छद्म आध्यात्मिकता क्या है?


छद्म आध्यात्मिकता का मतलब है लोगों को आध्यात्मिकता दर्शन के नाम से छलना ,उनको ज्ञान के नाम से ज्ञान की ओट /आड़ में अज्ञान ,भ्रमज्ञान देना ::/छल कपट करके उनका ब्रैन बाश करके उनको अपनी इच्छाओं अपने मानकों के आधार पर उनके मन मस्तिष्क में उनकी सोच विचार पर अपना अधिकार /कब्जा करके उनको अपनी डिक्शनरी/शब्द कोश के अनुसार बोलना सोचना करना सिखा कर आदमी की संतान को अपना पालतू बनाकर अपने भावी परिवार जनों की सुख सुविधाओं को अक्षय /अमर /अमिट करना । खुद भी मौज करना बिना कर्म किए-कराए और अपनी वंशावली की भी मौज पार्टी /पुख्ता इंतजाम करना जिससे उनको भी बिना कुछ कर्म किए उत्तम से उत्तम भोग भोजन पदार्थो की आपूर्ति की निरंतरत व्यवस्था बनी रहे ।

मुंड़ मुड़ाए तीन गुंण , सिर की मिट जाए खाज ।

भोजन दें बावा कहें , लोग कहें महाराज ।।

जब पिता की सम्पत्ति में पुत्री का भी बराबर का अधिकार है तो फिर दहेज लेना और देना अपराध कैसे? क्या इन्हें एक-दूसरे का पर्याय समझा जाए?


पहले तो दहेज का मतलब समझो फिर ऐसी सोच विचार बनाओ

दहेज की परिभाषा है :-शादी के समय पर पुत्री को ,न कि वर पक्ष को ; पिता पक्ष की ओर से उनके भविष्यक जीवन की सुविधा सुरक्षा के लिए दिये गये उपहार और धनराशि को दहेज कहते हैं ।

यह प्रथा नहीं , आवश्यकता है सहमति है पुत्री के भावी जीवन में सामाजिक सुविधा है । अधिकार नहीं है ; अनुबंध नहीं है ;वैद्युत बंध नहीं है कि यदि दहेज नहीं मिला है तो शादी विवाह संबंध खट्टे कड़वे या खत्म कर दिये जायें ।

आपकी सोच के अनुसार दहेज एक यह गरीब निर्धन व्यक्ति और उसकी पुत्री के जवान होने पर उसे उसकी जवानी की कीमत का सामाजिक दंड है ,कि उस गरीब की बेटी पर जवानी क्यों आईं ? , उस गरीब की बेटी को गरीबी में यौनानन्द के मौलिक पशुज ,मानव अधिकार से कैसे रोका जाए ?उस गरीब की बेटी को , युग्ल की संतान को पैदा होने से कैसे रोका जाए? यह उस गरीब की बेटी के जैविक ,पशुज , मानवीय अधिकारों का हनन है ।क्या किसी भी गरीब की बेटी को धन की कमी से ,पर्याप्त दहेज न मिलने पर उसके विवाह संबंध से वंचित कर देना , विवाह संबंध खत्म कर देना ,यह दहेज नहीं अर्थदंड है ।। जो उसके बाप से वसूली करना चाहिए कि उस गरीब के घर बेटी क्यों पैदा हुई ?

। जिसे आप अधिकार बनाने की सोच की फिराक में हैं आपका यह दहेज प्रथा का अधिकार समाज संस्कृति को बहुत मंहगा और भारी पड़ेगा ।अब से १४००वर्ष पहले अरब के लोगों की यही मानसिकता बन गई थी जिसे मुहम्मद साहब ने ऐसा ठीक कर दिया कि आज उनके अनुयायियी धन से धनी लोगों के धर्म काफिर (काफिलान) काफिया संस्कृति पर भारी पड़ रहे हैं ।।

समझ लेना इसी से ना समझ में आये तो कुछ पैसे ख़र्च करके कुरान पढ़ना अब यह हिन्दी में भी उपलब्ध है लखनऊ वाला ज्यादा विश्वसनीय है ।।अब से १४०० वर्ष पहले जब अरब के लोग बहुत बड़े व्यवसाई थे उनका यूरोपीय क्षेत्र रोम रूमानिया यूनानी क्षेत्र तक प्रभाव था । उनमें भी आज का L G B T W यौन विकृति संबंध सामान्य थे तब उनको मुहम्मद साहब ने अरबी भाषा में समझाया था और वो सुधर गये थे ।। आपको यह दहेज प्रथा से उत्पन्न दुष्परिणाम फोकट /मुफ्त में नहीं समझ में आने वाले । वर्तमान में इसका दूसरा यौन विकृत रूप L,G,B,T,W, है जो धन से ग़रीब , दिमाग से धनी लोगों में पैदा हो रहा है ।

भारतीय अपनी बेहतरीन संस्कृति को छोड़कर पाश्चात्य संस्कृति के पीछे क्यों भाग रहे हैं?


आपने कैसे समझ लिया कि भारतीय संस्कृति अच्छी गुणवत्तापूर्ण है । कोई व्यक्ति तो क्या पशु भी जो अच्छे बुरे का विवेक बुद्धि रखता है वह अच्छे संस्कार संस्कृति को क्यों छोड़ेगा और बुरे संस्कार संस्कृति को क्यों अपनायेगा । आखिर कुछ तो कमी है भारतीय संस्कृति संस्कार ओं में कि लोग भारतीय संस्कृति संस्कार को छोड़कर कर विदेशी संस्कृति संस्कार अपना रहे हैं जैसे इस्लामिक , ईसाईयत संस्कृति ।

भारतीय संस्कृति मित्थक /भ्रम ज्ञान/कापी राइट एक्ट /पेटेंट एक्ट पर आधारित धन प्रभाव से संचालित है जिसमें जिसके पास पर्याप्त धन नहीं उसका धर्म नहीं धर्म समाज संस्कृति नहीं ।। वह व्यक्ति धन की कमी से सत्य /वास्तविक ज्ञान से वंचित रहता है और अपने धर्म जाति जीवन को धार्मिक मिथकीय अवधारणा से जीता है जो सच कम और झूठे ज्यादा होते हैं ।। जिसके पास धन नहीं है देने को गुरु जनों को वह फोकटिया /मुफ्त के ज्ञान की तलाश में समाज में फोकटिया ज्ञान स्थल सत्संग सभा समारोह संगोष्ठी ओं में आजीवन जाता /घूमता रहता है और घूम घूमकर भ्रम ज्ञान एकत्र करके अपने जीवन को भ्रम से जीता रहता है ।। जिसके पास धन नहीं है वह कापी राइट एक्ट पेटेंट के तहत तरह तरह की मिथकीय अवधारणा भरी भ्रम पैदा करने वाली अनेक असंख्य किताबों /पुस्तकों को आजीवन पढ़कर जीवन भर अपने जीवन को तरह-तरह के किताबों के मुताबिक मिथकीय भ्रमणीय कथन संग्रह करके अपने जीवन को भ्रमर /भंवरे के समान जीता है । हिन्दू है तो कभी मुसलमान बनना चाहता है तो कभी ईसाई बनना चाहता है कभी सिख बनना चाहता है कभी बौद्ध धर्म से प्रभावित होकर बौद्ध बनना चाहता है कभी जैन बनना चाहता है ।। लेकिन जो लोग अपने हिंदू धर्म को छोड़कर कर दूसरा धर्म अपना कर दूसरे धर्म मतावलंबी बने हैं क्या उनकी सोच मानसिकता में कोई अंतर आया है तो उसका जवाब है नहीं ।। ब्राह्मण इस्लाम धर्म में इमाम मौलाना उलेमा मुफ्ती बना है ईसाई धर्म में फादर कामिल बनता है सिख धर्म में ग्रंथी बना है बौद्ध धर्म में भंते जैन धर्म में मुनि या श्रमण बनता है । ठाकुर इस्लाम में पठान , ईसाई धर्म में जैकब ,सिख धर्म में निहंग बनता है । बनिए ने सभी धर्मों के ठेकेदार जनों को धन दौलत देकर अपना धर्म अहम् वर्चस्व कायम रखा है इसके बाद बड़े स्तर पर श्रमिक जातियों के धर्म परिवर्तन का वृत्तांत हिंदू जलसेवक जातियों के लोग इस्लाम में सक्का भिश्ती , नाईयों को हज्जाम सलमानी में बदला है हिंदू खटीक कटारिया मुसलमानों कसाईयों में बदल गये । कारण में कि उन्होंने अपने आप अपनी इच्छाओं के अनुसार हित में कभी सोचना सीखा ही नहीं अपना व्यवसाय परक सोच नहीं बदली ।उनकी सोच सदैव मुफ्त में डाउनलोड हुए ज्ञान पर आधारित होती है । जिसका परिणाम लाभकारी कम हानिकारक ज्यादा होता है । जिन्होंने अपना हिन्दू धर्म समाज संस्कृति छोड़कर दूसरे धर्म समाज संस्कृति को अपनाया था तो उसका पहला मूल मुख्य कारण धन से प्रभावित होकर धन लेकर धर्म बदलना रहा है दूसरा मुख्य कारण जब अपने धर्म भाईयों से सुविधा सम्मान सुरक्षा ना मिली तब दूसरा धर्म अपनाया , लेकिन यहां पर भी मुख्य कारण धन प्रभाव प्रधानता रही ।आज भी यह धर्म समाज संस्कृति परिवर्तन की बिमारी बरकरार है ।

धर्म जाति संप्रदाय संस्कार संस्कृति एक सामाजिक राजनीतिक परिवारिक संगठन व्यवस्था होती है /बनी हुई है जो मनुष्य ने अपने मुश्किल समय के लिए बनाई है प्रत्येक धर्म समाज संस्कृति जाति संप्रदाय संस्कार संगठन व्यवस्था का वैज्ञानिक वैधानिक कारण आपस में सहयोग सहायता पर आधारित/निर्भरता है जब किसी भी धर्म समाज संस्कृति वर्ग जाति संप्रदाय में लोगों में आपसी सहमति सहयोग सहायता भावना कम से कमतर होती हुई लुप्त हो जाती है तो वह धर्म समाज संस्कृति वर्ग जाति संप्रदाय सभी संस्कारों सही शिक्षा ज्ञान विज्ञान की कमी से लुप्त /नष्ट हो जाते हैं । ऐसे में उस विलुप्त प्राय सभ्यता संस्कृति वर्ग जाति धर्म संप्रदाय के लोग सहयोग सहायता संस्कार की कमी से दूसरे उस धर्म समाज संस्कृति वर्ग जाति धर्म संप्रदाय की ओर रुख किया करते हैं जिनमें सहयोग सहायता संस्कृति संस्कार भावना पायी जाती है ।यही सब हिंदू धर्म समाज संस्कृति में आज घटित हो रहा है । ऐसे में पढ़े लिखे विद्वान शिक्षित लोग पाश्चात्य संस्कृति संस्कार की ओर शिक्षित वर्ग रुख कर रहा है ।। तो अशिक्षित निर्धन गरीब लोग अपनी सूविधा सुरक्षा मान सम्मान इस्लाम धर्म समाज संस्कृति में अनुभव करते हुए मुसलमानों में निकट जा रहे हैं ।

कहने का अभिप्राय यह है कि जब भी लोगों को अपने धर्म जाति संप्रदाय समाज संस्कृति के लोगों से सहयोग सहायता संस्कार संस्कृति शिक्षा सही नहीं मिलती है तो वे अपने जीवन की निरंतरता को बनाए रखने के लिए सुविधा सुरक्षा सहायता देने वाले मनुष्य ओं के नये या पुराने धर्म समाज संस्कृति वर्ग जाति संप्रदाय संगठनों की ओर जाने लगते हैं ।अपना घर परिवार धर्म समाज संस्कृति वर्ग जाति संप्रदाय संस्कार संगठन व्यवस्था को छोड़कर दूसरे लोगों के धर्म संस्कृति शिक्षा समाज संस्कृति वर्ग जाति संप्रदाय को अपनाने लगते हैं ।।शेष है.

रावण महापंडित था, अत्यंत शक्तिशाली था, शिवभक्त था, महान शासक था। फिर भी क्यों लोग अपने पुत्र का नाम रावण नहीं रखते हैं?


रावण शब्द का वाल्मीकि रामायण के अनुसार अर्थ है :— सभी को रूलाने वाला /परेशान /दुखी करने वाला । यह रावण का निक नेम /पुकारु नाम था जो पीड़ित ऋषि मुनि लोगों ने रखा था । जो नामकरण संस्कार संस्कृति के अनुसार नहीं रखा गया था ।

क्या आप जानते हुए अपने बेटे का नाम ऐसा रखना चाहेंगे जिसके नाम से पहले ही समाज में घृणा/नफरत समाज संस्कृति के लोगों के मन मस्तिष्क में व्याप्त है । जैसे कि अतिरिक्त नाम :: दुर्योधन है ।

ऐसे अन्य दूसरे घृणा सूचक नामों को कोई भी श्रेष्ठ /उत्तम पंडित नामकरण संस्कार संस्कृति के अनुसार किसी का भी नाम रखना पसंद नहीं करता है ।

क्या यह भविष्यवाणी सच है,की हर 100 सालों के बाद एक महामारी होगी ?


