अपने बच्चों की शादी तय करने से पहले उसके भावी जीवन साथी के बारे में किस तरह की तसल्ली कर लेनी चाहिए ?

बच्चों की शादी तय करने से पहले उसके भावी जीवन साथी के बारे में सोचने से पहले अपने पुत्र पुत्री की कुंडली का अध्ययन पहले खुद करना चाहिए बाद में दूसरे के पुत्र पुत्री की कुंडली पर चर्चा मिलान सोचना चाहिए ।वर्तमान परिपेक्ष्य में ज्यादा लचीलापन से सोचते हुए खुलकर बात करना चाहिए जैसे नाड़ी मिलान के स्थान पर रक्त ग्रुप मिलान देखना देखना चाहिए, एक रक्त ग्रुप दोनों का ना हो यदि कोई विकल्प नहीं बचता है दोनों एक रक्त ग्रुप के हैं तो दोनों ++ या - - हों किसी भी हालत में + - ॥ - + नहीं ,मिलने चाहिए । योनि भेद तो चलेगा लेकिन शत्रु योनिज नहीं होने चाहिए जैसे बाघ बकरी , बंदर ऊँट , सिंह हाथी , बंदर घोड़ा , सर्प नेवला आदि ।यदि दोनों की एक योनि है तो सबसे अच्छा है । पितर विद्या अनुवांशिक नियमों को ध्यान में रखते हुए गोत्र अलग अलग होते हुए भी शादी संबंधों में रक्त संबंध को प्राथमिकता देते हुए मामा, बुआ मौसी के कुल में शादी नहीं करनी चाहिए ।यही नियम एक गोत्रीय शादी संबंध ताऊ चाचा के बच्चों में शादी नहीं होनी चाहिए । इस गोत्र कुल नियम के पालन न करने पर पितर जीन्स मिलान के समय होमोजाईगस औटोसोमल रिसैसिव मैन्डेलियन डिस्आर्डर से अनेकों अनुवांशिक लाइलाज़ रोग संतान मेंं आ जाते हैं तथा हैटैरोजाईगस सैक्सुअल डिस्आर्डर जैसे हीमोफीलिया, वर्णअंधता उत्पन्न होने से संतान समय पूर्व दुर्घटना ग्रस्त होकर मर सकती है ।इन्द्र वर्णा ,अग्नि वर्णा पुरुषों के लिए सदैव रत्न वर्णा चंद्र वर्णा , स्त्रियों का जोड़ा उचित रहता है । सामान्य वर्ण के लोगों के लिए उग्र वरणा इन्द्र, अग्नि ,रत्न ,वर्णा स्त्रियाँ समस्या का कारण बनती हैं जैसे इन्द्र वर्ण राम के लिए सीता रत्न वर्णा समस्या रही ।रत्न वर्णा पांडवों के लिए अग्नि वर्णा द्रौपदी समस्या उत्पन्न करती रही ।अतः असमान वर्ण विचार करने योग्य है ,समान सवर्णा श्रेष्ठ है ।विजातीय की तुलना में स्वजातीय विवाह उत्तम है ।स्वजातीय शादी के समय कम समस्याएं पैदा होती हैं शादी के बाद भी सिर्फ दहेज को छोड़ कर यदि दहेज की. डीलिंग समझौता हो जाय तब स्वजातीय स्वधर्म में विवाह श्रेष्ठ है ।
मैंने इस प्रकरण पर पहले काफी लिख दिया है । ढ़ूँढे मेरी कोरा साईट पर नरेश शर्मा Msc Med मेरठ रोहतक पर होम -आपका कंटेंट -अपना संबंधित सवाल …..
