सच तो यह ह कि ओशो रजनीश जी मरे ही नहीं ,वे अपने अतृप्त शिष्यों और अतृप्त अनुयायियों के रूप में हमारे सम्मुख हमारे समाज में विद्यमान हैं अपने विचारों के लेखन रुप में जो अक्सर समय समय पर उनके शिष्यों अनुयायियों द्वारा उद्घृत किए जाते रहते हैं ।,
कारण केवल मनुष्य ही पूर्णतः सत्य रुप में मरता है जन्म का आश्य है लिंग (पहचान)कारण शरीर धारण करना ःःमृत्यु का अर्थ ह लिंग (पहचान)कारण शरीर का नष्ट होना अर्थात मरते समय मनुष्य का लिंग विवेक समाप्त हो जाय कि तू पैदा होते समय स्त्री था या पुरुष तू अपने जीवन में जो भी कारण शरीर स्त्री/पुरुष पैदा हुआ था जीवन के पूर्वाध में बाद में अर्ध जीवन पश्चात तू दूसरे पूरक लिंग में मानसिक रूप से जीया (पुरुष बाद के आधे जीवन को स्त्री की तरह डर डर कर जीता है स्त्री हार्मोन का स्तर बड़ जाने से जबकि स्त्री बाद के आधे जीवन को पुरुष की तरह जीती है निडर होकर पुरुष हार्मोन का स्तर बड़ जाने से । अर्थात मरते समय स्त्री लिंगीय शरीर होते हुए पुरुषायित की मानसिकता से मरती है कर्कश /भारी स्वर नाद करते हुए । । पुरुष मरते समय पुरुष लिंगीय शरीर होते हुए स्त्री की मानसिकता से मरता है कातर/कोमल नारी स्वर नाद करता हुआ )
अर्थात मरते समय यदि स्वर नाद बदल जाय तो समझो उस नर /नारी जीव ने जीवन के दोनों पक्षों को नर ने नारी को और नारी ने नर पक्ष की मानसिक रूप से जीते हुए जीवन की पूर्णता को सार्थक किया और मरते समय वह जीवन के दोनों नर /नारी पक्ष को अन्त समय तक समझ गया और निषपक्ष तटस्थ मानसिकता से मरा ।मरते समय वह न नर रहा ,न नारी रही
इसके विपरीत ओशो रजनीश जी ने मन की विशेष पूर्णतः इच्छा पूर्ति पर विशेष ज्ञान /ध्यान दिया कि यदि नर हो तो नारी को इतना भोगो कि नर के मन में नारी आसक्ति भाव समाप्त हो जाय । और यदि नारी हो तो नर को इतना भोगो कि नारी में नर के प्रति आसक्ति भाव समाप्त हो जाय । उनका तर्क था कि पूर्ण भोजन भक्षण के पश्चात मन तृप्त होने पर भूख कुछ समयावधि के लिए शान्त हो जाती है ,मर जाती है ।लेकिन स्त्री को नर और नर को स्त्री भोजन नहीं है ।वैसे मैं इस लाईन से सहमत हूँ कामसूत्रम के अनुसार इसे नर का नारी को और नारी का नर को मित्थ्या भक्ष्ण psudo canabolism कहा है क्योंकि काम के पूर्ण वेग में दोनों के मुख खुल जाते हैं एक दूसरे को काटने लगते हैं ,आलिंगन के द्वारा दोनों एक दूसरे को कसकर पकड़ने लगते हैं कि दूसरा छूट कर भाग न जाय ।
परन्तु जीवन के निरंतरता नियम के अनुसार भूख की कभी भी पूर्ण तृप्ति नहीं होती है एक समय भरपेट भोजन के बाद फिर दोबारा पुनः भूख लग आती है उसी तरह से एक बार पूर्णतः सफल मैथुन /संभोग के पश्चात दोबारा किसी को एक दिन बाद ,किसी को दो दिन बाद ,किसी को 7 दिन बाद, किसी को 15 दिन बाद ,और किसी को एक माह में ,किसी को छ:माह में फिर से काम इच्छा की भूख /रति फिर से पुनः पैदा होती रहती है ।यहाँ तक कि सफल मैथुन /संभोग के परिणाम स्वरूप गर्भधारण पश्चात संभोग में अवरोध उत्पन्न होने पर या गर्भ निस्तारण/प्रसव पश्चात जीवों में फिर से /पुनः संभोग /मैथुन करने की इच्छा फिर से नये सिरे से उत्पन्न हो जाती है । आखिर किसी की कहाँ कब कभी तक यौन इच्छा पूर्ति काम्यक्षुधा पूर्ति पूरी तरह से शान्त /समाप्त हुई है ।तो इसका फाईनल उत्तर है नहीं