महामारी का तो पता नहीं पर यह जरूर सुना है :- सौ साल बढ़ै वन और सौ साल बढ़ै जन यह जरूर सुना है ।

दूसरा वाक्य/कथन :- जो गया है बढ़ कर गया है /नष्ट हुआ है ।जो जीव अपनी सामान्य सीमा से ज्यादा बढ़ जाता है शरीर में वह शीघ्र नष्ट होता है जल्दी मरता है ,उसकी आयु कम होती है उसके जाति भाईयों /जातकों की तुलना में । जो जीव जाति अपनी सामान्य सीमा से अधिक बढ़ने लगती है दूसरे जीवों को खतरा बनने लगती है वह जाति भी नष्ट होने लगती है ।इस नियम की पुष्टि जीव विज्ञान की एक शाखा जीवाशमिकी का अध्ययन करने से होती है , जिसके अनुसार डायनोसोर ही उल्कापात से नष्ट नहीं हुए हैं अपितु अनेकों असंख्य जानवर और पेड़ पहले भी नष्ट हुए हैं जिनकी पूर्व में अनियंत्रित असीमित वृद्धि हुई थी । वह अब भी जीवाश्म में मिलते हैं ।पत्थर वाला कोयला पौधों का जीवाश्म ईंधन रुप है । डायनोसोर की जीवाश्म कथा से सभी परिचित हैं ।

मनुष्य हो या कोई भी अन्य जाति जीव हो जब वह दूसरे जीवों को अकारण निर्दोष होने पर मारने लगता है । या जीवों को आवश्यकता से अधिक मात्रा में मारकर उनके शरीर से जीविकोपार्जन धनार्जन करने लगता है । तो उसे नष्ट करने नियंत्रित करने का कार्य , सबकी नियंत्रण करता /जन्म मृत्यु स्वामिनी //माता प्रकृति अपने हाथ में लेकर उसे नष्ट करने /नियंत्रित करने के लिए तरह तरह की बिमारियाँ /महामारी पैदा करके उसे नष्ट करके या नियंत्रित करने का प्रयास किया करती है । यदि यह प्रकृति मनुष्य के अक्षम्य कार्यक्रम कार्यकलापों को रोकने में असमर्थ हो जाती है मनुष्य की विशेष बल बुद्धि प्रयोग यांत्रिकी क्षमता से तो ऐसे में यह अपना नियंत्रण कार्य अपने स्वामी ईश्वर को सौंप दिया करती है ।

तब ईश्वर मनुष्य को नियंत्रित किया करता है :- तब ईश्वर मनुष्य को चैताने ,चेतावनी देने के लिए मानव समाज में तरह तरह की नयी नयी व्याधियाँ उत्पन्न करता है , पहले अपने मंद हिंसक कालभैरव के द्वारा नियंत्रित करने का प्रयास करता है जो मानव पशु समाज में तरह तरह की बिमारियों को पैदा करके मर्यादा हीन लोगों को अनियंत्रित व्यवहार करनेवाले लोगों को व्याधि ग्रस्त बीमार करके असाधारण असाध्य कुसाध्य बिमारियों से ग्रसित करके आचरण हीन मर्यादा हीन लोगों को यमराज के हवाले कर के नष्ट कर दिया करता है । यदि इस कालभैरव से मानव समाज के लोग नियंत्रित नहीं होते हैं ।। तब ईश्वर बिगाड़ देता है बुद्धि मनुष्य ओं की और शुरू हो जाते हैं जनता में उपद्रव उत्पात अशांति मारकाट शुरू हो जाता है ग्रह युद्ध जनता /प्रजा आपस में लड़ने लगती है ।लोग दो खेमों मेँ बंट जाते हैं कुछ अमन शान्ति का प्रयास हवन यज्ञ ,वार्ता संगोष्ठियों से लोगों को समझाने में लग जाते हैं ।कुछ लड़ाई झगड़े से लूटपाट से धन एकत्रित करने में लग जाते हैं ।ऐसे में विधाता भेज दिया करता है वीरभद्र को जो नष्ट कर दिया करता है उन बदले हुए लोगों को भी जो डरकर भक्त /सज्जन पुरुष बन जाते हैं । वीरभद्र केवल उन्हीं लोगों को जिन्दा छोड़ता है ।जो सत्य मेव जयते में विश्वास /यकीन रखते हैं । जन्म जात संत वृत्ति शान्त सज्जन भाव से पैदा हुए थे , या जिन्होंने बचपन या युवा अवस्था में सत्य ज्ञान प्राप्त होने पर सज्जन भाव अपनाया दान भाव अपनाया ,सत्य कथन अपनाया ,संतोष संतुष्ट धर्म अपनाया ,कंजूसी और व्यापार वृत्ति का आर्थिक वृद्धि का त्याग कर दिया हैं ।

परंतु जब कालभैरव और वीरभद्र भी मनुष्य की बल बुद्ध धन यांत्रिकी धूर्तता के आगे फेल /परास्त /पराजित /हार जाते हैं तब विधाता विवश होता है फिर से नयी सृष्टि सृजन करने के लिए ,इसके लिए जरूरी है ऐसे धूर्त लोगों को पूरी तरह से नष्ट करना इसके लिए विधाता भेजता है तेज हवा ( बवंडर ), अधिक जल (अतिवृष्टि) , अधिक गर्मी ( उष्ण युग ) , अधिक ठंड ( हिम युग ) लेकिन अबकि बार प्रलय आकाश से अग्नि पिंड वर्षा से एस्ट्रायड के जमीन से टकराने से होगी ।ये आकाशीय पिंड पत्थर छोटे छोटे या बड़े भी हो सकते हैं हिन्दू ग्रंथ मारकण्डेय पुराण ,शिव पुराण , ईसाई ग्रंथ बाईबिल , मुस्लिम ग्रंथ कुरान के अनुसार ।

यदि प्रकृति अपने मिशन /महाकार्य /धर्म स्थापना मेँ सफल नहीं हो पाती है तो उस महाकार्य को पूरा करने के लिए विधाता /प्रकृति नियंता अपना प्रतिनिधि महापुरुषों की फौज युगपुरुष के साथ भेजता है जिसे अवतार वाद कहते हैं ।जैसे राम के आने से पहले उनके सहायक विशेष बली भालू वानर पैदा हो गए थे बाली ,सुग्रीव, हनुमान, जामवंत, आदि .।।कृष्ण के लिए सहायक विशेष अर्जुन भीम युधिष्ठिर आदि पैदा हो गए, ब्राह्मणोँ के अति वध प्रवृत्तियों को रोकने के लिए महावीर स्वामी जैनतीर्थंकर ,गौतम बुद्ध ,सम्राट अशोक ,आदि पैदा हो गए थे ।जब मुगल मुसलमान , अंग्रेज ईसाई , और ब्राह्मण अपनी अधार्मिक ,भ्रामक ,मित्थया , कल्पित शिक्षा से मनुष्यों को मानवपशु बनाने में लगे थे तब अन्य मनुष्य ओं को मानवपशु बनाने से रोकने के लिए महर्षि दयानंद भीम सतपाल (भीमराव आंबेडकर) , राजाराम मोहन राय , मदनमोहन मालवीय ,सरसैयद अहमद खां आदि अनेक ऐसे विशेष विभूति जन पैदा हुए ।जिनके संयुक्त प्रयास से भारत क्षेत्र में रहने वाले मनुष्य मानवपशु बनने से बच गए ।

ये महा पुरुष हर समय हरकाल में पृथ्वी पर विद्यमान रहते हैं यदि ये अपना दायित्व जो ईश्वर द्वारा निर्धारित होता है । जिसके लिए ईश्वर इन महा पुरुषों को विशेष बल बुद्धि प्राकृतिक अधिकारों से युक्त करके अधिकारी बनाता है । जब ये महापुरुष विशेष निज बल बुद्धि होने पर भी , राज्य अधिकारों से युक्त शक्ति मान होने पर भी अपना ईश्वरीय धर्म नियमों का पालन नहीं करते हैं । अपने अस्तित्व को अपनी निष्ठा विश्वास को समाज नियंता शासन कर्ता के आधीन मानते हुए अधर्म और अज्ञान का प्रचार प्रसार में संलिप्त हो जाते हैं । यह महापुरुष और अधिकारी गण लोकतंत्र व्यवस्था में या राजतंत्र व्यवस्था में अपने जीवन को ईश्वर नियमों के अनुसार न जीकर अपने जीवन को दूसरों के प्रभाव के अनुसार जीते हैं और दूसरे लोगों को पशुओं को उनका जीवन प्राकृतिक नियमों के अनुसार न जीने देकर उनका जीवन भी अपनी इच्छाओं अपने नियमों के आधार पर जीने को विवश /मजबूर करने लगते हैं ।ऐसे मनुष्य जिनमें विशेष विद्या बल बुद्धि है जिनमें निर्माण विनाश सामर्थ्य ह ऐसे ब्रह्म के अणु /लघु रुप ब्रह्म अणु समान जन ब्राह्मण जातक राजपुरुष नेता और प्रशासन अधिकारी समाज के लोगों को अपने विशेष वाकचातुर्य से शासन सत्ता शक्ति से समाज के लोगों को पशु बनाने लगते हैं ।। राजकीय सामाजिक नियमों की अति प्रति बद्धता से मनुष्य को पशुओं में बदलने लगते हैं । ऐसे में इन कृत्रिमता पूर्ण जीवन जीने वाले महापुरुषों ,अधिकारियों ,बैल मनुष्य ओं को नियंत्रित करने के लिए ईश्वर और प्रकृति अपनी अपनी शक्ति /ताकत दिखाने लगते हैं जिसका नतीजा यह आता है कि कार्य का परिणाम उसके विपरीत उल्टा आने लगता है ।समाज परिवार शिक्षा देने पर भी परिणाम बच्चों में पाशविक प्रवृत्तियां पैदा होने लगती हैं ।चारों तरफ समाज में मनुष्यओं में , वन में पशुओं में असामान्य व्यवहार पनपने लगता है ।चहुंओर , वैर विरोध असहयोग असहिष्णुता का वातावरण बन जाता है , तो समझो विधाता , प्रकृति , मानव जीवन पशु जीवन के विपरीत विरुद्ध हैं ।। ऐसे में जो जागरूक लोग अपने जीवन को प्राकृतिक जीवन के अनुसार जीने लगते हैं । अति संचय /कंजूस भाव /व्यापार भाव छोड़ /त्याग दिया जाता है ।। तो उनके जीवन की रक्षा सुरक्षा हो जाती है ।यदि वो अति संचय करनेवाले व्यापार बुद्धि पर बने रहते हैं तो उनका जीवन खतरे में आ जाता है ।या नष्ट हो जाता है ।।इसे कयामत कहते हैं ।। जीव जनजागरूकता से उत्पन्न परिस्थिति जनजागरण /कयामत कहते हैं ।

।अब से 1400वर्ष पूर्व अरब क्षेत्र में ऐसी भीषण विषम परिस्थितियाँ बन गई थीं ,जब मनुष्य की मौलिक मूल भावनाओं का भी उदारीकरण के चलते आर्थिकीकरण कर दिया गया था ,जैसा आज फिर से दुनिया में हो रहा है ।किसी स्त्री का पति मर गया मार दिया गया दे दो रुपये अपराध मांफ , किसी औरत के साथ ब्लात्कार हुआ या किया दे दो रुपये ब्लात्कार अपराध मांफ ,किसी बच्चों के मां या बाप मर गए या मार दिए दे दो रुपये उन यतीम बच्चों को अपराध मांफ , पैसा रुपया दो समाज बनाने को पैसा पर रुपयों पर भाड़े के मां बाप बच्चे बहन भाई सभी मिलेंगे /बन जायेंगे ,कोई नैतिक जिम्मेदारी मानव मूल्य नहीं मनुष्य दो पैरों वाला पशु बन गया था जो रुपये पैसे के लिए बंदर बनकर नाचता फिरता था आज के आधुनिक सोच के मानव की तरह ।अरब क्षेत्रों में आपसी सहमति सहयोग विशवास नष्ट होने से मनुष्यो में पशुओं जैसी सोच समझ आचरण व्यवहार बन गया था । गांव शहरों का वातावरण जंगली बन गया था ।। तब मुहम्मद साहब ने उनको समझायाऔर अरब बच गया लेकिन अबकि बार काबा बंद होना ।24घंटे लगातार चलने वाली हज यात्रा बंद होना बताता है कि अबकि बार कुछ नया होना है कि मंदिर बंद ,मस्जिद बंद ,गुरुद्वारा बंद ,चर्च /गिरजाघर बंद , बौद्ध पूजा स्थल स्तूप बंद , समर्थ समृद्ध धनी लोगों के भागकर प्राण बचाने के संसाधन रेल जहाज /वायुयान जलयान बंद बता रहे हैं , जता रहे हैं कि अबकि बार कुछ हटकर नया होने वाला है ।

इस खतरनाक परिस्थिति में अपने जीवन की सुरक्षार्थ हम सभी को अपना जीवन ईश्वरीय विधान नियमों के अनुसार जीना चाहिए और दूसरे कमजोर दुर्भाग्यपूर्ण दुर्बल मूर्ख बुद्धि मनुष्य ओं को और अन्य जीवों को भी अपना जीवन प्राकृतिक रूप से जीने देना चाहिए ।इसके लिए हम सभी को प्रकृति प्रदत्त संसाधनों का संग्रह या प्राकृतिक जीवन संसाधन भूमि अधिग्रहण, क्रयविक्रय , जल व्यापार ,वायु व्यापार , आदि ना करें ।। सभी जीवों को निरधन दुरबल कमजोर मनुष्य को अपना जीवन प्राकृतिक सुविधाओं के साथ जीने दिया करें ।। यह ईश्वरीय विधान नियम हैं ।। कहने का तात्पर्य यह है कि जब मनुष्य सभी का व्यापार करने लगता है हर वस्तु का मानक मूल्यांकन करने लगता है तो वह ईश्वरीय व्यवस्था को खतरा बन जाता ह ।ऐसे में सृष्टि नियंता जब सृष्टि नियंत्रण की कमान अपने हाथों में संभाल लेता है तो विनाश का अनुमान /आंकलन करना मनुष्य की बुद्धि क्षमता से बाहर की बात है ।

लेकिन हर बार पैदा हुई महामारी / अति मृत्यु दायक विशेष बीमारी एक नयी शिक्षा देकर जाती है ।

पुरानी शिक्षा संस्कृति संसकारों में परिवर्तन /बदलाव लाने की जरुरत है ।

बदलो अपने मन को ,बदलो शिक्षा को ,बदलो शिक्षा जनित धर्म कर्म काण्ड पर पर आधारित जीवन पद्धति को को , छोड़ो उन रस्म रिवाजों को आचार विचार व्यवहार को, जो तुमको मौत के दरवाजे पर ले आये ।

अपनाओ उन नये जीवन दायक नियमों को जो तुम्हारा जीवन स्थिर और लम्बा करेंगे ।

गुरुवार को बाल दाढ़ी क्यों नहीं कटवाना चाहिए?