ऊर्जा स्तर का निर्धारण माईट्रोकोन्डिया के DNA के द्वारा निर्धारित होता है जो जीवद्रव्य अनुवांशिक निर्धारित नियमानुसार माता के माईट्रोकोन्डिया उसकी संतान में पुत्र पुत्री दोनों में समान रूप से आते हैं अंडाणु के जीवद्रव्य द्वारा ।। लेकिन पिता के माईट्रोकोन्डिया जो पितर युग्मक शुक्राणुओं के मध्य भाग धड़ में पूँछ से पहले होते हैं पूँछ को गति /चाल देते हैं जिनके माईट्रोकोन्डियल DNA के आक्सीकरण पैटर्न के तेज या मंदे होने से शुक्राणुओं में गति होती है।जिनकी चाल की गति के अनुसार निषेचन होने के बाद संतान (पुत्र /पुत्री) उत्पन्न होते हैं । ये पितर युग्मक शुक्राणु के माईट्रोकोन्डिया निषेचन क्रिया के दौरान स्त्री युग्मक अंडाणु में प्रवेश नहीं कर पाते हैं यदि कोई पुरुष शुक्राणु माईट्रोकोन्डिया स्त्री अंडाणु के अंदर किसी तरह से अंदर चला जाता है तो वह स्त्री अंडाणु के गाल्जीबाडी के लाईसोसोमस सैल पार्टिकल्स एक्टिविटी के फैगोसाईटोसिस प्रक्रिया द्वारा नष्ट कर दिया जाता है ।
कहने का तात्पर्य यह है कि मनुष्य में ऊर्जा स्तरीय निर्धारण मातृपक्षीय माईट्रोकोन्डिया के DNA द्वाराहोता है इसकी कहावत /मुहावरा है ःः माँ पर पूत (मनुष्य में) पिता पर घोड़ा ( पूत ) । बहुत नहीं तो थोड़ा थोड़ा ।। ऊर्जा पक्ष (कार्य शैली ,काम करने का तरीका , फुर्तीला पन ,आलस्य प्रगतिशील सोच का गुण ) का निर्धारण माँ नानी पक्ष की ओर से होता है ।पिता पितर(दादा /बाबा ) नाना पक्ष की ओर से नहीं होता है । अतः जब भी लड़की देखें तो उसके गाने गवाने बोलने से मानसिक ऊर्जा , नाचने से संगीत बजाने से कार्य करने का ढंग शारीरिक ऊर्जा और नाचने चलगत पर उठते हाथ पैर से फुर्तीलापन यौन ऊर्जा का पता चलता है ।
बच्चों में शरीर निर्माण और स्वास्थ्य मातृपक्षीय होता है माईट्रोकोन्डियल DNA मातृपक्षीय होने से बच्चों का दिमाग उनकी माँके दिमाग के अनुसार मंदा या तेजी से काम करता है, पिता से बच्चों में इगोइज़म आता है। ** यदि बच्चों में डोमिनैंन्ट प्रभावी दबंगई लक्षण ज्यादा है तो उनका सामाजिक विकास अवरुद्ध हो जाता है लड़ाई झगड़ों में उलझ जाने से ,परन्तु यदि उनमें रिसैसिव अप्रभावी भीरु पन लड़ाई झगड़ों से बचने दूर रहने के लक्षण/गुण ज्यादा है मैन्डेलियन पैटर्न के अनुसार तो उनका सामाजिक आर्थिक राजनीतिक बौद्धिक विकास अधिकतम होता है अधिक चिंतन मनन अन्तर्दृष्टि अन्तर्द्वन्द्व अन्तर्मुखी सोच क्षमता विकसित हो जाने की वचह से ।
अब चरक संहिता के अनुसार वर वधू की मानसिकता या सत्व विशलेषण ःः 1 *- ब्रह्म सत्व :-सत्य प्रतिज्ञ ,जागरूक, स्मृतिमान ज्ञान विज्ञान वचन प्रतिवचन प्रतिक्रिया प्रशासनिक बुद्धि सर्वे भवन्तु सुखिनः में आस्था । 2*- आर्ष सत्व :-अधिकतम कार्य स्वयं करनेवाला ( इज्या ) नित्य स्वंय अध्ययन ( स्वाध्यायी ) संकल्प विकल्प ब्रती प्रणशील विपर्यय ज्ञानी अदृश्य को अनुमान से समझने में पारंगत मेधावी Proactive होनी को घटने से पहले समझने वाला अतिइन्द्रिय क्षमता युक्त आसानी से शीघ्र नथकने वाला 3*- ऐन्द्रिक सत्व :- 5 ज्ञानेन्द्रियों 5कर्मेन्द्रियों से समर्थ विस्तार वादी ,प्रभावी, दबंग, ओजस्वी तेजस्वी शूरबुद्धी ,कभी न थकने वाला अति ऊर्जावान ,धर्म कर्म ,अर्थ अन्ना , काम मोह ,मोक्षदायि भोगमें सफल न होने पर ग्लानि भावहीन महात्मा ।