आप आम आदमी की शर्तों में "कर्म के नियम" की व्याख्या कैसे करेंगे? आप इसे एक बच्चे को कैसे समझा सकते हैं?

आम आदमी की शर्तों मेंं कर्म की व्याख्या " कर्म के नियम "
कर्म हो या विचार या पदार्थ ये सभी विज्ञान के गति के न्यूटन के नियम , फैराडे के विद्युतीय नियम ,कैप्लर के अन्तरिक्षीय गुरुत्वाकर्षण के नियम ,गुलबर्ग बागे के रासायनिक क्रिया में द्रव्य अनुपात आदि अनेक ओं नियम के कारण आधार के अनुसार चलते हैं । ज्यादा जानकारी के लिए खुद पढ़ना और तुलना करना अवसर मिला तो मैं लिख सकूंगा ।न्यूटन के गति के नियम : 1:—कोई वस्तु /विचार /कर्म चल रहा है/ रही है तो चलती रहेगी यदि उसे वाह्य विरोधी बल सामने से लगाकर रोका न जाय ::: कर्म हो या विचार या वस्तु यदि उनकी परंपरा गतिविधि चल पड़ी तो चलती रहेगी यदि उसे अपने दिमाग /मन को चैतन्य करके रोका नहीं जाय । जो लोग इस नियम की उपयोगिता को समझ जाते हैं वे अपने मन /दिमाग की/हाथ की गति को नियंत्रित करके अपने विचारों की गति प्रक्रियाओं +-+- को नियंत्रित करके अपनी मन की इच्छा के अनुसार+++ या —— सोचना /विचार करना सीख जाते हैं विचारों पर ,अपने मस्तिष्क पर नियंत्रण स्वयं करके अपनी मानसिक ऊर्जा का सदुपयोग करना सीखकर अपने जीवन में उत्तम स्वास्थ्य के साथ अधिक बुद्धिमान बनकर अपने जीवन में अधिकतम प्रगति /तरक्की करते हैं ।जीवन में कर्म के क्षेत्र में भी उनका अपनी जिंदगी पर विशेष नियंत्रण रहता है वे कर्मों को एक रेखा के अनुसार सीधी दिशानिर्देश के अनुसार करते हैं योजना बनाकर ।जो लोग कर्मविधा पर नियंत्रण नहीं कर पाते कर्मविधा +-+- से पहले कर्मविधा योजना नहीं बनाते वे अपने अनियंत्रित कर्मजाल हो या दूसरों के अनियंत्रित कर्मजाल में फंसकर दिशाहीन होजाते हैं असंख्य कर्मश्रृंखला से विभ्रमित होकर अपने जीवन लक्ष्य से हटकर दूसरों के जीवन लक्ष्य की पूर्ति में खो जाते हैं परमाणुवीय कर्मविधा क्रमश्रृंखला जंजाल में ।
अब न्यूटन की गति का दूसरा नियम ::: F = M×a या बल /शक्ति # द्रव्यमान × त्वरण निरंतर बढ़ती गति बल कर्म हो या विचार या हो पदार्थ उन सभी की गति शक्ति इस बात पर निर्भर करती है कि गति की चाल कैसी है गति स्थिर है मंद है तेज है या निरंतर बढ़ती चली जा रही है की व्याख्या जिन लोगों की विचार क्षमता स्थिर होती है जिनके विचारों में स्वयं की गति नहीं होती है वे वज्रमूर्ख ,जड़बुद्धि कहे जाते हैं जिन लोगों की विचार क्षमता प्रक्रिया मंद है वे मंद बुद्धि कहे जाते हैं जिन लोगों के विचारों की गति निरंतर बढ़ती चली जाती हैं वे विचारणा गति शक्ति के अनुसार बुद्धमान ,अति बुद्धिमान , वैज्ञानिक( खोजी ) दार्शनिक अक्ल से पेलु या अक्ल से ठोकू (अपने को लाभदायक दूसरे को हानिकारक) गलत बात को सही और दूसरों की सही ( खुद को हानिकारक ) बात को गलत प्रमाणित करने में समर्थ सक्षम होते हैं । जो लोग स्थिर जड़़ बुद्धि कर्मा हैं वे आलसी कर्महीन कहे जाते हैं इनका कर्म करने में विश्वास नहीं होता है ,जो लोग मंद गति से कर्म करते हैं वे आलस्य युक्त कहे जाते हैं ,परन्तु जिनके कर्मकरने की गति इतनी तेज होती है कि वो कर्मकरते दिखाई नहीं देते कर्मकरने में फुर्तीले होते हैं वे जल्दबाज चंचल कहे जाते हैं वे अपनी चंचलता से अक्सर कर्म को खराब गलत परिणाम दाता बना बना देते हैं और जिन लोगों की कर्मकरने में कर्म की गति निरंतर बढ़ती चली जाती है उनके कर्म सही परिणाम दाता होते हैं जो बंदूक की गोली की तरह से निरंतर बढ़ती तेज गति से लक्ष्य भेदन कला में निपुण अर्जुन कहे जाते हैं ।
