मेरे बायें हाथ पर भग /योनि जैसा निशान
मेरे दाँये हाथ पर आँख जैसा निशान
गनपत कहार के दाँये हाथ पर शंख का निशान
जिन लिए के हाथों में ये निशान होते हैं वे साधारण जन नहीं होते हैं ।जिनके हाथ में जो भी निशान होता है वे अपने हाथ के निशान के अनुसार अपने ज्ञान कर्म के क्षेत्र में विशेष योग्य होते हैं ।उन पर जाति धर्म परिवार के नियमों का बंधन प्रभाव नहीं होता है।ये परिवार जाति धर्म के नियमों को ताक पर रखकर/ जाति धर्म परिवार के नियमों को पार करते हुए , अपने आप अपने लिए अपना जीवन प्रगति का रास्ता खुद चुनते हैं इन पर दूसरों के विचारों का प्रभाव आसानी से नहीं पड़ता ,ये दबंग बुद्धि होते हैं इनमें विशेष मानसिक ऊर्जा/शक्ति होती है जिससे जो भी इनके निकट प्रभाव क्षेत्र में आता है वह इनसे इनके विचारों से प्रभावित हो जाता है ।ये जितेन्द्रिय अतिइन्द्रिय (गुप्त को देखने सुनने वाले ),और इनका शारीरिक, मानसिक ,ऊर्जा स्तर सामान्य लोगों की तुलना में ज्यादा होता है ,इनमें थकान सामान्य लोगों की तुलना में देर में होती है ये अर्जुन वर्णीय होते हैं ,इन पर युवा अवस्था ज्यादा समय तक रहती है ।
उल्लेखनीय बात यह है कि हाथ में हथेली पर बने निशान और अंगुलियों के पोरों पर बने निशान का मतलब अलग अलग होता है अंगुलियों के पोरों पर तीन तरह के निशान शंख ,चक्र, सीप के निशान पाये जाते हैं जिनके अनुसार जैविक बायोमैट्रिक आईडेंटिफिकेशन और स्वभाव प्रकृति का फलित कथन होता है ।जबकि हथेलियों और पैर के तलुओं पर अनेक प्रकार के निशान पाये जाति हैं उनका अलग फलित ज्योतिष कथन होता है ।
हस्तसामुद्रिक शास्त्र में हस्त चिन्ह के बारे में बहुत बढ़ाकर लिखा गया है ये चिन्ह हाथ के अलावा पैर में भी पाये जाते हैं जो हाथ कि तुलना में ज्यादा प्रभावी होते हैं ।
अब मेरा ब्यौरा : मैं ब्राह्मण परिवार (माता पिता दोनों ही ब्राह्मण ) जाति में पैदा हुआ ,लेकिन मेरा आचरण व्यवहार क्षत्रिय जैसा है परिवार में सबसे बड़ा शरीर है ,हाथ में आँख होने से मैं विशेष अतिइन्द्रिय क्षमता युक्त हूँ मुझे बचपन से ही अज्ञात का देख ने का अहसास /दर्शन/सटीक अनुमान लगाने की विद्या /होनी का दर्शन आती है बिना तंत्र विद्या पढ़े /जाने । जो परिवार में किसी को नहीं आती है ।मेरी रुचि बचपन से ही जाति से ,घर से हटकर थी मैं सर्जन बनना चाहता था मैंने सारी शिक्षा जाति परिवार अभिरुचि से हटकर ली है जैसे मैंने Msc zoo (fish&fisheris ) से M Ed मापन मूल्यांकन से किया बाद में परजीविता का अध्ययन किया कहने का अभिप्राय यह है कि संस्कृति और संस्कार जैसे शब्दों से मुझे चिढ़़चिढ़ी पैदा होती है कि कैसे हैं ये लोग जो आज शिक्षित होने पर भी संस्कृति के पुराने जमाने के नियमों पर आजतक रुके हुए हैं ।
मैं जन्म जातक ब्राह्मण होने पर भी ब्राह्मणों वाले संस्कृति संस्कार सत्य अहिंसा में 100% विश्वास नहीं करता हूँ अवसर केअनुसार जीवन जीने में विश्वास रखता हूँ मैंने इन नियमों पर चलते हुए दूसरों की भी लड़ाईयाँ अपने सिर लेकर हानि अपयश उठाया है । आँख के निशान प्रभाव से दार्शनिक योनि के निशान के प्रभाव से यौनाचार्य/यौन शिक्षक हूँ । ब्राह्मणों के धार्मिक कर्म कांड जैसे :- जप तप पूजा अर्चना व्रत उपवास कीर्तन प्रवचन सुनने से दूर रहता हूँ होम यज्ञ हवन से बचने की कोशिश में रहता हूँ ।लेकिन वेदों का स्वाध्याय उपनिषद दर्शन अन्य धार्मिक ग्रंथ रामायण महाभारत का स्वाध्याय अपने भीऔर दूसरों के जैसे कुरान , बाइबिल का अध्ययन करता रहता हूँ वर्तमान में अमेरिकन साहित्यकार स्टीफन कवि, डेलकारनेगी ,नारमनपील, जोसेफ मर्फी ,नैपोलियन हिल ,रोमेश शर्मा राबर्ट किओसाकि ,के विचारों पर आधारित नया धर्म कर्म के अनुसार जीवन जी रहा हूँ जो सत्य तो नहीं सत्य सत्ता के निकट है अहिंसा नहीं अवसर अनुसार हिंसा की अनुमति देता है ।
