पत्नी को धारण /स्वीकार किया जाता है ।
वह साथ साथ पैदा होते हुए भी स्वीकार्य/मान्य नहीं है स्त्री लिंगधारित होते हुए भी । जीवविज्ञान के अनुसार एक ही साथ गर्भ में आये स्त्री &पुरूष लिंगधारी बच्चों में से स्त्री लिंगधारी नर बच्चे को खराब /अर्धपुरुष कर दिया करती है ।गर्भ में पहले या बाद में आई स्त्री शिशु सम लक्षणा समान गुँण सूत्रम होने से उसके प्रति वह प्रेम आकर्षण भाव दीर्घ और स्थाई रूप से नहीं आता/रहता । ऐसे में दूसरे कुल परिवार में उत्पन्न स्त्री के असमान होने पर दोनों ही के बीच में अपूरणीय दीर्घकालीन कमी बनी होती/रहती है जो दीर्घकालीन आकर्षण का कारण बनी रहती है ।बृहदारण्यक उपनिषद के प्रथम कामसूत्रम आकर्षण श्लोक के अनुसार।
जैसे दो बुद्धिमान लोग /स्त्री पुरूष के मध्य कभी भी स्थिर स्थाई मैत्री प्रेम पूर्ण संबंध लम्बे समय तक नहीं चला करते हैं ।संबंधों को लम्बे समय तक चलने के लिए उन दोनों के बीच दीर्घकालीन कमी उच्च विभव ( अधिक बुद्धि , बल ,धन ,ऊर्जा सटैमिना ) और निम्न विभव (कम बुद्धि बल , धन ,ऊर्जा स्टैमिना ) के मध्य का विभवांतर डेनसिटी ग्रैडिएंट जरूर होना चाहिए तभी उन दोनों के बीच स्थिर स्थाई वैद्युत संयोजी संबंध लूँण /लोग लुगाई वाला दाता ग्राही वाला लुनाई/नमकीन संबंध बनेगा ।
प्रैम सम्बंध के स्थिर स्थाई /आकर्षण के लिए उन दोनों के बीच कमी /रिक्ता का होना जरूरी है ।इसी नियम को जानते समझते हुए विधाता ने उनके जननांगों में भ्यंकर कमी बनाई है एक के जननांग शरीर के बाहर निकाल दिये तो दूसरे के जननांग शरीर के अंदर छिपा दिया नतीजा आज तक भी स्त्री पुरुष में यौनसंबंध निरंतर बनते रहने पर भी यौनव्यवहार ,यौनक्रीड़ा, यौनक्रिया यौनसंबंध समानता अभी तक नहीं आई है ।जाने कब से नर नारी जीव यौनसंबंध बनाते चले आ रहे हैं लेकिन उनके सतत यौनसंबंध के परिणाम स्वरूप आज और अबभी अभी तक आधे अधूरे लिंगधारित बच्चे नर लिंग नारी लिंग अपूर्ण शरीर लेकर पैदा हो रहे हैं ।
ऐसे विचित्र हालात में पत्नी हमेशा धर्म पत्नी /धारित ,धारक, धारण, धार्मिक, ध्यान धर्म ,से ही बनती रहेगी ।
आज कल लोग यौन अग अंतरभेद को मिटाने के लिए समान यौनांग धारी को पत्नी /पति बनाने लगे हैं जिसे समलैंगिकता कहा जाता है जिसमें वे एक दूसरे से मिलने की कोशिश तो करते हैं पर शरीर के अंदर तो क्या समायेंगे शरीर के बाहरी स्तर से भी नहीं मिल पाते बस तन मिलन के प्रयास में वस्त्र हीन /नंगे होकर रह जाते हैं ।और उनके आजीवन यौनक्रीड़ा कर्म का परिणाम शून्य संतानहीनता के निष्फल निषकाम ,निष्पादित निष्कर्ष के रूप में घर परिवार समाज के सम्मुख आता है ।
ऐसे विचित्र पत्नी पति संबंध रसायन विज्ञान की भाषा में सह संयोजी संबंध आसानी से अलग होने वाले , उप सहसंयोजक दूर से दिखाई देने वाले संबंध कहे जाते हैं जिनमें कहीं पर भी प्राणसेतु मिलानबंध नजर नहीं आता जिससे होकर एक का प्राण दूसरे के अंदर जाता दिखाई देता हो ।प्राण के अंदर ही अपने जैसे प्राणी के निर्माण की क्षमता होती है । आत्मा में अपने जैसे आत्मा के निर्माण की क्षमता नहीं होती ह। यदि आत्मा में अपने जैसे आत्मा के निर्माण की या अपने जैसे आत्मा को बुलाने की क्षमता होती तो संसार में परिवार में मन चाही संतान पैदा होती ,मन चाहे तन मन के मिलने पर ।
पत्नी को धारण करने में ज्यादातर समझदारी है और वो भी धार्मिक तौर तरीकों से नहीं तो अधार्मिक तरीका से धारण की गयी धर्म पत्नी को धारण करने पर भी अपराध बोध मन में आजीवन रहता है और वैधता पूर्ण तरीका से उत्पन्न संतान को अवैधानिक संतान का अभिषाप आजीवन निर्दोष होने पर झेलना पड़ता है । इस अवैधता के लेविल की भारी कीमत चुकानी पड़ती है ,जैसे कर्ण ने सब कुछ जानते हुए दुर्योधन को चुकाई थी ।
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