क्या भारत में शिक्षा का स्तर इतना गिर गया है कि भारत में ही रहने वाले ज्यादातर लोगों को यहाँ शिक्षा ग्रहण करने में शर्मिंदगी होती है?


  1. आपके प्रश्न का जवाब मूलतः भारतीयों की पुरानी अवधारणा में छुपा है । अतिथि देवो भव ःः अर्थात अज्ञेय, अज्ञात अतिथि देवता होता है ।। अतिथि जो अज्ञात होता है और निकट आने पर ज्ञात होता है वह जो बोलता है उसके वाक्य को ज्ञान कहा जाता है । इसी अवधारणा को लेकर हम भारतीयों की एक सामान्य सोच बन गई है । '' घर का जोगी जोगड़ा आन गांव का सिद्ध ,, जो पास में रहता है जो हमारा है जिससे हम परिचित हैं वह कुछ नहीं जानता । जो दूर रहता है जिसे हम नहीं जानते हैं वह विद्वान हैं । वह ज्ञेयः है । हमें उससे अवश्य सब कुछ जानता है । अपनी इसी धारणा के आधार पर हम विदेशियों से आए ज्ञान को श्रेष्ठ समझते हैं ।और स्वदेशी लोगों घर कुल के लोगों से निकट सदस्यों से प्राप्त ज्ञान को अश्रेष्ठ समझते हैं । इस धारणा में चार चांद तब और लग जाते हैं जब हमारे शिक्षा वर्ग के शासकीय कर्मचारी भी विदेशी शिक्षा शिक्षक संस्कृति के सम्मुख बिना पढ़े बिना समझे विदेशियों की अज्ञात भाषा के प्रभाव से नत मस्तक होकर विदेशी ज्ञान को श्रेष्ठ कहते हैं। 

शिक्षा मूल रूप से 4:: प्रकार से ग्रहण की जा सकती हैःः नंबर 1:- निजी शिक्षा इस शिक्षा में व्यक्ति अपनी सुविधा अपनी आवश्यकता अपने समय के अनुसार शिक्षा ग्रहण करता है यह शिक्षा अधिकतम सकारात्मक परिणाम देती है नंबर 2:-पारिवारिक शिक्षा यह शिक्षा मनुष्य अपने परिवार समाज के परिवेश में विभिन्न लोगों से परिवार के लोगों से मित्र मंडली से धार्मिक लोगों से राजनीतिक लोगों से तरह तरह की शिक्षा लेता है जो जैसी शिक्षा लेते हैं उसी शिक्षा के अनुसार उसी लाइन में चलते चले जाते हैं इस शिक्षा के परिणाम भ्रमित प्रकार के होते हैं सकारात्मक नकारात्मक मिश्रित शिक्षा ।नंबर 3 :-पर शासन प्रदत या संगठन प्रदत शिक्षा यह शिक्षा तरह-तरह के शिक्षा बोर्ड के द्वारा सरकार के मानक माध्यम पाठ्यक्रम के अनुसार दी जाती है जो संभावना पर निर्भर है जैसे यदि व्यक्ति की सोच सकारात्मक है और उसे संगठन में सकारात्मक सोच के लोग भी मिलते हैं सकारात्मक पाठ्यक्रम पड़ता है तो वह व्यक्ति प्रगति करता है यदि व्यक्ति की मौलिक सोच नकारात्मक है ऐसे में वह बोर्ड और शासन की दी गई शिक्षा को ठीक तरह से नहीं स्वीकार करता है । उसमें कमियां निकालते निकालते वह सिस्टम की सोच से अलग चला जाता है परिणाम तः वह सिस्टम और बोर्ड की परीक्षाओं में फेल हो जाता है। जिससे उसमें नकारात्मकता का प्रतिशत और भी बढ़ जाता है । शिक्षा के लिए किसी बोर्ड को किसी सिस्टम को किसी संगठन को किसी व्यक्ति को दोष देना उचित नहीं है जैसे पब्लिक स्कूल में अच्छे छात्र होते हुए मानक स्तर से निम्न स्तर के शिक्षक होने पर भी दी गई शिक्षा का सकारात्मक परिणाम आशा के अनुरूप आता है ।जबकि सरकारी स्कूलों में सरकारी मानक के अनुसार उच्च स्तरीय शिक्षक होते हुए भी निम्न स्तरीय परिवारों के छात्रों के शिक्षा के उदासीन रवैया होने के कारण सरकारी स्कूलों की उपलब्धि वह नहीं आ पाती जो सरकार चाहती है। क्योंकि सरकार का उद्देश्य सबको शिक्षित करना है चुन-चुन कर सरकार शिक्षा नहीं देती जबकि प्राइवेट सेक्टर के लोग धर्म के आधार पर, परिवार की सामाजिक, राजनीतिक ,धार्मिक, स्थिति के आधार पर उच्च आईक्यू के छात्रों को शिक्षा देते हैं। वे निम्न आईक्यू के छात्रों को स्कूल में 1 बार फेल होते ही स्कूल से निकाल देते हैं ।जो बाद में सरकारी स्कूलों में दाखिला लेते हैं और सरकारी स्कूलों क डिग्रेडिंग में करा देते हैं । नंबर 4 : पर औपचारिकता पूर्णता शिक्षा का नाम आता है । जो आजीवन प्रशिक्षण प्राप्त करने के रूप में विभागीय स्तर पर या निजी रूप में लोगों से समस्या समाधान उनमूलन रुप में वार्ताकारीता रुप में चलती रहती है आजीवन।।

