किशोरों में अवसाद पर आपके क्या विचार हैं?


किशोरों में अवसाद का मुख्य कारण किशोरों को गलत शिक्षा दिया जाना ( जा - ना , आ - जाना ) ** जैसे शिक्षा के चार चरण है !! 1. आदर्शवादी शिक्षा जो कहने भर को तो सत्य शिक्षा कही जाती है लेकिन वास्तव में स्वप्न शिक्षा है । समाज में जिसका कहीं दर्शन होता है कहीं दर्शन नहीं होता । 2. दूसरी शिक्षा प्राकृतिक शिक्षा है वह किसी के द्वारा दी नहीं जाती मनुष्य अपने अनुभव से स्वयं सीखता है जिसका सीखना बहुत महंगा पड़ता है । 3. तीसरी शिक्षा यथार्थवाद कही जाती है कहना बहुत आसान है यथार्थ बोलो यथार्थ सुनो यथार्थ ज्ञान हो जाएगा चित्त ,मन शांत हो जाएगा लेकिन यथार्थ शब्द अपने आप में बहुत भयंकर है ! बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो यथार्थ दर्शन यथार्थ श्रवण करने में समर्थ होते हैं अन्यथा यथार्थता का बोध होते ही दिमाग हिल जाता है लोग पागल हो जाते हैं या डिप्रेशन में चले जाते हैं!! 4. चौथी प्रकार की शिक्षा प्रयोजनवाद है। मैं इस प्रयोजनवाद की शिक्षा से पूरी तरह सहमत हूं जिसका मतलब है जिस छात्र को , किशोर को , जैसी शिक्षा वह चाहिए जैसी शिक्षा वह महसूस कर रहा है उसे वहीं शिक्षा दी जानी चाहिए । यह प्रयोजनवाद की शिक्षा है ।।

अक्सर किशोरों को आदर्शवादी प्रधान शिक्षा दी जाती है जैसे समाज के संचालन का नियंत्रण का सारा भार किशोरों के ऊपर ही टिका हुआ है जबकि समाज को चलाने में सभी प्रकार के आयु सभी दोंनो प्रकार के नर /नारी लिंग !! सभी प्रकार की जातिआं सभी प्रकार के लोगों का हाथ होता है । ऐसे में वह आदर्शवादी किशोर जिसने आदर्शवादी शिक्षा यदि किसी भी जातिविशेष की ली है जिसमें उसका जन्म हुआ है जो उस जाति विशेष के लोगों के बीच पला बढ़ा रहा शिक्षित हुआ है तो उसी जाति को अपनी जाति को समझता है। दूसरी जातियों के अस्तित्व को स्वीकार करने दूसरे जाति के लोगों की सुनने समझने की जरूरत को सही नहीं समझता ह जिससे नई परिवर्तन वादी लचीली नयी सोचसूचना न बन पाने से उसकी सोचदूसरी जातियों के अस्तित्व के प्रति खतरनाक स्तर की दुश्मनी की /शत्रुता की दूसरी जाति के लोगों से लड़कर से लड़ने झगड़ने उन्हें खत्म करने की सोच बन जाती है । यदि किशोर ने धार्मिक शिक्षा ली है तो वह अपने धर्म के स्थायित्व अस्तित्व को सही सच्चा मानता है दूसरे धर्मों के मानने वाले लोगों पर शंका करता है दूसरे धर्म के लोगों को अपने धर्म के लिए घातक खतरनाक समझकर उनसे अपने धर्म की जीवन पद्धति में बाधक समझते हुए उन दूसरे धर्म के लोगों से अकारण लड़ाई झगड़ा करने लगता है । इसी प्रकार से किशोर को कुल या वंश परंपरा की शिक्षा उसे अपने कुल वंश के बड़े छोटे लोगों के द्वारा मिलती है जिससे वह किशोर अपने कुल की परंपरा को सही मानता है। क्योंकि कुल और वंश की परंपरागत शिक्षा वह उसे उसके माता-पिता से मिली है । ऐसे में वह किशोर दूसरे कुल और वंश परंपराओं की शिक्षाओं को गलत समझता है और गलत बताता है ।झूठलाया करता है । ऐसी निजी शिक्षा जो उसने लिंग के आधार पर जाति के आधार पर वंश के आधार पर दूसरे लोगों से सीखी है तो उसमें वह सिर्फ और सिर्फ अपने को , अपनों को सच्चा मानता है जबकि दूसरों के अस्तित्व को नकारने लगता है । इससे किशोरों में संघर्ष लड़ाई झगड़ों की प्रवृत्ति/आदत बन जाती है । जो उस किशोर को समस्या बनने के साथ-साथ समाज के सभी कुल वंश जाति धर्म आदि समूहों के लिए समस्या बन जाती है।

