शब्द स्वयं बोलता है अपना अर्थ और भ्रमित हो जाता है जीव
इस विषय पर एक बार बुलंदशहर में बुद्धि जीवियों का सम्मेलन हुआ जिससे मेरी समझ मैं तो कुछ भी स्पष्ट नहीं आया लेकिन जो सुना उस समय उससे मुझे जो विपर्यय दर्शन का ज्ञान हुआ उसे लिख रहा हूँ ।
भगवान शब्द पाँच शब्दों से मिलकर बना हुआ है जिसके शब्दों के कारण क्रम को तोड़ने पर जो अनेक शब्द बनते हैं नये गुण दर्शन होते हैं वह लिखता हूँ ःः
भगवान # भ + गवान अर्थात भ+य से अपने गीत गवाने वाला
भगवान # भग + वान अर्थात आधा अधूरा भग और योनि गुण युक्त दृश्य अदृश्य भ्रमजाल में खुद उलझन में
भगवान #भगव+आन अर्थात पद प्रतिष्ठा युक्त
भगवान # भगवा + आन अर्थात ओजस्वी ऊर्जायी केसरिया रंग वाला भोरी और आन के अनुसार स्वयं मर्यादा में रहने वाला दूसरों को मर्यादा में रखने वाला पुरुषोत्तम राम
भगवान# भगवा +न अर्थात भगव भगवा को भी नेस्तनाबूद करनेवाला निर्माण विनाश में समर्थ
बाकी अर्थ अपनी अपनी बुद्धि से खुद लगा लेना ःः
मैंने तो बुद्धि के विपर्यय दर्शन का मार्ग /छिपे हुए को देखने की कला कल्पना विज्ञान का मार्ग खोल दिया
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