हिंदू धर्म समाज संस्कृति में गुरु का स्थान मनुष्य होने पर भी आराध्य भगवान से ऊंचा माना /जाना /समझा जाता है ।पुरातन संस्कृति वैदिक के अनुसार दो मुख्य विचार धारा एं हैं एक असुर विचार धारा जिसके प्रवर्तक शुक्राचार्य हैं ।दूसरी सुर या देवताओं की विचारधारा जिसके प्रवर्तक वृहस्पति हैं । असुर विचार धारा के अनुसार शुक्राचार्य के अनुयाई शुक्रवार /जुम्मा को पवित्र मानते हैं । जबकि सुर/देवता विचार धारा के अनुसार देश/सुर समाज संस्कृति के लोग वृहस्पतिवार को पवित्र मानते हैं ।

कबीर के अनुसार :- गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागू पांय ।बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताए ।।

अब आपके सवाल का जवाब:-सभी धर्मों में बाल कटने को शक्ति हीनता का सूचक माना जाता है यह हिंदुओं में छौर कर्म छुरित कर्म कहा जाता है जो छुरा या उस्तरा से किया जाता है इसमें बालों को शरीर से हटाया जाता है जिससे क्षेत्र के स्थान से नाम दिया जाता है यदि मुंड या सिर क्षेत्र के बाल छुरी /उस्तरा से हटाए जाते हैं तो उसे मुंडन कहा जाता है ।इसमें यदि दाढ़ी मूछ और शरीरांग के अनुसार बाल जोड़ दिए जा तो इसे छौर कर्म कहा जाता है ,जो अक्सर माता पिता के मरने के समय पर किया जाता है , या बालक के 6 माह 1 साल 5 साल पूरा होने पर किया जाता है । इस छौर कर्म को अपवित्र या संक्रमण कारी मानते हुए , रोग उत्पत्ति दायक मानते हुए इससे अपवित्र कर कहा जाता है जिससे कराने के बाद नहाना जरूरी है । और नहाने के बाद बाल कटे हुए स्थान पर रोग विरोधी क्रीम या तेल लगाया जाना जरूरी माना जाता है।

आपने जो अपनी शंका वृहस्पति वार को छोड़कर केस मुंडन के बारे में कही है । वह उचित नहीं है ऐसा सभी धर्म ग्रंथों में वर्णित है जैसे बाइबल में लिखा है सप्ताह के 6 दिन काम करो और ७वें दिन घर की शरीर की सफाई करो, आराम करो । जबकि इस्लाम में एक लाइन और जोड़ी गई है कि सुंदर सुरंगारीत होने के बाद घर में मत बैठे रहो इस दिन भाइयों के साथ समाज में शरीक हो मतलब नमाज जाओ , देश विदेश घूमने जाओ ईमान और रोजी रुजक बढ़ाओ । ईसाइयों में इतवार का दिन पवित्र माना जाता है इसके लिए वे छौर कर्म बाल कटवाने /मुंडन को शनिवार को उचित मानते हैं ।यहूदियों में शनिवार को पवित्र दिन माना गया है वह छौर कर्म के लिए शुक्रवार या जुम्मा को उचित मानते हैं । हिंदुओं में छौर कर्म वृहस्पतिवार के लिए इसलिए निषेध है क्योंकि इससे शक्ति का क्षय /कमी काद्धांत जुड़ा हुआ है , इसे मानते हुए हिंदू लोग बृहस्पतिवार को विशेष पवित्रता का ध्यान रखते हुए ना तो छौर कर्म करते हैं ,ना धोबी कर्म कपड़ों की धुलाई करते हैं , ताकि वह संक्रमण से बचे रहें और समाज में सभी से मिलजुल कर अपना सामाजिक दायरा बढ़ा कर के पद क्रमिक व्यवस्था के अनुसार अपना औहदा /सामाजिक रुतबा बरकरार कर सकें , जो राजनीति में समाज नीति में बहुत उपयोगी होता है। अब हम थोड़ा सा इसका दायरा और बड़ा करते हैं हिंदू धर्म में अनेक जातियों अनेक वर्गों के लोग रहते हैं जिनके अपने अपने देवता उन्होंने बनाए हैं ताकि वह उस दिन विशेष साफ सफाई से शुद्ध होकर देव आराधना कर सकें और इस दिन वे सभी अपनी व्यावसायिक कार्य बंद रखते हैं जिससे उन्हें भी 1 दिन आराम मिल सके और अगले दिन से उनमें फिर से उर्जा संचार होने से पूरे हफ्ते निरंतर ऊर्जा प्रवाह बना रह सके । जैसे मंगलवार के दिन हनुमान के अनुयाई अर्थात श्रमिक वर्ग के लोग पवित्र मानते हैं वे हनुमान के लिए निर्धारित हुए मंगलवार के दिन बाल नहीं काटते कटवाते और ना ही कोई सामाजिक गतिविधि में लिप्त होते हैं ।

यह अपनी-अपनी धर्म समाज संस्कृति विचारों के अनुसार मनुष्य के लिए उसके धर्म समाज संस्कृति संचालक लोगों ने निर्धारित किया है जैसे शंकराचार्य /महंत /पंडितों ने तरह-तरह के नियम हिंदू समाज के लिए बनाए , ईसाईयों के लिए विशप और फादर अपने नियम बनाए । ध्यान रखना ऐसे सबाल गुरु गोबिंद सिंह जी के अनुयायियों में ऐसे प्रश्न मत कर बैठना । नहीं तो यदि वहां पर कट्टर सिक्ख निहंग मौजूद हुए तो मुझे दोष मत देना कि पहले बताया न था ।


साधक के चेहरे पर तेज क्यों होता है?


साधक लोग ब्रेन मैपिंग माइंड सेटिंग में एक्सपर्ट होते हैं वह अपने विचारों को अपने अनुसार नियंत्रित करना सीख जाते हैं और उनकी शारीरिक एक्टिविटी भी उनके विचार और इच्छा के अनुसार होती हैं जिससे जिससे वह न्यूनतम जैविक ऊर्जा व्यय करते हैं जो थोड़े से भोजन से भी संतुलित बनी रहती है या पूरी रहती है जिसस शरीर को , मस्तिष्क को पूरा पोषण मिलता है ।

चेहरे पर तेज/चमक का एक बेसिक /पहला साधारण नियम है कि यदि मन में कोई चिंता तनाव/दबाव न हो भोजन /खान-पान पुष्टि कर हो , दूसरे नियम मेहनत के अनुसार भोजन किया जाय , तीसरे नींद /निद्रा मेहनत के अनुसार आती रहे तो चेहरे पर चमक/तेज अपने आप आ जाता है । भोजन में प्रोटीन वसा विटामिन खनिज लवण उचित अनुपात में हैं तो चमक /तेज स्वत आती है ।

वैज्ञानिक व्याख्या मानव मस्तिष्क में अरबों न्यूरोंन /तंत्रिका कोशिकाएं होती हैं और प्रत्येक न्यूरोंन कोशिका में ऊर्जा उत्पादन कर्ता ईकाई माईट्रोकोन्डिया की संख्या ५००००से २०००००तक होती है कार्य आवश्यकता के अनुसार । अधिक चिंता करने से या व्यर्थ की चिंता की आदत पड़ जाने पर मानसिक रोग लग जाने पर, दुष्चरित्र व्यवहार स्वभाव बन जाने पर मनुष्य जितना भोजन खाता है उससे ज्यादा व्यर्थ के कामों में अपनी शारीरिक मानसिक ऊर्जा व्यय करता है जिससे उसके अवचेतन मन को शरीर की पूर्ण मरम्मत करने का अवसर नहीं मिलता है जिससे अति वायु कुपित शरीर बन जाने से /उच्च आक्सीकरण दर शरीर बन जाने से ,तन और मन दोनों ही की सैटिंग ख़राब हो जाती है । जिससे शरीर की चमक उड़ जाती है चेहरा निष्तेज हो जाता है।

जो लोग साधक स्वभाव के उत्तम चरित्र होते हैं जिनको भोजन और श्रम /थकान दायक मेहनत का ज्ञान हो जाता है , वे मानसिक श्रम व्यर्थ चिंतन और शारीरिक श्रम पर दृष्टि पात निरंतर बनाये रखने से , तथा भोजन के श्रम अनुपात के प्रति जागरूक होने से अपने तन मन की ऊर्जा का अपव्यय नहीं करते हैं । जिससे उनका अवचेतन मन शरीर की मरम्मत आवश्यकता अनुसार करता रहता है । शरीर पर विशेष चमक और चेहरा तेजपूर्ण बना रहता है ।

साधक लोग अपने दिमाग में ज्यादातर के फालतू विचार नहीं रखते हैं । वह समाज के दूसरे लोगों से सहानुभूति कमतर रखते हैं ,नहीं रखते हैं । ऐसे में वह समाज के संगठन क्षेत्र से अलग रहते हैं ।। उनके ऊपर किसी का भी सामाजिक दबाव नहीं पड़ता है और ना ही वह किसी मनुष्य से परिवार से जाति से सहानुभूति रखते हैं जिससे दूसरे मनुष्यों के समस्याएं संभावनाएं महसूस कर सकें , ऐसे में उनके मन मस्तिष्क के पास उनकी अपनी थोड़ी सी सीमित समस्याएं होती हैं जिनका वे निदान भी जानते हैं और अनिष्ट की आशंका से चिंतित की चिंता नहीं करते ।। साधारण मनुष्य के मन मस्तिष्क पर उनकी अपनी सामाजिक समस्याओं का चिंतन भार होता है इसके अलावा वे समाज में घर परिवार में जिन लोगों से जुड़े रहते हैं उनकी भी समस्याओं का चिंतन भार अपने मन मस्तिष्क पर संवेदनशीलता के गुण से डालते रहते हैं ।जिससे उनके मस्तिष्क का चिंतन भार बढ़ जाता है चिंता की संख्या बढ़ जाने से चिंता सामाधान या चिंता हल करने की क्षमता घट जाती है जिससे वे अक्सर उदास, उदगिनर खिन्न निराश रहते हैं । समय-समय पर दूसरे लोगों की चिंताओं का चिंतन होते रहने से उनका मस्तिष्क उनकी निजी जैविक ऊर्जा को अकारण व्यय करता रहता है ।। जो उनके किसी काम नहीं आती जबकि साधक लोगों के पास दूसरों की कोई समस्या नहीं होती उनकी अपनी चिंता चिंता समस्याएं कम होती हैं जिसका हल समाधान वह जानते हैं । जिससेउनके शरीर में जैविक ऊर्जा पर्याप्त होती है । इसके अलावा उनके अवचेतन मन की कार्यप्रणाली नियंत्रित रहने से उनका हृदय धड़कन सामान्य बनी रहती है उन्हें निद्रा सामान्य आती है जिससे उनका और चेतन मन उनके तन मन की रिपेयर समय अनुसार करता रहता है । जिससे उनके चेहरे पर पर्याप्त तेज बना रहता है क्योंकि वह अनावश्यक कार्य नहीं करते अनावश्यक चिंतन नहीं करते वह श्रम केयर करने के बारे में अति जागरूक होते हैं ।

आपकी दृष्टि में सफलता प्राप्ति के कुछ मूल मंत्र क्या हैं?


जिंदगी में सफलता प्राप्त करने का एक भी मंत्र नहीं है यदि कोई सफलता हासिल करना चाहता है तो उसका सिर्फ और एक सिर्फ शब्द है जिसका नाम है सच्चाई । ज्यादातर लोग सफलता हासिल करने के लिए कठोर परिश्रम, अनुशासन, दूरदृष्टी ,पक्का इरादा, लगन आदि असंख्य अनेक शब्दों में व्यक्त किया करते हैं । लेकिन ये सभी क्वालिटी /विशेष गुण गधा , चींटी , गिद्ध , सिंह , भेड़िया /कुत्तों में भी होते हैं फिर वे पशु क्यों कर रहे गये ?ये सभी या एक इनमें से श्रेष्ठ पशु होकर भी आदमी से आगे सम्मानित क्यों नहीं बन पाए ? विकास की दौड़ में आदमी से पिछड़ गए । सफलता उन लोगों को मिलती है जिनकी सोच ईश्वर समान होती है जो निर्माण अधिक विनाश कम बुद्धि वाले सामाजिक व्यावसायिक सोच विचार इच्छा वाले होते हैं । जिनका स्वभाव ज्यादा से ज्यादा जीवों पशु पक्षी मनुष्य आदि की मदद करने वाला होता है ।

जीवन में कामयाबी/सफलता अपने मन के अवचेतन स्तर में डली सत्य सूचना, निजी आत्मविश्वास, वैधानिकता नीति आश्रित सूचना ,पर आधारित मशीनी मेहनत, परोपकार भाव पर बनी आदत जीवन पद्धति पर निर्भर करती है । जो लोग निरंतर अपने हित की सोच विचार इच्छा रखते हैं अपने लिए खुद सच्चाई पर ईमानदारी पर नहीं होते स्वभाव सोच आदत से कृष्ण /कंजूस होते हैं मेहनत करने की जिनकी आदत नहीं होती स्वभाव से भीरु /डर्रु /फट्टू होते हैं , अपने जीवन में कभी सफलता हासिल नहीं कर सकते हैं ।

कितना कठिन है एक फेल हुए बच्चे को /छात्र को अहसास करा पाना कि तुम फेल हो गए हो परीक्षा में । और कितना आसान है एक नकारा नाकाबिल अयोग्य छात्र को नकल से , सोर्स सिफारिश से , , डोनेशन देने पर पास होने पर अहसास कराना कि तुम पास हो गये हो । जबकि वह व्यक्तिगत रूप से जानता है कि उसने पढ़ाई में मेहनत नहीं की है , या उसका पेपर /परीक्षा प्रश्नपत्र ठीक से नहीं हुआ था ।अब जब अनैतिक रूप से वह पास हो जाता है तो सहर्ष स्वीकार कर लिया करता है कि वह पास हो गया है । ऐसे छात्र/मनुष्य अपने आप से छल कपट करते हैं जो फेल होने पर अपने को फेल नहीं मानते/समझते और न ही अपनी श्रम/मेहनत में कमी को स्वीकार करते हैं ।वे सफल क्योंकर होंगे । क्योंकि ये अपने स्वयं प्रति भी ईमानदार/सच्चाई युक्त नहीं होते हैं ।

फेल होने पर रोबिन शर्मा ने कहा है कि फेल होना एक बाधा है शैक्षिक विकास मार्ग में , जो यह सिद्ध करती है कि 1:आपने अपने लिए अध्ययन विषयों का चुनाव अपने लिए अपने आप नहीं किया है अध्ययन विषयों का चुनाव आपने दूसरों की सलाह पर माता पिता गुरु मित्रों की सलाह पर किया है ।जिसमें आपकी रुचि, सहमति नहीं है । जब चुनाव/चयन गलत हुआ है । तो परिणाम भी गलत ही आयेगा ,फिर दुख क्यों हो रहा है । लगातार मेहनत करने पर भी आप दो बार से ज्यादा बार बार फेल हो रहे हैं तो आपने अपनी अभिरुचि से हटकर, अपनी मानसिक बौद्धिक क्षमता दक्षता से हटकर गलत मार्ग चुनाव किया है ।दो बार से ज्यादा फेल होना औंर उसी अध्ययन मार्ग पर डटे रहना बज्रबुद्धि मूर्खता है ।ऐसी स्थिति में अध्ययन ट्रैक बदलना समझदारी है ।

2 : आपने अध्ययन के मानक स्तर से कम मेहनत की है या मेहनत नहीं की है अध्ययन विषयों की उपयोगिता महत्व को नहीं समझा है आप अध्ययन में रुचि नहीं ले रहे हैं । फिर फेल होने पर दुखी नहीं खुश होना चाहिये ।परिणाम वह आया है जो आप चाहते थे । लोगों को समाज को दिखाने के लिए /झूंठी सांत्वना लेने के लिए रुदन /रोना धोना क्यों?फेल होने पर मिले अपयश से बचने के लिए ; एक धोखा और अपने साथ जोड़ना ।

राबर्ट स्काटी के अनुसार जीवन में यदि कामयाब/सफल होना चाहते हैं तो पहले अपनी कमी अपने आप ढूंढें सोचें और फिर अपनी कमी में सुधार अपने आप करने की सोच विचार आदत डालें तब ही आप अपना सुधार अपने आप करके कामयाब/सफल हो सकते हैं । जब तक आप अपनी कमी के लिए दूसरों को जिम्मेदार ठहराते रहोगे । दूसरे लोगों को समाज को दोष देते रहोगे , दूसरों में कमी ढूंढते रहोगे अपनी कामयाब बनने की तब तक उम्मीद मत करना कि तुम कामयाब/सफल भी हो सकते हो । जैसे फेल होने पर दोष अध्यापक को देना । जबकि फेल छात्रों के परीक्षा प्रश्नपत्र को रिकार्ड को बार बार ध्यान देकर ग़ौर से चैक किया जाता है ।