4*-याम्य सत्व :- प्राप्तकारी दृढ़शरीरवाला हर्ष उत्थान युक्त निर्भय स्वभाव शुचिष्मान सुगंधित शरीर में दुर्गंधित पसीना नहीं होता ,राग मोह मद द्वैष दोष दूषणहीन प्रियदर्शी 5*-वारुण :- मौसम के बुरे प्रभाव गर्मी सर्दी वर्षा को सहने वाला ,अप्रिय व्यवहार को सहनशील,क्रोध प्रसन्नता में आत्मनियंत्रण युक्त , दूसरों को शत्रुओं को रुलाने में पीड़ा देने में निपुण । 6*- कुबेर सत्व :- समृद्धशाली( भूस्वामी धातु अधातु स्वामी श्रंगारित वेशभूषा में प्रसंन्न बड़े कुल परिवार वाला उद्योगपति ) धर्म समाज का धन से हितकारी कोप क्रोध प्रसंन्नता स्पष्ट हो वह कुबेर भाव युक्त होता है 7*- गंधर्व सत्व :-साहित्य संगीत रसायनों में रुचि भोग गंध माला स्त्री को पूरुष /पुरुष को स्त्री प्रिय ,सदैव मंडली में सभा सद दर्शना ,गायन वादन नृत्य इतिहास पुराणों में रुचि फिल्मों के नायक/नायिका के जैसा चिरयौवना वृद्ध लक्षण हीन पुष्ठशरीर गंधर्व सत्व ह । ये सत्व गुणी श्रैष्ठ भाव के स्त्री पुरुष होते हैं ।ये मानसिक ऊर्जा प्रधान होते हैं इनमें देर तक बोलने दूसरे को समझने की, चिंतन मनन कल्पना शक्ति होती है।
राजस सत्व के भेद / राजलक्षण युक्त स्त्री पुरुषों के भेद /गुण 1*- असुर सत्व :- अपने मूल स्वरूप को छिपाकर रहनेवाले छलिया भाव से अपना जीवन जीने वाले, सुर /श्रेष्ठ समृद्धशाली लोगों के शिकारी , संघर्षशील, शूरवीर मरने मारने में विश्वास करते हैं क्षणिक जीवन प्रिय ,तीव्रक्रोधी ,दूसरों के गुणों में दोषारोपण में पारंगत ,उच्च कोटि के निंदक प्रशंसक ,उग्र स्वभाव निर्दयी आत्मपूजक स्वार्थी ,राजपुरुष /कर्मी असुर सत्व गुणवाले होते हैं। 2*- राक्षस सत्व :- एकांतवासी , सदैव दूसरों को ग्रसित/नष्ट करने में निपुण,क्षमा न करनेवाले दीर्घकालिक क्रोधी छिद्रान्वेषी ,छिद्रप्रहारी (छिपकर अवसर पाते ही प्रहार करने वाले ) राहु वर्ण रक्षण कार्य लड़ाई भिड़ायी में निपुण बड़े शरीर वाले दीर्घकाय ,बहुत परिश्रमी निद्रालु राक्षस सत्व होते हैं जो भृंशमात्र चेष्टा से तमस और श्रापित बुद्धि होकर ईष्ट श्रेष्ठ को अनिष्ट अश्रेष्ठ में बदलकर मंझधार के बचे को किनारे पर डुबो दिया करते हैं । 3*-पिशाच सत्व :- महाआलसी परमकामुक सदैव विपरीत लिंगीय पशु हो या स्त्री/पुरुष ,पवित्रता के द्वेषी ,भीरू डर्रू ,निर्लज्ज, विकृत वर्जित अन्नभक्षी ,वर्जित क्षेत्रों में रहने भ्रमणशील,लघुआकार छोटे शरीर के पिशाच सत्व के स्त्री/पुरुष होते हैं ।परम हिंसक भेड़िया स्वभाव के तीक्ष्ण साहस दुस्साहसी छिपकर रहने वाले और मौका पाते ही झुंड में हमला/आक्रमण कर दिया करते हैं ।अमर्यादित स्वभाव होता है । 4*- सर्प सत्व :- क्रोधित अवस्था में शूर वीर दुस्साहसी ,जब क्रोध न हो तब भीरू /डरपोक ,बहुत परिश्रमी , डरते हुए विषयों स्त्री/पुरुष का सेवन करने वाले एकांतवासी ,बाईपोलर डिस्आर्डर ,पलक न झपकने वाले, गोल आँखों वाले , स्वप्न में सर्प दर्शन की अधिकता सर्प योनिज /सर्प सत्व प्रधान स्त्री/पुरुष होते हैं ये अतिइन्द्रिय क्षमता युक्त परंसंवेदनशील होते हैं । 5*- प्रेत सत्व :- विकृत अन्नभक्षी, सदैव काममति परमलुच्चे ,दुखी रहनेवाले , sadlife deadline अपने शील आचार संहिता से दूसरों का जीवन समस्या ग्रस्त करनेवाले, सुईयक भाव युक्त ,सामाजिक न्याय व्यवस्था पर अविश्वासी, पत्नी पुत्री भेद विवेकहीन ,असंविभागी दूसरे का छीन झपट हड़पने वाले अति लोभी आलसी जो सदैव नींची नजर करके दूसरों का बुरा सोचते/करते हैं वे प्रेतसत्व विदुर नर नारी होते हैं । 