आजकल समृद्धशाली लोगों के जीवन में प्रोटीन अहार ( माँस, अण्डा दाल ) और वसा (तेल घी चर्बी )की मात्रा सामान्य से अधिक हो गई है । तथा साथ साथ ही समृद्धशाली लोग कोल्ड ड्रिंक / शीतल पेय पदार्थों का उपयोग अधिक मात्रा में करने लगे हैं ।
जीव की जैविक क्रिया नियम B.M.R. के अनुसार हम जो भी भोजन करते हैं उसका उपयोग /उपभोग 24 घंटे के अंदर दिन रात चक्र में होजाना चाहिए अन्यथा वह रिजर्वेशन चक्र पथ पर चलकर अपने आप अपने स्टोर कक्ष यकृत ,पित्त, वृक्क /किडनी में धीरे धीरे एकत्रित होने लगते हैं जिससे पथरी बनने की शुरुआत होने लगती है ।आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति में रोग के तीन निदान सोपान हैं साध्य कुसाध्य असाध्य ,जबकि पाश्चात्य चिकित्सा पद्धति में दो सोपान कुसाध्य (कठिनता से साध्य /ठीक होना और असाध्य /ठीक न होना यानि आपरेशन /शल्य क्रिया /सर्जिकल चिकित्सा।
प्रोटीन की डिएमिनेशन प्रक्रिया में प्रोटीन के मूल इकाई घटक अमीनों अम्लों से अमोनिया और शेष कार्बन युक्त कीटोन समूह अंश को ऊर्जा उत्पादन के लिए अलग अलग करके उससे ग्लूकोज टू ग्लाईकोजन प्रक्रिया शुरू कर दिया जाता है।या फिर अतिरिक्त कीटोन यौगिक मात्रा होने पर वसीय अम्लों में बदल संचय योग्य वसा चर्बी में बदल कर आपातकालीन ऊर्जा ईंधन के रुप में शरीर के ऊपर क्यूटेनियस लेयर में त्वचा के नींचे संचित कर ली जाती है ।जिससे माँसाहारी विशेष रूप से मोटे पुष्टावर नजर आते हैं ।
यकृत कोशिकाएं शरीर में बढ़ी अमोनिया को कार्बन डाइऑक्साइड से मिलाकर आर्निथीन चक्र द्वारा यूरिया में बदलतीं रहतीं हैं इस चक्र में तीन अमीनो अम्ल आर्निथीन, सिट्रुलिन,आर्जिनीन का चक्रीय उपयोग होता है ।इस प्रक्रिया का एक भाग माईट्रोकोन्डिया में तीन भाग कोशिका द्रव्य में होते हैं।इस प्रक्रिया के अतिरिक्त दूसरे भाग में एस्पार्टिक एसिड भी उपयोग होता है ।
अतिरिक्त मात्रा में ली गई कठोर वसा हार्ड कालेस्ट्राल जो एन्टीआक्सीडेंट के साथ भोजन में खायी जाती है वह यकृत कोशिकाओं के द्वारा मंद शोधन होने से रक्त में तेजी से जाकर रक्त का कोलेस्ट्रॉल बढ़ाने लगती है जो रक्त नालिकाओं धमनियों शिराओं में जमने लगती है उन लोगों में कफज प्रकृति के आलसी श्रमहीन होते हैं ।इन्हीं लोगों को यूरिया के बढ़ते स्तर की समस्या होती है प्रारंभ में ,बाद में ये दोनों यूरिया और कौलैस्ट्रोल की बढ़ती समस्या पथरी /स्टोन फार्मेशन में बदल जाती है । निरंतर बढ़ते यूरिया और हाई कैल्सियम आक्जलेट डाईट से किडनी में स्टोन फार्मेशन होने लगती है ,और बढ़ते हुए कोलेस्ट्रॉल से हृदय कठोर हो जाने से हृदय रोग और पित्त में पथरी बाईल स्टोन बनने लगते हैं ।
यकृत इन सभी अवांछनीय पदार्थों को विशेष शोधन प्रक्रिया द्वारा शोधित करके उनको कम विषाक्त रसायन में बदलाव करके प्रोटीन के डीएमिनेशन से बने यूरिया को रक्त में डालता रहता है किडनी रक्त में बढ़े अतिरिक्त यूरिया की मात्रा को छानकर मूत्र द्वारा शरीर से बाहर निकल कर शरीर को स्वस्थ रखता है ।
अब कोल्ड ड्रिंक्स का उपयोग या शरीर का तापमान कम होने पर ठंडे मौसम से प्रभावित होने पर शरीर पर बुरा प्रभाव::मेरा निजी अनुभव ——- मुझे भी अक्सर सर्दियों के मौसम में यूरिया की समस्या उत्पन्न हो जाती है जिससे पैर की एड़ियों में दर्द बनने लगता है मैंने नोट किया है कि जब ऐसे में चना, मटर, अरहर, मूंग की दाल का सेवन गलती से भूलकर भी हो जाता है तो दर्द की समस्या और बढ़ जाती है ।अतः यदि स्टोन फार्मेशन/पथरी की समस्या किडनी की हो या पित्त/बाईल की ,इनसे बचना है तो,शरीर का तापमान ऊँचा रखो लेकिन बुखार नहीं इसके लिए जरुरी है समुचित रूप से मेहनत करना चाहिए ।समुचित मात्रा में आवश्यकता के अनुसार शरीर की वातज ,पितज ,कफज प्रकृति को देखते हुए भोजन करना चाहिए ।और व्यायाम /एक्सरसाइज में हृदय की धड़कन कम से कम तीस मिनट अधिकतम बनी रहनी चाहिए ।
बढ़ते हुए यूरिया के स्तर को सामान्य रखने के लिए माँसाहार दाल दूध अण्डा का सेवन सोचसमझ करना चाहिए ना कि शरीर को अधिक मात्रा में परिपुष्ट करने के लिए अधिक मात्रा में माँस दाल दूध अण्डा का सेवन बिना सोच समझ के बे दिमाग होकर किया जाए । इतने पर भी यदि यूरिया समस्या उत्पन्न होने लगे तो पित्त प्रधान भोजन जिमीकंद बैंगन कुल्रथी की दाल ।। पित्त प्रधान आयुर्वेदिक औषधियां जैसे सोंठ ,मेथी ,अलसी ,लोंग ,काली मिर्च, पीपल ,कालमेघ, पित्त पापड़ा ,आदि का किसी योग्य आयुर्वेदिक चिकित्सक के दिशानिर्देशन में करना चाहिए। कोल्ड ड्रिंक्स सेवन से बचना चाहिए । शरीर का तापमान बढ़ाने के लिए मेहनत और भोजन के सहसंबंध को समझते हुए जीवन यापन में समझदारी है ।
शरीर के 3उत्तम प्रकार वातज (सक्रिय) पितज (गर्म )कफज (कठिन ) और तीन प्रकार के भोजन वातज, पितज,कफज की समय्क जानकारी के लिए भाव प्रकाश , संक्षेप ज्ञान के लिए शारंगधर संहिता , विस्तृत वर्णन के लिए चरक संहिता लाहौर प्रकाशन से पढ़ें ।
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