वासना मन का रिक्त भाव है , जिसमें असंख्य अनंत वासनाएं पूर्व के कर्मों के फल की पूर्ति की आशा में जीव आसक्ति भाव से जन्म लेकर जन्म की आवृत्ति प्रक्रिया से स्वयं ही वासना पूर्ति स्रोत पृथ्वी पर भौतिक भूतिक अपभ्रंशित जग में दो रूपों में दृश्य अदृश्य अवस्था में अदृश्य सत्ता के काल नियम से पैदा होते मरते रहते हैं । इन वासनाओं के मन में अधिक परिमाण में भरे होने पर जीव जल्दी जल्दी जन्म मरण के चक्र में अनियंत्रित होकर पशुमनस्थति रुप से जल्द मरता पैदा होता रहता है जिससे पशु ओं की आयु कम होती हैं परंतु जिस जीव के मन में वसनाएं कर्मसंस्कार कम और नियंत्रित होते हैं वह मानव मन स्थिति रुप में देरी से मरता पैदा होता है जिसे जीवन बाद की जीव की विश्राम अवस्था कहते हैं जिसके कारण मानव की आयु लम्बी होती है ।परंतु जिस जीव के मन में वासनाएं कर्मसंस्कार न्यून कम नियंत्रित होते हैं वह मानव उच्च मानव देव /दानव की मनः स्थिति के अनुसार देरी से मरता है अपनी आयु को अधिकतम रुप से जीता हुआ देरी से मरता है देरी से पैदा होता है देवता और दानव रोज रोज नहीं पैदा होते हैंमन में भरी वासनाओं के अनुसार पैदा होते हैं ।
अब वासना की जड़ तो बाद में खोजेंगे पहले वासना को यदि ढंग से समझ लिया जाय ,वासना के मूल बिंदू को पहचाना समझा जाय , मेरे विचार से वासना जीवों के मन में छिपे कर्म कारक ,संस्कार होते हैं जिन में से हम कुछ अपने जन्म के साथ लेकर पैदा होते हैं आँशिक रूप में पूर्ण रूप से नहीं लिये होते कुछ कर्मकारक संस्कारों को हम अपनी माता पिता भाई मित्र परिवार पड़ोसियों से पत्नी परिवार समाज रिश्तेदारओं से कुछ अपने सानिध्य में रहे पशु पक्षियों आदि जीवों से सीखते /अपनाते हैं ।यदि हम जन्म के साथ/समय पूरे के पूरे कर्म संस्कार लेकर पैदा हुए होते तो हमें माता पिता से गुरु से पड़ोसियों से मित्र मंडली से कुछ भी सीखने की जरूरत नहीं होती ।लेकिन पशु अपने साथ अपने पूर्व के अधिकतम संस्कार अपने साथ लेके आते हैं इसलिए उन्हें अपने माता पिता गुरु पड़ोसियों मित्र मंडली से ज्यादा कर्म विधा संस्कार सीखने की जरूरत नहीं पड़ती ।मन में अधिकतम वासनाओं के भरे होने से मन उन पर नियंत्रण नहीं कर पाता जिस कारण पशुओं में मन इच्छा नियंत्रण हीनता का गुँण होता है ।
मन में भरे कम मात्रा में कर्मसंस्कारओं के कारण हमारे मस्तिष्क में रिक्तता अधिक होने से मानसिक अलमारियों में भरे अपूर्ण विडियों को अपने हित से पूर्ण करने की इच्छा हमारे मन में हमारे संस्कार के रूप में व्याप्त होती है ।अर्थात हमारे मन मस्तिष्क में अपूर्ण संस्कार /अपूर्ण विडिओ भरे रहते हैं जिनको पूरा करने की इच्छा वासना कही जाती है ।अर्थात वासना की जड़ हमारे मन में मस्तिष्क में भरे वे आधे अधूरे विडिओ /अधूरी मानसिक फिल्में हैं।