रहा प्रश्न शिक्षा के देश विदेश की शिक्षा तो इसका जवाब है भारत में समस्त शिक्षा तरह तरह के प्रतिबंध पर निर्भर है ।जैसे नंबर एक बौद्धिक पेटेंटः धनी लोग अपने धन के दम पर अपने बच्चों को श्रेष्ठतम शिक्षा दिलाते हैं जो बुद्धि प्रधान होती है निर्धन लोग जो शिक्षा पर धन खर्च करना उचित नहीं समझते वह अपने बच्चों को मुफ्त की शासकीय शिक्षा या सत्संगी शिक्षा दिलाते हैं जिसमें छात्र का बच्चों का मानसिक विकास ठीक प्रकार से नहीं हो पाता । जो लोग शिक्षा पर पैसा खर्च करते हैं वह शिक्षा का परिणाम भी चाहते हैं और जो लोग शिक्षा पर पैसा नहीं खर्च करते उन्हें शिक्षा के परिणाम की उतनी चिंता नहीं होती ऐसे में वे अच्छी शिक्षा के प्रति जागरूक नहीं होते।

इसमें जैसा किंग पर्सन / शासक या संगठन संचालक जैसा चाहता है वह वैसी शिक्षा देता है । अपने विरोध करने वाले विरोधियों को संगठन विरोधी , समाज विरोधी , शासन विरोधी , बताकर के अपने संगठन से शिक्षा तंत्र से बाहर निकाल देता है।

नंबर दो पुस्तक लिखित कापी राईट एक्ट :- के तहत कोई भी मनुष्य किसी भी पुस्तक को अपने कलम से लिख नहीं सकता ना किसी की लिखी हुई पुस्तक में अपने विचारों के अनुसार संशोधन या परिवर्तन कर सकता है और ना ही किसी की पुस्तक के लिखे विचारों का उपयोग अपने निजी व्यापारिक हित में कर सकता है । किसी पुस्तक में लिखे हुए दूसरे व्यक्ति लेखक के विचारों का प्रचार प्रसार नहीं कर सकता ।।उसका ब्यौरा नहीं दे सकता दूसरी बात कॉपीराइट एक्ट की जो सबसे गलत है । वह ह कॉपीराइट एक्ट के अनुसार जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे लिखे व्यक्ति की पुस्तक का अनुवाद अपनी निजी भाषा में या दूसरी भाषा में करता है तो स्थिति और भी ज्यादा खतरनाक गंभीर कर देता है इसमें भारतीय लेखक सबसे आगे हैं । भारतीय लेखक जब भी किसी दूसरी पुस्तक का अनुवाद करते हैं तो वह अक्षर परिवर्तन तो करते ही हैं साथ ही उस पुस्तक के विचार भाव भी पूरी तरह से विपरीत लिख देते हैं । जिससे एक ही पुस्तक के जितने अनुवाद लिखे जाते हैं वह उनसे मेल नहीं खाते अलग होते हैं । जबकि पाश्चात्य देशों के लेखक पुस्तक अनुवाद में इस बात का विशेष ध्यान रखते हैं कि पुस्तक के शब्द से शब्द भले ही ना मिले लेकिन पुस्तक के लेखक के विचार और अनुवादक के विचार का भाव सारांश एक रहे । जिससे विदेशी लेखकों के अनुवाद भी उच्च क्वालिटी के होते हैं। ऐसा कॉपीराइट एक्ट का कमाल होता ह ।

