जोंक चिकित्सा क्या है, इसका उपयोग क्यों किया जाता है, कैसे किया जाता है और इसके प्रभाव क्या हैं?


जिन लोगों के स्थान विशेष में अंग विशेष में त्वचा पर बार बार फोड़े फुंसी होते हैं फोड़े फुंसी होते रहने का एक क्रम बन जाता है फोड़े फुंसी नष्ट नहीं होते तो ऐसे में यह माना जाता है कि उनकी त्वचा का वह क्षेत्र और उनका रक्त दोनों ही खराब हो चुके हैं ऐसे में उनकी त्वचा पर जोंंक को चिपकाया जाता है जिसे जोक चिकित्सा कहते हैं । जोंक फाइलम एनैलिदा का 1 प्राणी है जो केंचुए परिवार के अंतर्गत आता है इसकी बनावट काफी हद तक केंचुए से मिलती है इसका शरीर खंडित होता है और यह जल में रहता है अक्सर जो लोग बिना सोचे समझे तालाब में या नदी के रुके पानी में फसल में जहां पानी भरा हुआ होता है वहां चले जाते हैं तो उनसे जोक उनके शरीर के खुले अंगों से चिपक जाती है कुछ जोंक पेड़ पत्तियों पर भी रहते हैं जो अक्सर पेड़ पत्तियों के नीचे से गुजरने वाले जीवो मनुष्य और पशुओं के ऊपर गिर कर उनसे चिपट जाते हैं कुछ जोक फसल में पाए जाते हैं जो फसल के पत्तों के ऊपर चिपके रहते हैं और जैसे ही कोई जीव फसल के अंदर से निकलता है तो फसल के पत्तों को छोड़कर जो उस मनुष्य और पशु से चिपट जाते हैं यह जब तक चिपके रहते हैं जब तक कि इनका पेट खून पीने से नहीं भर जाता जैसी ही इनका पेट खून पीने से भर जाता है यह उस पशु और मनुष्य को छोड़कर अलग चले जाते हैं।

जोंक चिकित्सा में सबसे पहले जोंंक के मुख सफाई के लिए उससे कुछ देर के लिए एंटीसेप्टिक लोशन में रखा जाता है उसके पश्चात ही जोक को संबंधित स्थान पर चिपकाया जाता है यदि जोक को एंटीसेप्टिक लोशन में डाले बिना सीधे-सीधे किसी की भी त्वचा पर चिपका दिया जाता है तो ऐसे में उससे और नए अलग तरह के संक्रमण पैदा होने का खतरा हो जाता है ऐसे में जोक का स्टरलाइजेशन करना बहुत जरूरी है ।

जोक उनकी त्वचा पर चिपकने के बाद उनकी त्वचा के आसपास से रक्त चूस लेती है बाद में उसको हटा लिया जाता है मेरे साथी अमरनाथ ने इस चिकित्सा की पुष्टि की है उन्होंने बताया कि एक बार उन्हें चेहरे पर फुंसियों की समस्या हो गई थी तो तब एक ग्रामीण वासी ने उनके चेहरे पर दो-तीन जगह जोंंक लगाई और उसके बाद उनके चेहरे पर फुंसियों की समस्या हल हो गई ।

जलौंका / जोंक यह जल में रहती हैं इसलिए इन्हें जलोंका कहते हैं। । यह 12 प्रकार की होती हैं जिसमें 6 प्रकार की जो जहरीली जौंक होती हैं । और 6 प्रकार की जौंक निर्विष होती हैं जो वह अशुद्ध रक्त निकालने में काम लाई जाती हैं । विषैली जोक यह 1. काली , 2.कबरी ,3. अल गर्दा , 4. इंद्र युद्धा , 5. समुद्रिका , 6. गोचंदना प्रजाति की होती है । निर्विषा चौक के नाम है 1.कपिला , 2 . पिंगला , 3. शंकुमुखी , 4. मूषिका , 5. पुंडरीक मुखी , और 6. सागरिका ,

इनके लक्षण इस प्रकार हैं मैनसिल के समान नारंगी रंग की जिसकी दोनों पसवाड़े वाले हो और पीठ चिकनी हो वह कपिला जोक है । कुछ लाल गोल बोल नारंगी रंग वाली शीघ्र चलने वाली पिंगला जोक है । यकृत के समान गहरे लाल रंग वाली शीघ्रता से रक्त पीने वाली बड़ी और तीक्ष्ण मुख वाली शंख मुखी जोक है ।मूषिका /चुहिया के समान रंग वाली दुर्गंध मुक्त मूषिका जौंक है ।मूंग दाल के समान हरि कमल के समान मुख वाली पुंडरीक मुखी होती है । चिकनी कमल पत्र समान वर्ण वाली 18 अंगुल प्रमाण की साबरिका होती है । यह साबरिका जौंक पशुओं का रक्त निकालने में काम आती है ।