जिनको पूरा करने को हम बैचेन व्यग्रता से उग्र रूप में चिंता चिंतन करते हुए तनाव युक्त होकर प्रेरित होते हुए अपना जीवन मन में भरी वासनाओं के अनुसार जीते हैं । यदि ये वासनाएं मन के सक्रिय रूप चेतन मन स्तर पर होती हैं तो मानसिक तनाव ज्यादा व्यवहार उग्र होता है और इसे हमारी मानसिक जागरूकता कहा जाता है।और जब ये वासनाएं मन के सक्रिय स्तर जागरूकता से पूरी नहीं होती हैं तो एक निश्चित समय अवधि बाद धीरे धीरे से मन के अक्रिय रुप अवचेतन स्तर पर आन्तरिक मन में गहनतम विस्मृत रूप से बैठती जाती हैं जिनको पूरा करने का प्रयास प्रकृति और अवचेतन के सहसंबंध से समय समय पर पूरी होती रहती हैं मन शान्त ,व्यवहार सौम्य, तनाव मंद,जीवन पद्धति सामान्य होने लगती है, पता तब लगता/चलता है जब हमको कोई हमारा मित्र या शत्रु या अजनबी कोई पशु भी प्रिय अप्रिय व्यवहार से अचानक हमें मिलता है।तो कभी हमारी मन मानी मनचाही इच्छा वासना रूप में पूरी होती है तो कोई हमसे हमारे ना चाहते हुए भी हमसे अपनी अपूर्ण दबी हुई इच्छा को पूरा करलेता है ।जब उस अप्रिय प्रिय घटना का हम अपनी विस्मृत हुई स्मृति को पुनः वापस लाते हैं भाव अतीत या प्रेक्षा ध्यान से अपने मन की अमूर्त से मूर्त रूप में लाते हैं पूनःस्मृति द्वारा तो पता चलता /लगता है की वह आधी घटना हमारे मन के चेतन ,अवचेतन स्तर में पहले से आधी अधूरी चित्राँकित वीडियो वासना रुप में पहले से मौजूद थी जो उचित समय पर उचित अवसर पर पूरी हुई किसी को लाभ हुआ किसी की हानि हुई ।इसी से कहा जाता है कि होनी घटित घटना अवश्य घटकर रहेगी क्यों कि वह घटना पूर्व में आधी घट चुकी है और अब आधी घटना अब अवश्य घटेगी पर कब पता नहीं है । जैसे यदि कहीं लड़की पैदा हुई है तो उस लड़की के लिए अवश्य ही कहीं न कहीं लड़का अवश्य पैदा होगा कब और कहाँ किसी को मालूम नहीं ,परंतु जब भी कोई नया जीव जो उनके मिलने पर पैदा होगा उस जीव संतान को पैदा करने के लिये वे कब कहाँ कैसे मिलेंगे नैतिक अनैतिक रूप में यह जीवन प्रक्रिया नियंत्रक प्रकृति जानती है । यही है मेरे विचार से वासना की जड़ के रहस्य का संक्षिप्त तर्क इसे बढ़ाकर पाठक अपने आप अपने अनुभव से स्वयं सीखेंगे ।
वासना पूर्ति होते समय आधी अधूरी वासनाएं हमारे मन मेंं पहले से भरी होती हैं आधी अधूरी वासनाओं को पूरा करने को हम सक्रिय रूप से अपने जीवन को जीते हैं जो आधी वासनाएं तो पूरी हो जाती हैं लेकिन अब इस दौरान हम पता नहीं चलता कि कब हम लोगों से आधी वासनाएं और ज्यादा कब ले लेते हैं जो मरते दम तक हमारे मन में आजाती हैं जिनको पूरा करने को फिर से लेना पड़ता है नया जन्म । मिलते हैं माँ बाप के नये मित्र शत्रु और हमभी छोड़ जाते हैं मित्र शत्रु अपने लिए अपनी संतान के लिए । वासना की जड़ अपने मन में बसे अपने हित के अनुसार अपूर्ण कर्म संस्कार हैं ।
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