बाबाजी का ठुल्लू क्या है?

 


पुराने समय में बाबाजी लोग जहां अपना आसन जमाते थे वहां वह लगातार अग्नि जलाकर रखते थे । जिसे बाबाजी का धूना कहा जाता था । भूमि पर अक्सर कंडों के लगातार जलते रहने से धूँआ बना रहता था ऐसे में उस स्थान को बाबा का धूना या धुआं स्थल कहते थे । जिससे जंगलों में बाबा की स्थिति लोकेशन को उनके भक्त देखकर जंगलों में बाबा के पास पहुंच जाते थे ।आज भी इमरजेंसी में आग जलाकर हुआ पैदा करके अपनी अपनी आपातकालीन स्थिति बताने का गुण बताया जाता है ।

वह धूआँ पैदा करनेवाली अग्नि गाय या भैंस के गोबर से बने कंडे अपनी बनाकर जलाकर पैदा की जाती थी । जब भी भक्त लोग अक्सर बाबा के पास आते थे । तो बाबा गंण हाथ उठा कर आशीर्वाद देते थे । जिसके लिए उन्हें अक्सर बार-बार आशीर्वाद देने के लिए हाथ उठाना पड़ता था । ऐसी आशीर्वाद देने की आसन मुद्रा में बैठे-बैठे बाबा लोग अपने अनुयायियों/भक्तों को आराम की मुद्रा में टिकटीनुमा छड़ी / बाबा जी का ठुल्लू पर हाथ रखे हुए भक्तों को आशीर्वाद देते रहते थे । जिससे अक्सर बाबा जी की बाजू थक जाती थी । तब बाबा लोग अपनी बाजू को वायु में स्थिर रखने के लिए इस ट्रिक की लकड़ी / बाबा जी की बाजू ठिकाने की ट्रिक लकड़ी टिकटी या बाबा जी ठुल्लू को उपयोग में लाते थे ।

इसके समाधान के लिए बाबा लोग गौ मस्तक जैसी छड़ जो बीच में खाली हो और जिसके दोनों पार्शव /करवट वाली दोनों सहायक ठूंठ छड़ें जिनके बीचोंबीच में जगह खाली हो । गाय के सींग के समान दीखती हों । उस ठूंठिया छड़ी को बाबा जी का ठुल्लू कहते थे । क्योंकि बाबा लोग कुछ करते धरते नहीं थे खाली रहते थे और अपनी भुजा को उस छड़ी के ऊपर आशीर्वाद की मुद्रा में आसन पर बैठे रहते थे उस छड़ी को जो गौ के मस्तक जैसी होती थी उस टिकटीनुमा छड़ /दंड को बाबाजी का ठुल्लू कहते हैं ।

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