हिन्दू विवाह कैसे होता है?

पशुओं में प्रारंभिक तीन चक्र 1मूलाधार (स्थापना ) 2 स्वाधिष्ठान (स्वाद अभिरुचि ) 3 मणिपूरक (पोषण ) मादा लिंगी /मादाओं के पुष्ट और विकसित होते हैं ।जबकि अन्तिम तीन चक्र 4 चतुर्थ अनाहतचक्र(हृदय /प्राण स्पंदन ) 5 पंचम वायुगतिकी (फेफड़े ) 6 छटा अग्नि ( यकृत और अग्नाशय ) नर लिंगीय /नरों के पुष्ट और विकसित होते हैं । 7 वाँ आज्ञा चक्र ( स्वर &प्रभाव ) ये सभी सातों चक्र ऊर्जा केंद्र बिंदु आधे अधूरे होते हैं चाहे एक शरीर नर का हो या मादा का इन सातों प्राण सहायक के आधे अधूरे होने से प्रत्येक प्राणी एक शरीर से सृष्टि में निर्माण कार्य संतान उत्पन्न नहीं कर सकते हैं ।
8 वाँ चक्र सहस्तर्धार आत्मा चक्र भी पूर्ण रूप से पूरा नहीं होता है जिससे आत्मा में भी रिक्त भाव बना रहता है जिसकी पूर्ति करने के प्रयास में आत्मा दूसरी आत्माओं से मिलकर अपनी आत्मिक पूर्ती का प्रयास पाणसेतु द्वारा यौन संबंध बनाकर किया करता है । । इस चक्र मिलान विधा में अग्नि का उपयोग/अग्नि साक्ष्य इसलिए किया जाता है कि अगनी सभी का गति दाता दयाल है अग्नि के प्रभाव से सभी जीव गति करते हुए आपस में एक दूसरे से आंशिक या पूरी तरह से मिलने में समर्थ होते हैं ।
सभी रासायनिक, भौतिक, जैविक ,क्रियाएं जो रुकी हुई होती हैं वे अग्नि के प्रयोग /प्रभाव से पूर्णता को प्राप्त होती हैं /पूरी हो जाती हैं । वर वधू की कैमिस्ट्री फिजिक्स ब्याओलोजी अग्नि के प्रभाव से पूरी तरह से मिलपाती है । वृध्दावस्था में जब अग्नि की शरीर में कमी होने लगती है तब उन दोनों नर लिंगी नारी लिंगी जीवों की कैमिस्ट्री, फिजिक्स, ब्याओलोजी उधड़ने /उखड़ने लगती है । बुढ़ापे में रोमांस प्यार का भूत शरीर में से निकल जाता है और बचता है वो मिट्टी प्रधान पंच तत्वों का पुतला जिसमें न भावनाएं हैं न आलिंगन मिलन प्यार है न चुम्बकीय आकर्षण है न विद्युतीय संचालन क्षमता ,न लोच लचक प्रत्यास्थता ।वजह /कारण है कि अब इस संसार में जीने का साधन शरीर में अगनि बहुत ही कम रह गई है जो सभी भौतिक रासायनिक जैविक कार्यों को करने के लिए कम पड़ जाती है ःः
अब चक्र मिलन विधा जब एक नर प्राणी अपने सात आधे अधूरे चक्र /ऊर्जा केंद्र बिंदुओं से दूसरे आधे अधूरे सात ऊर्जा केंद्र/चक्र बिन्दुओं वाले नारी लिंगी प्राणी से मिलता है तो दोनों अपने अपने ऊर्जा केंद्र बिंदुओं से ऊर्जा का क्षरण करते हैं जिसका उपयोग करने को उन दोनों के बीच में एक अपरिचित नया जीव संतान रूप से आता है ।यदि ऊर्जा क्षरण समान नहीं है समरति नहीं है तो असमरति ,विषमरति की अवस्था में नवे जीव संतान के आने की संभावना कमतर हो जाती है । यदि मिलन आठ चक्रीय होता है समरति से लैला मजनूं की तरह आत्मियता से तो संतान मन चाही पैदा होने की संभावना बढ़ जाती है ।अवतारी संतान अवतरित पैदा होती है राम और कृष्ण की तरह की ,अभिमन्यु जैसी जैसा बाप वैसा बेटा । और यदि मिलन असमरति होता है तो आने वाली आत्मा पर नियंत्रण नहीं होता है कंस और प्रहलाद पैदा होते हैं ,कुलहीन वंशहीन जातिहीन धर्महीन जिनको अपना कहने में परिचय देने में झिझक /शर्म होती है ।
सप्त चक्र मिलान से पशुयौनिक विवाह होता है अष्ट चक्र मिलान से इन्द्र कोटि विवाह होता है बे मेल बिना चक्र मिलान विधा से असुर विवाह अन्तर्जातीय विवाह होता है ।जिसमें अग्नि के समझ चक्र मिलान विधा के अन्तर्गत अग्नि के चारों ओर समाज के गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति में चक्कर लगाये जाते हैं ।जीवन भर साथ साथ रहने की प्रतिज्ञा /वचन लिए दिये जाते हैं संक्षिप्त रूप में कामसूत्रम रतिरहस्यम् की जानकारी दी जाती है ।परिवार समाज विधान संविधान की बेसिक शिक्षा दी जाती है । विस्तार में फिर से विवेचना होगी अथर्ववेद और बृहदारण्यक उपनिषद छंदोग्य उपनिषद ग्रंथ प्रमाण के साथ ।

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