इससे किशोरों किशोरियों में किशोरावस्था में दूसरों से अकारण झगड़ा करने की उसमें प्रवृत्ति उत्पन्न हो जाती है । ऐसे मेँ शिक्षा किशोरों को या तो चार प्रकार की एक साथ दी जानी चाहिए जो एक साथ एक समय में संभव नहीं हो सकता है । उचित प्रकार की शिक्षा एक साथ नहीं दी जा सकती है । या वह चारों प्रकार की शिक्षाओं को एक समय में एक साथ निरंतर ग्रहण करते रहने से ग्रहण नहीं कर सकता सीख नहीं सकता ।। ऐसे में उसे सिर्फ 5. पांचवें प्रकार और परिवर्तनवाद वाली शिक्षा दी जानी चाहिए जिसका अब लब्बो/ लुबाब या सारांश पहलू यह है कि दुनिया में हर समय परिवर्तन हो रहा है हर क्षण हर जगह परिवर्तन हो रहा है समय की सुई बदलकर दिन के बदलने का संकेत करती है दिन बदल कर हफ्ते का संकेत करता है हफ्ता बदलकर महीने का संकेत करता है और महीना बदलकर साल का संकेत करता है और आयु बदलने का संकेत करता है ।

जब सब कुछ हर क्षण बदल रहा है तो उस क्षण के अनुसार उस जाति आयोग धर्म विशेष के अनुसार ली गई शिक्षा उस समय तो उपयोगी है। उस आयु जाति धर्म कुल वंश समूह के लिए उपयोगी है । लेकिन वही शिक्षा उस उस समय को बदल जाने के बाद दूसरे समय के दूसरे चरण में दूसरी आयु में , दूसरे लोगों के लिए , दूसरे जाति के लोगों के लिए, दूसरे धर्म वालों , दूसरे कुल वंश जाति परंपराओं के लोगों के लिए अनुपयोगी है गलत है और बेकार निरर्थक सिद्ध हो जाती हैं साथ ग्रहण करने की अस्तित्व बाध्यता से अनुदान तक या फिर बेकार सिद्ध हो जाती है । ऐसे में किशोरों को ही नहीं अपितु हम सभी को हर किसी को , बीते हुए समय पर भी विश्वास करना आना चाहिए । भविष्य में जो परिवर्तन होगा उसके अनुसार भी हम सबको विश्वास करना आना चाहिए ।यह किशोरों को ही नहीं अपितु हर किसी को हर शिक्षा पाठ के बाद हर क्षण हर समय बताया जाना चाहिए।

