मनुस्मृति के अनुसार नाम दो तरह के होते हैं एक सार्थक नाम जिसके अनुसार जो जातक का नाम है उसमें उसके नाम के अनुसार गुंण लक्षण होने चाहिए तथा नाम से परिचय सुनने वाले लोगों को हो जाना चाहिए नाम से पिता कुल गोत्र वंश ग्राम जनपद प्रांत देश का पता लग जाना चाहिए ।वह नाम आदर्श /पूर्ण नाम कहा जाता है आज भी दक्षिण भारत में इसी प्रकार से लम्बे नाम रखे बोले जाते हैं जैसे दक्षिण भारत से एक पूर्व प्रधानमंत्री थे एच .डी . देवगोड़ा जिसकी फुल फार्म थी :-हरदन हल्ली डोडा गोडा देव गोड़ा , इसी तरह से एक पूर्व राष्ट्रपति थे :- ए. पी .जे . कलाम जिनका पूरा नाम था अब्दुल पाकिर जैनुबुदिल कलाम ।
महाभारत ग्रंथ में नाम गुंण के लक्षण के आधार पर रखे गए थे जैसे धृतराष्ट्र पुत्र दुर्योधन के समय हस्तिनापुर में अपशकुन हुए थे ।पैदा होते समय दुर्योधन की आवाज गधे के स्वर के समान थी जो न पुरुषोचित लिंगीय गंभीर वृष /सांड स्वर मर्दाना थी न कोमल मृदु स्वर स्त्रियोचित जनानी थी जैसी महाभारत के दुर्योधन पात्र की थी ।तब उसका नाम दुर यो धन रखा था जो गरीब निर्धन सूचक माना जाता है । युधिष्ठिर की आवाज बैल के समान वृषभ स्वर की थी युधिस्टर शांत और स्थिर बुद्धि का था वह आसानी से विचलित नहीं होता था उसका नाम युद्ध में भी स्थिर बुद्धि युधिष्ठिर रखा गया था । भीम का शरीर सबसे विशालकाय था उसका नाम बड़े शरीर से भीम रखा गया था । अर्जुन विशेष फुर्तीला था ऊर्जा की अधिक मात्रा के कारण ऊर्जा के समुचित उपयोग के कारण अर्जुन का नाम रखा गया था । नकुल कुल में सबसे सुंदर था उसका नाम सुंदरता के आधार पर रखा गया था ऐसा व्यक्ति सुंदर उस समय दूसरा नहीं था । सहदेव छोटे शरीर का आज्ञाकारी सेवक भाव वाला था उसका नाम उसके काम सबकी सहायता करना सब की आज्ञा मानना के आधार पर सहदेव रखा गया था । दुशासन का नाम सदैव बुरे शासन में शासक का सहयोग करने के कारण रखा गया था । विकर्ण का नाम विशेष प्रज्ञा और उचित निर्णय क्षमता के कारण रखा गया था । यह थी महाभारत के समय की परंपरा जिसमें व्यक्ति का नाम सार्थक गुण के अनुसार रखा जाता था ।
बात करते हैं निरर्थक गुणके आधार पर नाम रखने के परंपरा जिसकी शुरुआत ज्योतिष शास्त्र प्राकट्य से हुई है ।जिसमें नाम रखने की परंपरा नाम राशि, नक्षत्र ,प्रहर चरण के अनुसार शुरू हुई थी । बाद में जब ज्योतिष का प्रभाव घटने लगा सब लोग अपनी इच्छा के अनुसार नाम रखने लगे ऐसे में नाम के शब्दों का कोई महत्व नहीं रहा । लोग उत्तम गुण देखते और उत्तम गुंंण के अनुसार नाम रख देते अधम निकृष्टतम प्रकृति के लोगों का भी और यह परंपरा चल रही आज भी जारी है । श्रेष्ठ शब्द अक्षर में नाम रखने की ।।
अब तो नाम रखने में लोग जो आधुनिक विचारों के हैं वह अपने बच्चों के नाम चीनी पैटर्न पर 2 अक्षरों में रखते हैं जिससे निकनाम कहते हैं जो हिंदी के 12 कड़ी ककहरा के 2 अक्षरों को कहीं से भी उठाकर रख दिया जाता है जैसे सुमी, हूतू , चैंचू ततो धूधू आदि अब बात इससे भी आगे बढ़ गई हैं । जब से लोगों को नाम शब्द के प्रभाव गुण का पता चला है तो लोग निकृष्टतम निरक्षर होते हुए भी अपने नाम श्रेष्ठ उत्तम शब्दों के रखते हैं ।जैसे त्रिवेदी शब्द से पता चलता है कि इस व्यक्ति के परिवार को तीन वेदों का ज्ञान है , द्विवेदी शब्द से दो वेदों का ज्ञान , चतुर्वेदी शब्दों से चार वेदों का ज्ञान , वेदी शब्द से एक वेद का ज्ञान । शर्मा शब्द से शर की मां यानी वकातूणीरधारी अर्थात तर्क शास्त्री , तर्क आचार्य का एहसास होता है ।चाहे मनुष्य अज्ञानी निरक्षर है।
इस बात को लेकर हाथरस के कवि लक्ष्मीनारायण गर्ग ने अपनी एक विशेष कविता पुस्तिका लिखी थी जिसका टाइटल था नाम बड़े दर्शन छोटे जिस की कुछ पंक्तियां जो मुझे याद है इस प्रकार है मुंशी चंदा लाल का तारकोल सा रूप श्यामलाल ऐसे खेलें जैसे खिलती धूप सजे बुशर्ट पैंट में ज्ञानचंद हो गए थे 6 बार टेंथ में पंडित विद्याधर को काला अक्षर भैंस बराबर । इसी प्रकार से सिंह शब्द लगाने से मनुष्य में श्रेष्ठ हिंसक सिंह पशु के गुण का पता चलता है यदि इसकी अधिक व्याख्या की जाए ,इस पर मेरे मित्र डा० जगन्नाथ गर्ग ने कहा था कि ये पैदा तो मनुष्यों में हुए हैं लेकिन पशु नाम उपसर्ग लगाने से इनकी पाशविक मानसिकता बताती है कि अभी तक ये आदमी पूरी तरह से नहीं बन पाये हैं इनमें हिंसा करने का गुंण पाशुविकता अभी भी छिपी हुई है जो अक्सर आदमी से बातचीत करने पर लड़ाई झगड़ा करने से इनके हिंसक होने का पता चलता है । लोग अपने नाम के पीछे वृक्ष अक्षर जैसे नीम का अपभ्रंश निम , पैप्लाद का अपभ्रंश पीपल या पिपिल , पक्षियों के नाम जैसे कोचर खरखूशष्टा छोटा उल्लू , तीतर पक्षी से तीतरों , मोर से मोरल मोरारजी ई आदि नामों का उपयोग लोग अपनी पहचान व्यक्त करने के लिए गोत्र के रूप में क्षेत्रवासी के रूप में प्रयोग करते हैं । नामों की व्याख्या के लिए गोत्रों के बालगोत्र शब्दों के अधिक जानकारी के लिए पंडित ज्वाला प्रसाद मिश्र की जाति भास्कर पढ़ें ।।
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