एक इंसान के जीवन का असली उद्देश्य क्या है? अगर इंसान सिर्फ अपना वंश आगे बढ़ाकर मृत्यु को प्राप्त हो जाता है तो फिर यही तो बाकी पशु पक्षी भी करते हैं। तो फिर इंसान को ही सर्वश्रेष्ठ क्यों माना जाता है?


सभी जीव अपने मन में भरी इच्छाओं के अनुसार इस भौतिक जगत में आते हैं वे जिस जाति में आते हैं उसी जाति के धर्म कर्म ज्ञान के अनुसार उनमें अपने जीवन को जीने के लिए तरह तरह की कामनाएं पैदा होने लगती हैं जो बाद में कामनाएं पूर्ति अपूर्ति आपूर्ति के विवेक संज्ञान के अनुसार आवशकताओं में बदलने लगती हैं बाद में इन जीवन इच्छाओं कामनाओं आवशकताओं के विवेक से जीव में संकल्प विकल्प प्रण प्राण संबंध भावनाओं के आवेश जैविक ऊर्जा प्रवाह के आधार पर जीव में अपने जीवन जीने के कर्तव्यों बोध के अनुसार सक्रियता स्फूर्ति गति विधियां व्यवहार में दृष्टिगोचर होती हैं ।जिनमें संघर्ष भाव उदय होने से तरह तरह की समस्याओं को सभी जीव अनुभव करने लगते हैं ।

सभी जीवोँ के लिए पैदा होने के साथ ही जीवन को जिंदा जीवांत बने रहने के लिए अनेक प्रकार की असंख्य संम्भव असंभव अनेक प्रकार की जैविक अजैविक भौतिक रासायनिक ,राजनीतिक सामाजिक आर्थिक समस्या एं पैदा होने लगती हैं क्रमबद्ध तरीकों से सिलसिलेवार ,एक समस्या समाप्त होती है थोड़ी सी देर बाद दूसरी समस्या पैदा होने लगती है । जिनमें से कुछ समस्या ओं की हम अनदेखी अनसुनी करते हैं तो कुछ समस्याओं के हल करने में पसीने छूट जाते हैं कुछ भयंकर समस्याएँ ऐसी होती हैं कि जिनका हम हल नहीं कर पाते हैं तो उनके भयंकर प्रभाव को सहन नहीं कर सकने की स्थिति में हम अपना जीवन जीने की आशा छोड़कर जीवन त्याग दिया करते हैं आत्महत्या करके । लेकिन क्या आत्महत्या करने के बाद जीवन जीने की आशा इच्छा समाप्त हो जातीहै तो इसका जबाब ना में आता है ।मैंने अपने निकट के कई पुनर्जन्म केस का अध्ययन किया तो यह पाया कि जीवन जीव की अंतहीन यात्रा है जिसे पूरा करने के प्रयास में जीव बार बार मरता पैदा होता हुआ जीवन की विकास यात्रा में अनवरत जारी किए रहता है

दिन जीव का जीवन है रात्रि जीव की मृत्यु है ,यह जीव की एक दिन की पूरी नित्य जिंदगी है ।सभी जीव दिन निकलते ही जीवन धारण कर सक्रिय हो जाते हैं , जीव की नित्य सक्रियता उसका एक नया नित्य जीवन है । सभी जीव रात होते ही जीवन त्याग कर नित्य निष्क्रिय हो जाते है , निद्रा अवस्था मे ।जीव की नित्य निद्रावस्था उसकि एक नित्य मृत्यु है । उसी तरह से दीर्घकालीन सक्रिय निष्क्रिय युक्त जीव अवस्था जीवन है तो दीर्घकालिक अदृश्य भूत जीव अवस्था मृत्यु है ।। जैसे हम एक दिन रात के चौबीस घंटों के चक्र में सूर्य के प्रकाश में सक्रिय होकर जीवन को जीते हैं उसी तरह से रात्रि में सूर्य दर्पण चंद्रमा के प्रकाश में निष्क्रिय होकर निद्रावस्था में तंद्रा निद्रा सुषुप्ति स्वप्न अवस्था में जीते हैं ।जीव का पूरा प्रकाश में जीया गया जीवन एक दिन है और मरने के बाद प्रकाश हीन अंधकार में अस्तित्व हीन जीवन उस जीव की एक रात है ।।

जिन लोगों का ऊर्जा स्तर उच्च स्तरीय होता है वे अल्पनिद्राशील होते हैं जिनका ऊर्जा स्तर निम्न स्तरीय होता है वे दीर्घकालीन निद्रावान होते हैं ।परन्तु यह नियम जीवन क्षेत्र में बदल जाता है जिसमें उच्च ऊर्जा स्तरीय अधिक आयु वाले और निम्न ऊर्जा स्तरीय अल्पायु वाला जीवन जीते हैं । यह जो सक्षेप में लिखा है वह ब्रह्म/जीव की प्राकृतिक गति है ।जिसके अनुसार सभी सूक्ष्मजीव , कीट पशु पक्षी जीव , वनस्पति जगत जीव अपने जीवन को प्रकृति में प्रकृति के नियमानुसार प्राकृतिक जीवन जीते हुए अपने जीवन की सभी आवश्यक इच्छाओं में से न्यूनतम इच्छाओं को पूरा करते हुए जीते मरते हुए अपना जीवन जीते हैं एक निश्चित जीवनकाल में जीवन चक्र यात्रा में । कीट पशु पक्षी अपनी न्यूनतम आवश्यकता ओं को पूरा कराने के लिए प्रकृति नियंता पर पूरी तरह आश्रित/निर्भर हैं ।

