अगर धरती पर पहला इंसान मनु था तो फिर जातिवाद भेदभाव कहाँ से आ गया, ब्राह्मण, ठाकुर, वैश्य, शूद्र, सब कहाँ से आये हैं?

किसी गांव में एक जाति के एक कुल का अध्ययन करना वो सभी जो एक परदादा की औलाद /संतान हों । उस कुल में भी तुमको ब्राह्मण (बुद्धिमान) ठाकुर (दबंग ) वैश्य (धनवान:सबको नियंत्रण में रखने वाले ) शूद्र (सबको निर्धनता के दोष से गाली देने वाले और उनको अपना कहने वाले ; बाइपोलर डिस्आर्डर दिमाग वाले कम्युनिस्ट बुद्धि के लोग ) श्रमिक /सेवक बुद्धि के लोग भी मिल जायेंगे ।
वे तो सभी एक बाप के बाप के भी बाप परदादा की औलाद हैं उनमें असमानता कैसे और क्यों आ गई । सोचना ।
जब सभी पढ़ें लिखे समान शिक्षित होते हैं एक शैक्षिक स्तर वाले लोग बी ए ,एम ए , दर्शन शास्त्र शिक्षा पढ़ें लोग तो उनकी बौद्धिक क्षमता में मानसिक स्तर में दिमाग के कामकाज करने के तौर-तरीकों में अंतर क्यों होता है ।जब सभी के सिर में दिमाग है तो किसी की रीजनिंग एबिलिटी ज्यादा होने से अफसर कैसे बनता है तो कोई मैमोरी / स्मृति अधिक और तेज होने से चिकित्सक, जज , शिक्षक कैसे बनता है ।
इतने इतने योग्य /काबिल लोग हैं समाज में तो सरकार ने तो उच्च पद के लिए न्यूनतम योग्यता रखी है सिर्फ ग्रेजुएट डिग्री फिर IAS,IPS,IFS फर्स्ट क्लास डिविजनर्स यहां महाग्रेजुएट, पोस्ट ग्रेजुएट , सुप्रीम ग्रेजुएट डिग्री धारक सभी क्यों नहीं अफसर बन जाते हैं ।
सरकारी सेवा में सर्वोच्च पद IAS सरकारी ब्राह्मण आदेश दाता IPS सरकारी ठाकुर सरकारी आदेश नियंत्रण करता IFS देश विदेश में कोआर्डिनेशन के लिए सभी को वशीकृत करने के लिए और देश की सबसे नीचे स्तर की सेवक स्तरीय सेवाएं जो इनके नीचे स्तर के आदेश पाल , आदेश पालक होते हैं । इतने उच्च शिक्षित होते हुए ग्रेजुएट डिग्री से ज्यादा शिक्षित उच्च कोटि शिक्षित समाज नियंत्रण करता अफसर क्यों नहीं बन पाते ?
ये सभी शिक्षा शूरमा जो ग्रेजुएट की तुलना में अधिक मात्रा में उच्च कोटि के शिक्षित दीक्षित हैं ये सभी मात्र ग्रेजुएट स्तर का टैस्ट क्वालीफाई करके IAS, IPS ,IFS जैसे सर्वोच्च सरकारी आदेश सेवा पद पर पहुंच कर सरकारी ब्राह्मण , सरकारी ठाकुर, सरकारी वैश्य क्यों नहीं बन पाते ।
अब राजनीति समाज की नियंत्रणकारी तंत्र व्यवस्था में नेता स्तर की समाज नियंत्रण की कोडोमिनैन्सी टैक्सोनोमिक हीरार्की सिस्टम पैटर्न व्यवस्था पंच परमेश्वर की स्तरिय व्यवस्था में साधारण पुरुष (सारे सभी नियम कानून इसको कंट्रोल करने को बनते हैं ) विशेष पुरुष (वि प्र : संघर्षशील कुछ नियम कानून मानता है कुछ को नहीं मानता है ) नेता पुरुष ( नियम कानूनों से खेलते हैं कभी फंस जाते हैं तो कभी छूट जाते हैं ) विधायक पुरुष (देश समाज को नियंत्रित करने को नियम कानून बनाते हैं लेकिन इनके लिए कुछ विशेष अधिकार होते हैं सीमा पर से हटकर ) मनु पुरुष (ये देश समाज नियंत्रण को कानून बनाते हैं कानूनों में बदलाव संशोधन करने वाले लेकिन खुद कानून की सीमा से परे ) इन्द्र पुरुष ( प्रधानमंत्री , राष्ट्रपति ) सभी को कानूनों से नियंत्रित करने वाले ।
ये सभी आदमी ही तो हैं किसी एक के भी निकट जाकर देख लेना और यदि ठीक से देखना /ज्ञान लेना हो तो इनको छेड़ देना पंगेबाजी कर लेना । इसलोक और परलोक का ज्ञान एक साथ इकठ्ठा मिल जाएगा ।भूल जाओगे एहमकी सवाल करना , भूल जाओगे ब्रामण, ठाकुर, वैश्य, शूद्र की शंका विवेचना करना ।
मेरे कुंवरपाल अंधेरे में ढूंढना , अंधेरे में तीर चलाने का काम बंद कर दो जो व्यवस्था का संचालन करता है उसे ढूंढने की कोशिश कर रहे हो , उसकी व्यवस्था को समझें बिना । पहले उसकी व्यवस्था को समझो फिर उससे अपने आप मिल जाओगे ।
अब ब्राह्मण ठाकुर वैश्य शूद्र समाज शब्दों की कीली टेस्ट को समझो ।ये सभी सिर्फ मात्र शब्द है जो जो गुंण और प्रभाव युक्त है ।बुद्धिमान बलवान धनवान, सेवा वाहन और चर्चाए ज्ञान प्राप्त है जिसके अनुसार नाम,कर्म , धर्म, धंधा , झंडा डंडा गुण प्रक्रिया मय है तो ठीक । नहीं तो बेठीक है जैसे ब्राह्मण ह बुद्धिमान नहीं भिक्षायापन करता है तो कोनसा कैसा ब्राह्मण ह जो स्वयं वृत्ति हीन ह वो औरों को क्या वृत्ति /रोजी देगा । ठाकुर है लेकिन भीरू डर्रु वो औरों को करता जीवन शक्ति /निर्भयता देगा । वैश्य है धनहीन वो औरों को क्या सेवा सुविधाएं उपलब्ध करायेगा । सेवक है और सेवा दिये बिना सेवामूल्य धन ऐंठने लगे तो कैसा कौन सा सेवक ।अब रही शूद्र विवेचना तो ये बने ही स्वंय दुखी रहते हुए दूसरे लोगों को भ्रमित करने गाली देने को हैं । इनका सही विवरण यजुर्वेद के अध्याय ३० के अन्तिम श्लोक में कहा है जो अज्ञान प्रसारी ब्राह्मण,भयदायक ठाकुर,बाधादायक वैश्य , बिना सेवाश्रम के धनमूल्य ऐंठने वाला सेवक ह उसे शूद्र कहा है ।

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