दर्शनशास्त्र क्या है?


दर्शनशास्त्र के अनेकों प्रकार हैं ।प्रथम प्रकार में वर्तमान में इसे पीएचडी कहा जाता है जिसमें मनुष्य को अपने व्यापक अध्ययन के अनुसार एक अपना अलग से विचार संग्रह स्रोत थीसिस या फिलासफी लिखनी होती है जिसकी उसे अपने गाइड से पहले ही गाइडलाइन मिल जाती है जिनके अनुसार वह अपना दर्शन फिलासफी लेक्चर लिखता है ।

परंतु भारतीय दर्शन के अनुसार यह अलग है प्रथम भारतीय दर्शन में 6 मुख्य दर्शन है कणाद का विश्लेषक दर्शन , गौतम का न्याय दर्शन , जैमिनी का मीमांसा दर्शन , पतंजलि का योग दर्शन, समाज दर्शन ,कपिल का सांख्य दर्शन और 16 अलग से अतिरिक्त दर्शन ग्रंथ नंदी का कामसूत्रम दर्शन नेत्र दर्शन नेत्र किस प्रकार देखते हैं श्रवण दर्शन कान किस प्रकार सुनते हैं नासिका दर्शन नाक किस प्रकार गंध अनुभव करती है दिव्य दर्शन जीव किस प्रकार बोलती है हस्त दर्शन हाथ कैसे कार्य करते हैं पैर दर्शन पैर किस प्रकार कैसे चलते हैं इसी प्रकार से जितनी भी अलग-अलग इंद्रियां है उन सभी के अपने-अपने अनुसार अलग-अलग कार्यप्रणाली है जिसके आधार पर वह दर्शन ग्रंथ लिखे गए हैं जिनके मैं लेखकों के नाम भूल गया हूं इसके अलावा प्राचीन समय के जो विद्वान हुए हैं जिन्होंने समाज को नियंत्रित करने वाले विभिन्न स्मृति ग्रंथ लिखे हैं जिनकी संख्या 50 से ऊपर है जिनमें से मुख्य नाम गौतम और सुना याज्ञवल्क्य मनु बौधायन ऑनलाइन आदि अनेक हैं उनके विचारों का संकलन विचारों की कार्यप्रणाली उनके विचारों के अनुसार उनके नाम के दर्शन के अनुसार कही जाती है।

लोक दर्शन जो विभिन्न मनुष्यों ने अपने विचारों के अनुसार अपनी शिष्य मंडली बनाई लोगों को विचार दिए वह लोग दर्शन के अंतर्गत आता है जबकि लोक दर्शन के अंतर्गत मनुष्य तरह-तरह के स्थानों पर भूमि में भ्रमण करते हैं उन स्थानों को देखते हैं उसके बाद वहीं स्थानों को अपनी डायरी में लिखते हैं जो संस्मरण कहे जाते हैं इससे लोक दर्शन किया उस स्थान विशेष का दर्शन कहते हैं जो सिर्फ कलम से शब्दों में लिखने से दूसरे लोग अपनी कल्पना शक्ति से कर सकते हैं ।

इसके अलावा लोग दर्शन विभिन्न लोगों के जो पहले प्रख्यात हो गए थे जैसे चार्वाक आदि उनके अपनी अलग विचारणा विचार पद्धति अलग विचार धाराएं हैं जिनसे लोग सहमत होकर उनके विचारों के अनुसार अपना जीवन जी रहे हैं।

इसके अतिरिक्त तरह-तरह के जितने भी मंदिर हैं सभी मंदिर दर्शनशास्त्र पर आधारित हैं जैसे नेपाल का पशुपतिनाथ मंदिर इस विचारधारा पर आधारित है कि समस्त विश्व के मनुष्य पशु प्राणी पौधे सभी पशु है और उन्हें नियंत्रित करने का कार्य पशुपतिनाथ भगवान शिव करते हैं ।तो केदारनाथ दर्शन के अनुसार भगवान शिव अपने विभिन्न देवी देवताओं के रूप में समस्त जग में विद्यमान हैं और उनका एक विशेष स्वरुप यमदूत वाहन भैंसे का भी है जो समस्त भूमि में समाया हुआ है जिसके अनुसार वह समस्त भूमि को भूमि के अंदर से रहते हुए कभी कम पाए मान करते हुए चलते हैं तो कभी अपने पीठ पर समस्त भूमि को रखकर मंदी मंदी प्रिय चाल से चलते हैं ।अर्थात समस्त विश्व को भगवान केदारनाथ ही चला रहे हैं । बद्रीनाथ मंदिर दर्शन के अनुसार समस्त भूमि को भगवान शिव के सहायक नाग देवता नियंत्रित किए हुए हैं ।