हम सभी की सफलता मेरे विचार से हमारे अपने जीवन में सच्चाई पर निर्भर करती है कि हम अपने जीवन में कितनी-कितनी सच्चाई /ईमानदारी/विश्वशनीयता /वैधता को अपने जीवन में स्थान देकर अपनी जिंदगी को जिम्मेदारियों के प्रति जागरूक हो कर जी रहे हैं । अब जब सच्चाई की बात चली है तो आदमी समाज संस्कृति ने सच्चाई की बखिया उधेड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी है । उसने सच्चाई की ,सच बोलने वाले की खूब मज्मत / धज्जियां उड़ाई हैं ॥ आज अब भी सच बोलना सच सुनना भयंकरतम अपराध माना/जाना जाता है मेरे विचार के अनुसार । आज अब भी सच बोलने पर अदालत में सजा निर्धारित की जाती है । जबकि जो भी व्यक्ति सच्चाई को महसूस कर लेता है उसके ऊपर मन में पड़ रहे त्रास की पीड़ा को तो वह समझ सकता है या फिर वह व्यक्ति जो सच्चाई स्वीकार करने पर पीड़ित हुआ हो , ऐसे अनेकों जज बाबाओं के किस्से सुनते हैं कि गलत फैसले हो गए तो अपनी आत्मा के दबाव से पीड़ित होकर उन्होंने सरकारी नौकरी लाभकारी पद का त्याग कर दिया ।

सच्चाई की सही परिभाषा कुरान में इस तरह से है सच बोलने की दो अवस्थाएं हैं निजी सत्य ( जो अपने लिए सत्य है तो यह जरूरी नहीं कि दूसरे दुनिया वाले लोग भी उसे सत्य मानें /समझें जैसे कि स्वप्न ) , दुनियावी सत्य ( दुनिया के समाज के लोगों से हम जो कुछ भी सुनते हैं या अक्षर ज्ञान से पढ़ते हैं यह कोई जरूरी नहीं है कि वह भी सत्य हो क्यों कि हम हर जगह एक साथ समान उपस्थित नहीं हो सकते और न ही प्रत्येक काल समय में हम मौजूद रहेंगे यह जरूरी नहीं है हमारी आयु निश्चित है ) दोनों तरह के सत्य -अलग अलग हैं ।। जबकि सत्य को वेदों में सिर्फ एक शब्द अर्द्धसत्य के नाम से परिभाषित किया गया है ।जो सच्चाई शब्द की वर्तमान स्थिति , निनाद (शब्द अनुभूति ) , उपलब्धि पर आधारित है । जिसके अनुसार आधा सच सदैव गुप्त /अदृश्य अज्ञात रहता है घटित और वाचन से पूर्व मैं ; और आधा सच भी वक्ता द्वारा व्यक्त तब होता है जब वह बोलता है या लिखता है चित्र साझा करता है ।। अपने अर्धांश के आंशिक सत्य ज्ञान के प्रतिशत अंश में भूमि पर सब जगह सभी जड़ चेतन वनस्पति पशु पक्षी मनुष्य आदि में व्याप्त है । जिसका समग्र /समय्क दर्शन करना , पूर्णतया अनुभव करना दिलो-दिमाग को भारी पड़ता है ।। जो लोग इस सतदर्शन ज्ञान कला विज्ञान को आंशिक रूप से समझना सीख जाते हैं वे समाज संस्कृति के शिखर पुरुष से युग पुरुष स्तर तक जाते हैं ।वे दार्शनिक कहे जाते हैं मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि सफलता/तरक्की वे लोग हासिल /प्राप्त करते हैं जो दार्शनिक बुद्धि होते हैं ।।

यह बात अलग है कि उनके जीवन में दार्शनिकता का अंश कितना है ? या वे अपने जीवन में कितनी दार्शनिकता अंश को अपनाते हुए अपनी जिंदगी जिम्मेदारी महसूस करते हुए जी रहे हैं ? क्या उनमें निजी जीवन में सच्चाई को महसूस करना आ गया ? !

लेकिन ज्यादातर लोगों को अपने लिए सच्चाई से बचना और दूसरे लोगों को सच्चाई पर चलने को प्रेरित करना ,सच बोलना चाहिए सिखाया जाता है कहा जाता है ।सच बोलना, सच्चाई पर चलने बोलने पर व्याख्यान देने वाले लोग अक्सर अपने जीवन में बहुत बड़े स्तर के झूंठे होते हैं । जो जुमला बाजी करते हुए ,सच पर लैक्चर देते हुए, दूसरे लोगों को सच बोलने को मजबूर करते हुए मिल जायेंगे । लेकिन वही लोग अपने जीवन में अपने लिए पूर्ण सत्य और दूसरे लोगों के लिए आंशिक सत्य / भ्रम सत्य / मित्थया सत्य /काल्पनिक सत्य का ज्ञान व्यवहार इस्तेमाल/प्रयोग किया करते हैं दूसरे लोगों को भ्रमित /झांसे में /झूंसी से रखते हुए अपने जीवन में कामयाब /तरक्की याप्ता होते हैं ।

सभी लोगअपने जीवन में अपने लिए सच्चाई को महसूस नहीं कर सकते हैं जैसे एक आंख का व्यक्ति अपने लिए काना या एक आंख का शब्द नहीं सुन सकता है । बिना कान का बूचा या बहरा नहीं सुन सकता है। बिना हाथ का लूला बिना पैर का अपाहिज नहीं सुन सकता है । इनको अंधा काना, बहरा बूचा,लूला अपाहिज शब्द सुनने में पीड़ा होती है । जबकि वास्तविकता यह है कि दोनों आंखों से समर्थ को कोई अंधा या काना नहीं कहेगा , उसे कहने के साथ ही दूसरे लोगों से अपने लिए अंधा या काना सुनना पड़ेगा ।। अनपढ़ और जाहिल गंवार अपराधी भी अपने लिए पुरुषोत्तम शब्द सुनना पसंद करते हैं । जब तक हम ऐसे कलियुगी लोगों को पुरुषोत्तम कहेंगे तब तक हम यह उम्मीद न करें कि ये अपने जीवन में पुरुषोत्तम बन सकेंगे । ये पुरुषोत्तम उस दिन बनना सोचेंगे , सीखेंगे , पुरुषोत्तम बनने की कोशिश जब करेंगे जब मर्यादा पुरुषोत्तम दशरथनंदन श्रीराम कथा रामचरितमानस से सुनकर इनमें अपने और श्रीराम के गुणों की तुलना करना आयेगा । ये अपनी मानवीय चरित्रिक कमी सत्यनिष्ठा , अशिक्षा/भ्रमशिक्षा , दुर्व्यवहार,व्यवहारहीनता को समझकर अपने चरित्र में अपने आप परिवर्तन करके अपने आप समाज में अपनी पहचान बनाने को तैयार होंगे । दूसरे लोगों से कहे गए सुने गए , रामचरितमानस में से पुरुषोत्तम बनना असंभव है । गांधी जी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि वे बहुत विशेष बुद्धि मान कर्मठ नहीं थे एक दिन उन्होंने अपने घर के निकट सत्य प्रतीक राजा हरिश्चंद्र का नाटक देखा उससे प्रभावित होकर उन्होंने अपने लिए सत्य आश्रित हरिश्चंद्र बनने का संकल्प लिया और गांधी जी साधारण मनुष्य से विशेष युगपुरुष महात्मा गांधी बन गये । नेताजी सुभाष चन्द्र बोस अपने पिता की सातवीं संतान थे , जो महाभारत के गुरु जन पात्र ज्ञानी विदुर , दानवीर कर्ण से प्रभावित होकर समाज के प्रति जागरूक होने से मानव समाज परिवर्तन को प्रेरित हुए थे।

अब मेरी कहानी संक्षेप में :- मैं स्वयं अपराधी कुल में उत्पन्न हुआ मैंने बचपन से आज अब तक अनीति कुरीति को अपने कुल में घटित फलित होते हुए देखा । जबकि मेरी मां एक कुलीन ब्राह्मण परिवार से थीं । उन्होंने मुझे कुलज्ञान अनीति कुरीति से हटकर सदैव नीति रीति-रिवाज की शिक्षा दी । मनुस्मृति, पंचतंत्र,मुल्ला नसरुद्दीन उर्फ नौराभैया के जीवन वृत्तांत/कहानियां सुना कर । मेरी मां का तकिया कलाम था :: झूंठ बोल दुबकता डोल सच बोल मन चाहे जहाँ डोल ;; सच्चे मन चरित्र वाले का दुश्मन सम्मान करते हैं ।। परिणाम यह हुआ कि मैं परिवार कुल से अलग सोच विचार करने वाला , अपना विकास - अपने आप कर गया उच्च शिक्षा प्राप्त करके । जबकि मेरे पिताजी की सोच दरिद्र नारायण की है :-अनीति कुरीति कथन करना ,हर समय नीति रीति रिवाज का उल्टा बोलना , सबकी तरक्की में बांधा पैदा करना न खुद आगे बढ़ना न दूसरों को आगे बढ़ने देना जो दूसरे लोग आगे बढ़ गये हैं तरक्की यापता हैं उनसे स्वयं बचना दूसरे लोगों को भी उनसे दूर रहने की सलाह देना । जैसे ::::सरकारी नौकरी उन लोगों की लगती है जिनके परिवार कुल वंश के लोग सरकारी नौकरी में पहले से मौजूद हैं वे अपनों को लगा लेते हैं या फिर सरकारी नौकरी उन लोगों की लगती है जिनके पास नेताओं को अफसरों को देने को मोटी रकम रिश्वत देने को है । मेरे पास इतना पैसा नहीं कि तेरी रिश्वत देकर सरकारी नौकरी लगवा दूं ॥ जबकि मेरा सच्चाई ईमानदारी मेहनत पर अकाट्य विश्वास है । परिणाम यह है कि मैं अपनी ऊंची सोच सच्चाई के बल प्रभाव पर उच्च शिक्षा प्राप्त कर के शिक्षानिदेशालय दिल्ली प्रशासन नियंत्रित राजकीय विद्यालय में २९वर्ष पहले शिक्षक नियुक्त हुआ और वर्तमान में प्रवक्ता पद पर हूं ।ना मेरे पास अब से २९वर्ष पूर्व नेताओं अफसरों को देने को रिश्वत थी न मेरे नेताओं अफसरों से जानकारी संबंध थे । लेकिन मेरा अपनी सच्चाई पर मेहनत पर अकाट्य विश्वास था । इतना ही नहीं मेरे दो भतीजे भी मुलायम सिंह यादव पुत्र अखिलेश यादव नियंत्रित सरकार में उ०प्र०पुलिस में निरीक्षक पद पर नियुक्त हुए थे। उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी ।उनके पास भी नौकरी के लिए रिश्वत देने को पैसे/रुपये नहीं थे । लेकिन अब एक आदर्शवाद पर रुका हुआ है दूसरा व्यवहारिक होकर बदल गया है ।

अंततः मैं यही कहूंगा कि पहले अपने लिए आप सच्चे बनो फिर सच्चाई ईमानदारी के मार्ग पर आओ मेहनत निरंतर करने की आदत डालो । कारण कि सरकार को समाज को मशीनी आदमी चाहिए मजदूर आदमी नहीं , जिनकी कार्य क्षमता दक्षता औरों से हटकर अलग हो । अक्सर लोग अपनी बौद्धिक क्षमता दक्षता शारीरिक मानसिक क्षमता दक्षता का आंकलन मूल्यांकन दूसरे लोगों से कराते हुए अपने भविष्य भाग्य का निर्धारण किया करते हैं । माता पिता गुरु ज्योतिष व्यावसायिक सलाहकारों के वाक्य कथन से यह मनुष्य की जड़मूर्खता उसे अपना उचित समय्क विकास करने से रोकती है। उसके विकास को बाधित करती है ।अपना अधिकतम विकास अपनी रुचि, अभिरुचि ,अपना स्व ऊर्जा मूल्यांकन स्टैमिना , अपने शौक पर आधारित होती है ।बस जरूरत है अपने बारे में सच सुनकर उसे सहन करके अपना स्वयं सुधार करने की । बात फिर अन्त में सच्चाई शब्द पर आकर रूकती है ।


एक इंसान के जीवन का असली उद्देश्य क्या है? अगर इंसान सिर्फ अपना वंश आगे बढ़ाकर मृत्यु को प्राप्त हो जाता है तो फिर यही तो बाकी पशु पक्षी भी करते हैं। तो फिर इंसान को ही सर्वश्रेष्ठ क्यों माना जाता है?


सभी जीव अपने मन में भरी इच्छाओं के अनुसार इस भौतिक जगत में आते हैं वे जिस जाति में आते हैं उसी जाति के धर्म कर्म ज्ञान के अनुसार उनमें अपने जीवन को जीने के लिए तरह तरह की कामनाएं पैदा होने लगती हैं जो बाद में कामनाएं पूर्ति अपूर्ति आपूर्ति के विवेक संज्ञान के अनुसार आवशकताओं में बदलने लगती हैं बाद में इन जीवन इच्छाओं कामनाओं आवशकताओं के विवेक से जीव में संकल्प विकल्प प्रण प्राण संबंध भावनाओं के आवेश जैविक ऊर्जा प्रवाह के आधार पर जीव में अपने जीवन जीने के कर्तव्यों बोध के अनुसार सक्रियता स्फूर्ति गति विधियां व्यवहार में दृष्टिगोचर होती हैं ।जिनमें संघर्ष भाव उदय होने से तरह तरह की समस्याओं को सभी जीव अनुभव करने लगते हैं ।

सभी जीवोँ के लिए पैदा होने के साथ ही जीवन को जिंदा जीवांत बने रहने के लिए अनेक प्रकार की असंख्य संम्भव असंभव अनेक प्रकार की जैविक अजैविक भौतिक रासायनिक ,राजनीतिक सामाजिक आर्थिक समस्या एं पैदा होने लगती हैं क्रमबद्ध तरीकों से सिलसिलेवार ,एक समस्या समाप्त होती है थोड़ी सी देर बाद दूसरी समस्या पैदा होने लगती है । जिनमें से कुछ समस्या ओं की हम अनदेखी अनसुनी करते हैं तो कुछ समस्याओं के हल करने में पसीने छूट जाते हैं कुछ भयंकर समस्याएँ ऐसी होती हैं कि जिनका हम हल नहीं कर पाते हैं तो उनके भयंकर प्रभाव को सहन नहीं कर सकने की स्थिति में हम अपना जीवन जीने की आशा छोड़कर जीवन त्याग दिया करते हैं आत्महत्या करके । लेकिन क्या आत्महत्या करने के बाद जीवन जीने की आशा इच्छा समाप्त हो जातीहै तो इसका जबाब ना में आता है ।मैंने अपने निकट के कई पुनर्जन्म केस का अध्ययन किया तो यह पाया कि जीवन जीव की अंतहीन यात्रा है जिसे पूरा करने के प्रयास में जीव बार बार मरता पैदा होता हुआ जीवन की विकास यात्रा में अनवरत जारी किए रहता है

