जानवरों को मानसिक बिमारियाँ होती हैं इस पर मेरा निजी अनुभव ःः हमारे घर पहले कृषि कार्य होता था घर पर पशु कृषि कार्य में मदद के लिए बैल (नपुंसक गौ पुत्र) रखे जाते थे मैं अक्सर पशुओं से दूर रहता था लेकिन कभी कभार मुझे भी पशु नियंत्रण का कार्य करने को मिल जाता था । ऐसे में बैलों को लेकर खेत पर पहुँचाने और खेत पर से घर लाना पड़ जाता था ।घर पर एक धौड़ा (हल्का पीला गंदा सफेद रंग का)बैल था वह कृषि कार्य में अच्छा कार्य करता था ।
लेकिन उसमें पूर्वाग्रह की मानसिक बिमारी थी ।
यदि उसे किसी ने अकारण मार दिया दूर से पत्थर से या राह चलते हुए किसी ने डंडे से अकारण पीट दिया वह उसका चेहरा याद कर लेता था , बस फिर क्या था जब भी उसे मौका मिल जाता जंगल में हो या खेतों पर उसे आक्रमण कारी दिखाई दे जाय वह उस पर आक्रामक तेवर दिखाता था । और यदि वह अकेला हो और वह धौड़ा बैल खुल गया तो फिर उस आक्रमण कारी की खैर नहीं थी ।परन्तु उस बैल की यह खासियत थी कि उसने कभी किसी को पूरी तरह से मारकर किसी की हत्या नहीं की थी आक्रमण कारी को अपने सींगों के प्रहार से टक्कर मार कर गिरा देता था फिर गिरेहुए पर आगे का पैर से उसे दबा कर फुंकार ते हुए डरा धमकाकर कर चेतावनी देकर छोड़ देता था ।वह मुझसे. बुरी तरह चिढ़ा रहता था लेकिन उसे इतना भी ध्यान था कि यह मालिक का पुत्र है मुझ पर प्राणघातक हमला नहीं किया लेकिन मुझे भी चेतावनी देने में पीछे नहीं रहता था ज्यादा निकट आते ही वह खौरने ,दुंकारने लगता था
दूसरी पशु पागलपन की घटना ःः हमारे पड़ोसी गंगू फूल सिंह का घोड़ा पागल हो गया वह उसने अपने बाग में लोहे की जंजीरों से बाँधकर रखा था जो लोगों के निकट आने पर उनको अकारण दुल्त्ती मारने लगा पागलपन के दौरान और यदि कोई ज्यादा निकट आ जाय तो उसे काटकर जख्मी कर देता था । पागलपन की हालत में वह एक महीना जीया बाद में मानव आबादी को लेकर खतरा मानते हुए उसे सरकार से परमीशन लेकर ,जिला पशु धन अधिकारी से पागल प्रमाणित होने पर उसे बंदी बंधी हालत में गोली मरवाकर खत्म किया तब जाकर उस पागल घोड़े का आतंक खत्म हुआ ।
तीसरी घटना ःः एक बार पास के गाँव सीकरी के पंडितजी का ऊँट पागल हो गया था उसके आतंक से लोगों ने जंगल खेतों में अकेले जाना बंद कर दिया था बाद में उसे काबू करवा कर अजमेर रेगिस्तान में छोड़कर आये थे ।
चौथी घटना ःः एक बार एक गीदड़ पागल हो गया वह दिन में ही जंगल में लोगों पर हमला कर देता ,गाँव में लगभग 8लोगों को काटकर घायल कर दिया था लोग परेशान थे उसकेतेजी से हमला करके सुरक्षित भाग जाने से उसे भेड़िया समझने लगे उसका हौंसला बढ़ गया अब वह वड़े लम्बे कद काठी के लोगों पर भी हमला करने लगा उसने अब्दुल गनी को पीर के जंगल में दौड़ाकर काटा ।उसका हौंसला बढ़ चुका था यही उसे भारी पड़ गया एक दिन वह मेरे मित्र ओमपाल जाट के बड़े भाई महीपाल पर जंगल में हमला करने के मूंड में था ।उसे महीपाल ने देख लिया सर्दियों का समय था उसके पास सूती कपड़े का मोटा खेस था वह उस गीदड़ के हमले की प्रतिक्षा करने लगा जैसे ही गीदड़ उस पर हमला करने को झपटा उसने उसके ऊपर खेस गिरा दिया वह खेस में पूरा ढक जाने से अंधा हो गया बस तभी महीपाल ने उसे खेस में लपेटकर घूँसों के प्रहार से मार डाला ।
पाँचवीं घटना एक बिजार की है जो कामपीड़ित सेटैराईसिस होकर गाय के साथ साथ भैंसों के साथ रतिक्रिया करने लगा वह विशेष कर ग्याभिन भैंसों के ऊपर चढ़ने लगा उसकी इस गलत कामचेष्ठा से भैंस समय पूर्व बया जाती थीं आसपास के इलाके में 15 भैंस जब खराब हो गयीं जब लोगों ने उस बिजार को नियंत्रित करके हरिद्वार के जंगल में छोड़ा ।तब जाकर उस कामपीड़ित सैटैराईसिस बिजार के आतंक से मुक्ति मिली ।
दिल्ली में एक बार नर हाथी मादा हथिनी के सानिध्य में गरमा गया उसे सैक्स फीवर /कामज्वर हो गया ,उसने अपने पीलमान /महावत का नियंत्रण मानने से मना कर दिया ।वह यमुना नदी से बाहर निकल कर निजामुद्दीन पुल पर से भीड़ कौ पीड़ित करता हुआ पंडारा रोड तक उत्पात मचाता चला गया कई गाड़ियाँ तोड़ीं कई बाईक सवार को हानि पहुँचायी , कई अन्य बस और ट्रकों को सूँड मारकर शीसे तोड़ दिए । जब वह काबू में /नियंत्रण में नहीं आया उसके असामान्य व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए हथनियों की मदद ली गई ,लेकिन उसकी पसंद की हथनी कहीं पर किसी कार्यक्रम में वयस्त थी वह उस समय वहाँ पर जल्दी नहीं आ सकती थी उधर उस नर हाथी का उत्पात बढ़ता जा रहा था ।ऐसे में उस हिस्टीरिया प्रभावित हाथी को जनसामान्य की सुरक्षार्थ गोली से मारना पड़ा । इस ब्यौरे का दिल्ली के अखबारों में काफी चर्चा रहा था पशु प्रेमियों ने कामपीड़ित नर हाथी के लिए अत्यधिक मानवीय संवेदनाएँ व्यक्त की थीं । दिल्ली सरकार, वन विभाग, वैटैनरी विभाग को खूब कोसा था कि वे एक काम पीड़ित नर हाथी के साथ नयाय न कर सके और एक बेजुबान नर को अकाल मौत मरना पड़ा था ।
इस विषय पर अध्ययन की आवश्यकता है पशुओं को भी मनुष्य के समान मनोरोग होते हैं लेकिन उनकी समुचित चिकित्सा करने के बजाय उन्हें मार दिया जाता है या स्थान परिवर्तित करके आपा बचाया जाता है ।
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