देवी दर्शन विचारधारा के अनुसार मनुष्य को इस प्रकार से मोटिवेट या प्रेरित किया गया कि वह समस्त विश्व की पुरुषों की अनुपूरक कृति नारी को कमजोर अबला रूप में देखने के बजाय नारी को सबल समर्थ श्रेष्ठ श्रृद्धेय रूप में देखें और नारी के प्रति अपनी विचारधारा विचारणा बदले , जो नारी में विशेषताएं हैं उन नारियों की विशेषताओं से लाभ उठाएं । इस प्रकार से स्त्रियों की व्यापक विशेष गुण विवेचना करके तरह-तरह की देवियां श्रेष्ठ स्त्रियों की कल्पना की गई और वहां से नारी दर्शन का सूत्रपात हुआ है ःःःः इस प्रकार से जो मनुष्य नारियों या स्त्रियों को भलीभांति देखना समझना सीख जाता है वह स्त्रियों से भली-भांति तरह-तरह के लाभ उठाने में समर्थ हो पाता है जो स्त्रियों के बारे में तरह-तरह की गलत धारणा है जैसे नारी निंदा नारी दूर्व्यवहार आदि सीख जाता है वह नारियों की विशेषताओं से परिचित ना होने के कारण नारियों के द्वारा प्राप्त संचित भोग पदार्थों का भोग नहीं कर पाता । क्योंकि महर्षि मार्कंडेय ने लिखा है विश्व के समस्त भोग की स्वामिनी स्त्रियां ही हैं पुरुष नारियों के पास लघु स्वरूप पुत्र ,भाई सेवक बनकर ही स्त्रियों के पास उपलब्ध भोग सामग्री का उपयोग उपभोग कर सकता है । जबकि पुरुष के बृहद रूप जैसे पिता पति आदि रूप हैं उनमें आते ही नारी उन पुरुषों का शोषण करना शुरू कर देती है। जो लोग समर्थ समृद्ध स्त्रियों को नहीं पहचानना देखना सीख समझ पाते वे आजीवन अपना जीवन अकेले बाबाजी बनकर एकांकी होकर जीते हैं । उनके लिए नारी दर्शन की परिकल्पना ऋषि मार्कंडेय ने की है जिसे महर्षि जैमिनी ने लोकहित के लिए मार्कंडेय पुराण बनाकर प्रचलित किया । जिसमें महिलाओं की तरह तरह की देवी मूर्तियां बना कर उन स्त्रियों के प्रभाव का परिचय प्रतीक विवरण किया । इसी प्रकार से अनेक मंदिरों की स्थापना उस मंदिर के एक मुख्य विचारधारा पर निर्भर है ।

इस प्रकार दर्शन के अंत में एक लाइन यही आती है कि दर्शन वह विचार है एक जीवांत जीव का निजी जीवन दर्शन है जो जिसने देखा सुना और उसी क्षण ग़ायब हो गया जो किसी एक मनुष्य ने देखा और उसी तरह गायब हो गया अर्थात दर्शन मिट गया । लेकिन जब वह विचार वह दृश्य किसी एक मनुष्य ने देखा दूसरे मनुष्य को दिखाया और उस मनुष्य ने अपने दर्शन श्रृंखला बना दी और वह दर्शन संख्या निरंतर चली आ रही है वह उस व्यक्ति के नाम के उसका नाम दर्शन कहा जाता है जैसे गांधी दर्शन नेहरू दर्शन ( भारत में ) बौद्ध दर्शन ( चीन में )हिटलर दर्शन (जर्मनी में ) रूस में ( लेनिन दर्शन , कार्ल मार्क्स दर्शन ) इंग्लैंड में ( चर्चिल दर्शन ) अमेरिका में ( वाशिंगटन दर्शन ) फ्रांस में (रोम्यांरोला फिलासफी ) जर्मन में ( नीत्से /नाजी दर्शन ) चीन में ( कन्फ्यूशियस फिलासफी ) इस प्रकार से अनेक प्रकार के असंख्य विचार ही दर्शन है जब वह विचार संकलित करके शब्दों के रूप में किताब में लिखकर पढ़ाए जाते हैं तो उन संकलित विचारों को दर्शन शास्त्र कहते हैं

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