दिन जीव का जीवन है रात्रि जीव की मृत्यु है ,यह जीव की एक दिन की पूरी नित्य जिंदगी है ।सभी जीव दिन निकलते ही जीवन धारण कर सक्रिय हो जाते हैं , जीव की नित्य सक्रियता उसका एक नया नित्य जीवन है । सभी जीव रात होते ही जीवन त्याग कर नित्य निष्क्रिय हो जाते है , निद्रा अवस्था मे ।जीव की नित्य निद्रावस्था उसकि एक नित्य मृत्यु है । उसी तरह से दीर्घकालीन सक्रिय निष्क्रिय युक्त जीव अवस्था जीवन है तो दीर्घकालिक अदृश्य भूत जीव अवस्था मृत्यु है ।। जैसे हम एक दिन रात के चौबीस घंटों के चक्र में सूर्य के प्रकाश में सक्रिय होकर जीवन को जीते हैं उसी तरह से रात्रि में सूर्य दर्पण चंद्रमा के प्रकाश में निष्क्रिय होकर निद्रावस्था में तंद्रा निद्रा सुषुप्ति स्वप्न अवस्था में जीते हैं ।जीव का पूरा प्रकाश में जीया गया जीवन एक दिन है और मरने के बाद प्रकाश हीन अंधकार में अस्तित्व हीन जीवन उस जीव की एक रात है ।।

जिन लोगों का ऊर्जा स्तर उच्च स्तरीय होता है वे अल्पनिद्राशील होते हैं जिनका ऊर्जा स्तर निम्न स्तरीय होता है वे दीर्घकालीन निद्रावान होते हैं ।परन्तु यह नियम जीवन क्षेत्र में बदल जाता है जिसमें उच्च ऊर्जा स्तरीय अधिक आयु वाले और निम्न ऊर्जा स्तरीय अल्पायु वाला जीवन जीते हैं । यह जो सक्षेप में लिखा है वह ब्रह्म/जीव की प्राकृतिक गति है ।जिसके अनुसार सभी सूक्ष्मजीव , कीट पशु पक्षी जीव , वनस्पति जगत जीव अपने जीवन को प्रकृति में प्रकृति के नियमानुसार प्राकृतिक जीवन जीते हुए अपने जीवन की सभी आवश्यक इच्छाओं में से न्यूनतम इच्छाओं को पूरा करते हुए जीते मरते हुए अपना जीवन जीते हैं एक निश्चित जीवनकाल में जीवन चक्र यात्रा में । कीट पशु पक्षी अपनी न्यूनतम आवश्यकता ओं को पूरा कराने के लिए प्रकृति नियंता पर पूरी तरह आश्रित/निर्भर हैं ।

जबकि मनुष्य अपनी अधिकतम आवश्यकता ओं इच्छाओं को पूरा कराने के लिए प्रकृति नियंता पर पूरी तरह से आश्रित/निर्भर नहीं है । यह उस मनुष्य के बुद्धि विवेक, चातुर्य, कौशल ,क्षमता दक्षता पूर्ण ज्ञान विज्ञानं कला शक्ति पर निर्भर करता है । जो जैसा अध्ययन ज्ञान विज्ञानं प्रज्ञानं प्राप्त करता है ।जैसे कला कौशल विज्ञानं पुरुषों गुरु जन से प्राप्त करता है उसकी उपलब्धता उसकी पात्रता परीक्षा पर निर्भर करती है। जिसके आधार पर उसकी सामाजिक प्रगति होती है।जिसके अनुसार वह साधारण पुरुष से उत्तरोत्तर प्रगति करता हुआ विशेष पुरुष (वि प्र ) नेता पुरुष , विधायक पुरुष , मनु पुरुष , युग पुरुष , इंद्र पुरुष स्तर तक जाता है अपनी समस्त इच्छाओं कामनाओं को लेकर पूरा करते हुए । जबकि पशुओं के मात्र दो प्रगति स्तर है साधारण पशु ,विशेष पशु स्तर ।पशुओं की इच्छाएं आवश्यकताएं कामनाएं न्यूनतम होती हैं जिन्हें वे अपने आप पूरा करने में समर्थ नहीं , स्वतंत्र नहीं हैं । वे अपनी इन दैनिक आवश्यकताओं को पूरी तरह से पूरा कराने के लिए पहले प्रकृति नियंता पर निर्भर हैं बाद में प्रकृति नियंता पुत्र मानव अनुकंपाओं पर निर्भर हैं ।

जबकि मनुष्य अपनी अधिकतम इच्छाओं आवश्यकताओं ,कामनाओं को अपनी अपनी सामर्थ्य बल पर पहले स्वयं पूरा कर लिया करता है बाद में शेष न्यूनतम इच्छाओं आवश्यकताओं कामनाओं को अपने समाज परिवार कुल नेता बंधुओं से पूरा करा लिया करता है । मनुष्य अपनी न्यूनतम इच्छाओं आवश्यकताओं कामनाओं की पूर्ति भी अपने मानव विश्व बंधु भगवान पुरुषों से करा लिया करता है ।आज का मनुष्य अपनी सभी प्रकार की इच्छाओं आवश्यकताओं कामनाओं की पूर्ति के लिए मनुष्य पर निर्भर करता है । वह प्रकृति नियंत्रण कर्ता पर भी निर्भर नहीं है उसने उस प्रकृति नियंता को भी अपने नियंत्रण में करने का उपाय खोज लिया है तंत्र विद्या द्वारा, पूजा अर्चना द्वारा, वैदिक स्तुति गायन वाचन द्वारा ।

ऐसे में हम कह सकते हैं कि सृष्टि में सभी कीट पशु पक्षियों वनस्पति योनियों में मानव जीवन ही श्रेष्ठ है यह अपनी इच्छाओं कामनाओं ,आवशकताओं को अपने आप या अपने कुल वंश जाति समाज धर्म संप्रदाय बंधु से पूरा करा लिया करता है ।जबकि पशु श्रेष्ठ सिंह योनिज जीव भी इसके सम्मुख अपना जीवन अपने आप जीने को विवश हैं ।इसे आप अजायब घर /प्राणी उद्यान से ,पशु पक्षियों के अभ्यारण्य से समझ सकते हैं कि मनुष्य ने पशु पक्षियों के जीवन पर दया /करूणा करते हुए उनके अस्तित्व को विलुप्त /पूर्ण नष्ट होने से बचाने/रोकने को प्राणी उद्यान, पशु पक्षियों के अभ्यारण्य बनाए हैं ।पशुओं पक्षियों पौधों ने मनुष्य की कहीं पर भी जीवन नित्यता क्षेत्रों में मनुष्य की सक्रिय होकर सहायता/मदद नहीं करी है ,मनुष्य ने पशु पक्षियों पौधों की भोजन से चिकित्सा से उनके जीवन क्षेत्रों में उनकी सहायता की है ,मनुष्य ने अपने बुद्धि बल चातुर्य से पशुओं पक्षियों पौधों से लाभ लिया है पशु पक्षियों पौधों ने स्वयं विवेक से मनुष्य की सहायता/मदद नहीं करी है । एंड्रोक्लीज और सिंह की कहानी पढ़ फिर से पढ़ लेना मानव जीवन की श्रेष्ठता का अहसास हो जायेगा ।

आप दहेज प्रथा के लिए कैसे बहस करेंगे?


आप सबसे पहले सुनना सीखें फिर सम्बन्धित टापिक पर अधिकतम ज्ञान हासिल करें ।स्मरणीय तथ्य यह है कि दुनिया में मास्टर नौलिज पर्सन /स्नातकोत्तर ज्ञानी बहुत ही कम मिलते हैं ।बैचलर ज्ञानी उनसे कम ,एकैडमी ज्ञान धारी उनसे कम मिलते हैं ।ज्यादातर लोग बहस करनेवाले प्राईमरी स्तर के या उससे भी निचले स्तर के ज्ञान धारक होते हैं ।उनसे बहस में जीतना कोई बड़ी बात नहीं है ।स्नातकोत्तर और स्नातक डिग्री ज्ञान स्तर के लोग कभी बहस नहीं करते हैं । यह बहस में जीतने का मूल मंत्र है ।

पहले दहेज का मूल कंसैप्ट खुद ज्ञात करो ।फिर दहेज प्रथा के बारे में पढ़ो ,फिर दहेज प्रथा के लाभ हानि का विश्लेषण करना सीखो ,फिर दहेज की उपयोगिता और अभिषाप को समझो ।और किसी भी कमजोर शरीर वाले ,कम पढ़े लिखे से बहस करने में लग जाओ जीत तुम्हारी होगी बीच बीच में थप्पड़ भी दिखाते रहो अपनी श्रेष्ठता का बखान बहस से पहले करना जरुरी होता है । जब बहस में हारने लगो तो हार घोषित होने से पहले बहस करनेवाले कमजोर बक्कू झक्कू के मुंह पर थप्पड़ मारने में देरी नहीं होनी चाहिए ।आपकी जीत बहस में शर्तिया होगी ।

समाज के बनाए गए कुछ गैर जरूरी नियमों को यह जानते हुए भी कि वो सही नहीं है, हम उन्हें क्यों नहीं तोड़ पाते हैं?


समाज मनुस्मृति पर आधारित सामाजिक विधान के आधार पर नियंत्रित है कहने को हम कुछ भी मनुस्मृति के विपरीत कुछ भी कह/बोल सकते हैं लेकिन मनुस्मृति में लिखे हुए नियम घर परिवार समाज में पैठ बनाये हुए हैं । अब आपने जो लिखा कुछ गैर जरूरी नियम से आपका आश्य /मंतव्य स्पष्ठ नहीं हो रहा है :- कि आप को कौन-कौन से समाज परिवार के नियम गैर जरूरी /अनावश्यक लगे ,जो आपको सही नहीं लगते हैं उनको भी आप मजबूरी वश सहन करके अपना जीवन मन मारकर /दबे हुए मन से समाज में जी रही हैं ।

अब आपके प्रश्न का विवेचनात्मक जबाव :- जो लोग समाज में धन के अभाव में अपना जीवन यापन कर रहे हैं वे धन की कमी से कर्म काण्ड हीन या पाखंड हीन - न्यूनतम कर्म काण्ड वाला जीवन यापन करते हैं मजबूरी वश आप जिनसे प्रभावित हो सकती हैं ।कारण कि धनहीन लोगों के जीवन में मान-मर्यादाओं और कर्म काण्ड पाखंड की कमी होती है ,कर्मकांड पाखंड का मनुष्य की आर्थिक स्थिति से सीधे सीधे संबंध होता है ;धनहीन कर्मकांड पाखंड किससे करेगा जब समस्त कर्मकांड पाखंड का आधार धन ही उन निर्धन लोगों के पास नहीं होता है। निर्धन गरीब लोगों के उनकी जीवन पद्यति में मानव समाज के नैतिक मूल्य अलग अलग होते हैं ।

जो लोग धनयुक्त ऐश्वर्य पूर्ण जीवन जी रहे हैं उनके पास सभी धर्म कर्म काण्ड के लिए पर्याप्त धन है उनको धर्म कर्म काण्ड पाखंड युक्त नियम समाज पद्यति से जीवन जीने में कोई असुविधा नहीं है ।धनी लोगों का उनके कर्म कांड पाखंड युक्त जीवन का समाज में विरोध नहीं किया जाता है पाखंड ही समाज में दृश्य होता है जबकि करमकांड अदृश्य होता है और धर्म शंकामय होने से तरह तरह की शंकाएं पैदा करता है ।जिससे लोग धर्म के प्रति विश्वनीय नहीं होते हैं और अक्सर धर्म बदलते रहते हैं ।पाखंड दृश्य होने से सबको दिखाई देता है इस सभी धर्म में अपने पाखंड को अच्छा बताया जाता है और दूसरे धर्म समाज के पाखंड की धज्जियाँ उड़ाते हुए उनकी धर्म समाज से निष्ठा को हिलाकर/डिगाकर अपने अपने धर्म समाज का संस्कृति का प्रचार प्रसार किया जाता है । सभी धर्म समाज में पाखंडी धनवान लोगों की स्थिति रुतबा सम्मानजनक होता है जबकि सभी धनी व्यक्ति अपने जीवन को अपने हिसाब से आधुनिक तरीक़े से अपने जीवन को अकेले होकर पड़ते हुए असामाजिक तरीके से जी रहे होते हैं ।

अधिकतर लोग अपनी जिंदगी पुराने लिखे मनुस्मृति के सामाजिक विधान के अनुसार जीते हैं मनुस्मृति आदिकाल का लिखा सामाजिक विधान ग्रथ है इस में जो भी बातें लिखीं हैं वे पुराने समय देश काल क्षेत्र परिस्थिति के अनुसार उस समय सही सत्य थीं लेकिन आजकल काल परिस्थिति परिवार देश समाज में हुए अनेक परिवर्तन के बाद , आज कुछ पुराने अनेक वैधानिक मनुस्मृति के नियम पूरी तरह से नहीं आंशिक रूप से बदल गये हैं जैसे विधवा (रांड)विधुर(रंडुवा),परित्यकता (अहिल्या सर्ग ) , परिवेत्ता (छिकैला ) आदि प्रथाएं रीति-रिवाज अभिशापित न होकर बदल गये हैं , जनसामान्य हो गये हैं ।लेकिन कुछ नियम कुछ समाज परिवारों में आज भी ज्यों के त्यों सार्थक बने हुए हैं।

इसके लिए सभी को परिवर्तन वादी नियम और परिवर्तन वादी व्यवस्था को समझने की जरुरत है ।जो लोग इस परिवर्तन शब्द को ठीक से पूरी तरह समझ जाते हैं वो परिवर्तन को समझते हुए परिवर्तन की दृष्टि से खुद में अपनी सोच विचार में अपने घर परिवार में वंश कुल जाति धर्म समाज में उचित आवश्यक परिवर्तन करते हुए निरंतर उन्नति /तरक्की करते हुए घर परिवार वंश कुल जाति में. शिखर पर बने रहते हैं ।जो परिवर्तन को समझ नहीं पाते हैं वे परिवर्तन को न समझ पाने की स्थिति में परिस्थितियों से संघर्ष करते हुए अकाल मौत या बेमौत मर जाते हैं या मार दिए जाते हैं या फिर यदि जीवित रहे तो निरंतर पतन अधोगति दुर्गति को प्राप्त होकर निर्धनता गरीबी दरिद्रता में जीवन जीने को विवश होते हैं ।यह परिवर्तन की प्रक्रिया व्यक्ति से परिवार घर वंश कुल गोत्र जाति धर्म समाज की ओर निरंतर चल रही है ।परिवर्तन का जहाँ पर भी प्रबल विरोध किया जाता है वहीँ पर परिवर्तन से संघर्ष करनेवाला मारा जाता है अशक्त बुद्धिहीन बलहीन धनहीन श्रमहीन मानव । जब और जहाँ पर भी होने वाले परिवर्तन को समझ कर उसके लाभ हानि के गणित को समझते हुए लाभ के पक्ष को बलवान होते हुए देखकर लाभ की दिशा को देखते हुए अपने में घरसमाज में परिवर्तन कर लिया जाता है या परिवर्तन से सामजस्य बिठाते हुए परिवर्तन से लाभ उठाया जाता है तो यह प्रयोग प्रक्रिया समझदारी/बुद्धिमानी कही जाती है ।।

ब्राह्मण वादी व्यवस्था (प्रज्ञावान) क्षत्रिय व्यवस्था (शक्तिवान) वणिक व्यापारिक व्यवस्था (धनवान) श्रमिक /शूद्रव्यवस्था(श्रमवान ) अश्रमिक /अशूद्र ( लूटपाट व्यवस्था ) नियंत्रण हीनता पर लिखना शेष है

