने /छोडऩे लगते हैं अपना हित सुरक्षित न होने पर ,।दूसरों के परिवार में ,कुल में,जाति में, धर्म में, संस्कृति में जाने लगते हैं । दूसरों के धर्म जाति परिवार में अपने जीवन हितों की ,जीवन मूल्यों की सुरक्षा महसूस होने पर ।
अतः नीति ,रीति ,और अनीति ,कुरीतियों के %ता और बदलते जीवन मूल्यों ,जीवन हितों के प्रति जागरूक रहेंं और आवश्यकताओं के अनुसार अपने परिवार कुल ,जाति, धर्म संस्कृति क्षेत्रों के संचालक विधान नियम संविधान को आवश्यकता के अनुसार बदलाव करते हुए अपने परिवार ,कुल, जाति, धर्म, संस्कृति क्षेत्र समाज में स्थिरता शान्ति निरंतर सतत सत्य सत्ता बनाये रहें ।यहीहै आपमें सही निर्णय लेने की क्षमता , जिससे आपका परिवार कुल जाति धर्म संस्कृति क्षेत्र में सहष्णुता बनी रहेगी ,कम से कम विरोध संघर्ष होगा ।मानवजीवन और जीवन मूल्य, जीवन हित सुरक्षित रहेंगे आदर्श परिवार में ,कुल में ,जाति में ,धर्म में ,संस्कृति में शान्ति सुख समृद्धि बने रहेंगे ।ये सभी स्थिर स्थाई भविष्य में बने रहे ।
ब्रहम कुल नीति सदा चलीं आयीं । प्राण जाय पर वचन न जायी ।।ब्राह्मण कुल नीति/नियम प्रधान होता है।
रघु कुल रीति सदा चली आयी । प्राण जाय प्रण वचन न जायी ।।क्षत्रिय कुल रीति/अवसर प्रधान होता है।
बनिया कुल कुरीति सदां चली आयी । प्राण न जाये चाहे वचन ह जायी ।धनी कुल कुरीति/आसन प्रधान होता है।
शूद्र कुल अनीति सदां चली आयीं । प्राण प्रण /वचन सभी है जायी ।शूद्र कुल, वर्ग अनीति/स्वार्थ हित संधानी/नियम हीन ;यम प्रधान खतरनाक होता है ।सेवक कुल , श्रमिक कुल ,और शूद्र कुल * में पर्याप्त अंतर है।ये तीनों एक नहीं अलग अलग मंत्वयधारित लोग हैं।सेवक लोगों की श्रृद्धा निष्ठा विश्वास, वैधता दर्शनीय वर्णनीय होती है जैसे पन्ना धाय ,झाला सरदार ,हनुमानजी आदि ये लोग पूज्य ,सम्मानीय दर्शनीय, वर्णनीय ,श्रेष्ठ वर्ण होते हैं।
श्रमिक वर्ग कुल के लोग श्रृद्धा हीन ,निष्ठा हीन, विश्वास हीन, लेकिन वैधता पूर्ण होते हैं ये धन के आश्रित होकर धनस्रोत धनिष्ठा जनसानिध्य मेंं रहते हैं । शूद्र :: चारों वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य श्रमिक वर्ग के पतित /स्वामी हीन समाज समूह हीन लोग हैं जो धन के आश्रित होकर अधर्मी ,विधर्मी ,कुकृत्य धर्मी तरीकों से जीवन जीते हैं ।
यदि मानव जीवन सामान्य रूप से तौर तरीकों से जीया जाता है तो वह अपना जीवन नीति रीति रिवाज/कुल ,समाज, राष्ट्रीय नियमों के अनुसार जी रहा है । यदि मानव जीवन में तनाव ,बिखराव ,छिटकाव आ रहा है /उत्पन्न हो गया है तो इसका मतलब है कि उसके जीवन में अनीति ,कुरीतियां आ गई हैं ।उसने अब अपना जीवन कुल, समाज, राष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन करना शुरू कर दिया है ।उसके दैनिक जीवन में नियमहीनता आ गई है । जिससे उसके मन में अनेक अस्ंख्य दुविधा, शंका संदेह पैदा होने लगे हैं ।अब उसे न स्वयं पर जीवन विश्वास है, न समाज पर, न विस्तृत समाज राष्ट्र पर ,और न ही इन सबके संचालन कर्ता ईश्वर पर । उसका चित्त उदास ,उद्गिन ,खिन्न ,अशांत रहने लगता है ।
किसी भी सिस्टम /तंत्र के संचालन में नियम /कानून का महत्वपूर्ण योगदान है ये नियम /कानून तीन प्रकार के होते हैं ,,
सामान्य नियम :इनकी जानकारी जनसामान्य ,साधारण लोगों को होती है ,ये सर्वाधिक श्रम करते हैं।और अपने श्रम का न्यू नतम लाभ लेते हैं ।
विशेष नियम :इनकी जानकारी सिस्टम /तंत्र को चलाने वाले प्रशासनिक बाबू, अधिकारियों को होती है ।ये अल्प श्रम करते हैं और अधिक लाभ उठाते हैं।
गोपनीय नियम: इनकी जानकारी सिस्टम /तंत्र को चलाने वाले दिशानिर्देशक या बोर्ड ,सिस्टम संचालक ओं को होती है ।इस तृतीय भाव स्तर में रहने वाले लोग न्यूनतम श्रम करते हैं और अधिकतम लाभ लेते हैं। इन नियमोँ के सार्वजनिक होते ही /जन साधारण को इनका ज्ञान होते ही जन सामान्य लोग अतिरिक्त श्रम से बचने के लिए शार्ट कट लगाने लगते हैं ।जिससे विशेष नियम संचालन कर्ता संकट ग्रस्त होने लगते हैं ,सिस्टम हिलने लड़खड़ाने बिखरने लगता है।

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