ब्रह्म ज्ञान हो जाने के बाद भी व्यवहार में बदलाव आने में समय क्यों लगता है? मन की आसक्ति, विकार जाने में काफी समय क्यों लग जाता है?


ब्रह्म ज्ञान का मतलब है यूनिवर्सल ट्रुथ या सार्वभौमिक सत्य जिसमें शंका संदेह की गुंजाइश नहीं होती । कथा सार शब्दों का महत्व , शब्दों से निर्माण विनाश दृश्य को समझना , शब्दों से निर्माण विनाश की परिस्थिति पैदा कर देना , ब्रह्म ज्ञान कहा जाता है । शब्द से ही समस्त संसार संचालित है ।जो संकल्प ( विचार उत्पन्न , विचार नियंत्रण , विचार प्रभाव ) ध्यान , स्मृति ( दृश्य की अपने मन मस्तिष्क में पुनः उत्पन्न करने की कला ) विज्ञान ( अज्ञात में से वांछित ज्ञात - अदृश्य में से वांछित दृश्यसे को अपने प्रज्ञा विवेक से जान लेना ) सांसारिक भौतिक ऐश्वर्य प्राप्त करना सीख लेते हैं वह ब्रह्म ज्ञानी हैं । । जो लोग अपने मन को मार कर जीते हैं जिन्हें संकल्प ध्यान कला विज्ञान विधान का ज्ञान नहीं होता संकल्प हीन होते हैं प्राण हीन होते हैं दर्शन ही होते हैं वह अपने जीवन को पशु रूप में जीते हैं जो आजीवन ब्रह्म ज्ञान के पात्र अधिकारी नहीं हो सकते।

इस पर विशेष रुप से छांदोग्य उपनिषद के आठवें अध्याय में देवराज इंद्र और प्रहलाद पुत्र विरोचन की दीक्षा का वर्णन है जिसमें प्रहलाद पुत्र विरोचन जब प्रजापिता ब्रह्मा जी के पास ज्ञान लेने गया तो उन्होंने कहा जो दिखता है जो देखता है जो सत्य का निर्धारण करता है वह ब्रह्म है इस ब्रह्म को सत्य स्वरूप को प्रकृति ने अपने धर्म असत्य से ढक दिया है सभी लोग इसी असत्य से भ्रमित होकर अपने अपने विचार के अनुसार इस असत्य की सत्य मानकर व्याख्या करते हैं सत्य क्या है ।। इसमें से विरोचन ने नेत्र दर्शन को सर्वप्रथम और सर्वांत सत्य मानते हुए स्वीकार कर लिया असुर धर्मप्रवृत्ति के लोग आज भी भौतिक दृश्य जगत को सत्य मानते हैं जो केवल वर्तमान काल पर आधारित है जबकि सुर धर्म प्रवृत्ति के लोग चार काल मैं विद्यमान को सत्य मानते हैं ।