शिक्षा में आदर्शवाद का होना तथा प्रयोजन वाद और परिवर्तन की सही समझ नहीं होने पर किशोरों का अपने जीवन में बार बार फेल होना , उनको दूसरे जाति के दूसरे लोगों के , दूसरे धर्मों के ,दूसरे कुल वंश परंपरा के , अस्तित्व बोध के बारे में सही सार्थक समाज ना हो पाने से वे अक्सर दूसरे जाति धर्म कुल वंश के लोगों से लड़ने झगड़ने की प्रवृत्ति बन जाने से अक्सर अशांत रहते हैं ।। जिससे उन्हें किशोरावस्था में तरह-तरह की समस्याएं अनुभव होती हैं उन समस्याओं को वह स्वयं हल करने की उम्र में सोच नहीं बन पाने से ,और उन समस्याओं के लिए हल के लिए वह दूसरे वरिष्ठ दम महाजन लोगों से विचार-विमर्श करना उचित नहीं मानते , क्योंकि उन्हें सामाजिक संपर्क सिद्धांत की जानकारी नहीं दी गई है । जो बात हमको यानी किशोरों को मालूम नहीं तो वह दूसरे लोगों दूसरे वरिष्ठ महाजन लोगों को उस बात का उस समस्या का हल अवश्य पता होगा तो ऐसे में हमें अपनी समस्या को समाज के दूसरे समझदार निर्मल बुद्धिजीवी लोगों से समय अनुसार वार्ता करना आना चाहिए इसके लिए आशा आचरण और सभ्यता के विशेष मायने हैं अक्सर कुलीन महाजन सब लोग एक अकुलीन उज्जड् झगड़ालू किशोरोंं और दूसरे असभ्य लोगों से वार्ता करने से बचते हैं उनकी समस्याओं पर गौर नहीं करते उनसे बात नहीं करते तो ऐसे में किशोर समस्या ग्रस्त बने रहते हैं । अतः किशोरों को दूसरे लोगों से बात करने की वार्तालाप करने की कला आनी चाहिए।

किशोरों की दूसरी भयंकर समस्या उनको समयानुसार मर्यादाओं की परिवर्तन समझ का ना होना , मनुस्मृति पुराने लिखित अमान्य सामाजिक संविधान के अनुसार प्रत्येक जाति धर्म की अपने अपने जाति धर्म के अनुसार अलग अलग सीमाओं की मर्यादाएं हैं । सभी लोगों के जाति धर्म परिवार की मर्यादाओं की सही पूरी समझ नहीं होने से इससे परेशान होकर अक्सर किशोर दूसरे जाति धर्म और आयु के लोगों से बार-बार टकराते रहते हैं , सामाजिक परंपराओं मर्यादाओं की स्थापना ओं के बारे में पाठक लोग हिन्दू धर्म ग्रथ अथर्ववेद के २९ -३०अध्याय वृत्ति निरुपण सर्ग में विभिन्न कर्मपरम्पराओं के अनुसार तरह तरह की जाति निर्माण व्यवस्था से समझ सकते हैं । जो परंपरा मर्यादा आएं एक धर्म जाति के लोगों के लिए बनी हैं वही परंपरा मर्यादा ए दूसरे जाति धर्म के लोगों के लिए व्यर्थ बेकार और विपरीत साबित होती हैं । ऐसे में किशोर अक्सर अक्षर मर्यादा का ठीक ज्ञान नहीं होने से मर्यादा हीन कहे जाते हैं ऐसे में दोष किशोरों का काम बल्कि किशोरों के परिवार वालों का ज्यादा है जो उनको अपनी मर्यादा के अलावा दूसरी जाति धर्म की परंपराओं कुल वंश जाति धर्म परंपराओं रिति रिवाजों के बारे में ठीक से नहीं बताते हैं । जिससे किशोर अपनी कुल वंश जाति धर्म परंपराओं को सही ठीक मानते हुए दूसरे फुल वंश जाति धर्म परंपराओं को गलत मानते हुए दूसरे कुल वंश जाति धर्म के लोगों से अकारण उलझते हुए अशांत चित्त खिन्न मन से परेशान रहते हैं । जीवन पद्धति विषयक सामाजिक समस्या के उत्पन्न होने से अक्सर लोग परेशान होने से या परेशानी अधिक बढ़ जाने से अवसाद या डिप्रेशन में चले जाते हैं मैं स्वयं इस समस्या से 5 साल अवसाद में रहा था।

