शिक्षा के प्रकारों की अगर हम बात करते हैं तो शिक्षा चार प्रकार की होती है आदर्शवाद शिक्षा को ईश्वर केंद्रित कर दिया गया है मेरे विचार से यह सही नहीं है जबकि मैंने यह पाया है पर उपदेश कुशल बहुतेरे लाइन के अनुसार जो लोग आदर्शवादी होते हैं आदर्शवाद की बात करते हैं उन लोगों का जीवन निजता में प्रयोजनवाद से परिपूर्ण होता है । जो अपने प्रायोजन को पूर्ण करने के लिए लोगों को सच ज्ञान उपदेश करते रहते हैं । लेकिन निजी जीवन में वह परम भोगा सख्त प्राणी होते हैं अब इसका दूसरा रूप विश्व की अधिकतर शिक्षा आदर्शवाद पर आधारित है । यह आदर्शवाद ईश्वर के द्वारा प्रेरित और शासक के द्वारा निर्देशित होती है । प्रशासक निर्देशित शिक्षा अधिक आदर्शवादी कही जाती है जिसको मानने समझने वाले प्राय दुखी रहते हैं वह कहते हैं ईश्वर के यहां न्याय नहीं है समाज में न्याय नहीं है जबकि वास्तविकता यह है कि उन्होंने न्याय अन्याय को समझा नहीं और अपने न्याय अन्याय को दूसरे मनुष्य के विचारों के अनुसार ग्रहण किया है ऐसे में जो शिक्षा दूसरे के विचारों के अनुसार में की जाएगी वह कैसा और कौन सा आदर्शवाद है यह मेरे दिमाग से बिल्कुल ऊपर जा रहा है मैं आदर्शवाद के कम पक्ष में हूं इसका विरोध इसलिए नहीं कर सकता क्योंकि इसके लिए मुझे ईश्वर और शासक दोनों से मोर्चा खोलना पड़ेगा मेरी इतनी सामर्थ्य नहीं है
यथार्थवाद आधारित शिक्षा का उद्देश्य सभी को एक समान शिक्षा सभी को एक जैसी शिक्षा और सभी को ग्रुप या समूह को एक जैसी दी गई सत्य शिक्षा समाजवादी शिक्षा यथार्थवादी शिक्षा कही जाती है जबकि किसी एक मनुष्य को उसके हित के अनुसार दी गई शिक्षा उसके हिसाब से यथार्थवादी है भले ही वह समाज के हिसाब से यथार्थवादी शिक्षा नहीं है। फर्क है , यह लाइन कहने में बहुत आसान लगती है लेकिन व्यवहार में बिल्कुल विपरीत उल्टा पलट है । यथार्थवाद के अनुसार मनुष्य को अधिकतम सत्य का ज्ञान होना चाहिए । सार्वभौमिक सत्य कल्पना सत्य मिथक सत्य है स्वप्न सत्य है निजी सत्य समूह सत्य
जैसे चिरकाल एक सार्वभौमिक सत्य जो समस्त स्थानों पर सदैव नियत रहेगा उसे सार्वभौमिक सत्य यूनिवर्सल ट्रुथ भी कहते हैं।। इसके बाद स्थान आता है अवसरवादिता का ःः सत्य मौके के अनुसार सच बोलो मौके के अनुसार जरूरत पड़े तो सच से बच जाओ इसके बाद आता है ।। काल्पनिक सत्य ऐसा सत्य है जिसे लोग अपने मत विचार के अनुसार बनाकर लोगों के सामने प्रस्तुत करते हैं ।। फिर आता है मिथ्या सत्य ऐसा सत्य जो कभी मौजूद था लेकिन आज वह मौजूद नहीं है उस पर विश्वास करना शक के दायरे में आता है इसे मिथक सत्य भी कहते हैं।। इन सब में बढ़ कर एक और सत्य भी होता है जिसे स्वप्न सत्य कहते हैं । जो किसी एक मनुष्य ने चाहे तो रात को सोते में देखा हो या जिस समय वह दृश्य देखा हो उस समय वह अलग अकेला हो उसके साथ कोई दूसरा ना हो ऐसे में वह जो भी कुछ बोलता है तो उसके वाक्यों को स्वप्न