बीता समय भूतकाल वर्तमान समय दर्शन काल आगे का समय भविष्य काल और नष्ट हो जाने पर भी वस्तु का अस्तित्व विद्यमान रहना यह गुप्त काल कहा जाता है जिसमें वस्तु के अस्तित्व को ब्रह्म मृत्यु के पश्चात भी स्मृति रूप में सुरक्षित रखता है और पैदा होने के बाद उन वस्तुओं को अनजान होने पर भी फिर से पैदा कर लिया करता है ।जबकि देवराज इंद्र ने इस नेत्र दर्शन दूरदर्शन की सत्यता पर शंका की क्योंकि नेत्र जो देखते हैं वह चतुर्थ कालिक भूतकाल वर्तमान काल भविष्य काल गुप्त काल मैं सतत सत्य स्थाई दर्शन नहीं है परिवर्तनशील है । इंद्र की आयु अब तक 32 वर्ष की हो चुकी थी आज 32 वर्ष की आयु तक मनुष्य को अज्ञान अल्प ज्ञान और असत्य से ब्रह्म धर्म के स्थान पर भ्रम अधर्म बना रहता है वह एक में दो यादों में एक दर्शन करके एक दूसरे के अस्तित्व को नकार ता है जैसे नारी के लिए नर या नर के लिए नारी संगसम सामान सत्य नहीं है। स्त्री पुरुष दोनों की एक दूसरे के लिए यही शक संदेह भ्रम की स्थिति है जो ज्ञान के अभाव में 64 बरस तक बनी रहती है लैंगिक हार्मोन की प्रबलता के कारण । 64 वर्ष की आयु के पश्चात शंका होने पर इंद्र पुणे प्रजापिता ब्रह्मा के पास गया तब ब्रह्मा ने उससे आंशिक ब्रह्म ज्ञान दिया :- जो स्वप्न में भी विचार शील है जो स्वप्न बनाता है स्वप्न देखता है वह अविनाशी अभय भ्रम है इस पर इंद्र को शक हुआ जिसके नेत्र नहीं हैं वह कैसे क्यों कर स्वप्न देखता है । इसके शंका समाधान के लिए इंद्र पुनः प्रजापिता ब्रह्मा के पास गया ब्रह्मा ने इंद्र को उपदेश किया सुषुप्त अवस्था में भी आनंद , शांत रहता है स्वप्न का अनुभव नहीं करता परंतु स्वप्न बनाता है देखता है जागृत अवस्था में ब्रह्म प्राण के आधीन संदेह करता हुआ भ्रमित होकर विश्व को देखता है यह ज्ञान इंद्र को ९६वें में वर्ष बाद हुआ । 96 वर्ष बाद इंद्र को यथार्थ बोध से शंका का भय उत्पन्न हुआ उसने सोचा यह है विस्तृत ब्रह्म भगवान सृष्टि और सूक्ष्मशरीर में अंतर क्यों कैसे हैं? ब्रह्म किस प्रकार सूक्ष्म ब्रह्म जीव रुप से विस्तृत ब्रह्म इंद्र , ब्रह्म - देवराज सृष्टि नियंत्रण कर्ता और विस्तृत देवराज इंद्र से सूक्ष्म ब्रह्म जीव शरीर में किस प्रकार से परिवर्तित अदल बदल करता होता रहता है । इस शंका को दूर करने के लिए इंद्र फिर से प्रजापति ब्रह्मा के पास गए कब ब्रह्मा ने उन्हें पूर्ण सत्य ज्ञान दिया जो ब्रह्म ज्ञान कहलाया जो ब्रह्म की अवस्था स्थिति जिसमें वह अज्ञान अशांति की निवृत्त के लिए वृत्ति ज्ञान को धारण प्राप्त कर लेता है वह सामान्य सा जीव समाज के सर गोत्र शिरोमणि देवराज इंद्र पद तक चला जाता है और इंद्र पद प्राप्ति पश्चात अज्ञानी असत्य जीव अवस्था में भ्रमित होता हुआ तरह तरह की जीव योनियों में घूमता भ्रमण करता रहता है । कैसे ? महात्मा विदुर धृतराष्ट्र भ्राता को कीट के मृत्यु भय से जाति स्मरता ज्ञान प्राप्ति सर्ग से देखें ..

प्रजापिता ब्रह्मा ने इंद्र को समझाया इंद्र जब इंद्र अपनी शिक्षा दीक्षा कला योग्यता को शनै शनै होता छोड़ता भूलता चला जाता है वह सूक्ष्मा ब्रह्म जीव रूप में बदल जाता है ।और जब जीव अपनी शिक्षादीक्षा कला विज्ञान योग्यता से समाज से , प्रकृति से- जुड़ता चला जाता है तो वह सृष्टि नियंता देवराज इंद्र में बदल जाता है इंद्र के पद है ।। समाज के अन्य पदों के समान जैसे प्रधानाचार्य गुरुजी माता पिता पुत्र पुत्री यह सभी मनुष्य के सामाजिक दायित्व नियंता स्वामी के स्तर पद हैं । जो शिखर पर है शिखर पितर ,,भुजा पर है भुज पितर ,, मूल में है मूल पितर ।।

