भारत में मानसिक बिमारियों का अस्तित्व मानने में भय इसलिए लगता है कि इन मानसिक बिमारियों को अदृश्य जगत का उत्पात या भूत ,प्रेत ,पिशाच, ब्रहमराक्षस डुंड मुंड रुंड बैतालियों की करामात माना /समझा जाता है जहाँ पर आज के पढ़े लिखे शारीरिक काय चिकित्सकों की पहुंच/पकड़ नहीं है ।और जो मानसिक चिकित्सक हैं उनके चिकित्सा के रेट सामान्य चिकित्सक की तुलना में बहुत अधिक हैं क्योंकि वे अप्रिय परिस्थितियों में अप्रिय नासमझ रोगियों की चिकित्सा करते हैं।
मानसिक बिमारियों का निदान होने में अधिक समय लगता है शरीर की बिमारियों की तुलना में । लोगों को शारीरिक बिमारियों के प्रति जागरूकता अभियान के बारे में प्राईमरी क्लास/कक्षा से पढ़ाई शुरू हो जाती है जो हर कक्षा स्तर पर और ज्यादा बढ़ाकर पढ़ाई जाती है । जूनियर क्लास में , हाई स्कूल क्लास में , इन्टर क्लास में /सीनियर सेकेंडरी लेवल तक ।शरीर के रोगों के बारे में बताया जाता है चर्चा होती है, लेकिन बच्चों के क्लास में फेल होने पर भी उनकी कम उपलब्धि का दोष शिक्षक के सिर पर मढ़ा जाता है बच्चों को सर्वश्रेष्ठ सर्वसमर्थ कहा /समझा जाता है ।और बच्चों /छात्रों के दोष और कमी उसके शिक्षक में मढ़कर दोषारोपण शिक्षक पर कर दिया जाता है ऐसे में बच्चों /छात्रों की कम शैक्षणिक उपलब्धता पर से ध्यान हटाकर शिक्षक पर केन्द्रित किया जाता है ।और बच्चों की/छात्रों की मानसिक उपलब्धता की समस्या की जानबूझकर लीपापोती/अवहेलना कर दी जाती है ।
मानसिक रोग भी शरीर के अन्य रोगों की तरह से रोग हैं बिमारी हैं जो उत्तम मानसिक चिकित्सा पद्धति से साध्य हैं ठीक हो सकते हैं लेकिन इसे अदृश्य शक्ति जगत भूत प्रेत पिशाच की करामात समझ कर इसे ठीक कराने के लिए अनपढ़ गुनिया तांत्रिकों के पास मानसिक रोगियों हिस्टीरिया पीड़ितों को ले जाया जाता है और उनके द्वारा ठीक हो जाये तो ठीक और ना ठीक हो तो लाइलाज बीमारी समझकर पागलों के बीच पागलखाने में भर्ती कराया जाता है तब जब रोग लाइलाज असाध्य अवस्था में गुनिया ओझा तांत्रिक अनपढ़े ग्ंवार चिकित्सकों द्वारा रोगी लाइलाज असाध्य बेकार कर दिया जाता है । काश मानसिक रोगों को रोग समझा जाता इनके बारे में प्राईमरी शिक्षा से सीनियर सेकेंडरी स्कूल लेवल पर अन्य रोगों की तरह बेसिक स्तर की पढ़ाई होती इनके प्रति समाज में जागरूकता फैलाई जाती ,शिक्षकों को भी मनोरोगों के बारे में प्राथमिकी स्तर का प्रशिक्षण /ज्ञान दिया जाता तो लोग कम से कम गुनिया ओझा तांत्रिक लोगों के पास अपने मनोरोगी को न लेजाकर किसी अच्छे मनोचिकित्सक के पास ले जाते और देश समाज में मनोरोगियों की संख्या कम होती तथा बच्चों/छात्रों की शैक्षणिक उपलब्ध ता की गुणवत्ता में ज्यादा सुधार होता ।
इन सबसे ज्यादा और भयंकर अंधविश्वास हमारे देश समाज में यह है कि जो पागल है मनोरोगी है वह खतरनाक बीमारी ग्रसित है ।उसका मानसिक /पागलपन का रोग कभी ठीक नहीं हो सकता है ।और सबसे खतरनाक अंधविश्वास यह है कि यह मनोरोग /पागलपन एक अनुवांशिक /खानदानी रोग है ।इस खतरनाक भयंकर अभिधारणा के चलते हुए सभी लोग इस मनोरोग/मानसिक रोग / ,पागलपन / अनियंत्रित अमानवीय व्यवहार असामाजिक व्यवहार से बचने के लिए अपनों का त्याग करना /छोड़ना / अपने उन मनोरोगियों से दूर रहकर बचना अच्छा समझते हैं ।और मानसिक बिमारियों से पीड़ित लोगों से बचना अच्छा समझते हैं ।। अपने ऊपर अपने निजी मनोरोगी संबंध के कलंक से बचना उचित है । कि कहीं उनके ऊपर भी मानसिक रोगी से संबंध होने से उनपर भी मनोरोगी अनुवांशिकता / खानदानी मनोरोगी निकटता का लेबल न लग जाय ।
ऐसे में प्रायः सभी अंधविश्वासी लोग मानसिक रोगों की चर्चा करना अपराध समझते हैं और मनोरोगी की सहायता न करना मानसिक रोगी से बचना अपना नैतिकता पूर्ण कर्तव्य । ऐसी विकट सोच से पाठक बंधु बताएं कि मनोरोगियों की संख्या बढ़ेंगी या घटेगी । क्या इस गलत सोच से बच्चों /छात्रों की शैक्षणिक गुणवत्ता मेंं सुधार हो सकता है ? जिसका दोषारोपण उसके शिक्षकों पर किया जा रहा है ।इन सभी यक्ष प्रश्नों का जबाब है कि देशसमाज के लोगों को कुछ शिक्षित लोग अपने निजी फायदे के लिए समाज की अधिकांश अशिक्षित आबादी को अनेक असंख्य मनोरोगों से ग्रसित करके उनकी शैक्षणिक उपलब्धि को कमतर करते हुए उन्हें सदा के लिए उसी हाल में रखना चाहते हैं कि वो जिस हाल में पैदा हुए थे ।वे उसी तरह के हाल में रहें ।अपने जीवन में प्रगति /तरक्की न कर सकें मानसिक रोगों के प्रपंच जाल मेंं फंसकर अपना जीवन पागलपंथी में जिएं ।
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