सत्य कहते हैं ।। और कहा जाता है कि तुम दिन में सपना देख रहे हो , जिसने सपना या दृश्य देखा है जब वह सपने में होता है उस समय वह उन दृश्यों को पूर्णता सत्य अनुभव करता है । और जब आंख खुल जाती हैं तो उन दृश्यों को कभी काल्पनिक , कभी मिथ्या ,कभी झूठा कहता है जबकि वह सब तो उसने जीवंत अदृश्य रूप में देखा था फिर झूठा कैसे हुआ स्वप्न सत्य की भी अपनी जगह एक प्रतिष्ठा है मूल्य है इसे भुलाया / झुंठलाया नहीं जा सकता ।। इसके बाद हित सत्य ऐसा सच बोलना जो स्वयं को लाभदायक हो अपने परिवार को लाभप्रद हो, अपने समूह को अपने ग्रुप को अपने जाति धर्म वालों को लाभदायक हो ःः और जो दूसरे लोगों का उनके परिवार का उनकी जाति का उनके धर्म का अहित करने में कुशल हो ऐसे सत्य को हितसत्य कहते हैं जब यह हित सत्य है अधिकतम लोगों के पक्ष में स्थित कारक होता है तो इसे इसे संवैधानिक सत्य भी कहा जा सकता है । जिसमें 1 वर्ग का लाभ होता है दूसरे की हानि होती है ऐसे में जिसका लाभ होता है वह हित सत्य में आता है और जिनकी हानि होती है वह अहित सत्य में आता है ।। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि यथार्थवादी शिक्षा सबसे बड़ा सपना है सबसे बड़ा असत्य है जब थाट के प्रभाव से अपने मन में ही अपने समूह में आपस में ही शंका संदेह पैदा होते हैं तो फिर यथार्थ का अर्थ यथार्थ का मतलब क्या रह गया ।
प्रत्येक मनुष्य को सत्य के विभिन्न परिवर्तित स्वरूपों का ज्ञान होना चाहिए । जबकि मेरे विचार से सत्य इतना भयंकर तम कृत्य है जिस का दर्शन करना जिस पर बोलना सत्य देखने वाले और सत्य बोलने वाले दोनों को इसकी बड़ी भारी कीमत चुकानी पड़ती है । संसार का परम सम्मानित शब्द पद है मां जब मां को कोई कहीं पर किसी की पत्नी रूप में देखता है तो उसे देखना आसान नहीं होता जब मां को किसी की मां बनते हुए देखता है तो मां को बनते देखना सहन करना असंभव है क्योंकि जब भी कोई मां बनती है तो वह अपनी पूर्व उत्पन्न संतति को शत्रु अधिक मित्र कम उत्पन्न करती है। जितने भी पुराने नबी संस्कृति पुरुष हुए हैं उनका जीवन अधिकतम दुखों से इसीलिए भरा रहा क्योंकि उन्होंने यथार्थवाद सत्यता पर लोगों को प्रेरित करने चलने का बल दिया लोगों ने उनको सत्य पर चलने को कहा और उन संस्कृति पुरुषों की समाज के लोगों से संघर्ष लड़ाई छिड़ी जिसमें कुछ लोग जीत गए कुछ लोग हार गए या मारे गए । सत्य में जीत उन लोगों की हुई जो सत्य के साथ असत्य झूठ छल प्रपंच को भी अपने जीवन में स्थान देते रहे । लेकिन उन लोगों की सत्य के सानिध्य में सत्य के संग में हार हुई जिन्होंने सत्य के साथ समझौता नहीं किया अपने सत्य को सर्वोच्च सर्वोपरि रखा परिणाम से उन्हें समाज के लोगों ने या तो मार दिया या मरने पर मजबूर किया या भागने पर मजबूर किया । ऐसा आप साहित्य में भी देख सकते सुकरात और दयानंद दोनों ने सत्य से समझौता नहीं किया नतीजा दोनों ही मारे गए । जबकि दूसरे