"वामपंथ जहां भी जाता है वहांं के सारे उद्योग धंधे बंद हो जाते हैं।" इसका क्या कारण है?

 


सभी जीव पशु मानव कीट आदि अपना अपना जीवन जीने के लिए दो तरीक़े अपनाया करते हैं । पहला आज्ञाकारी तरीका जिसमें वे शासन और स्वामी और समाज /मानव समूह संचालक के नियंत्रण में रहते हुए समाज भय स्वामी भय शासन भय से उसकी आज्ञा का पालन करते हुए जीते हैं । दूसरा तरीका अवज्ञा कारी तरीका है जिसमें वह पशु और मनुष्य अपने शासन और स्वामी /सभ्य मानव समूह की अवज्ञा करते हुए मौत से पंगेबाजी करते हुए अपने जीवन को निर्भय /निडर /आक्रामक स्वभाव से सभी का विरोध करते हुए अपना जीवन जीते हैं। यह विपरीत मति गति से जीवन जीने की कला वामपंथी जीवन धारा कहीं जाती है । इस वामपंथी जीवन विचारधारा को चंद्र गति के अनुसार छलियापन से दोहरा चरित्र व्यवहार अपनाते हुए वामावर्त गति से जीवो का जीवन जीना कहते हैं ।

यह विचारधारा का उदय भारत में आदि काल से है जिसे जीवो का छलिया पन से जीवन जीना , या जीवो का बिना श्रम परिश्रम किए , मानव समाज को सहयोग /उपयोग दिए बिना मानव समाज से समृद्धि हासिल करना वाममार्गी पद्धति से जीवन जीना कहा जाता है । इसे चोर मति गति से जीवन जीना भी कहते हैं ऐसे लोग मानव समाज को कुछ भी सहयोग नहीं किया करते हैं और समाज के सुखी समृद्ध लोगों की आर्जित धन सम्पत्ति को अपना समझते हुए दूसरे लोगों की संचित आर्जित धन संपत्ति का उपयोग /उपभोग किया करते हैं । इस चोर पद्धति से जीवन जीने की कला विज्ञान का वर्णन चाणक्य के प्रसिद्ध ग्रंथ पंचतंत्र , और रावण के उडीसतंत्र में मिलता है जिसमें रावण की शिक्षा दीक्षा के पश्चात रावण ने असुर गुरु शुक्राचार्य उसे बताते हैं कि रावण मेहनत परिश्रम पशु किया करते हैं बुद्धिमान मनुष्य तो मूर्ख मनुष्यओं , पशुओं , पक्षियों , कीट पतंगों के परिश्रम के फल को चुराकर छीन झपटकर, उन्हें मारकर खाया करते हैं रावण मनुज बन पशुज मत बन , दूसरे मेहनती लोगों के परिश्रम का लाभ उठाना सीख । अतः वाममार्गी सोच के लोग दूसरों से लड़ झगड़ कर उनकी धन संपत्ति पर अपना अधिकार समझ कर जीवन जीने को वामपंथीजीवन विचार धारा कम्युनिस्ट पद्धति से जीवन जीना कहते हैं।

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