न्यूटन की गति का तीसरा :::क्रिया के प्रति विरोध में प्रतिक्रिया का नियम :—जबभी हम कोई कार्य करते हैं तो उसके ठीक विपरीत दूसरा कार्य प्रकृति करने लगती है । हम निर्माण कार्य करने लगते हैं तो उसके विरुद्ध प्रकृति विनाश कार्य में लग जाती है ।हम विनाश कार्य युद्ध आदि करने लगते हैं तो प्रकृति निर्माण कार्य में लग जाती है । हमें प्रकृति का विपरीत विरोधी कार्य दिखाई नहीं देता है परंतु उसका परिणाम हमारी भावी भविष्य पीढियों को अवश्य देखने को मिलता है ।
हम जब भी कोई कार्य करते हैं तो उसे कार्य की प्रतिक्रिया /उल्टी क्रिया अवश्य होती है , लेकिन कम बुद्धि वाले मूर्ख नासमझ लोग प्रति क्रिया के प्रभाव को देखकर दोबारा कर्म /कार्य करने की हिम्मत नही जुटा पाते हैं और बुद्धिमान ,दार्शनिक बुद्धि के लोग प्रतिक्रिया को देखकर प्रतिक्रिया का अध्ययन करके करते हुए कार्य करते हैं और मनचाहा वाँछनीय परिणाम प्राप्त करते हैं । जैसे जो विकास की बात कर रहा है तो विकास की प्रतिक्रिया विनाश है ।वह कहीं न कहीं ,किसी न किसी का विनाश अवश्य कर रहा है यह अलग बात है कि उसका विनाश कर्म किसी को दिखाई नहीं दे रहा है उसने अपने वाक कौशल से लोगों को भ्रमित कर दिया है कि लोगों को विनाश होते हुए भी दिखाई नहीं दे रहा है या वे लालच वश विनाश की अन देखी कर रहे हैं ।लेकिन विकास का प्रतिक्रिया परिणाम विनाश अवश्य आयेगा लेकिन कब ?इसका पता नहीं । लेकिन विकास का प्रतिक्रिया परिणाम विनाश अवश्य आयेगा । :: अब कर्म की क्रिया के प्रति प्रतिक्रिया का दूसरा उ0
अब फेल पास पर या उत्तीर्ण अनुत्तीर्ण पर …. जो लोग लगातार परिश्रम करते हुए परीक्षा में नान स्टाप बिना रूके पास /उत्तीर्ण होते चले जाते हैं वे परीक्षा प्रणाली के अनुसार सभी लोगों को तो पास होते हुए दिखाई देते हैं लेकिन सच तथ्य यह हैं कि तेजी से पास होते रहने के कारण वे जीवन /जिन्दगी की परीक्षा में फेल /अनुत्तीर्ण होते जा रहे हैं इसका परिणाम यह आता है कि जब भी वे किसी परीक्षा में :परीक्षा चाहे बोर्ड की हो ,बोर्ड से हटकर जाब /नौकरी की हो ,कम्पटीशन या संघर्ष /जीवन संघर्ष की हो जैसे ही वे एक बार फेल हो जाते हैं उनका मानसिक संतुलन बिगड़ /खराब हो जाता है। वे फेल होते ही अपने को मूर्ख नकारा अपने आप को बिल्कुल बेकार नकारा निरुपयोगी समझते हुए जीवन से ,समाज से ,सिस्टम से से दूर जाने की सोच /आत्महत्या तक करने की सोच रखते हुए अपने आप को सबसे दूर जाने की सोच /एकांकी पन से अकेला पन की ओर चलते हुए अवसाद /डिप्रैशन में जाने लगते हैं । ,कुछ नासमझ तो जिन्हें ठीक से और जल्दी नहीं समझा /पहचाना गया तो वे आत्महत्या कर भी लेते हैं ।अवसाद के शुरुआत के दौर में या अवसाद के लम्बा खिंच जाने पर , अन्यथा उनका पागल होना /सामाजिक जीवन मृत्यु तय है । तो क्या परीक्षा इतनी मूल्यवान /कीमती हो गई कि उसमें फेल होते ही सम्पूर्ण जीवन को निस्सार /बेकार ,समझते /मानते हुए अपने जीवन को परीक्षा की बलि/भैंट चढ़ा दिया जाय ।
मेरे मत विचार के अनुसार कोई भी परीक्षा जीवन से ज्यादा मूल्यवान उपयोगी नहीं हो सकती है ।परीक्षा में फेल होना इस बात की पहचान है कि परीक्षा के स्तर के अनुसार मेहनत /परिश्रम नहीं किया गया या फिर अपना ऊर्जा स्तर ,अपनी क्षमता का सही आँकलन नहीं किया गया और ना ही अपनी रुचि अभिरुचि चैक की गई और दूसरे लोगों की सलाह के अनुसार अपने लिए गलत मार्ग का चयन किया गया ।रुचि इंजीनियरिंग में थी मम्मी पापा पड़ौसियों की सलाह पर मैडिकल चिकित्सा की परीक्षा का चयन किया गया अब जब फेल हो गए तो दोषी खुद को माना ।एक परीक्षा मार्ग में फेल होने पर दूसरे परीक्षा मार्ग का चयन किया जाना समझदारी है ःः