संस्कृति पुरुष और विचारक जैसे राम कृष्ण कबीर तुलसीदास सूरदास आदि आजीवन सुरक्षित अपने जीवन को जिए उन्होंने सत्य के साथ व्यावहारिकता असत्य झूठ छल प्रपंच पाखंड को भी अपनाया और सत्य की अधिकतम हानि से बचे । वह जिंदा रहे । कहने में बड़ा सच्चा महसूस होता है लेकिन प्रकृति समाज सृष्टि में परिवर्तन के चलते जिसने धज्जियां इस यथार्थवाद की पूर्वी है उड़ रही हैं । उससे ज्यादा धज्जियां शायद ही किसी शिक्षा के प्रकार की हो । हम कभी भी यथार्थवादी शिक्षा नहीं ले सकते । ना ही यथार्थ वादी शिक्षा दे सकते हैं। क्योंकि हम बीते हुए समय में मौजूद नहीं थे। आने वाले समय में मौजूद नहीं रहेंगे । और जो वर्तमान समय में चल रहा है उस समय का हमको वह ज्ञान नहीं है कि हमारे ज्ञान से किए गए कर्म का फल हमारे भाग्य में कितने अंश में आएगा या हमारे कर्म कर्मफल को दूसरे लोग हमारे बिना मर्जी के कितनी अधिक मात्रा में ग्रहण कर लेंगे और हमारे कर्म करने के बाद भी वे अकर्मण्यता लोग परम कर्ता , सकर्ता , फल पकड़ता सिद्ध होंगे और जिन्होंने कर्म नहीं किया होगा वह कर्म फल प्राप्त सिद्ध होंगे ऐसे में यथार्थवादी ज्ञान क्या है इसका भी निर्णय नहीं हुआ है। । ऐसे में यथार्थ है ? क्या बिना यथार्थ है ? इस यथार्थ का निर्धारण करना कठिन है :-ःः हम कुछ बीते हुए पुराने काल की धारणाओं को ही जो तिथि पूर्ण हैं उन धारणाओं को यथार्थवादी सत्य धारणा मान सकते हैं परंतु जो धारणाएं अतिथि हिना है जिन धारणाओं के समर्थक संसार में अत्यंत कम है ,कमजोर हैं । ऐसे ही अतिथि धारणाओं को कमजोर लोगों द्वारा कही गई बातों को हम झुंठलाया करते हैं , विठला देते हैं ।यह यथार्थ नहीं है ऐसा कहते हैं ।। ऐसे में पूर्णतया यथार्थवाद जीवन में शिक्षा में किसी भी क्षेत्र में असंभव है ।
प्रकृतिवाद प्रकृति प्रदत्त शिक्षा ःः प्रकृति हमें शिक्षा देती बात कही जाती है । यह कहना बहुत आसान है प्रकृति प्रदत्त शिक्षा हमें अपने गुरुजनों गुरुजनों वृद्ध जनों से प्राप्त होती है जिसमें उन पूर्वजों के पास खुर्ददु पुराने समय के तजुर्बे अनुभव होते हैं जो वर्तमान समय के अनुसार मिलान करके अपनी आने वाली पीढ़ी को बताए जाते हैं । यह कहना आसान नहीं की प्रकृति हमें क्या शिक्षा दे रही है क्योंकि हम वर्तमान में जीते हैं प्रकृति कभी भी वर्तमान में नहीं रुकी रहती है , प्रकृति सदैव भविष्य की ओर चलती है । हमारी शिक्षा सृष्टि के बीते समय फर्स्ट /पूर्व काल के आंकड़ों का वर्तमान काल के तथ्य आंकड़ों से मिलान प्रकृति काल पर आधारित कहा है । ऐसे में प्रकृति वादी शिक्षा के बारे में हम जो भी अनुमान लगाते हैं जो भी बात करते हैं वह पुराने समय की भूतकाल में बीती गई होती हैं ।