सभी जीवो के अंदर उन सभी जीवो का नियंता मूल जीव वृत्ति धारक आत्मा जो निर्विकार निष्कर्म ब्रह्म कहा जाता है । वह सांसारिक व्रतियों से लिप्त नहीं होता ह ।ऐसे में आत्मा के ऊपर जब मूल प्रति का आवरण चढ़ जाता है तो वह प्राण कहा जाता है।। प्रत्येक जीव प्राण धारण करने से प्राणी है स्वतंत्र है समान है तो फिर यह प्राण धारण में असमानता कैसी ? माता-पिता गुरु यह भी प्राण धारी हैं । जिन्होंने पहले प्राण धारण किए थे । और इनके बाद में पुत्र पुत्री शिष्य यह भी प्राण धारी है जो बाद में प्राण धारण करेंगे । किस प्रकार से ब्रह्म अंश आत्मा एक पीढ़ी से जब दूसरी पीढ़ी में जाता है ? जब आत्मा के उसके ऊपर दूसरी पीढ़ी के लिए आवश्यक अर्जित वृत्तियों का आगवरण चढ़ जाता है ।अर्जित वृत्ति आवरण के अनुसार सभी जी अपने माता पिता गुरु के आज्ञा निर्देश के अनुसार जीवन जीते हैं ।।
अब आप के सवाल पर आते हैं इसका सही जवाब मार्कंडेय पुराण में लिखा है जिसके अनुसार जब रौच्य ऋषि पूर्ण ज्ञान से युक्त हो गए उन्हें वैराग्य आ गया , उन्होंने कर्म छोड़ दिया तो उनके पितर कुल के जाति के अन्य कुल पीढ़ी के बड़े लोगों को चिंता हुई और उन्होंने रौच्य के ज्ञान को उसके निकम्मे पन वृत्ति के लिए गलत बताया । कुल पितर बुजुर्ग वृद्ध जनों ने समझाया ।उन्होंने कहा राज्य तुम जो यह ज्ञानी बन कर ज्ञानियों का ढोंग करके कर्म छोड़कर निकम्मे वैरागी बनके अपने आप को महान समझ रहे हो । तुम महान तो क्या तुम तो अधम /पतित कहलाने लायक भी नहीं हो । कारण कि संसार में अधम /पतित लोकों में स्थित जीवों की भी वंशावली होती है ।उस वंशावली में ऊपर वाले जीव पीढ़ी नीचे वाले जीव पीढ़ी की रक्षा सुरक्षा ज्ञान देकर करते है । तो नीचे वाली वंशावली पीढ़ी ऊपर वाली और मध्य वादी वंश पीढ़ी की रक्षा सुरक्षा जीवन भोग्य पदार्थ देकर करती है ।अपने पूर्व पीढ़ी के प्रदत्त ज्ञान पर आधारित कर्म से वह भोग्य पदार्थ उत्पन्न करती है ।अर्थात पुत्र ही वृद्ध अशक्त अवस्था में अपने पिता पुरुष माता स्त्री मनुष्य को संसारिक भोजन भोगने योग्य न होने पर भी भोग प्रदान कराता है ।
इसी प्रकार से शिष्य भी मनुष्य का औरस पुत्र ना होकर मानस पुत्र होता है जो मनुष्य के मानसिक विचारों के अनुसार अपना निर्माण गुरु के विचारों के अनुसार करता है गुरु की शिक्षा के अनुसार , वह अपना जीवन श्रेष्ठ बनाने के लिए गुरु ज्ञान के आधार पर खुद को तैयार करता है। शिष्य का जीवन श्रेष्ठ हो जाता है तो वह बाद में समय-समय पर वृद्ध गुरु को उचित भोग पोषण पदार्थ देकर अपने गुरु के जीवन की रक्षा सुरक्षा करता है ।
रौच्य तुम्हें इतना विवेक नहीं सभी जीव जो दुनिया में आते हैं । वह अपने जीवन जीने की लालसा में लालच में अपने जीवन दाता प्रथम अन्नदाता माता के दूध के आश्रित होने से वह माता का मानसिक गुलाम ऋणी हो जाता है जब वह माता से बली पिता से अपने जीवन की रक्षा होते हुए देखता है तो जीवन रक्षा कारण से पिता का मानसिक गुलाम ऋणी होता चला जाता है ।और इसी प्रकार जब माता पिता से भी ज्यादा श्रेष्ठ जीवन गुरुजी को जीते हुए देखता है तब जीवन सहायक ज्ञान दाता गुरु के शब्द जाल ज्ञान ऋण में फंसते चले जाते हैं । जो मनुष्य इन माता पिता गुरु के ऋण को मरने से पहले नहीं उतारता है ।वह माता पिता और गुरु का ऋणयुक्त होकर मरता है । ऐसे में जब तक माता का अन्न ऋण , ऋण पिता का रक्षा ऋण , गुरु का शब्द ज्ञान ऋण नहीं उतरता है तब तक वह इस सृष्टि में बार-बार इनके ऋण को उतारने के लिए सृष्टि पशु अज्ञानी मानव बनकर पैदा होता रहता है ।
अतः यदि सृष्टि में मोक्ष की कामना करते हो तो पूर्ण मोक्ष के तुमको अपनी वंश बेल वंशावली चलाने के लिए पुत्र पुत्री और शिष्यों को उत्पन्न करना पड़ेगा । मनुष्य के लिए लिए माता का ऋण पुत्री के द्वारा , पिता का ऋण/कर्ज पुत्र के द्वारा , और गुरु का ज्ञान ऋण / कर्ज शिष्य के द्वारा उतार कर ही मनुष्य समाज के तीनों प्रमुख देव माता पिता गुरु ऋण से देवों के ऋण सेमुक्त हो सकता है ।।इसके अलावा मनुष्य को जीवन जीने के दौरान जितने लोगों की सहायता पड़ती है जो जो मनुष्य की सहायता करते हैं मनुष्य उन सभी जीवो के पशुओं के ऋण के जाल में फंसता चला जाता है ।ऐसे में सांसारिक ऋण जाल से वही व्यक्ति उऋण हो सकता जो दान शील हो जिसमें देवत्व हो देने की भावना हो जिस पर किसी का जीवन का जैविक पदार्थ ऋण शेष नहीं है। वह पूर्ण मोक्षमार्ग का पात्र होता है ।और जिस में लेने का गुण हो , मुफ्त खोरी की आदत हो ,फोकट पन की सोच हो लूट कसोट का धर्म अपनाता हो तो ऐसा असुर धारी जी संसार चक्र में बार-बार आता जाता पीड़ा देता पाता रहता हैःः।
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