6*- वानर सत्व :- चंचलता पूर्ण आचरण व्यवहार श्रृगारित वेशभूषा, नटखट बुद्धि ,अमर्यादित आचरण से कुल /परिवार को त्रासित रखना परम लोभी एक हाथ से से पकड़े दूसरे हाथ से मूर्खता पूर्वक छोड़ने वाला उद्यमी होने पर भी निर्धन ,अत्यंत लोभी मोही दूसरे की कमान/रस्सी केअनुसार जीते हुये समस्याओं युक्त जीवन जीने वाला वानर भाव है 7*- शाकुनसत्व :- शकुन विद्या ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जीवन जीने वाला बिना कर्मकिये फल की इच्छा रखने वाला निकम्मा आलसी निद्रालु जीवन जीने वाला मूर्ख , शकुन सत्व हानि के भय से श्रम कर्म न करनेवाला अभागा सौभाग्य हीन होता है , अस्थिर मति ,असहनशील, धन संचय न करने वाला इसका मन पक्षी समान सदा उड़ान भरनेवाला लेकिन तन कर्म न करनेवाला हिरन के समान होता है जो सब जग को क्षणिक भंगुर मानकर कर्म करने की नहीं सोचता । ये शरीर ऊर्जा प्रधान उत्तम पेशियों वाले शक्तिशाली होते हैं ।
ये तमिस्त्रा /अज्ञान जगत में रहने वाले मूढ़मति यौंन ऊर्जा प्रधान विशेष प्रज्यायि उच्च यौन क्षमता वाले मूर्ख मनुष्य होते हैं जो जीवन के प्रति उदासीन जीने मरने को दूसरों को जीवन आनंद देने को अपना जीवन जीते हैं । 1*- वनस्पति सत्व :- ये शिला /पत्थर के समान आलसी, केवल भोजन तक बुद्धि सीमित ,मान अपमान से दूर प्यार दुत्कार समान, निरंतर पीड़ित अपमानित होते रहने पर भी इनपर कोई फर्क नहीं होता है कोई इनको मारपीट लो ये किसी भी प्रकार की बौद्धिक चैतन्य प्रतिक्रिया नहीं देते । वनस्पति भाव से अपना जीवन जीते हैं ।एक स्थान, एक नर /नारी ,से एक रति नित्यमाहार से भूखमाहार से दुखी जीवन जीते हुए भी परिवर्तन बोध नहीं होता है । 2*- मत्स्य सत्व :-मछली के समान भीरू, बुद्धि हीन ,परंचिंतित निरंतर बुद्धि हीनता से श्रमजीवी ,समस्या उत्पन्न होने पर पराक्रम चिंतन क्षमता हीरो होने से निरंतर दूसरों के जाल /चंगुल में फंसकर अपना जीवन जीते हैं ।इन्हें जन्म लेने के बाद दो काम याद रहते हैं भोजनं बच्चं ।खाओ और बच्चे पैदा करो समाज को सेवक या गुलाम पैदा करना । 3*- मगर सत्व :- इनका बौद्धिक स्तर मछली सतवा से थोड़ा ज्यादा होता है ये भयंकर श्रेणी के हिंसक होते हैं समाज इनसे आतंकित रहता है ये अति क्रूर निष्ठुर आतंकी सोच के लोग होतेहैं मनोरोगी सैडिस्ट परपीड़क ,सैटैराईसिस पुरुष निम्फोमैनिक स्त्रियाँ ,नैतिक दायित्वहीन अनीति खोरा समाज में उपद्रव अशांति मचाये रहते हैं । 4*- पशु सत्व :- इनकी जीवन सोच गाय भैंस ,बकरी ,कुत्ता ,सिंह ,ऊँट हाथी के जैसी निम्न स्तरीय होती है ये बुद्धि के होते समर्थ होते हुए भी मगर छाप बुद्धि लोगों से पीड़ित होते रहते हैं ।आदमी के रूप में होते हुए समर्थ होते हुए भी अपने क्षमा गुण की मूर्खता से आजीवन पीड़ित परेशान जीवन जीते हैं ।
शरीर में उपस्थित धातुओं के संग्रह के परिमाण के अनुसार शरीर में बाल ,त्वचा, स्नेह,माँस , रक्त, अस्थी हड्डियों की दृढ़के अनुसार पुरुष शरीर बाल,माँस अस्थिप्रधान होना चाहिए और स्त्री शरीर त्वचा स्नेह ( वसा ) रक्त प्रधान होना चाहिए । पूर्ण हुआ

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