गौमूत्र पीने के क्या फायदे हो सकते हैं ?

मूत्र तो मूत्र है शरीर का उत्सर्जन पदार्थ , जैविक विष है काम का होता तो शरीर के अंदर रहता , शरीर इसे बाहर क्यों निकालता ?
मूत्र चाहे गाय का हो , बच्चे का हो स्त्री /पुरुष का हो पीने के योग्य नहीं होता है । इसमें यूरीया /यूरिक एसिड /अमोनिया जैसे हानिकारक घातक जैविक विष रसायन होते हैं ,जो प्रोटीन के टूटने / डिएमीनेशन से और शरीर में बढ़ी अतिरिक्त कार्बनडाईआक्साईड के मिलने से बनते हैं । मूत्र के पीने से शरीर में यूरिया /यूरिक एसिड का स्तर बढ़ने से रक्त का शोधन संयंत्र वृक्क /गुर्दे /किडनी का कार्य अतिरिक्त रुप से बढ़ जाता है शुरू शुरू में बाल /युवा वस्था में पहले कुछ दिन तो दिक्कत /परेशानी महसूस नहीं होती है लेकिन जब मूत्र पीने की आदत /शौक बन जाता है जिससे शरीर में लगातार यूरिया यूरिक एसिड का लेवल बढ़ाना रहने लगता है तो शरीर के रक्त शोधक संयंत्र किडनी का कार्य अतिरिक्त रुप से बढ़ा रहने से किडनी अवसादित होने लगते हैं अपना काम धीरे-धीरे करने लगते हैं जिससे शरीर में से क्रियेटिन आर्निथीन जीव विषाक्त रसायन और कार्बन-डाई-ऑक्साइड जैसे हानिकारक शरीर के जैविक विषयों का निस्तारण /उत्सर्जन धीमा /मंद पड़ने लगता है जिससे शुरूआती दौर में शरीर में हल्की सूजन पैरों पर जलने से चढ़ने लगती है जो सोने आराम करने पर उतर जाती है। किडनी के मंदा काम करने से । बाद में यदि रक्त में यूरिया यूरिक एसिड अमोनिया का स्तर मानकों पर सही नहीं आता है तो हाथ पैरों पर सूजन स्थाई रुप से बढ़ने घटने रहने लगती है और अब किडनी के खराब होने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है ।
पहले दौर में जब किडनी धीरे धीरे खराब होते हैं तो उनमें स्टोन फार्मेशन /पथरी बनने लगती है या फिर दूसरे दौर में किडनी एक दम से अचानक कार्य करना बंद कर दिया करते हैं जिससे पूरे शरीर पर एक साथ सूजन स्थाई रूप से स्वत बढ़ने लगती है जिसे ज़हरबाद /नैफ्राईटिस /गुर्दोंका मरजाना कहते हैं जिसमें रोगी सही चिकित्सा हीमोडायलेसिस ( ब्लड प्लाजमा शोधन /रक्त शोधन ) न मिलने पर १५ से ३०दिन रोगी की जीवन अवधि शेष रह जाती है ।
रक्त में यूरिया के स्तर से अधिक बढ़ने से शरीर में कठोरता जड़ता बढ़ने लगती है विशेषकर वृद्धा अवस्था में , तो फिर युवा वस्था में यूरिया का मानक स्तर ।्बढ़ने से किडनी में कठोरता जड़ता बढ़ने से स्टोन /पथरी की रासायनिक फार्मेशन होगी /बढ़ेगी ।
ज़हरबाद /नैफ्राईटिस /गुर्दे फेल होने पर रोगी की अवधि तीस दिन , यूरिक एसिड बढ़ने से दस दिन ,और अमोनिया के बढ़ने से दो दिन है।
पशु गाय हो या मनुष्य सभी के मुख में , मूत्र मार्ग में तरह तरह के हानिकारक रोग दायक बैक्टीरिया, वायरस ,प्रोटोजोआ पाये जाते हैं जिन्हें आप नैट पर ओरल बैक्टीरिया ,प्रोटोजोआ , तथा एनल बैक्टीरिया,प्रोटोजोआ ,और वैजाइनल /यूरिनल बैक्टीरिया ,प्रोटोजोआ स्पैक्टर्म के फोटो और जानकारी पढ़ोगे तो मूत्र पान करना तो दूर की सोच है मूत्र पान के सपने भी देखना भूल जाओगे , और मूत्र पान की चर्चा वार्ता बंद कर दोगे । मूत्र पान की चर्चा वार्ता सुन न सकोगे ।
मूत्र पान का मेरे शब्दों में मतलब है बिना दुष्कर्म कुकृत्य किये बिना यौनांग को चूमना चाटना , मुख के अन्दर जीभ डालकर चूमना चाटना आदि कुकृत्यों की सजा बिना कुकृत्य किये मिल जाना अर्थात एस टी डी का S,T,D,सैक्सुअल ट्रान्सफैरेबिल डिजीज का प्रसार या फैलना , यही सब ओरल सेक्स , वैजाइनल सैक्स ,अनलकी सैक्स के द्वारा होता है ।और यही सब STD संक्रमण फैलने की संभावना बनती हैं मूत्र पान करते रहने से, । यानिकि अनहाईजैनिक रूल फोलो न करने पर ।स्वच्छता नियम न मानने पर ।