जिनका वर्तमान समय से मिलान तारतम्य बिठाने की कोशिश हमारी गुरुजन पीढ़ी वैज्ञानिक पीढ़ी करती है । वैसे भी प्रकृति प्रदत्त शिक्षा बच्चों को नहीं दी जा सकती क्योंकि कोई कोई अनुभव प्रकृति का इतना भयंकर होता है कि उसे बताने के लिए समझाने के लिए लोग नहीं बचते जैसे भूकंप के दौरान मरेलोग तूफान के दौरान मरेलोग इसके अलावा अनेकों प्राकृतिक आपदाएं आती हैं जीवन में अनेकों प्राकृतिक दुर्घटनाएं करती हैं । सभी कुछ प्रकृति के अधीन चल रहा है लेकिन फिर भी हम किसी के बारे में कुछ भी निश्चित तौर पर नहीं बता सकते जैसे वर्तमान समय में कोरोना जैसी महामारी विज्ञान की नजर में तो नहीं है लेकिन हमारे पुराने आयुर्वेद के अनुसार सारंगधर अनुसार यह उग्रवाद विकार है जो लोग उग्रवाद आज भोजन करते हैं उन्हें अवश्य ही भयंकर वाटर रोग वायरस जनित व्याधियों का शिकार करना पड़ता है ऐसे में प्राकृतिक शिक्षा सिर्फ एक अनुमान सिद्ध होती है । जैसे वायरस अब तक चार रंगरूप आकार अपने बदल चुका है । आदमी का कोई पता नहीं कब आदमी अपना रूप बदल ले उसकी क्या प्रकृति का भरोसा पशु का पता नहीं वह कब अपना रूप बदल उसकी प्रकृति का क्या भरोसा अब हम प्रकृति की चर्चा करते हैं जो पहले थे वहां आज जनाब आदि मौजूद है ऐसे में हम कैसे कह सकते हैं कि प्रकृति स्थित अस्थाई है तो जो स्थिर स्थाई नहीं उसकी शिक्षा पर विश्वास करना उचित नहीं भयंकर है
प्रयोजनवाद आदर्शवाद के अनुसार वह शिक्षा दी जाती है जो हम चाहते हैं भले वह शिक्षा शिष्य को यह सीखने वाले को हितकारी हो या ना हो या उसका हित करें या अहित करें लेकिन प्रयोजनवाद शिक्षा में यह तय है कि हित प्रथम तो गुरु का अवश्य होगा , वित्तीय शिष्य का भी हित अवश्य होगा क्योंकि यह दुनिया यह जीवन प्रायोजन के अधीन है हर कोई अपनी मनमर्जी चाहता है कि उसकी मन मर्जी के अनुसार सृष्टि समाज संस्कृति चले जिससे उसके अधिकतम मनोरथ पूरे हो और ऐसा प्रयोजनवाद से ही संभव है ऐसे में गुरु श्रेणी को पीढ़ी को नियंत्रित करते हुए हमें ऐसी शिक्षा देने के लिए गुरुजनों को बाध्य करना होगा प्रेरित करना होगा जो शिक्षा उनके शिष्यों को उचित हो उनके शिष्यों के अधिकतम मनोरथों को पूरा करें भले ही उसके लिए उन्हें कैसे ही घनिष्ट थम निकटतम क्रूर तम जीवन तक चलाने पड़े , अहित कर दें यथार्थवाद के अनुसार वह शिक्षा शिष्य को यह सीखने वाले को मिलनी चाहिए जो वह चाहता है जो उसने देखा है जो सच्चाई है प्रकृतिवाद के अनुसार शिक्षा को सीखने में बहुत समय लगता है और कोई कोई अनुभव ऐसा भी होता है कि वह शेयर नहीं किया जा सकता या शेयर करने से पहले अनुभव करने वाला मर जाता है प्रयोजनवाद के अनुसार शिक्षा मतलब परस्त होनी चाहिए जिसको जो शिक्षा चाहिए उसे वहीं शिक्षा मिलनी चाहिए ना कि शिक्षा को किसी के ऊपर थोपा जाना चाहिए इस पर मैं तो यही कहूंगा कि समाज को शिष्य को चारों प्रकार की शिक्षा के वादों की विवेचना एक ही समय में एक ही जगह पर एक ही स्थान पर बिठा कर दी जानी चाहिए जिससे शिष्य अधिकतम सत्य को सीख सकें और अहित से प्रभावित होकर अधिक दुखी ना हो ।
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