किशोरों की तीसरी भयंकर समस्या उनको संविधान की सही जानकारी या संविधान विषयक ज्ञान नहीं होता किशोरों को संविधान जैसी जानकारी तब मिलती है । जब वह किसी अपराध के कुचक्र या दुष्चक्र में फंस जाते हैं और किशोर या उनके माता-पिता कोर्ट कचहरी के चक्कर लगाते हैं । परिवार की आर्थिक स्थिति खराब हो जाती है तब जाकर किशोरों को पता लगता है कि समाज में कुछ संविधान जैसी चीज भी है जिसके संपादन संचालन के लिए पुलिस कोर्ट कचहरी अदालत परिषद विधानसभा संसद सभा बनी हुई हैं । और जिनके कार्यपालन के लिए जगह जगह हर जिले में आईएएस आईपीएस अधिकारी अपने दल बल के साथ समाज के उन्मुक्त अनियंत्रित आचरण करने वाले लोगों को नियंत्रित करने के लिए करने के लिए नियुक्त हैं। जो उन्मुक्त आचरण स्वच्छंद व्यवहार विचार से सामाजिक गलती होने पर गलती होने पर लोगों को परिवार समाज से आइसोलेट अलग करके अदालत के रास्ते पर डाल देते हैं ।संविधान की मार से कोर्ट कचहरी के खर्च से अक्सर किशोर खिन्न होकर परेशान रहने लगते हैं और जब परेशानी उनके मानक स्तर से अधिक बढ़ जाती है तब वह डिप्रेशन या मानसिक अवसाद जैसे रोग में चले जाते हैं। संविधान का अर्थ है संग रहने का विधान । यह संविधान भी दो प्रकार का है प्रथम मान्य लिखित संविधान भारत का संविधान है जिसके पालन करने के लिए समस्त राष्ट्र में आईएएस अधिकारी आईपीएस अधिकारी पुलिस दलबल कोर्ट कचहरी अदालत मौजूद है जबकि दूसरा अमान्य अनिकेत गुप्त गोपनीय संविधान ग्रंथ है जिससे मनुस्मृति कहते हैं जिसके अनुसार जिसकी जड़ें समाज में बहुत गहरी आदिकाल से जुड़ी हुई हैं जिसके अनुसार अधिकतर भारतीय संस्कृति के लोग अपना जीवन आज भी नवीनतम परिवेश में पुरानी पद्धति के अनुसार जी रहे हैं यह संविधान ग्रंथ स्मृति ग्रंथ कहे गए हैं जो प्रत्येक शासक ने अपने अपने शासन नियमों के अनुसार लिखवाए हैं और आज भी अनेक प्रकार के हैं जैसे प्रत्येक राष्ट्र का अपना अलग संविधान है अर्थात संवैधानिक विविधता समस्त संसार में व्याप्त है। इन दो संविधान ओं के अलावा भी समाज में एक तीसरा गुप्ता लिखित अपाठ्य संविधान भी होता है जो पूर्णतया गोपनीय है जिसके बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता उसका पता तब लगता है जब कोई की भयंकर समस्या उत्पन्न हो जाती है जिससे हम अपराध कहते हैं यह निजी अपराध अलग होता है पारिवारिक अपराध अलग होता है सामाजिक अपराध अलग होता है।

अर्थात प्रत्येक जाति का , प्रत्येक धर्म का , प्रत्येक कुल का, प्रत्येक परिवार का , एक गुप्त /गोपनीय अलिखित अपाठ्य संविधान होता है । प्रत्येक मनुष्य का निजी अलिखित अपाठ्य गुप्त संविधान अलग अलग होता है । ऐसे में किशोर सिर्फ और सिर्फ वर्तमान के सामूहिक सामुदायिक भारतीय संविधान को सही सच्चा मानते हुए दूसरा लिखित मान्य संविधान मनुस्मृति के मानने वाले लोगों से और तीसरा लोगों के निजी अलिखित अमान्य गुप्त गोपनीय संविधान के लोगों के न जाने से अक्सर अधिकांश वाद विवाद परिवाद में उलझ कर मर्यादा उल्लंघन का ज्ञान ना होने से दूसरे लोगों से टकरा जाते हैं । जबकि इसी वर्तमान भारतीय संविधान के समकालीन हमारे समाज में एक और प्राचीन सामाजिक लिखित अमान्य संविधान मनु स्मृति है जो लिखित में मान्य नहीं है परंतु उसके नियम समाज के प्राय अधिकांश लोग मांगते हैं तो ऐसे में वयस्कों को सिर्फ और सिर्फ अपने विचारों को भारतीय संविधान तक सीमित नहीं करना चाहिए अपितु उनको आदिकाल के बने हुए पुराने मानव संविधान मनुस्मृति के अलावा भी तीसरे लोगों के निजी ए लिखित अपठित गुप्त गोपनीय निजी संविधान की भी सोच समझ होनी चाहिए ।