अब मूत्र पान मूत पीने का महात्म्य ःः
सभी जीवों के मूत्र में उनके सैक्स हार्मोन, विटामिन बी सी ,लिंग गंध फैरामोन ,अति अल्प न्यूनतम मात्रा में होते हैं जिन्हें प्राप्त करने को पशु एक दूसरे के यौनांग को सूंघते मूत्र पान करते कहीं कहीं नजर आते हैं जैसे भैंसा सांड कुत्ता आदि अपनी अपनी मादाओं के यौनांग को सूंघते चूमते चाटते ,उनका मूंत पीते नजर आते हैं ।वे पशु हैं मनुष्य नहीं उन्हें मूत्र पान के लाभ हानि नुकसान की विवेचना का पता नहीं ऐसा वे अपने शरीर हार्मोन के संयंत्र के अनुसार के अनुसार करते हैं । जैसे पुरुष हार्मोन की कमी होने पर अपने अंदर आक्रामकता लाने बढ़ाने के लिए मादाएं नर के यौनांग को सूंघने चूसने चूमने चाटने के अतिरिक्त नर का मूत्र पान वीर्य पीन को उद्यत तैयार हो जाती हैं यौन क्रिया करने से पहले क्योंकि उनके शरीर में वीर्य की कमी होती है , । तों नर भी अपने अंदर शान्ति स्थिरता लाने /बढ़ाने के लिए मादाओं के यौनांग को सूंघते चूमते चूसते चाटते के अलावा मादाओं का मूत्र पान करते मूत पीने रज स्त्राव चाटने को उद्यत /तैयार हो जाते हैं । यौन क्रिया में स्थिरता लाने लम्बे समय तक चलाने के लिए ,क्योंकि उन के शरीर में रज की कमी होती है । ये पशुओं के कृत्य है आदमी के लिए कुकृत्य हैं ।
सैक्स हार्मोन की कमी है , सैक्स हार्मोन का स्तर मानक से कम है तो यौन क्रिया में यौनक्षमता बढ़ाने के लिए बाजार में यौनशक्ति वर्धक दवाएं हैं चिकित्सक हैं उनका लाभ उठाएं ना कि मूत्र पान के पशुओं के फार्मूले से STD जैसे भयंकर खतरनाक हानिकारक मारक रोगों में फंस जायें वो भी सिर्फ मूत्र पान करके बिना मैथुन के यौनानन्द का मजा लिये बिना यौन रोगी बन जायें ,ये कौन सी समझदारी है मानव होने की ।
विकल्प चयन आपका निजी अधिकार है मैंने मूत्र पान की लाभ हानि विवेचना लिख दिया है ।
नोट ःः जिन पुरुषों के शरीर में रज की मात्रा अधिक हो जाती है वीर्य की कम हो जाती है वे स्त्रियोचित सम हो जाते हैं वे रज वीर्य की समानता लाने के लिए वीर्य को बढ़ाने के लिए दूसरे पुरुषों का वीर्य पान करते हैं कम वीर्य को समान करने के लिए अपने अधोमुख गुदा से वीर्य पान करते हैं गुदामैथुन कराकर ही स्टैमिना बनता है मैथुन करने का , इसी से उनमें स्फूर्ति और आक्रामकता आती है ।अर्धपुरुष ।
जिन स्त्रियों के शरीर में रज की मात्रा कम होती है वे रज पूर्तिके लिए दूसरी स्त्रियों का रज पान करती है ंंंंं उनकी योनि का रज स्त्राव चूस चाटकर ,और जिन स्त्रियों में वीर्य की कमी होती है वे पुरुष के वीर्य का भक्षण किया करतीं हैं वीर्य पान मुख से करके । यदि वीर्य पान करने पर भी उनका वीर्य स्तर नहीं बढ़कर सामान्य नहीं हो पाता है शरीर में स्टैमिना स्फूर्ति आक्रामकता नहीं आती है तो वे अधिक वीर्य पान के लिए गुदा मैथुन करवाने लगती हैं चंडूल स्त्रियां ।
नोट :::: वीर्य पान हो या मूत्र पान पशु का हो या मनुष्य का दोनों ही के सेवन से STD सैक्सुअल ट्रान्सफैरेबिल डीजीज /संक्रमण का खतरा बराबर बरक़रार बना रहता है ।तो मानव होने के नाते पशु समान आचरण व्यवहार करके खतरनाक रोगों में घिरना समझदारी नहीं है ।

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