भोजन भक्ष्ण कर्म और लिंगिय भक्ष्ण कर्म नर का नारी से और नारी का नर से कभी पेट नहीं भरा है , भरे हुए पेट पर या रुके हुए भोजन कब्ज होने पर भी स्वादिष्ट भोजन सामने आते ही भूख जाग जाती है ।और मन चाही स्त्री सामने आने पर पुरुष में तथा मन चाहा पुरुष सामने आने पर स्त्रियों में उसके लिए सहवास की इच्छा उत्पन्न हो जाती है ।यह अलग बात है कि वे दोनों मर्यादा और संस्कार वश खुद को कंट्रोल किए रहते हैं और घर जाकर किसी की खुमारी किसी पर उतरती है ।रास्ते की सुन्दरी की खुमारी बीवियों पर उतरती है और सुन्दर पुरुषों की खुमारी पति पर उतरती है ।लेकिन जो मर्यादाहीन संस्कार हीन हैं उन के किस्से अखबारों और पत्रिकाओं में छपते हैं ।
रजनीश जी जीव जीवन जन्म मरण के मध्य जीवित अवस्था जिसमें नरनारी की संयुक्त अवस्था ( एक जीवन के दो पक्ष नर और नारी , एक शरीर में छिपे दोनों नर लिंगिय नारी लिंगियता ,एक शरीर में दोनों तरह के नर हार्मोन नारी हार्मोन ,एक जीव के एक कर्म के दो प्रभाव निर्माण नारी गुण और विनाश नर गुण ,एक जीव के कर्ता भाव नर और कर्मा भाव नारी की भ्रम पूर्ण ःः भ्रमर ,भ्रमित भ्रमण भ्रूण भृष्टाचारी सतत कर्मरत अवस्था युक्त जीवन तक को नहीं समझ पाये )
वे अर्ध नारीश्वर के शैव शिव शव सिद्धांत तक को नहीं समझ पाये वे दूसरों को नरनारी का भेद और मिलन तथा मिलन का परिणाम अर्धनारीश्वर के दोष से युक्त आधी अधूरी संतान नर लिंगिय या नारी लिंगिय के गुण दोष युक्त अपूर्ण अधूरा जो दोनों के मिलकर भी मिलने पर नहीं होता पूरा अर्थात जीवन की सततता निरंतरता के वृहद अरण्यक उपनिषद के प्रथम प्रारंभिक श्लोक जीव का उदगम स्थल, उदगार ,उद्देश्य बेसिक जीव जीवन विज्ञान तक को ठीक से नहीं समझ पाये और जीव की फिजिक्स /भौतिकी ,कैमिस्ट्री /रसायनी ,और मैथ /गणित में खुद उलझे रहे और दूसरों को भी उलझे रहने को कह गए ।
रजनीश जी अपने जीवन काल में सफल नहीं रहे उनकी मौलिक इच्छा खुद को समाज में धर्मगुरु के रूप में. प्रतिष्ठित /पहचान नया वैज्ञानिक धर्म ( अमूर्त चिंतन तर्क प्रधान नयी सोच ) चलाने की थी ।लेकिन वे कंचन कामिनी के जाल में ऐसे उलझ गए थे कि उनकी छवि धर्माचार्य गुरु के बजाय समाज में यौनाचार्य गुरु की प्रसिद्ध हो गई
मैं अन्तिम लाईन यह कहूँगा कि रजनीश जी की ख्याति/प्रसिद्धि जीवन काल में एक सामान्य पुरुष की तरह श्रेष्ठ धर्माचार्य की तो सार्थक हो नहीं पायी ,हाँ वे उत्तम यौनाचार्य के रूप में अवश्य प्रसिद्ध हो गए ।अपने यौन पिपासु शिष्यों/अनुयायियों के मध्य ।
वे मूत्र यान पर बैठ कर खुद मूत्र/ गर्भ मार्ग मेंं बह गए , और दूसरों को गर्भमार्ग /मूत्र सागर में तैरने को कह गये ।
लेकिन ओशो रजनीश जी ने जीवन की पूर्णता के दर्शन नहीं किये जन्म के दूसरे आधे स्त्री पक्ष को नहीं देखा जन्म लेने के बाद सार्थक ता के साथ मृत्यु दर्शन नहीं किया । जबकि सामान्य कोटि के लोग आसानी से जीवन के दूसरे स्त्री पक्ष का करने के बाद मृत्यु मोक्ष पा रहे हैं । पुराने जा रहे हैं नये आ रहे हैं
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