इतना ही नहीं संविधान में अक्सर परिवर्तन होते रहते हैं वर्तमान से मैं जो समस्याएं आ रही हैं उन समस्याओं के निराकरण के लिए भविष्य में जो संविधान में परिवर्तन किए जाएंगे या जो वर्तमान में संविधान में परिवर्तन हो रहे हैं तो किशोर किशोरों को वर्तमान में संविधान में होने वाले परिवर्तनों को भी समाज ने स्वीकार करने की सोच बननी चाहिए ना कि वह बार-बार दूसरे दिशाहीन लोगों के समूह में जाएं और उनकी दिशाहीन ताकि बातों से प्रभावित होकर अकारण व्यर्थ संविधान विरोध जैसी गलत विपरीत जीवन सभ्यता की सोच बना लें यह बात सही नहीं है बार बार संविधान व्यवस्था का पूर्ण रूप से लागू नहीं हो पाना होता है । अधिकतर किशोर अवसाद में तब चले जाते हैं जब उनकी समस्याओं पर समाज के मूर्धन्य लोग मनन चिंतन नहीं करते हैं ।

चौथी किशोरों की सबसे विकट विकराल भयंकर समस्या उनको यौन शिक्षा या सेक्स एजुकेशन का सही जानकारी का नहीं होना है । जिसके बारे में पुराने समय में इसे गुप्त और गोपनीय रखा जाता था । परंतु आज भी सेक्स एजुकेशन या यौन शिक्षा पाठ्यक्रम सार्वजनिक नहीं अपितु गोपनीय है इस पर चर्चा करना एक यौनशिक्षक को कभी-कभी खतरनाक भी सिद्ध होता है । यौन शिक्षा देते समय वह एवं पुराने रूढ़ीवादी विचार के लोगों से वैचारिक संघर्ष के चलते शारीरिक संघर्ष से पीड़ित होकर घायल हो सकता है या एवं शिक्षक को यह पुराने रूढ़िवादी विचारधारा के लोग योन संवेदी भावनाएं भड़काने के आरोप लगाकर या समाज को यौन अपराध प्रेरण करने का अपराध लगाकर यौन शिक्षक को कोर्ट कचहरी में ले जा सकते हैं जिससे उसका आर्थिक नुकसान अकारण होता है ।।

