भभूति और भस्म में क्या अंतर होता है?

 भभूति या भभूत गोबर या कंडे को जलाने से बनी हुई राख /एश को कहते हैं ।भभूत/भभूति का रंग ग्रे या कालासफेद होता है भभूत/भभूति गोबर के उपलों / डंगकेक एक बार जल जाने पर बन जाती है इसे बार-बार नहीं जलाकर बनाया जाता ।

जबकि भस्म मैं जैविक अजैविक रासायनिक औषधियों को गोबर के उपले या कंडों के दहर/दहारे के बीच में लम्बे समय तक रखकर जलाया जाता है।भस्म का रंग सफेद होता है।भस्म बनाने में औषधि को बार-बार कंडों के बीच में रखकर चलाया जाता है जितनी बार औषधि को कंडों के बीच में रखकर चलाया जाता है उतनी बार भसमें बनती हैं और भस्म की पुटिया शक्ति बढ़ती चली जाती है। यह दहर में बनी पुटकी शक्ति के आधार पर बनाई जाती है । यदि एक बार के जलाने से भस्म बन गई है तो एक पुट्टी भस्म कही जाती है । उसके बाद दो बार जलाने पर सुधरी हुई दो पुटी भस्म । 10 बार जलाने पर और सुधि हुई दस पुटीभस्म , 100 बार जलाने पर सुधि शतपुटीभस्म और एक हजार बार जलाने पर शोध कर बनी भस्म सहस्त्र पुटी भस्म कही जाती है ।

इस प्रकार से भभूत और भस्म में बहुत अंतर ह। प्रायः बाबा लोग सर्दी के समय में ठंड से बचने के लिए अकारण कंडे / उपले जलाते रहते हैं तापते रहते हैं इससे बनी राख भस्म भभूत कही जाती है । जबकि जो भस्म शब्द है आयुर्वेद के अनुसार औषधि का पृथ्वी काअग्नि सारअंश होता है।जिसे विशेष प्रशिक्षित वैद्य लोग अपने गुरु के चिकित्सक के निर्देशन में बनाते हैं यह वैद्य लोग विभिन्न जीवों के शरीर को जीवांश को जलाकर जैविक भस्म में बनाते हैं । कीमियागर /रासायनिक /कैमिस्ट लोग तरह-तरह के रसायनों को जलाकर तरह-तरह की रासायनिक भस्म बनाते हैं जिनका उपयोग चिकित्सा निदान में किया जाता है।

कुछ जैविक भस्म जैसे श्रंग भस्म वायु विकार में काम ली जाती है । अस्थि भस्म और शंख भस्म का उपयोग शरीर में गर्मी कम होने पर ,कैल्शियम की कमी होने पर किया जाता है । स्वर्ण भस्म ( रासायनिक भस्म ) वृद्ध अवस्था में सांप काटने पर अंतिम समय में उपयोग की जाती है। दादुर भस्म ( जैविक भस्म ) और कुक्कुट भस्म ( जैविक भस्म) का उपयोग टीवी के रोगमें किया जाता है ।छिपकली की भस्म का उपयोग असाध्य व्रण या भरिया फूटा असाध्य व्याधि में किया जाता है। मकरध्वज भस्म मगर के लिंग से बनाई जाती है जो वृद्धावस्था कामभावना हीनता में उपयोग होती है । लौह भस्म रक्त हीनता एनिमिया में उपयोग होती है। मोती भस्म त्वचा विकार फोड़ा फुंसी एक्जिमा में उपयोगी है। हीरा भस्म का भी उपयोग शरीर के गलने की व्याधि गैंगरीन में किया जाता है। पारद पारा भस्म ,वंग /टिन भस्म, लैड भस्म ,तांबा भस्म , जस्ता भस्म आदि भस्म का उपयोग वैद्य रोग की अंतिम अवस्था में या वृद्ध लोगों पर किया जाता है। जब स्वरस चूर्ण आसव क्वाथ काढ़ा फंट अवलेह /हलुआ औषधीय रुप कार्य नहीं कर पाता है।

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