ताज्जुब होता है उन पढ़ेलिखे नव साक्षरों पर जो आज भी अपने धर्म को बुरा बुरा बकते हैं वर्तमान में उपलब्ध सस्ता ज्ञान होने पर भी ऋषि मुनियों धर्म ग्रंथ को कोसते रहते हैं जो हमारे संस्कृति मूलक हैं उनके वैदिक संस्कृति कार्य को समझने का प्रयास नहीं करते हैं और ना ही वर्तमान में उपलब्ध उत्तम पुस्तकों और नैट पर से उत्तम /श्रेष्ठ ज्ञान अध्ययन करके उसे अपनाते हैं वे शब्द साक्षर होने पर सिर्फ अपने ऋषि गण पुरखों को गालियाँ देना सीखा हैं । ये कौन से जमाने के शिक्षित हैं ,जो शिक्षित होने पर भी दूसरों केउत्तम शिक्षा विचारों का विश्लेषण अनवेषण करते हुए आज के नये उत्तम विचार नहीं अपना रहे हैं ।
गनपत के बारे में उसकी कहानी भी जाति धर्म से हटाकर है :— गनपत कहार ( जल सेवक) जाति में पैदा हुआ ,अपने दोनों भाईयों अमींचंद ,चिम्मन से बड़ा है । चिम्मन के पैदा होने के बाद उसकी माँ हिरनिआँ उसके एक साल बाद मर गई थी , गनपत को ही अपने भाईयों को पालना संभालना पड़ा उसके पिता जी प्यारे ने शादी नहीं की ।गनपत खुद पढ़ता ,भाईयों को पढ़ाता उन पर नजर रखता कि कहीं वे जमाने की हवा से बहक न जांय घर में आजीविका का स्थाई संसाधन नहीं था उसके पिताजी बुलंदशहर में जाकर लालाओं के यहां मासिक मजदूरी करते थे । घर में गरीबी का जोर बोलबाला था हमारा गांव पिछड़ी जाति, दलित जाति, हरिजन बाहुल्य है , उस समय गांव में शिक्षा के साधन नहीं थे ,वह भी बड़ा होकर मजदूरी पर जाता और मजदूरी से मिले पैसों से बुलंदशहर जाकर किताबें खरीद कर पढ़ता था उसके पास उसके अपने पैसों से खरीदी पुस्तकों से अपनी निजी छोटी सी लाईब्रेरी पुस्तकों का संग्रह था जिसमें धार्मिक पुस्तकें, गीता रामायण तुलसी, बाल्मीकि, महाभारत, और योग साहित्य तंत्र साहित्य की पुस्तकें थीं मैंने भी धार्मिक, सामाजिक, योग का ज्ञान गनपत की छत्रछाया में निर्देशन में सीखा और योगक्रियाओं का ज्ञान भी गनपत से लिआ ।
कहने का तात्पर्य यह है कि जो व्यक्ति सेवक जाति में पैदा हुआ ,बचपन में माँ मर गई।घर में गरीबी, पैसों का अभाव अकाल - उसके पास उस समय उत्तम धार्मिक सामाजिक योग साहित्य वह स्वयं भी पढ़ा और उसने दूसरों को भी पढ़ने का शौक पैदा किया ,जो सेवक जाति परिवार में उत्पन्न होने पर भी ब्राह्मण वर्ण शरीर से गोरा समय्क शरीर वाला है ,और ब्राह्मणों के समान अभिरुचि ,दृष्टिकोण वाला है ब्राह्मण के समान अपना जीवन आज भी जी रहा है संतुष्टिपूर्ण तरीक़े से आज अब तक उसके परिवार में समृद्धि तो नहीं आयी है लेकिन उसके दोनों भाईयों अमींचंद नरौरा परमाणु घर से सम्मान पद से सेवानिवृत ,चिम्मन परमाणु घर के डाईरेक्टर का सरकारी चालक है ।लेकिन गनपत आज भी ब्राह्मण तरीका से गरीबी में जीवन जीते हुए खुश रहता है किसी से कोई शिकायत नहीं करता अपनी गरीबी को लेकर लेकिन धर्म संबंध शासत्रार्थ में उसका सामना करने से ब्राह्मण भी बचते हैं ।
यह है उसके हाथ में शंख का प्रभाव जिसने उसे शंखधारी ,शंखनादी , विद्याधर बना दिया ।
अन्त में मैं यह कहूँगा कि आपके हाथ में जो भी निशान है । वह आपके जन्म पूर्व योग्यता का सूचक है । जिसके प्रभाव से आप किसी भी जाति धर्म में पैदा हो जांंय लेकिन आपके पूर्व जन्म की योग्यता अपना प्रभाव रखती है ,जिसके बल से आप जाति धर्म के नियमों का उल्लंघन करते हुए , अपनी क्षमता दक्षता के अनुसार उस पतित जाति में श्रेष्ठ जीवन जीते हैं ।अर्थात आपके ऊपर जाति धर्म के नियमों का पूरा प्रभाव नहीं पड़ता है । आप अपनी निजी प्रगति करते हुए किसी भी जाति में उत्तम जीवन जी सकते हैं ।जाति धर्म के नियम आपकी प्रगति में बाधा /रुकावटें नहीं डालते हैं ।यदि आपमें मानसिक शारीरिक क्षमता दक्षता का स्तर अपनी जाति के लोगों की तुलना में ज्यादा है ।तो जाति धर्म के नियम आपके लिए सार हीन हैं ।आप अपनी निजी योग्यता के बल से जाति धर्मों के नियमों को बदलने की सामर्थ्य रखते हैं जैसे मैं ब्राह्मण होकर ब्राह्मण जाति में क्षत्रिय वर्ण के समान जीवन जी रहा हूँ । गनपत सेवक जाति में पैदा होकर ब्राह्मण के समान अपना जीवन जी रहा है ।
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