महाभारत या रामायण का सबसे अच्छा क्षण क्या है जिसने आपको प्रेरित क्या है?

महाभारत ग्रंथ में :- युद्ध की समाप्ति के बाद धृतराष्ट्र (गिरिजा शंकर ) का वाक्य गंधारी (रेणुका इसरानी ) से : गंधारी मुझे अपने सौ पुत्रों की मृत्यु का इतना दुःख नहीं है जितना दुःख इस बात का है क्या मेरा पुत्र दुर्योध्न पाँडव पुत्र सहदेव जितना भी समर्थ नहीं था ।मेरे सौ के सौ पुत्र मारे गए पाँडवों में से एक भी नहीं मरा । क्या हमारे पुत्र इतने कमजोर थे ।
जानती है गंधारी ऐसा क्यों हुआ ? मैं जन्मांध था तू तो जन्मांध नहीं थी ।हस्तिनापुर में आकर तूने भी अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ली ,तू भी अंधी हो गई । हम दोनों अपने पुत्रों को पैदा होने से लेकर मरने तक न देख सके हम अपने पुत्रों को ममता प्यार वात्सल्य सहयोग जैसे गुण नहीं सिखा सके ।हमारे पुत्र बल के मद में चूर होने से रण भूमि में एक ने दूसरे की सहायता नहीं की , हमारे पुत्र ईर्ष्या द्वेष बैर के विषैले वातावरण में पले । जबकि कुंती ने पाँडु के न होने पर अपने पुत्रों को ममता प्यार वात्सल्य दिया उन्हें आपत्तियों के समय एक दूसरे की मदद करना सिखाया अपने पुत्रों में ईर्ष्या द्वेष वैर पैदा न होने दिया । कुंती के पाँडु पुत्रों ने हमारे पुत्रों की मदद की परन्तु हमारे पुत्र सदैव उनका बुरा सोचते करते रहे , रण भूमि में भी कमजोर पाँडु पुत्रों ने आपत्तियों में एक दूसरे की मदद की । गंधारी हमारे पुत्रों को ईर्ष्या ,द्वेष ,वैर के विषैले वातावरण ने कमजोर कर दिया और इसकी जिम्मेदार तुम हो । पाँडु के ना होने से पाँडव पुत्र पिता हीन जरूर रहे लेकिन कुंती ने अपने संरक्षण में पिता की कमी महसूस नहीं होने दी । तुमने तो आँखों पर पट्टी बांधकर माँ का भी दायित्व नहीं निभाया ,मैं तो आँखों से अंधा होने से उन्हें देखने में असमर्थ था ।
ये लाईनें तब से लेकर आज अब तक सही बैठतीं हैं उन बच्चों पर , जो समाज में रहते हुए असामाजिकता गुण ईर्ष्या ( दूसरे की प्रगतिशीलता से चिढ़ना), द्वेष ( अपने लिए अच्छा दूसरे के लिए बुरा सोचना बुरा करना ), वैर ( सभी को शत्रु समझना सबसे बुरा अप्रिय व्यवहार करना ) ,असहयोग व्यवहार ( समर्थ होने पर भी असमर्थ ,लाचार मजबूर मनुष्य पशु पक्षियों की मदद न करना ,निष्ठुर क्रूर व्यवहार करना ) सीख गए हैं ।
रामायण में से पंचवटी प्रकरण में से :- रावण की बहन शूपर्णखा जब लक्ष्मण के पास जाती है दोनों में वार्तालाप होता है । लक्ष्मण अपने को राम का सेवक के रूप में परिचय देता है शूपर्णखा लक्ष्मण के सेवक होने पर आपत्ति जताते हुए कहती है तुम राम के सेवक नहीं राम के भाई हो वह उसे सेवक और भाई में अंतर बताती है वह कहती है
सेवक सुख चह मान भिखारी ,व्यसनी धन शुभ गति व्याभिचारी ।
जिमि चाहें ये चार गुमानी , नभि दूही दूध ये मानहु प्रानी ।।
धर्म कर्म के विपरीत गति से चलने पर लक्ष्य पूर्ति नहीं होती है ।
कार्य सेवक का करे और सुख की चाह रखे विरोधाभास है ।भीख माँगे और सम्मान की इच्छा करे यहां पर भी विरोधाभास है ।भीग मांगने वाला कटु शब्द पाता है अपमान अर्थात भीख माँगने वाले का सम्मान नहीं होता है,जो तरह तरह के व्यसनों में लिप्त है उसके पास धन अर्जन /कमाने को समय नहीं होता है जो व्याभिचारी है व्यापक अभिचारिक कर्मों मे लिप्त है ( जैसे मारण मोहन उच्चाटन विद्वेषण घायल मूठ अपघात अपहरण जैसे कार्यों को मानसिक रूप से तंत्र विधा द्वारा करता है ) ।जिसमें ये चार अवगुण तो पहले से हैं और पाँचवाँ अभिमान /गरुर /घमण्ड और आ जाय ।तो समझो वह मूर्ख तो पहले से था अब वज्र मूर्ख हो गया है जो आँखों के होने पर अंधा, कानों के होते हुए बहिरा ,हाथों के होते लूलिया/लुंजा निकम्मा बन गया है ।वह वज्र मूर्ख प्राणी आसमान में से दूध निकालने का असंभव कार्य करने की सोच रहा है ।
लक्ष्मण मैं शूपर्णखा लंंका के राजा रावण की बहन हूँ मुझे भी राजनीति समाजनीति मान मर्यादा का ज्ञान है ,मैंने तुम्हें तुम्हारे विशेष आचरण से पहचान लिया है तुम राम के सेवक नहीं राम के भाई हो । सेवक घर समाज में निम्न पद होता है और स्वामी उच्च पद है । मैं विशेष उच्च कुलीन महिला ( राक्षस कुल में ) हूँ । जो स्वामी पद प्रतिष्ठा पुरुष पर अनुरुकुत् / अति आसक्त हुई हूँ ।अयोध्या में रानी बनूंगी सेविका नहीं इतना विवेक मुझे है ।
शूपर्णखा के इस मंत्वय को तुलसीदास जी ने चौपाई में नहीं लिखा है लेकिन उसका सीता से द्वेषपूर्ण कपटी व्यवहार से सीता से झगड़ा करने से स्पष्ट होता है ।लड़ाई झगड़ा समान स्तर वालों में होता है ।असमान स्तर वाले सेवक स्वामी के मध्य झगड़ा नहीं हो सकता था।

No comments:

Post a Comment