इससे यौंनशिक्षक समाज में यौन शिक्षा , यौनाचार , यौनकर्मियों ,यौनेच्छा, यौनांग जैसे मुद्दों पर सार्वजनिक चर्चा करने से बचते हैं । जो यौन शिक्षा समाज में प्रचलित है या व्याप्त है वह इतनी विकृत निकृष्ट और दिशाहीन है जिसे पढ़कर या जिसे सुनकर हमारे युवा किशोर तरह-तरह की पाश्चात्य शिक्षान जगत की यौंन कृति विकृतियों में लिप्त होकर तरह-तरह के गुप्त रोगों S.T.D. में फंस जाते हैं इस पर मैं यही कहूंगा कि किशोरों को भारतीय पद्धति के अनुसार यौंनशिक्षा दी जानी चाहिए ना कि किशोरों को पाश्चात्य जगत के शिक्षा के आधार पर शिक्षा दी जाए । पाश्चात्य जगत के लोगों में शीत वातावरण होने के कारण यौन उत्तेजना कम होती है जबकि पूर्वी शिक्षा जगत में या पूर्वी जगत के लोगों में गर्म वातावरण होने के कारण किशोरों में यौन उत्तेजना दीप्ति स्तर अधिक होता है । जिससे नई उम्र के किशोर अपरिपक्व होने पर भी यौन क्रियाओं में लिप्त हो सकते हैं । जिससे उनके तन मन का विकास बाधित हो जाता है किशोरों की अधिकांश समस्याएं इसी सेक्स एजुकेशन या यौन शिक्षा के अभाव में यौन विषय के जानकारों की जानकारी ना होने से अक्सर योन विषयक अपराधों में फंसकर हैं । जिनमें फंसकर /घिर कर किशोर तरह-तरह की यौनसमस्याओं में गिर जाते हैं ।अधिकतर किशोर इन यौन अपराधों में फस कर या यौन अपराधों से पीड़ित होकर यौन क्रिया कलाप से प्रभावित होकर डिप्रेशन या अवसाद में चले जाते हैं । यहां तक कि जब यह योन विषयक अपराध , विपरीत लिंगीय आसक्ति से प्रभावित होकर योन विषयक एहसास अधिक संवेदनशीलता के स्तर से आगे बढ़ जाते हैं तो अक्सर किशोर योन विषयक अपराध करते हैं । या आत्महत्या तक कर लेते हैं तो मैं तो इस पर यही कहूंगा कि किशोरों को उनकी आयु के स्तर के अनुसार देखते हुए यौन शिक्षा सामाजिक शिक्षा और बेसिक चिकित्सा की जानकारी संबंधित शिक्षा जरूर दी जानी चाहिए ।जिससे किशोर के जीवन में समस्याएं कम से कम आएं ।

बाकी उनकी अन्य समस्याओं के निराकरण के लिए तो समाज में उनसे भी मूर्धन्य विशिष्ट महाजन लोग चिकित्सक शिक्षक एडवोकेट उचित जगह मिल जाएंगे लेकिन उनके लिए उन्हें धन व्यय करना पड़ेगा ।

कार्ल पीयरसन ने कहा है सभी मनोरोग मानसिक अवसाद और डिप्रेशन का मुख्य कारण मनुष्य को दी जाने वाली गलत शिक्षा है जो उसको स्वार्थी गुरु जनों के द्वारा भ्रम सत्य के रूप में मिलती है जिससे उसमें भ्रष्टाचार की जैसी प्रवृतियां पनपने लगती हैं , काल्पनिक सत्य की शिक्षा उसको लोभी लालची अपना हित चाहने वाले गुरुजनों के द्वारा मिलती है जो स्वार्थ व शिक्षा देते हैं ,मिथ्या सत्य जैसी शिक्षा किशोरों को प्राय दूसरे धर्म आचार्य लोगों के द्वारा या दूसरे धर्म चारी लोगों के प्रखंड तर्क धारी विद्वानों के द्वारा मिलती है जो उनकी बुद्धि को विपरीत कर देते हैं , मिथक सत्य ज्ञान की शिक्षा राह चलते अपरिचित लोगों के द्वारा मिलती है गलत शिक्षा शत्रु या विपरीत बुद्धि लोगों के गुरुजनों के द्वारा मिलती है जिन्हें पहले तो सही ज्ञान नहीं होता दूसरे वह शिष्यों को गलत ज्ञान देकर दिग्भ्रमित कर देते हैं, और अज्ञानता पूर्ण आधी अधूरी शिक्षा राह चलते इंद्रजाल एक ठग लोगों के द्वारा मिलती है फ्रांसिस गाल्टन के अनुसार सही सूचनाओं का मनुष्य को मिलना सही शिक्षा है जो उसके विकास का कारण मिल बनती है और गलत सूचनाओं का मिलना मनुष्य के विनाश का कारण बनती है। जिस दिन भी जब भी मनुष्य को यथार्थ सत्य ज्ञान मिल जाएगा तो उसी समय से उस समस्या से जुड़े समस्त मनोरोग अपने आप खत्म हो जाएंगे अर्थात डिप्रेशन अवसाद बाइपोलर डिसऑर्डर हिस्टीरिया पीडोफीलिया सिजोफ्रेनिया मेनिया आदि मनो रोगों का कारण समाज मंडली द्वारा मिला हुआ गलत ज्ञान से उत्पन्न समस्याएं हैं ।

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