मेरे हाथ के दाहिने हाथ में जीवन रेखा थी जो पहले हथेली की ओर आधी अधूरी टूटी हुई अलग अलग थी जोशी ने बताया था कि यह समय जीवन का निर्णायक फैसला करेगा अर्थात इस आयु पर जीवन पूरा होने की संभावना है । लेकिन जीवन बच भी सकता है ।
लगभग 50 साल की आयु के पश्चात अचानक पारिवारिक परिस्थितियां बुरी तरह से विपरीत हो गई पूरे 2 साल मैं बुरी तरह अवसाद में घिरा रहा ।लेकिन जब परिस्थितियां ठीक हुई लेकिन अवसाद /डिप्रैशन ठीक नहीं हुआ था । तो तब मैंने देखा कि मेरे हाथ की हथेली पर जीवन रेखा जो अधूरी थी वह जुड़ गई थी ।इसके अलावा जीवन रेखा का दूसरी सहायक रेखा बन गई थी जो चंद्र पर्वत तक बड़ी हो गई थी । ज्ञानरेखा जो पहले बृहस्पति पर्वत तक जाती थी अब वह छोटी होकर सूर्य बिंदु तक रह गई है ।
कहने का तात्पर्य यह है कि हथेली की रेखाएं स्थिर नहीं होती यह मानसिक विचारों के अनुसार , सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार , सोच दृष्टिकोण ,नजरिया बदलने के अनुसार बदलती रहती हैं । ऐसे में जीवन रेखा को अंतिम प्रमाण मानकर या हथेली की किसी भी रेखा को अंतिम प्रमाण मानकर अपनी सोच बदल देना समझदारी नहीं है । इतना ही नहीं पहले मेरे हाथ में शादी की दो रेखाएं थी । लेकिन अब एक रेखा मिटकर आधी रह गई है ।इसके अलावा शुक्र जाल के ऊपर अंगूठे से नीचे पूरी तरह से असंख्य रेखाएं थी वह भी अब धीरे धीरे कम हो गई हैं इसके अलावा मेरे हाथ में अनेक सम्मानित निशान जैसे योनि (इंद्रत्व सूचक) (उच्च ऊर्जा सूचक ) ध्वज( विशेष ध्यान सम्मान ) सूचक निशान थे यह निशान अब बदल गए हैं शरीर में हाथ में ध्वज का निशान बचा है योनि का निशान जो इंद्र सूचक उर्जा उच्च स्तर की पहचान था वह गायब हो गया है क्योंकि अब आयु 58 वर्ष हो चुकी है जाहिर है ऐसे में शरीर में ऊर्जा स्तर गिर गया है अतः हाथ की हथेलियों की रेखाओं पर मैं यह कहूंगा कि यह हाथ की रेखाएं बदलती रहती हैं। समय के अनुसार आयु के अनुसार परिस्थितियों के अनुसार सोच विचार दृष्टिकोण नजरिया के अनुसार ।
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