ऐसा कोई रोग नहीं है जो एक बार के लिए जड़ से खत्म हो ,बस रोग होने के कारण का पता चल जाए ,उसका सिद्धांत यह है कि प्रत्येक रोग के कारक बैक्टीरिया वायरस प्रोटोजोआ स्पैक्टर्म पैरासाइट्स की पसंदीदा डायट्री भोजन न किया जाए । अपितु उसको शरीर में से बाहर निकालने के लिए उसकी ना पसंदगी का भोजन तत्त्वों का सेवन शुरू कर दिया जाए ।जिसे परहेज विधा कहते हैं । इसकी जानकारी ज्ञान के लिए शारंगधर संहिता भाव प्रकाश पढ़ो ।उसे कोरा पर नहीं लिखा /शेयर किया जा सकता है
जैसे अधिक मीठा खाने वाला शुगर /मधुमेह का रोगी बाद में बनता है पहले वह प्रोटोजोआ के पेचिश पायरिया आदि रोगों में घिरता है , शरीर के सावधानी तंत्र एलार्मिंग सिंगल न समझा तो पैरासाइट्स के तरह-तरह के फंदों में फंसता है। इतने पर भी अपनी डायट्री भोजन में परिवर्तन/सुधार नहीं किया गया तो शुगर /मधुमेह का राज रोग /आसाध्य रोग जीवन भर के लिए हो जाता है ।
दवाई /इलाज के विधान विधा का मतलब होता है कि शरीर के बायोलॉजिकल माइक्रो /मैगा मोलीक्यूल जैविक अणुओं की संरचना प्रक्रिया में परिवर्तन किया जाए । इसके लिए रोगी को औषधि/दवाई खिलाई /दी जाती है जिसे सूक्ष्म अन्न या अन्र सारांश कहा जाता है । कुष्ठ रोग से बचाव के लिए उष्ण कफज /मींठा गर्म खुजली दायक भोजन नहीं करना चाहिए । लम्बे समय तक चली खुजली एक साल से ज्यादा पहले चर्म रोग दाद से आगे खाजू दाद एक्जीमा में बदलती है फिर उकौत औदुम्बर में बदलती है , चिकित्सा श्रूषा न की गयी तो कुष्ठरोग में खुजली शरीर में जड़ जमा जाती है ।
कुष्ठ वयाधि भी द्वि दोषज कुसाध्य कठिन रोग है त्रि दोषज /आसाध्य रोग नहीं है । एक बार किसी अच्छे चिकित्सा शास्त्र विशेषज्ञ को दिखाओ ।जब रोग ठीक हो जाय तो जीवन भर परहेज विधा से निरोग जीवन जिओ ।
कुष्ठ रोगियों कुसाध्य है आसाध्य नहीं है ।
पहले जब इसका पूरा चिकित्सा ज्ञान चिकित्सक उपलब्ध नहीं थे तब यह राज़ रोग /आसाध्य रोग था ।अब यह रोग विशेषज्ञ डा के इलाज से पूरी तरह से ठीक हो जाता है ।बाद में जीवन कठिन भोजन पद्यति और सामाजिक नियमों के मुताबिक भविष्य में जीना पड़ता है ।
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