सनातन धर्म,वैदिक धर्म,ब्राह्मण धर्म और आर्य धर्म में क्या अन्तर है ?



सनातन धर्म एक नयी सोच वाला धर्म है,जिसके अनुसार जिन्दा रहने के लिए दूसरे धर्मों/मजहबों के उत्तम /अच्छे विचार कर्म धर्म पद्धतियों को अपनाकर अपने धर्म के हानिकारक गलत विचारों कर्मों को छोड़ते हुए वर्तमान समय के अनुसार श्रेष्ठ जीवन पद्धति के अनुसार अपना जीवन अपनी इच्छाओं/मर्जी के साथ अपने जीवन को जीना लेकिन दूसरों को स्वयं प्रभावित होते हुए भी दूसरों को उनकी मनमर्जी के अनुसार अपने धर्म के अनुसार जीवन जीने देना , सनातन संस्कृति का मूल वाक्य धर्म उपदेश है :-" जिओ और जीने दो " । सनातन संस्कृति के अनुसार :- दूसरों का बल पूर्वक ,या लालज देकर धर्म परिवर्तन कराना ,दूसरों को अपने धर्म की शर्तों नियमों पर जीवन जीने को विवश /मजबूर करना एक अपराध है । जिसके अनुसार एक ही परिवार में कई देवी देवताओं को मानने वाले अलग अलग धर्मों के लोग परिवार में सकते हैं ,रामानंदी कृष्णा नन्दी मूर्ति पूजक मूर्ति पूजा हीन आदि सर्वधर्म समान भाव । ।
,वैदिक धर्म में देवताओं का स्थान गौण है ,संकल्प (योजना प्रधानता ),प्रण (जीवन कथन को श्वास में सदैव स्मरण रखना) , उपासना (श्रेष्ठ गुण धारण करना) मूर्ति पूजा नहीं देव गुण विवेचना है कि हम मनुष्य से उत्तम देवताओं के समान गुण संपन्न बनें ; वैदिक देवता सर्वे प्रथम सर्वश्रेष्ठ देव शासक इन्द्र , द्वितीय देव गुरु ब्रह्म , तृतीय देव नियंत्रणक शिव , देव संचालन कर्ता विष्णु ,मानव संचालन कर्ता शरभ् ,ब्रहमचारी, व्रात्य ,और मानव सहायक देवतुल्य उपयोगी पशु हाथी ,घोड़ा ,गाय ,बैल ,कुत्ता ,चूहा ,सर्प , पक्षियों मोर ,गरुड़ कौआ ,आदि को देव समान सम्मानिय माना जाय ।
ब्राह्मण धर्म में हिंसा का प्रतिकार हिंसा से वैध है , बलि विधान वैध हैसमाज हित में और जीवन के संघर्षों में कठोर बनाने के लिए कट्टरता आवश्यक है । देवता विधान:- ब्राह्मण का देवता इन्द्रियों का जग का स्वामी जितेन्द्रिय इन्द्र है जो मूर्ति रहित है । क्षत्रियों का स्वामी सूर्य है ,वैश्य का स्वामी देव जल है सेवकों /शूद्र का स्वामी भूमि /यमी है ब्राह्मण धर्म वेदों का अध्ययन दर्शन पूर्वक /समग्र वेद विचार अध्ययन पश्चात अपने लिए स्वयं उत्तम विचार ग्रहण करना है जैसे शतपथब्राह्मण, गोपथ ब्राह्मण के अध्ययन से खुद को समझना जरूरी है ब्राह्मण धर्म में अध्ययन अध्यापन कार्य परम आवश्यक है इसके पश्चात तत्व ज्ञान सत्य ज्ञान प्राप्त करके दुख शौक रहित जीवन जीने का मर्म /सार आना चाहिए ,जो जीवन जीने की प्रक्रिया के दौरान दुखी हो जाय ,असत्य /मित्थ्या /भ्रममय /भ्रष्टाचार से नियम हीन होकर सुख समृद्धशाली जीवन जीने वाला व्यक्ति ब्राह्मण नहीं हो सकता मनुस्मृति ग्रंथ के अनुसार ब्राह्मण को धार्मिक दार्शनिक तत्वदर्शी दुख रहित, शोकरहित, लालच रहित होना चाहिए । ब्राह्मणों का जीवन पद्धति ग्रंथ मनुस्मृति, शतपथ ,गोपथ ,आदि ब्राह्मण ग्रंथ का ज्ञान अतिरिक्त आवश्यक है वेदों के ज्ञान के साथ साथ । मृत्यु से ना डरना ,मृत्यु दाता हिंसात्मक मनुष्यों / जीवों का मुकाबला /सामना करना ब्राह्मण की पहचान है , और मृत्यु के समय शरीर की क्षति /शरीर नष्ट होते हुए समय पर भी ब्राह्मण को शोक नहीं करना चाहिए ।कहने का तात्पर्य यह है कि ब्राह्मण में समाज के अन्य लोगों की अपेक्षा अत्यधिक परम दुख को सहने में समर्थ होना चाहिए ब्राह्मण नाम धर्म ध्वजा, धर्म कर्म कर्ता ,धर्म संस्कृति रक्षक, समूह संचालक विशेष पुरूष / नेतृत्वकर्ता प्रशासन पुरुष का होता है । ।
आर्य धर्म में केवल वेद अध्ययन हवन यज्ञ की प्रधानता है कार्य की ,उपयोगिता के अनुसार ,चार वर्ण ,चार आश्रम , अति उत्तम ,उत्तम , उपयोगी , निम्न ABCD ग्रेड जीवन पद्धति हैंं । मूर्ति पूजा प्रति बंधित है ।

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