अब जो लोग समयानुसार अक्सर फेल होते रहते हैं वे समय के पारखी समझदार अनुभवी होते हुए अपने जीवन में अधिक तम प्रगति करते हैं। वे फेल होने पर अधिक मेहनत करके परीक्षा को दोबारा अच्छे अंकों से पास करते हैं या तीसरी बार में परीक्षा में पास होने पर उनका चयन उत्तम उम्मीदवार के रूप में हो जाता है । वे परीक्षा को चौथा अवसर नहीं देते ,चौथी बार में वे परीक्षा का मार्ग बदलाव किया करते हैं।,समस्त व्यावसायी लोग और समाज संचालक उच्च शिक्षित नहीं होते हैं वे उच्च कोटि के अनुभवी होते हैं ।अतः परीक्षा में पास होकर व्यक्ति उतना नहीं सीख पाता है जितना कि वो परीक्षा में फेल होकर सीखता है … सोचना ,फेल होने का कारण ढूंढना ,पास होने के लिए उपयोगी सामग्री खोजना, अच्छा जीवन जीने के लिए उपयोगी लोगों की पहचान करना, सम्पर्क कला, भाषण कला चापलूसी आदि जीवन योग्यता एं फेल होने पर अच्छी तरह से सीखी जाती है मन पक्का परिपुष्ट होता है दूसरों के वाक बांण व्यंग्य बांणों का अपने तन मन मस्तिष्क पर कोई असर नहीं होता है ।फेल होते रहने से तन मन मस्तिष्क पर बुलैट प्रूफ कवच /ढाल /शील्ड चढ़ता चला जाता है ।जबकि लगातार परीक्षा में पास होते रहने से तन मन मस्तिष्क कच्चा रह जाता है आसानी से दूसरों के वाकबांण अपशब्द अशिष्टता ,व्यंग्य बांण ,गालियाँ आसानी से दिमाग पर चोट करके आदमी के मन तन को हिलाते रहते हैं जीवन भर ।
विचारों को/कर्म को /बात को पकड़ा भी जा सकता है ,संचित किया जा सकता है ,बढ़ाया /विस्तार किया जा सकता है ,और कार्य /इच्छा /मंतव्यों के सफल /पूर्ण हो जाने पर छोड़ा जा सकता है ।
कैप्लर के गुरुत्वाकर्षण नियम के अनुसार विचारों में गुरुत्वाकर्षण बल पाया जाता है जिन लोगों के विचार गुरुत्व वर्णा भारी होते हैं जैसे गुरु जन हों या महागुरु नेता गण ःःऐसे लोगों के सानिध्य में प्रभाव क्षेत्र में जाने पर सामान्य लोग के विचार लघुत्व वर्णा हल्के होने से उड़ने /निष्क्रिय होने लगते हैं ।अतः गुरु और महागुरु नेताओं की कक्षा /सभाओं में सोच समझकर जाना चाहिए अन्यथा इनके प्रभाव क्षेत्र में जाते ही सामान्य मनुष्य का दिमाग काम करना बंद कर देता है । ब्रेनवॉश जैसी खतरनाक क्रिया /मुफ्त में दिमाग की धुलाई हो सकती है ,जो फोकटिया/मुफ्त का ज्ञान लेने वाले श्रोताओं को लाभदायक होने के स्थान पर हानिकारक सिद्ध होती है । अतः ज्ञान लेने के लिए गुरु/महागुरु के स्तर का विवेक होना चाहिए और ज्ञान दाता दयाल को देने को धन दक्षिणा अनुपात विवेक ज्ञात होना चाहिए। अन्यथा मुफ्त का ज्ञान लेने की फिराक में एकलव्य की तरह अंगूठा जा सकता है पढ़ा लिखा सब बेकार या शम्मूक की तरह सिर भी जा सकता है अमर्यादित ज्ञान प्रवंचना दोष से जान भी जा सकती है जीवन संकटग्रस्त हो सकता है ।
फैराडे और ओसटर्ड के विद्युत नियम के अनुसार जैसे चुम्बक में बिजली छिपी हुई है दिखाई नहीं देती , अनुभव नहीं होती है वैसे ही बिजली में चुम्बक छिपी हुई दिखाई नहीं देती है लेकिन बड़ी चुम्बक जैनेरेटर में विद्युत के रुप में बाहर निकल कर आ जाती है उसी तरह से बड़ी चुम्बक मोटर में विद्युत चुम्बक में बदल कर रौड /साफ्ट को घुमाती हैं । ट्रान्सफार्मर में दोनों इकट्ठी अनुभव होती हैं । इसी तरह से कर्म भाव(चुम्बक और विद्युत भी) और कर्मफल /परिणाम ( कार्य /निर्माण विनाश ) एक दूसरे में मिक्स /समाहित हैं जो कर्ता यानि ट्रान्सफार्मर अवस्था में ऊर्जा रुपान्तरण अवस्था में अनुभव होते हैं ।

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