—जैसे ब्राह्मणों का पूजा पाठ , समाज संचालन का , प्रशासन का अधिकार नियम जिससे वे निर्धनता और गरीबी के कुचक्र /दलदल से न निकल पाने से दलित जैसी दयनीय स्थिति में रहते हुए अभिशापित जीवन जीने को मजबूर हैं । इस पूजा पाठ प्रशासन के नियम के लिए बहुत ज्ञान ध्यान बुद्धि चातुर्य अध्ययन की आवश्यकता होती है लेकिन वे सत्य नारायण कथा को सर्वोपरि सर्वश्रेष्ठ मानते हुए वैदिक वैज्ञानिक ज्योतिष ज्ञान से दूर हैँ ।।

हमको/उन अपरिवर्तित समाज परिवार के लोगों को जिनकी सोच विचार आज भी पुरानी है जो आज भी अपने जीवन पद्धति को पुरानी रुढिवादी विचारधारा से से जीते हुए खुद ही अपने आप को सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक हानियाँ पहुंचा रहे हैं । ऐसे हमें भी अपने पुराने घातक /हानिकारक नीति नियम रीति-रिवाज को बदलकर नये लाभकारी नीति नियम रीत रिवाज अपनाकर अपने जीवन में नयापन लाते हुए अपने जीवन को नये तरीके से जीने में समझदारी है । पुराने नीति नियम रीति-रिवाज निर्माताओं को कोसना मनुस्मृति नियम रीति-रिवाज पर कमेंट करना हमारी बुद्धि हीनता दर्शाते हैँ । कि हम आज भी अपनी निजी जीवन पद्धति को हानिकारक होते हुए आज भी अपने जीवन को पुराने नीति नियम रीति-रिवाज से जीने को मजबूर हैं । जबकि तमाम धनाढ्य वर्गों के लोग जो विभिन्न धर्म समाज जातियों से संबद्ध हैं वे इसलिए अपने जीवन में आर्थिक सामाजिक राजनीतिक रूप से तरक्की कर गए कि उन्होंने अपने जीवन को नये परिप्रेक्ष्य नयी परिस्थितियों के अनुसार जीना सीख लिया ,,जैसे कुछ ब्राह्मण चिकित्सा, राजनीति ,विधि संकाय , अध्यापन ,और तरह तरह के नये उद्योग धंधों में उतर आए औँर फिर से धनी संपन्न हो गए ।

जबकि हमने अपना मानसिक बौद्धिक विकास नहीं किया है पुराने ज्ञान को ज्ञान पद्धति को कोसने उसमें कमी निकालने में ,पुराने समाज नियमों से शिकायत करने में लगे हुए हैं।। जबकि मनुस्मृति को पूरा पूरी तरह पढ़ने पर ज्ञात होता है कि उसमें भी ऋषि-मुनियों ने समाज व्यवस्था की आवश्यकता के अनुसार समय समय पर नीति ( नियम ) रीति-रिवाज में परिवर्तन किए हैं ।इसका पता तब चलता है जब एक श्लोक का अर्थ दूसरे श्लोक के अर्थ /मनत्व्य को क्लेशित करता है ।।

विकास नियम :- रीति-रिवाज के अनुसार जीवन को नये परिवेश से जीना समझदारी है ना कि नये परिवेश में पुराने नीति नियम रीति-रिवाज को अपनाकर अपने जीवन को कठिन दुखदाई परिस्थिति में जीना मुश्किल से जीया जाय ।या पुराने हानिकारक घातक प्रदूषित सामाजिक नियमों का निरंतर पोस्टमार्टम करते रहने में अपना समय खराब/बरबाद किया जाय ।। लेकिन जीवन को फिर भी जिया जाता है जब एक नहीं अनेकों घातक बरबादी दायक प्रतिकूल नियम परिस्थितियाँ समाज परिवार में व्याप्त होती हैं ।। कोई भी जीव समाज से समाज के घातक हानिकारक नियमों से विचलित होकर जीवन का त्याग नहीं किया करता सभी जीवों को अपने जीवन में समाज में रहना है तो समाज के नियम प्रतिकूल हो या अनुकूल हो ऐसी स्थिति में जीवन को जीने के लिए समाज के प्रतिकूल नियमों के साथ सामंजस्य दिखाते हुए जीना पड़ता है।

अब आते हैं आपके जीवन शंका सर्ग :- समाज में प्रगति के पदक्रमिक व्यवस्था नियंत्रण जिसमें मनुष्य अपनी बुद्धि बल धन के कारण बल से तरक्की करता हुआ समाज के पाचों सम्मानित पदों पर जा सकता है या एक पदीय स्थिति में आजीवन रुका रहता है बल बुद्धि धन की कमी के कारण रुप से ,, पर समाज में नियमों की स्थिति स्थिरता में समय- समय के अनुसार धर्म संस्कृति विधान के अनुसार क्षेत्र के अनुसार बदलती रहती है ।परिवर्तन होता रहता है ।इन समाज के नियमों में परिवर्तन समाज को नियंत्रण करने वाले पंच परमेश्वर मालक पांच पुरुष स्तर है । जिनमें है सबसे निम्न स्तर के (1) साधारण पुरुष:: निर्माण विनाश कर्ता समाज के सभी अच्छे बुरे नियमों को शिरोधार्य करते हैं जैसे माना कि सभी नियम इन्हीं के लिए बनाए गए हैं , परंतु साधारण पुरुष से ऊपर के 4 पुरुष स्तर इन नियमों के साथ कहीं पर सामंजस्य बिठाते हैं तो कहीं पर इन नियमों का विरोध करते हैं और कहीं पर इन नियमों को नहीं मानते जैसे (2)* विप्र या विशेष पुरुष जिन्हे ब्राह्मण कहते हैं ये सामाजिक प्रशासक निर्माण विनाश को अपने बुद्धि चातुर्य से नियंत्रित रखते हैं ।परंतु यह ब्राह्मण भी नियमों के नीचे रहते हुए अपना जीवन सुख शंका दुख की स्थिति में जीते हैं । ब्राह्मणों से ऊपर नियम बनाने वाले (3) ** विधि पुरुष या न्याय पुरुष होते हैं जो नियमों की समय अनुसार विवेचना करते हैं इन्हें विधायक पुरुष कहते हैं यह विधायक पुरुष भी नियम बनाने को स्वतंत्र नहीं है ।इन विधायक पुरुषों के ऊपर (4)*** मनु पुरुष होते हैं जो समाज के आवश्यकता के अनुसार नए नियम बनाते रहते हैं और पुराने नियम हटाते रहते हैं यह सामाजिक नियमों से ऊपर होते हैं ।अर्थात यह समाज को नियम बनाते हैं लेकिन जरूरी नहीं कि समाज के नियमों को अपने ऊपर जस का तस लागू रखें यह अपने ऊपर लगे नियमों में अपनी इच्छा अनुसार माने ना माने या नियमों में परिवर्तन करने करने को स्वतंत्र हैं इन मनु पुरुषों के ऊपर (5) ****देव पुरुष इंद्र गण होते हैं जो अपने जीने के लिए अपने हिसाब से नियम बनाते और मानते हैं लेकिन समाज के सभी लोगों को मनु पुरुषों के द्वारा बनाए गए नियमों के अनुसार जीवन जीने के लिए बाध्य करते हैं और समाज के सभी लोगों को नियंत्रित रखते हैं । समाज के सभी नियमों में परिवर्तन करने या बदलाव करने का अधिकार केवल मनु पुरुष सांसद गंण को होता है बाकी इंद्र पुरुष और ***** युगपुरुष इन समाज के नियमों से परे और ऊपर रहते हुए अपना जीवन अपने विशेष नियमों में जीते हैं।*मनुष्य के रुतबे सम्मान को व्यक्त करने के लिए है ।

समाज के संवैधानिक नियमों के 4 चरण आधार गुण होते हैं जिन के जिनके आधार पर समाज में शांति व्यवस्था और अशांति व्यवस्था दोनों मिश्रित रूप से चलती रहती हैं यदि शांति व्यवस्था अधिक है और अशांति व्यवस्था न्यून है तो उसे सतयुग कहते हैं यदि शांति व्यवस्था अधिक है और अशांति व्यवस्था कम है तो उसे द्वापर युग कहते हैं । जैसे-जैसे अशांति का अनुपात बढ़ता जाता है युग परिवर्तन के अनुसार त्रेतायुग और कलयुग कहे जाते हैं ।।

इसमें विशेष रुप से चार शब्द नीति रीति (प्रीति) कुरीति और अनीति मुख्य हैं । सतयुग में नीतियां प्रधान होती हैं सबके लिए नियम सामान एक जैसे होते हैं राजा रंक का भेद नहीं होता जैसे जनक राज ।। द्वापर युग में रीति-प्रीति प्रधान होते हैं जिससे कुल और वंश के लोग शासन की नीतियों का अधिक लाभ उठाते हैं और प्रजा निम्न स्तर पर रहते हुए जीवन जीती है जैसे दशरथ राज ।। , त्रेता में लोग कुरीति प्रधान होते हैं समाज के लोग राजा के कठोर नियमों से पीड़ित होते हुए समाज के मनु नियमों के कठोर नियमों से पीड़ित होते हुए अपना जीवन दुख शंका संशय में जीते हैं जैसे किष्किंधा राज बाली का शासन वानर जाति ।। अब अनीति का शासन मैं लोग अपने बुद्धि बल की श्रेष्ठता के अनुसार अपना जीवन जीते हैं छोटे बड़े ऊंच-नीच का भेद चरम उत्कर्ष स्तर पर होता है समाज के निम्न वर्ग के लोगों के पास जीवन अधिकार तक राजा के द्वारा नियंत्रित होते हैं परंतु राजा और राजकुल स्वेच्छाचारी होता है जो निम्न वर्गीय लोगों को नौकर गुलाम दास बना कर लगता है उनका जीवन और जीवन स्तर का मानक मूल्य होता है ।ऐसे लोगों का मुंह अपराध पीड़ित होने पर मानक मूल्य धन देकर बंद कर दिया जाता है।इन लोगों की इच्छा भावनाएं मानक मूल्य निर्धारित होती हैं ।ये लोग सामाजिक , राजनीतिक ,आर्थिक ,वैज्ञानिक सोच हीन , अधिकार हीन पशुओं के समान अपने जीवन को मानव होते हुए भी पशुओं के समान बिना निजी मौलिक सोच के अधिकार हीन होकर जीते हैं । ऐसे निम्न वर्गीय लोगों के जैविक मौलिक अधिकार तक स्वतंत्र नहीं होते बस राजा की मर्जी चलती है कोई प्रजा जन रीति नीति अनीति कुरीति की विवेचना नहीं कर सकता । सभी राजा शासक लोगों के द्वारा बने कठोर नियमों में अपना जीवन जीते हैं यह अनीतिका शासन होता है ।।

इसे रावण राज ( सबको रुलाने वाला ) या दुर्योधन राज (बुरे असामाजिक कर्मों को वैध/सही ठहराना ) कह सकते हैं ।जिसमें सीता अपहरण और द्रोपदी चीरहरण जैसी असामाजिक अपराधीक घटनाओं का प्रायोजन करनेवाले नीति स्थानक राजपरिवारों के लोग थे ।इस अनिति शासन या राजवंश का उन्मूलन या समापन जिस भी व्यक्ति विशेष के द्वारा किया जाता है उसे युगपुरुष इंद्र पुरुष या ईश्वर और ईश्वर का अंश राम ,कृष्ण आदि अवतार कहा जाता है यह प्रकृति द्वारा विशेष मानव पुरुष संरक्षित होता है जिस पर प्रकृति नियंता ईश्वर की विशेष दृष्टि होती है।

एक ही माता-पिता की किसी एक संतान को कोई आनुवंशिक रोग होता है लेकिन उनकी दूसरी संतान स्वस्थ रहती है। इस बात का क्या कारण हो सकता है?


इसके लिए आप को पितर विद्या/अनुवांशिकता में मैंडल के नियम पढ़ने पढ़ेंगे कोशिका विभाजन की मिओसिस /अर्धसूत्रीविभाजन विभाजन की पहली स्टेज प्रोफेज 1के क्रोसिंग ओवर ,क्याजमैटा को पढ़ना

अनुवांशिक रोग वह रोग हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी दादा दादी नाना नानी से माता पिता में और माता पिता से उनके बच्चों में पीढ़ी दर पीढ़ी आते हैं /चलते रहते हैं । अनुवांशिक कई प्रकार के होते हैं प्रथम असाध्य अनुवांशिक रोग प्राय जीव विज्ञान की कक्षाओं में इन असाध्य अनुवांशिक रोगों के बारे में पढ़ाया जाता है जैसे हीमोफीलिया कलर ब्लाइंड हंटिंग डांस कोरिया एडिशन डिजीज मस्कुलर डिस्ट्रॉफी थैलसिमिया भैंगापन ,आंख फेरना फ्लैटफीट आदि इन अनुवांशिक रोगों का इलाज संभव नहीं ह आधुनिक चिकित्सा जगत में ऐसे लोगों की संख्या 160 से ज्यादा है इनका पता तब चलता है जब आधुनिक चिकित्सा जगत के चिकित्सक भी इनके इलाज में कामयाब नहीं हो पाते ।

इसके बाद कुछ अनुवांशिक बीमारियां ऐसी होती हैं जो कुसाध्य हैं जिन अनुवांशिक बीमारियों का निदान जो आयुर्वेदिक चिकित्सक हैं वे कर सकते हैं इनको कुसाध्य बीमारियों के निदान के लिए सबसे पहले रोग के वातावरण और खानपान का पता लगाना पड़ता है यह रोग परिवार मैं निर्धनता की कमी से जड़ जमाते हैं जो आर्थिक संपन्नता आने पर घर का वातावरण बदलने से खानपान बदलने से ठीक हो जाते हैं ।इनकी आयुर्वेदिक चिकित्सा एक साल से पांच साल तक नियमित रूप से आयुर्वेदिक दवाओं के अपने आप सेवन करने पर होती है शारंगधर संहिता के अनुसार सभी आयुर्वेदिक औषधि यां अन्नसार हैं जो उचित भोजन न करने से कुपोषण से उत्पन्न होती हैं।

इसके बाद कुछ अनुवांशिक बीमारियां साध्य होती हैं जो बच्चों में उनके पूर्वजों से निरंतर चली आती हैं जैसे जो रोग पितर पीढ़ी को था वह पिता पीढ़ी में आता है उसके बाद संतान पीढ़ी में चला जाता है यदि रोगी को रोग की आयुर्वेदिक दवा पता लग जाए या उसके खानपान में रहन-सहन के वातावरण में परिवर्तन हो जाए । परिवार और वातावरण जनित तनाव से मुक्ति मिल जाए तो ऐसी साध्यां बिमारियाँ व्यक्ति के थोड़ी से खानपान में परिवर्तन करने से और थोड़ी सी आयुर्वेदिक औषधि लेने से दबी रहती हैं उल्लेखनीय बात यह है की ऐसी अनुवांशिक बीमारियां मेटाबॉलिज्म डिसऑर्डर से पैदा होती हैं मेटाबॉलिज्म जो काफी हद तक खानपान पर निर्भर करता है ।