चौथी जो सबसे भयंकर बात है वह है बौद्धिक पेटेंट एक्ट भारत में बौद्धिक पेटेन्ट एक्ट बड़े बुरे विकृत रूप में व्याप्त है । जिससे समूह शिक्षा , निष्ठा शिक्षा , धार्मिक ,रूढ़िवादिता युक्त अविश्वास अंधविश्वास उत्पन्न करने वाली शिक्षा , जिसका परिणाम अज्ञान के रूप के रूप से जाना जाता है । यह बौद्धिक पेटेंट हमारे राष्ट्र के नेताओं की , अभिनेताओं की , धर्म दाताओं की वाणी होती है जो नीति रीती कम , अनीति कुरीति प्रधान होती है । जिसे सुनने के बाद समाज में जगह-जगह लोगों की बुद्धि भ्रमित हो जाने से लोग एक दूसरे की बात समझने की वजह एक दूसरे को सुनी सुनाई नेता अभिनेता की वाणी को दूसरे के दिमाग में घुसने का प्रयास करते नजर आते हैं । जिससे जगह जगह सांप्रदायिक संघर्ष जातीय संघर्ष कुल संघर्ष आदि तरह तरह के संघर्ष पैदा हो रहे हैं । परंतु लोग नेता अभिनेता धर्म दातारों की वाणी को श्रेष्ठ मानते हैं और घर परिवार के लोगों के द्वारा दी गई शिक्षा को अश्रेष्ठ /गलत खराब मानते हैं। विद्यालय में श्रेष्ठ गुरुजनों के द्वारा दी गई शिक्षा को भी छात्र शिक्षा ग्रहण योग्य नहीं समझते हैं और इसका परिणाम भयंकर रूप से आज जगह-जगह अशांति उत्पात उपद्रव के रूप में दृष्टिगोचर हो रहा है।

भारतीय पद्धति से प्राप्त शिक्षा में आधुनिक समय में लोगों की सोच को सोचने बोलने लिखने पढ़ने की क्षमता शक्ति को बाधित कुंठित किया जा रहा है ।जबकि पाश्चात्य पद्धति से प्राप्त शिक्षा में विदेशों में लोगों में सोचने समझने बोलने लिखने पढ़ने की क्षमता उत्पन्न करने पर विशेष बल दिया जाता है । इसका परिणाम हमें प्रत्यक्ष में भी देखने को मिलता है हमारे अधिकतम नेता , पाकिस्तान बांग्लादेश के नेता गणों की संतान विदेशों मैं पढ़ी-लिखी विदेशों से शिक्षित होती है ।जो भारतीय क्षेत्रों की जनता की ,सभ्यता संस्कृति की , नस / समझ को शीघ्र समझ कर समाज को अपनी इच्छा के अनुसार बदलने में प्रवीण है ।जबकि भारत में पढ़े लिखे लोग भारतीय गुरुजनों से पढ़े लिखे लोग समाज में दूसरे तो क्या अपने घर परिवार के लोगों से अपने जाति धर्म के लोगों से संवाद बोलचाल नहीं कर पाते ऐसे में इनकी पढ़ाई लिखाई का मूल्य गिर जाता है जिससे विदेशी शिक्षा का मूल्य बढ़ जाता है । इसके अलावा भारतीय शिक्षा पद्धति में छात्र और शिक्षक दोनों ही श्रम से बचने का प्रयास करते हैं यहां की शिक्षा में श्रम का स्थान गौण है जुगाड़ का बुद्धि का जबकि बुद्धि भोग का समृद्धि का स्थान मूल है । विदेशों में शिक्षा में श्रम का स्थान मूल है भोग समृद्धि का स्थान गौंड़ या द्वितीय नंबर पर है। भारतीय पद्धति से शिक्षित होकर लोग बिना श्रम के समृद्धि या धनी बनने की सोचते हैं । जबकि पाश्चात्य पद्धति में श्रम के मूल्यों से समझौता नहीं किया जाता जिससे पाश्चात्य सभ्यता संस्कृति से शिक्षित लोग भारतीयों की तुलना में अधिक श्रेष्ठ साबित होते हैं। ऐसे में जो भी धनिक या समृद्ध लोग हैं वह अपने बच्चों को विदेश में पढ़ने भेजते हैं जिससे उनमें अपने निकटतम लोगों के विचार सोचने समझने की क्षमता पैदा हो सके और अपने निकटतम लोगों को शब्दों के द्वारा मानसिक गुलाम बनाकर अपने लोगों से अच्छा व्यवसाय किया जा सके। पाश्चात्य लेखकों की लिखी पुस्तकें भी भारतीय लेखकों की तुलना में अधिक सत्य के निकट होती हैं जबकि भारतीय लेखकों की पुस्तकों में सत्य का ढूंढना केवल दार्शनिक और उच्च कोटि के लोग ही समझ पाते हैं जिनमें ज्ञान समीक्षा करने की क्षमता पैदा हो जाती है ऐसे में मैं यही कहूंगा विदेशी साहित्य का अध्ययन करो जो सत्य के अधिक निकट है और संभव हो सके तो अत्यधिक ज्ञान के लिए विदेश से शिक्षा ग्रहण करना समझदारी है यदि धन पर्याप्त मात्रा में है तब।

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