एक ही मनुष्य है समाज में इन तीनों पितर स्थितियों को प्राप्त करता है । अलग-अलग समय पर 101 वर्ष की आयु में इंद्र को यह ब्रह्म ज्ञान ब्रह्मा ने दिया ,या कह सकते हैं कि इंद्र को जो दूसरे संसारिक लोगों से मिले भ्रमयुक्त ज्ञान और अपने निजी विचारों के सही तरीका से तालमेल नहीं बन पाने कारण शंकायुक्त रहा । 101 वर्ष की आयु के पश्चात शरीर के अशक्त होने से संसारिक जीवों द्वारा त्याग दिये जाने से उस इंद्र को निजी मौलिक विचारों को विश्लेषण करके सत्य ज्ञान / यूनिवर्सल /मौलिक ज्ञान स्थिति का पता लगा । जिससे मात्र सिर्फ इंद्र को ब्रह्मा ज्ञान /ब्रह्म स्थिति का बोध हुआ था । आज और अब भी 101 वर्ष की आयु तक ही जीव को अपने अस्तित्व का और संसारिक ज्ञान हो पाता है अंत समय मरने तक मनुष्य दूसरे लोगों के विचारों को अपना मानने समझने से क्लेशित/दुखी रहता है ।101 वर्ष की आयु में संसारिक लोगों के ज्ञानी इंद्र वर्णा मनुष्य का त्याग कर देने पर मनुष्य को अपना,और संसार का अलग-अलग अस्तित्व का ज्ञान हो जाता है।।

इसके बाद मनुष्य शरीर की अस्वस्थता असमर्थता, इंद्रियों की अक्षमता के कारण सांसारिक भोगों में असमर्थ होने से क्लेशित दुखी होकर इस संसार को छोड़ने की इच्छा करता है लोगों से मिले तिष्कार के कारण क्योंकि वह अब स्त्रियों को भोग देने में समर्थ नहीं रहा न उनसे भोग लेने में समर्थ रहा दूसरे जनो को नियंत्रित करने में समर्थ नहीं रहा । उसे कमजोर मनुष्य को सभी नियंत्रित करने लगते हैं ऐसी दीनहीन हीन पशुओं से निम्न अवस्था प्रकृतिक अवस्था जाने से पूर्व मनुष्य का भूलेख अवचेतन उसे सक्रिय होकर उसे संसार त्याग को प्रेरित करता है । ।विवशताओं से परेशान मानव समाज कलाओं को छोड़ते हुए सूक्ष्मजीव से लेकर विशेष इंद्र पुरुष जीव भी मृत्यु मार्ग मोक्ष की ओर चल पड़ता है ।। नए जीवन की ओर नए समाज की ओर नए जीवन आयाम विस्तार की ओर यही ब्रह्म ज्ञान है ब्रह्म जीव ब्रह्म ज्ञान बुद्धि दोनों चैतन्य पदार्थ हैं जब चैतन्य पदार्थ के साथ बुद्धि ज्ञान कला ब्रह्म के साथ जुड़ जाते हैं तो उसका विस्तार होने लगता है वह विस्तृत ब्रह्म भगवद प्रतिष्ठा की ओर चलने लगता है ।