जबकि मनुष्य अपनी अधिकतम आवश्यकता ओं इच्छाओं को पूरा कराने के लिए प्रकृति नियंता पर पूरी तरह से आश्रित/निर्भर नहीं है । यह उस मनुष्य के बुद्धि विवेक, चातुर्य, कौशल ,क्षमता दक्षता पूर्ण ज्ञान विज्ञानं कला शक्ति पर निर्भर करता है । जो जैसा अध्ययन ज्ञान विज्ञानं प्रज्ञानं प्राप्त करता है ।जैसे कला कौशल विज्ञानं पुरुषों गुरु जन से प्राप्त करता है उसकी उपलब्धता उसकी पात्रता परीक्षा पर निर्भर करती है। जिसके आधार पर उसकी सामाजिक प्रगति होती है।जिसके अनुसार वह साधारण पुरुष से उत्तरोत्तर प्रगति करता हुआ विशेष पुरुष (वि प्र ) नेता पुरुष , विधायक पुरुष , मनु पुरुष , युग पुरुष , इंद्र पुरुष स्तर तक जाता है अपनी समस्त इच्छाओं कामनाओं को लेकर पूरा करते हुए । जबकि पशुओं के मात्र दो प्रगति स्तर है साधारण पशु ,विशेष पशु स्तर ।पशुओं की इच्छाएं आवश्यकताएं कामनाएं न्यूनतम होती हैं जिन्हें वे अपने आप पूरा करने में समर्थ नहीं , स्वतंत्र नहीं हैं । वे अपनी इन दैनिक आवश्यकताओं को पूरी तरह से पूरा कराने के लिए पहले प्रकृति नियंता पर निर्भर हैं बाद में प्रकृति नियंता पुत्र मानव अनुकंपाओं पर निर्भर हैं ।

जबकि मनुष्य अपनी अधिकतम इच्छाओं आवश्यकताओं ,कामनाओं को अपनी अपनी सामर्थ्य बल पर पहले स्वयं पूरा कर लिया करता है बाद में शेष न्यूनतम इच्छाओं आवश्यकताओं कामनाओं को अपने समाज परिवार कुल नेता बंधुओं से पूरा करा लिया करता है । मनुष्य अपनी न्यूनतम इच्छाओं आवश्यकताओं कामनाओं की पूर्ति भी अपने मानव विश्व बंधु भगवान पुरुषों से करा लिया करता है ।आज का मनुष्य अपनी सभी प्रकार की इच्छाओं आवश्यकताओं कामनाओं की पूर्ति के लिए मनुष्य पर निर्भर करता है । वह प्रकृति नियंत्रण कर्ता पर भी निर्भर नहीं है उसने उस प्रकृति नियंता को भी अपने नियंत्रण में करने का उपाय खोज लिया है तंत्र विद्या द्वारा, पूजा अर्चना द्वारा, वैदिक स्तुति गायन वाचन द्वारा ।

ऐसे में हम कह सकते हैं कि सृष्टि में सभी कीट पशु पक्षियों वनस्पति योनियों में मानव जीवन ही श्रेष्ठ है यह अपनी इच्छाओं कामनाओं ,आवशकताओं को अपने आप या अपने कुल वंश जाति समाज धर्म संप्रदाय बंधु से पूरा करा लिया करता है ।जबकि पशु श्रेष्ठ सिंह योनिज जीव भी इसके सम्मुख अपना जीवन अपने आप जीने को विवश हैं ।इसे आप अजायब घर /प्राणी उद्यान से ,पशु पक्षियों के अभ्यारण्य से समझ सकते हैं कि मनुष्य ने पशु पक्षियों के जीवन पर दया /करूणा करते हुए उनके अस्तित्व को विलुप्त /पूर्ण नष्ट होने से बचाने/रोकने को प्राणी उद्यान, पशु पक्षियों के अभ्यारण्य बनाए हैं ।पशुओं पक्षियों पौधों ने मनुष्य की कहीं पर भी जीवन नित्यता क्षेत्रों में मनुष्य की सक्रिय होकर सहायता/मदद नहीं करी है ,मनुष्य ने पशु पक्षियों पौधों की भोजन से चिकित्सा से उनके जीवन क्षेत्रों में उनकी सहायता की है ,मनुष्य ने अपने बुद्धि बल चातुर्य से पशुओं पक्षियों पौधों से लाभ लिया है पशु पक्षियों पौधों ने स्वयं विवेक से मनुष्य की सहायता/मदद नहीं करी है । एंड्रोक्लीज और सिंह की कहानी पढ़ फिर से पढ़ लेना मानव जीवन की श्रेष्ठता का अहसास हो जायेगा ।

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