इसमें मेरा निजी अनुभव इस प्रकार है मेरे परिवार में पिताजी को मुंह के छाले पेचिश मलेरिया यह तीन रोग बहुत अधिक परेशान करते थे । यही तीन रोग मुझे भी परेशान करते रहे । और यही तीन रोग मेरे चार बच्चों (तीन पुत्री यां और एक पुत्र ) में से दो (बीच वाली मंझली बेटी और सबसे छोटे पुत्र ) में आ गए । मंझली बेटी में ज्यों के त्यों आ गए , दूसरे सबसे छोटे बेटे में मंद वेग से आ गए । जबकि मेरी बड़ी बेटी और छोटी बेटी पूर्ण रूप से स्वस्थ हैं ।उन दोनों में यह शुगर जनित रोग समस्या नहीं हैं । उल्लेखनीय बात यह है कि मेरी माँ बच्चों की दादी में शुगर उच्च स्तर का था जिससे उन्हें त्वचा रोग अधिक होते थे ।। अब इसका निदान जब मैंने आयुर्वेदिक ग्रंथ साहित्य का अध्ययन किया तो पता चला कि हमारे शरीर वायु प्रधान हैं और वायु प्रधान शरीर में दृढ़ता लाने के लिए पितज और कफज भोजन किया जाना चाहिए । तथा आयुर्वेदिक औषधियां दवाइयां पितज और कफ़ज गुंण वाली लेनी चाहिए ।। मैंने इसका पहले अपने ऊपर प्रयोग किया फिर अपनी बेटी को सलाह दी मैं आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति से अब अधिकांशतः निरोग रहता हूं और मेरी बेटी भी अब निरोग रहने लगी है । बस मैंने त्रिफला आयुर्वेदिक औषधि को पढ़ा और उसका उपयोग किया पहले 2 साल तक हरण का उपयोग किया उसके बाद 1 साल बहेड़ा का फिर एक साल तक आंवलों उपयोग किया ।अब मैं मीठा भी खा लेता हूं और मुझे मींठा खाने से अब ज्यादा परेशानी नहीं होती , नहीं तो पहले मेरे लिए मीठा विष जैसा कार्य करता था मुंह में छाले 15 से 30 दिन बने रहते थे । कारण था मुख में ओरल प्रोटोजोआ की मौजूदगी और शरीर का शुगर लेवल बॉर्डर पर था कभी बढ़ जाती कभी सामान्य हो जाती सबसे पहले शुगर लेवल मेंटेन करना सीखा खानपान के द्वारा, और शारीरिक श्रम अधिक मानसिक श्रम उचित परिमाण में तथा अकारण अनावश्यक मानसिक तनाव कम से कम । उसके बाद आयुर्वेदिक औषधियां निरंतर लेनी शुरू कर दी जिससे मुझे कोई परेशानी वर्तमान में नहीं है ।।

अब आगे अनुवांशिक बीमारियां क्यों होती हैं इसका मैंने शुरू में विवरण दिया था । मनुष्य के शरीर में स्त्री हो या पुरुष सभी के शरीर में शरीर गुणसूत्र क्रोमोसोम्स की संख्या 46 होती है जो उनके बच्चों में भी प्रत्येक बच्चे में 46 होती है अब सोचने की बात यह है जब पिता ने 46गुणसूत्र हैं माता में 46 गुणसूत्र हैं तो बच्चे में 92 गुणसूत्र होने चाहिए लेकिन बच्चे ने भी 46गुणसूत्र होते हैं ॥ इसका कारण है बच्चे के शरीर के बनने से पहले पिता के शुक्राणु में गुणसूत्रों की संख्या 23 एक्स वाई होती है और मां के अंडाणु में गुणसूत्र की संख्या 23 एक्स एक्स होती है इस प्रकार दोनों के निषेचन से 46 गुणसूत्र वाली संतान पैदा होती है ॥ 46 गुणसूत्र वाले दूसरे क्रोमोसोम समाप्त हो जाते हैं । अब इस प्रकार से बच्चों में अनुवांशिक रोग आने का प्रतिशत सबसे पहले 50%यानि आधा रह जाता है । इस प्रकार से बच्चों में पिता के समस्त अच्छे बुरे गुंणों में से आधे अच्छे आधे बुरे या अच्छे बुरे दोनों तरह के मिश्रित गुंण आधे होकर बच्चों में आते हैं ।( 100–50 =50%या 50%+I've या 50%—या 25%ive +25%ive ) गुंणों का यही गणितीय अनुपात माता केअच्छे बुरे गुंणों को लेकर बच्चों में आता है । ( बुद्धिमानी मूर्खता ,रोग निरोग ,लम्बा बौना ,काला गोरा , पेशिय शरीर कमजोर पेशिय या पेशिय हीन शरीर आदि अंसंख्य मानव अनुवांशिकी गुंण विवेचना है जो पितर विद्या अनुवंशिकी विज्ञान में पढ़ने पर ज्ञात होता है )

जिस कारण से सभी मनुष्य हों या बच्चे सभी में पर्सनैलिटी स्पिल्ट विखंडित व्यक्तित्व या द्विव्यक्तित्व (बाईपोलर डिस्आर्डर ) का मानसिक रोग अपने अलग अलग अनुपात में पाया जाता है ।जिससे बच्चों की शैक्षिक उपलब्धि प्रतिशत 50%से भी नींचे रहता है । इसका कारण है अर्ध नारीश्वर /+ — द्विलिंगिय मिश्रण से सृष्टि में निर्माण का सिद्धांत । जो एक शरीर में द्विहार्मोन ( नर हार्मोन और नारी हार्मोन मिश्रित नियंत्रण ) नियंत्रण व्यवस्था । जिससे बच्चे कभी अपने शरीर लिंग के अनुसार उपलब्धि दिखाते हैं तो कभी विपरीत लिंग के अनुसार उपलब्धि दिखाते हैं । जिससे सृष्टि निर्माण बच्चों के शरीर लिंगिय उपलब्धि 50% या अर्धसत्य का नियम कहते हैं जो 50%+50% =100%ना होकर सदैव 51%+49%=100%होता है ।जिससे नर पूरा पूरा नर नहीं होता है उसमें कहीं न कहीं नारी अंश छिपा रहता है ।नारी पूरी तरह से नारी नहीं होती उसमें नर अंश छिपा होता है । अनुवांशिकता के गणित को शादी के समय माता पिता पंडितजी मौलवी साहब फादर अपने अपने हस्तक्षेप से और भी ज्यादा बिगाड़ कर खराब कर देते हैं ।अनुवांशिकता/पितर विद्या का ज्ञान न होने पर ।

उसके बाद दूसरा कारण शरीर से शुक्राणु बनने के दौरान विशेष अर्धसूत्री /मिओसिस कोशिका विभाजन होता है जिसमें क्रोमोसोम्स की संख्या 23:23 अलग अलग हो जाती है यदि अनुवांशिक रोग वाले गुणसूत्र शुक्राणु में आ गए तो बच्चों को अनुवांशिक रोग हो जाता है। ।। यदि 23 गुणसूत्र अच्छे वाले बिना अनुवांशिक रोग वाले आ गए तो बच्चों में गुणसूत्र उत्तम होने से अनुवांशिक रोग नहीं होता है ।। इसमें अर्धसूत्री विभाजन में पहले विशेष कोशिका विभाजन होता है ( लेप्टोटीन ,जाईगोटीन ,पैचाईटीन डिप्लोटीन डायकायनेसिस ) जिसमें कुछ क्रोमोसोम आपस में बुरी तरह चिपक जाते हैं और बाद में अलग होने पर किसी क्रोमोसोम्स में कुछ ऐसा ज्यादा आ जाता है तो किसी क्रोमोसोम्स में कुछ हिस्सा कम रह जाता है ।माना किसी क्रोमोसोम्स में कुछ हिस्सा अनुवांशिक रोग वाला बच्चे में ज्यादा आ गया है तो बच्चों को अनुवांशिक रोग होने की संभावना बढ़ जाती है और यदि बच्चे के क्रोमोसोम्स में निरोग वाला हिस्सा जींस का क्रोमोसोम्स में आया है तो बच्चे में रोग होने की संभावना घट जाती है इस प्रकार से बच्चों में रोग घटने की संभावना का अनुपात 25% तक कम हो जाता है या हम कह सकते हैं किअनुवांशिक रोग चौथाई बच्चों मेंआता है । इस कारण से बच्चों में अनुवांशिक रोग समान रूप से वितरित होकर सभी में समान बैठकर नहीं आता है कुछ बच्चे उग्र रूप से अनुवांशिक रोगी होते हैं जिनमें अनुवांशिक रोग भयंकर अवस्था में असाध्य या कुसाध्य. रूप से आता है इन बच्चों के माता पिता में अनुवांशिक रोग जीन्स गुप्त रूप से छिपे होने से ओटोसोमल रिसै्सिव या अनुवांशिक रोग वाहक हैटैरोजाईगस रिसै्सिव या होमोजाईगस रिसै्सिव होते हैं। कुछ बच्चों में अनुवांशिक रोग निम्न अवस्था में साथ्य रूप से आता है और कुछ बच्चों में अनुवांशिक रोग नहीं आता है , वह पूर्णता अनुवांशिक रोग मुक्त होते हैं । एक पीढ़ी तक ,, लेकिन उन रोगमुक्त बच्चों में भी अनुवांशिक रोग कैरियर चाइल्ड हो सकते हैं जो आगे शादी होने पर सामान्य युगल बनने पर भी उनके बच्चों में अचानक अनुवांशिक रोग पैदा हो जाते हैं इसका मतलब है की माता या पिता एक या दोनों में से कोई सा या दोनों अनुवांशिक रोग के वाहक थे जिनमें अनुवांशिक रोग मेंडल के हेटेरोजाईगयस जीन्स मौजूद थे । जो अनुवांशिकता के प्रभाविता जीन्स नियम के अनुसार छुप गया था ।। रोग दाई जींस को निरोग जींस में अपने बल प्रभाव से दवा लिया था यहां से ऑस्ट्रिया के अनुवांशिकी जनक जॉन ग्रेगर मेंडल के 3 नियम प्रभाविता का नियम पृथक्करण का नियम पूर्णतया अलग अलग होने का स्वतंत्र अभिवहन नियम लागू होते हैं इन्हें 12वीं की क्लास में आप अनुवांशिकी विज्ञान से विस्तार में पढ़ सकते हैं

कुछ लोग बगैर वेदों को पढ़े अपने नाम के आगे चतुर्वेदी या त्रिवेदी लिखने की परंपरा को चालू रखे हैं,ये गलत होने के बावजूद समाज में इसकी स्वीकृति क्यों है ?


मनुस्मृति के अनुसार नाम दो तरह के होते हैं एक सार्थक नाम जिसके अनुसार जो जातक का नाम है उसमें उसके नाम के अनुसार गुंण लक्षण होने चाहिए तथा नाम से परिचय सुनने वाले लोगों को हो जाना चाहिए नाम से पिता कुल गोत्र वंश ग्राम जनपद प्रांत देश का पता लग जाना चाहिए ।वह नाम आदर्श /पूर्ण नाम कहा जाता है आज भी दक्षिण भारत में इसी प्रकार से लम्बे नाम रखे बोले जाते हैं जैसे दक्षिण भारत से एक पूर्व प्रधानमंत्री थे एच .डी . देवगोड़ा जिसकी फुल फार्म थी :-हरदन हल्ली डोडा गोडा देव गोड़ा , इसी तरह से एक पूर्व राष्ट्रपति थे :- ए. पी .जे . कलाम जिनका पूरा नाम था अब्दुल पाकिर जैनुबुदिल कलाम ।

महाभारत ग्रंथ में नाम गुंण के लक्षण के आधार पर रखे गए थे जैसे धृतराष्ट्र पुत्र दुर्योधन के समय हस्तिनापुर में अपशकुन हुए थे ।पैदा होते समय दुर्योधन की आवाज गधे के स्वर के समान थी जो न पुरुषोचित लिंगीय गंभीर वृष /सांड स्वर मर्दाना थी न कोमल मृदु स्वर स्त्रियोचित जनानी थी जैसी महाभारत के दुर्योधन पात्र की थी ।तब उसका नाम दुर यो धन रखा था जो गरीब निर्धन सूचक माना जाता है । युधिष्ठिर की आवाज बैल के समान वृषभ स्वर की थी युधिस्टर शांत और स्थिर बुद्धि का था वह आसानी से विचलित नहीं होता था उसका नाम युद्ध में भी स्थिर बुद्धि युधिष्ठिर रखा गया था । भीम का शरीर सबसे विशालकाय था उसका नाम बड़े शरीर से भीम रखा गया था । अर्जुन विशेष फुर्तीला था ऊर्जा की अधिक मात्रा के कारण ऊर्जा के समुचित उपयोग के कारण अर्जुन का नाम रखा गया था । नकुल कुल में सबसे सुंदर था उसका नाम सुंदरता के आधार पर रखा गया था ऐसा व्यक्ति सुंदर उस समय दूसरा नहीं था । सहदेव छोटे शरीर का आज्ञाकारी सेवक भाव वाला था उसका नाम उसके काम सबकी सहायता करना सब की आज्ञा मानना के आधार पर सहदेव रखा गया था । दुशासन का नाम सदैव बुरे शासन में शासक का सहयोग करने के कारण रखा गया था । विकर्ण का नाम विशेष प्रज्ञा और उचित निर्णय क्षमता के कारण रखा गया था । यह थी महाभारत के समय की परंपरा जिसमें व्यक्ति का नाम सार्थक गुण के अनुसार रखा जाता था ।

बात करते हैं निरर्थक गुणके आधार पर नाम रखने के परंपरा जिसकी शुरुआत ज्योतिष शास्त्र प्राकट्य से हुई है ।जिसमें नाम रखने की परंपरा नाम राशि, नक्षत्र ,प्रहर चरण के अनुसार शुरू हुई थी । बाद में जब ज्योतिष का प्रभाव घटने लगा सब लोग अपनी इच्छा के अनुसार नाम रखने लगे ऐसे में नाम के शब्दों का कोई महत्व नहीं रहा । लोग उत्तम गुण देखते और उत्तम गुंंण के अनुसार नाम रख देते अधम निकृष्टतम प्रकृति के लोगों का भी और यह परंपरा चल रही आज भी जारी है । श्रेष्ठ शब्द अक्षर में नाम रखने की ।।

अब तो नाम रखने में लोग जो आधुनिक विचारों के हैं वह अपने बच्चों के नाम चीनी पैटर्न पर 2 अक्षरों में रखते हैं जिससे निकनाम कहते हैं जो हिंदी के 12 कड़ी ककहरा के 2 अक्षरों को कहीं से भी उठाकर रख दिया जाता है जैसे सुमी, हूतू , चैंचू ततो धूधू आदि अब बात इससे भी आगे बढ़ गई हैं । जब से लोगों को नाम शब्द के प्रभाव गुण का पता चला है तो लोग निकृष्टतम निरक्षर होते हुए भी अपने नाम श्रेष्ठ उत्तम शब्दों के रखते हैं ।जैसे त्रिवेदी शब्द से पता चलता है कि इस व्यक्ति के परिवार को तीन वेदों का ज्ञान है , द्विवेदी शब्द से दो वेदों का ज्ञान , चतुर्वेदी शब्दों से चार वेदों का ज्ञान , वेदी शब्द से एक वेद का ज्ञान । शर्मा शब्द से शर की मां यानी वकातूणीरधारी अर्थात तर्क शास्त्री , तर्क आचार्य का एहसास होता है ।चाहे मनुष्य अज्ञानी निरक्षर है।