इन जौंकों के क्षेत्र हैं यूनान , दिल्ली , मथुरा , हिमालय /सहयाद्री पर्वत के निकट के क्षेत्र में रहने वाली जौंके बड़ी बड़ी सी शीघ्रता से रक्त पीने वाली होती है । पदम (श्वेत कमल) , उत्प्ल ( कुछ नीला ) नलिन ( गुलाबी ) कुमुद ( कुमोदनी ) सौगंधिक (सुगंधित ) कुवलय (रक्त वर्ण ) पुंडरीक ( आसमानी ) एसी कमल और शैवाल के कोथ से जो पैदा हो निर्मल जल में रहे वह जोंक विषरहित होती हैं । इन विषहीन जौंकों को जौंकों से रक्त शोधन चिकित्सा करने के लिए काम में लाया जाता है ।

इन जौंकों को गीले चमड़े की चिमटी से पकड़े और फिर इनको अच्छे बड़े-बड़े में शुद्ध जल में रख दे इसे खाने के लिए काई सिबाल सूखा माँस और जल के कंद घड़े में डाल दे ।दूसरे तीसरे दिन खाने की और वस्तु डालता रहे और 7 दिन में घड़ और पानी बदलता रहे । आप जो भी व्यक्ति जोक से रक्त निकलवाने के लिए आया हो उसके दूसरे स्थान की त्वचा को साफ करके उस पर शुद्ध मिट्टी और गोबर सुखा करके लगाएं जिससे जोक्स लग जाए । उसके बाद जो पकड़ी हुई और पाली हुई जोंक को सरसों और हल्दी को पानी में पीसकर उसमें उसे खूब सूत सूत साफ कर देमें । इस प्रकार से जल को भी बार बार साफ सही करके जोंक को शुद्ध करे पहले जल में , फिर मट्ठा में उस जोक को शोधन कर रख दें । जिससे उसकी गलानि थकान दूर हो जाए थकान दूर हुई जानकर फिर जोक को रक्त निकालने की जगह पर चिपका दें । बारीक सफेद भीगे हुए कपड़े में उस स्थान को ढक दें जहां जोक को लगाना है जिससे जोक के शरीर के ऊपर भी नमी बनी रहे । जब जोक भली प्रकार से रक्त पी ले तो वह पूरी तरह से फूलकर मोटी हो जाती है । इसके बाद उस जोंक को धीरे से खींचे यदि जो खींचने में दर्द और खाज होने लगे तो समझ लीजिए यह जोक शुद्ध रक्त खींचने लगी है । शुद्ध रक्त खींचने पर जोक को छुटाले यदि वह आसानी से नहीं छुटती ह तो उसके मुंह पर सैंधानमक चूरा बुरक दे तो उससे जोक आसानी से छूट जाती है । उसके बाद उस जॉक को चावलों के पानी से माड से धोकर उसके मुंह पर तेल और नमक मिलाएं और उसके बाद उसे पकड़ कर पीछे से दबाते हुए आगे की ओर तक का रक्त उसके भरे हुए शरीर में से निकाल दे । इस प्रकार से जोक फिर से रक्त निकाल कर दुखी हो जाती है और दोबारा रक्त पीने के लिए तैयार हो जाती है ।

साफ जल पात्र में छोड़ने से जोक भूखी जल्दी दर-दर चलने लगती है और जो जो साफ नहीं की हुई है जिसमें से दूषित रक्त पूरी तरह से नहीं निकाला गया है वह तृप्ति भाव से बर्तन में नीचे बैठ जाती और चलती फिरती नहीं है । ऐसे में उसे अच्छी प्रकार से निचोड़ कर रक्त साफ करें , बिना अच्छी तरह से निचोड़ी जोक को फिर से प्रयोग में लाने पर इंद्रमदनाम असाध्य व्याधि हो जाती है । क्योंकि उस जॉब के पेट में दूषित रक्त भरा हुआ है जो दूसरे व्यक्ति के शरीर में जाकर उसे असाध्य बीमारी पैदा कर सकता है ।इसके पश्चात जॉक को हटाने के बाद जॉक के घाव पर पहले ठंडा जल छिलके फिर उसके बाद शहद बांधे या कोई डिसइनफेक्टेंट केमिकल लगाए यह जॉब चिकित्सा है।

सुश्रुत संहिता प्रथम भाग ,अध्याय 13 

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