इस बात को लेकर हाथरस के कवि लक्ष्मीनारायण गर्ग ने अपनी एक विशेष कविता पुस्तिका लिखी थी जिसका टाइटल था नाम बड़े दर्शन छोटे जिस की कुछ पंक्तियां जो मुझे याद है इस प्रकार है मुंशी चंदा लाल का तारकोल सा रूप श्यामलाल ऐसे खेलें जैसे खिलती धूप सजे बुशर्ट पैंट में ज्ञानचंद हो गए थे 6 बार टेंथ में पंडित विद्याधर को काला अक्षर भैंस बराबर । इसी प्रकार से सिंह शब्द लगाने से मनुष्य में श्रेष्ठ हिंसक सिंह पशु के गुण का पता चलता है यदि इसकी अधिक व्याख्या की जाए ,इस पर मेरे मित्र डा० जगन्नाथ गर्ग ने कहा था कि ये पैदा तो मनुष्यों में हुए हैं लेकिन पशु नाम उपसर्ग लगाने से इनकी पाशविक मानसिकता बताती है कि अभी तक ये आदमी पूरी तरह से नहीं बन पाये हैं इनमें हिंसा करने का गुंण पाशुविकता अभी भी छिपी हुई है जो अक्सर आदमी से बातचीत करने पर लड़ाई झगड़ा करने से इनके हिंसक होने का पता चलता है । लोग अपने नाम के पीछे वृक्ष अक्षर जैसे नीम का अपभ्रंश निम , पैप्लाद का अपभ्रंश पीपल या पिपिल , पक्षियों के नाम जैसे कोचर खरखूशष्टा छोटा उल्लू , तीतर पक्षी से तीतरों , मोर से मोरल मोरारजी ई आदि नामों का उपयोग लोग अपनी पहचान व्यक्त करने के लिए गोत्र के रूप में क्षेत्रवासी के रूप में प्रयोग करते हैं । नामों की व्याख्या के लिए गोत्रों के बालगोत्र शब्दों के अधिक जानकारी के लिए पंडित ज्वाला प्रसाद मिश्र की जाति भास्कर पढ़ें ।।

भगवान इंद्र को मंदिरों में क्यों नहीं पूजा जाता?


इंद्र के बारे में या ब्रह्मा के बारे में यदि आप जानना चाहते हैं तो छांदोग्य उपनिषद अध्याय 8 खंड 8 9, 10 ,11 12, 13 ,14, 15 को पढ़ें जिसमें इंद्र के बारे में इंद्र और प्रहलाद पुत्र विरोचन की कथा दी गई है जिसके अनुसार इंंद्र एक विशेष ज्ञानी, विशेष बली, विशेष उद्योगपति, सर्व समर्थ पुरुष को कहा जाता है । जो परम भोगी भी है ।।चूंकि वो कर्मा है धर्मा है तो भोक्ता/भोगी भी है कारण कि सभी कर्मों का कारण आधार परिणाम भोग पर आकर रुकता है ।। छांदोग्य उपनिषद के अनुसार इंद्र और ब्रह्म दोनों ही अदृश्य विद्युत चुंबकीय सूक्ष्म शरीर के नाम हैं , जिनके सक्रिय होने से इंद्रियां / इंद्राणी धर्म धारण कर जीव को कर्म में समर्थ बनाती हैं और इंद्र के ब्रह्म के निष्क्रिय होने पर इंद्रियां शरीर में मौजूद होने पर भी धर्म धारण नहीं करती जिससे जीव कर्म करने में समर्थ नहीं होता है ॥ जिस देवता के आकार आकृति के बारे में चरित्र चित्रण के बारे में कुछ भी निश्चित नहीं कहा जा सकता जो आकार आकृति चरित्र चित्रण को अपने प्रज्ञा विवेक के अनुसार करम धरम परिणाम बदलने में समर्थ हो ऐसे इंद्र और ब्रह्मा की मूर्ति कैसे बनाई जाए किस तरह की बनाई जाए और उसकी प्रतिष्ठा मंदिर में किस तरह से की जा है यह मानव बुद्धि विधान से परे एक बात है ऐसे में मंदिर में इंद्र और ब्रह्मा की मूर्ति नहीं बनाई जा सकती है वैसे पुष्कर में राजस्थान में एक ब्रह्मा का मंदिर है शेष भारत में ब्रह्मा का मंदिर या इंद्र का मंदिर कहीं पर भी मौजूद नहीं है ऐसे में ब्रह्मा के मंदिर की उपस्थिति पर प्रश्न सूचक छंद बनता है।

छांदोग्य उपनिषद के अनुसार देव /सुर और दानव /असुर दोनों ने श्रवण कला का परंपरा से आत्मा के बारे में जाना जो इस प्रकार है आत्मा जरा आयु रहित , जन्म रहित, मृत्यु रहित , शोकरहित ,क्षुधा रहित तृष्णा रहित , सत्य काम, सत्य संकल्प है वही जानता है अनुभव पड़ता है जब तक इस वाक्य को इंद्र और विरोचन नहीं समझ सके उन्होंने दूसरे प्रकार से समझाया जो आंखों में होते हुए आंखों से देखता है जिसके कारण आंख देखने में समर्थ है वह इंद्र /ब्रह्म है । प्रहलाद पुत्र विरोचन विश्वास कर गया तब से असुर संस्कृति मानने वाले लोग दृश्य जगत को सत्य मानते हैं अदृश्य जगत को अदृश्य जगत को नहीं मानते हैं । इंद्र को शंका हुई और वह वापस प्रजापति के पास गया प्रजापति ने ब्रह्म ज्ञान दिया प्रजापति ने कहा जो शंका करता है शंका का हल ढूंढने की कोशिश करता है वह ब्रह्म है जो स्वप्न बनाता है ब्रह्म है सुप्त अवस्था में आनंदित रहता है वह ब्रह्म है ।जो ब्रह्म का आश्रय स्थल शरीर है उस में ब्रह्म की स्थिति शरीर भ्रम है , शरीर जो मरण धर्मा है सदैव जन्म मृत्यु से आच्छादित है जरा जीर्ण आयु परिवर्तन से युक्त मनुष्य को भूमंडल का वास चेतावनी देने वाला स्थल शरीर है जिसमें आत्मा परमात्मा के नियमानुसार सीमित समय के लिए कर्म करते हुए विभिन्न तरह के शरीर में निवास करते हैं ।

हिंदू धर्म में भगवान के आराध्य के दो रूप दो अवस्थाएं हैं निराकार अवस्था जो अदृश्य होने के कारण शक्ति हीन कही जाती है दूसरी दृश्य होने से शक्तिमान प्रभावशाली श्रेष्ठरूप श्रेष्ठ अवस्था प्रत्यक्ष साकार अवस्था कही गई है । जिसमें जीव को अपने से बड़े को काल्पनिक को समर्थ प्रज्ञा वन बलशाली सहायक जीव का निकट होने का एहसास होता है जिसके अनुसार मनुष्य का भगवान बड़े समर्थ मनुष्य जैसा , भैंसे का भगवान भैंसे से भी बड़े समर्थ भैंसे जैसा , हाथी का भगवान उस हाथी से विशाल बड़े समर्थ हाथी जैसा , और शेर का भगवान शेर से भी बड़ा शेर से भी ज्यादा समर्थ बड़े शेर जैसा होता है । यानी भगवान की कल्पना मनुष्य अपनी बुद्धि के अनुसार अपने से बड़े समर्थ सहायक जीव के रूप में करता है । मानव मत के अनुसार देवताओं में अधिक विशेषशक्ति रूप होने से देवता आराध्य कहे गए जो दृश्य है ,मंदिर में मूर्ति रुप से । लेकिन जो दृश्य नहीं है तो क्या उसे आराध्नाय श्रेष्ठ न माना जाए । जैसे गायत्री देवी /देगी /देती है याज्ञवल्क्य विरचित गायत्री उपनिषद के अनुसार गायत्री गायन की त्रिविधा त्रिपाठी लोकोक्ति शैली कहीं गई है ।गायत्री गायन की विधा अदृश्य है परा (अदृश्य) ,पश्यन्ती (भावभ्रम ),बैखरी (प्रत्यक्ष ) ,के रूप में परा रुप में विचार , पश्यन्ति रुप में जीव के भाव विचार की निष्क्रिय सक्रिय भ्रमी अवस्था और बैखरी रूप में कर्म कृति अवस्था । लेकिन श्रीराम शर्मा ने गायत्री को भी एक स्त्री के रूप में देवी बनाकर लोगों के सामने प्रस्तुत करके गायत्री देवी प्रतिष्ठान खड़ा कर दिया ।। इसी प्रकार भारत माता का अस्तित्व सन 47 से पहले नहीं था लेकिन बंगाल में रविंद्र नाथ टैगोर के शांतिनिकेतन में भारत माता नाम की देविका चित्र शक्ति प्रदर्शन चित्रकार ने चित्र बनाकर कर दिया । देवताओं के बारे में गायत्री महाविज्ञान के अनुसार सभी देवता शब्द रूप हैं जिसके पास जैसे शब्द हैं उसको अपने दिमाग में भरे संचित शब्दों के अनुसार उपलब्धि प्राप्ति होती है बाद में इन शब्दों को कर्म प्रभाव के अनुसार इनके समझदार लोगों ने चक्र महाविज्ञान के शक शक भेदन कला विश्लेषण से इनका देवी दर्शन किया और देवी दर्शन के बाद यह शब्द शक्ति लोगों को देवता/दानव /राक्षस बनाती है ।

ऐसे में जब इंद्र और ब्रह्म दोनों ही विद्युत चुंबकीय शक्ति वाले अदृश्य शरीर धारी है तो ऐसे में इनका सही रूप चित्र चरित्र कैसे बनाया जाए परंतु कुछ भी निकृष्ट लोगों ने इंद्र और ब्रह्म का परम भोगी लालची स्त्री प्रिय नारी आसक्त पुरुष के रूप में चित्रण कर दिया कहानियां घड़ी गई । जैसे ब्रह्मा काम उन्मुक्त अवस्था में अपनी पुत्री अहिल्या को पत्नी बनाने को प्रेरित हुए थे इसमें दिमाग लगाने की जरूरत है ब्रह्मा किसी मनुष्य का नाम था जो उस समय मौजूद था जो अय्ययाश स्त्री लोलुपता पूर्ण विवेक हीन था मर्यादा हीन था उसका मन अपनी बेटी पर आ गया और वह अपनी बेटी को पत्नी बनाने लगा ।

इसमें सोचने की बात यह है मनुष्य का नाम भगवान का नाम रख देने से मनुष्य भगवान नहीं बन जाता और भगवान का नाम मनुष्य नाम रख देने से भगवान मनुष्य नहीं बन जाता । मेरे एक साथी शिक्षक का नाम ओमब्रहम था । पहली बार जब ऐसे नाम का पता चला तुम्हें प्राप्त हुआ सोचने लगा क्या ऐसा भी नाम रखा जा सकता है तो क्या ओमब्रहम भगवान का नाम शक्ति सम्मान ले पाया इसका जबाब है नहीं ।। कुछ शातिर लोग इस नाम विधा के उपयोग से तरह तरह का खतरनाक घटिया साहित्य घड़ कर लोगों को पागल कर देते हैं ।बरगला देते हैं इसमें दोष सुनने वाले का है ज्यादा और बोलने वाले कम है क्योंकि बुद्धि जैसी चीज सभी के पास है । अपनी निजी उपयोग के लिए । ऐसे में लोग अपनी बुद्धि को दूसरों को गिरवी रख कर सोचना बंद कर दें या ना सोचे दूसरे लोगों के अनुसार सोचें बोले ऐसे में कभी उन धूर्त वक्ताओं की तो है ही धूर्त श्रोता भी दोषी है । जरूरत है अपना दिमाग अपने हित में अपने अनुसार उपयोग करने की । मंदिर के अंदर देवी देवता में पूजा का विधान बड़े शातिर धूर्त निकम्मे लोगों की खुराफात है जिसमें वह तरह-तरह की मूर्तियां कलाकृतियां बनवाते हैं उन्हें अपने मंदिर / ड्राइंग रूम / कला कक्ष / म्ययूजियम / संग्रहालय में रखवाते हैं और लोगों को कलाकृति दर्शन :: मूर्ति दर्शन कला से धन कमाते हैं जो मंदिर कहे जाते हैं ।

जबकि मन मंदिर का अर्थ है अपने मन के भी अंदर एक ऐसा दृश्य जगत मौजूद है जो उस मनुष्य के लिए सत्य है परंतु दूसरे लोगों के लिए अदृश्य होने से असत्य है मन के अंदर भी ये ही कला कृतियाँ स्वप्निल अवस्था में सक्रिय हो जाती है तो ऐसे में मनुष्य अपने मन्दिर की हलचलों के सपने देखते हैं जिनसे दूसरे लोग अनजान रहते हुए दूसरे मनुष्य के सपनों को झूंठा/असत्य कहते हैं

। ऐसे में जिस एक स्थान विशेष पर तरह-तरह की कलाकृति मूर्तियां रखी हो जो निष्क्रिय मूर्तियां है निष्क्रिय मूर्तियों मैं जब तक श्रद्धा निष्ठा आस्था विश्वास नहीं है तब तक वे सिर्फ पत्थर की कलाकृतियां हैं जो मंदिर के मालिक /नियंता ने कारीगर ने बनवाई है । बाद में भक्तगण या दूसरे उचित बुद्धि वाले लोग अपनी श्रद्धा निष्ठा विश्वास से मैस्मर शक्ति/ जादुई शक्ति पैदा करते हैं । इससे भी अधिक प्रभाव मनुष्य यदि अपने मन के अवचेतन स्तर में सकारात्मक कथन / सत्य कथन पूजा अर्चना के द्वारा डालता है जैसे दुर्गा सप्तशती के देवी कवज अर्गलास्तोत्र आदि के द्वारा तो वह अधिक प्रभावशाली होता है। यदि अपनी इस मैस्मर शक्ति या जादूगर शक्ति का उपयोग मनुष्य यदि अपने हित में करने लगे तो परिणाम विशेष उत्तम मिलते हैं यह मनुष्य के निजी मानसिक शक्ति पर ऊर्जा पर निर्भर करता है ।ऐसे में मंदिर की मूर्तियों से ज्यादा उत्तम रहेगा कि अपने मन मंदिर की मूर्तियों के दर्शन ठीक तरह से किए जांय और यदि अपने मन्दिर की मूर्तियों में कोईं विकार है तो उसे अपनी मानसिक इच्छाशक्ति से ठीक किया जाय तो यह भौतिक जगत में दृश्य व्यवहार करनेवाली मूर्तियां भी बदल जाती हैं । जिससे ईष्ट देव/देवी सम्पर्क मानवों के व्यवहार में परिवर्तन आने से अपना जीवन शांन्त सुखमय हो सकता है ।इसके लिए अवचेतन मन की शक्ति जोसेफ मर्फी लिखित पढ़ें ।