मुझे भी ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति नहीं — ब्रह्म ज्ञान अनुभूति :: सन 97 में केदारनाथ मंदिर के पीछे बनी शंकराचार्य की समाधि पर लिखें ब्रह्म वाक्य से हुई , जो इस प्रकार है:-- प्रज्ञात् मांनम् ब्रह्म स तत्वम् असि ।। प्रज्ञ्या ही आत्मा की कला (संसार से जुड़ने स्वंय के अस्तित्व को नष्ट होने से बचने का विज्ञान ह जिसके अनुसार विस्तृत ब्रहम ही तरह तरह के सुक्ष्म जीवों के रुप में तरह तरह की प्रज्ञा कला धारण करके —ब्रह्म तरह-तरह के जीवो मैं प्रदीप्त हो रहा है ) है । जीव दर्शन ःःःःब्राह्मण का अर्थ है ब्रह्म को पूर्ण रूप से जानते हुए निर्माण विनाश दोनों कर्म विधाओं में योग्यता हासिल करना पारंगत होना जिसका आशय है मनुष्य का राजनीति सीट पर राज धर्म धारण करके राज्य के सर्वोच्च पद इंद्र पद की प्राप्ति करना यह पंच परमेश्वर के पंचपदी अस्तर की पद क्रमिक व्यवस्था है जिसमें वाकयोद्धा ब्राह्मण सबसे निम्न स्तर पर आता है और संग्राम योद्धा देवराज इंद्र सर्वोच्च स्तर पर प्रतिष्ठित है । पशुपतिनाथ दर्शन मंदिर नैपाल से …

मेरे विचार से ब्रह्म ज्ञान का मतलब मानव मस्तिष्क का अपनी पूर्ण क्षमता दक्षता से उपयोग करना है जो चेतन स्तर पर अधिकतम 10% अवचेतन स्तर पर 90% होती है यह दार्शनिक बुद्धि लोगों का सत्य है निम्न बुद्धि लोगों का आंकड़ा 5% से ऊपर और 10% के बीच में आता है जिसके अनुसार मनुष्य का कर्म फल परिणाम पर अधिकार अधिकतम होना चाहिए । यह ब्रह्म ज्ञान है जो गोपथ में शपथ में विस्तार से लिखा है । इसे और भाषा में समझना चाहते हैं तो निकोला टेस्ला अमेरिकन दार्शनिक को पढ़ें जिसमें मानव मस्तिष्क के मानसिक ऊर्जा के अधिकतम उपयोग करने की विधि को बताया गया है ।। सामान्य लोग अपने मानसिक ऊर्जा का बहुत ही कम सार्थक उपयोग करते हैं वह अपनी मानसिक ऊर्जा को अधिकतर निरर्थक कार्यों में अमूर्त चिंतन में सोच विचार में बेकार की बातों में उलझ कर नष्ट करते रहते हैं ।। जो लोग अपनी मानसिक ऊर्जा का अपनी इच्छा के अनुसार संचालन संवहन विकिरण विचार प्रसार कला सीख जाते हैं वही ब्राह्मण हैं ।। वही श्रेष्ठ राजनीतिक जन है और जो इस मानसिक ऊर्जा उपयोग कला को प्रयोग करना नहीं जानते उद्यम हीन हैं भीख मांग कर पेट भरते हैं भिक्षावृत्ति करते हैं जो ब्राह्मण तो क्या ब्राह्मण के शिष्य कहलाने के भी लायक नहीं है । वह भिक्षु हैं समाज पर बोझ ।

ब्रह्मा ज्ञान होने पर मनुष्य के अंदर शंका प्रश्न दिमाग से उत्पन्न होने लगती हैं और उनके उत्तर में संकल्प विकल्प उत्तर भी अपने आप अपने मन में उत्पन्न होने लगते हैं जिससे वह अपने जीवन को अपने विचारों के अनुसार जीते हैं । जो लोग ब्रह्म ज्ञानी नहीं होते अपने जीवन को दूसरे के विचारों कथनों , दूसरोंकी बातों के अनुसार माता पिता गुरु मित्र शुभचिंतकों की उचित अनुचित शिक्षा अध्ययन के अनुसार जीते हैं । ऐसे में जब अपने जीवन को दूसरों के बातों या शिक्षा के अनुसार दिया जाता हैतो उन ब्रह्मा ज्ञान हीन लोगों के जीवन के परिणाम भी दूसरे लोगों की शिक्षा कथन के अनुसार ही आते हैं ।जिससे ब्रह्म ज्ञान हीन लोग अधिकांशतः आजीवन क्लेशित चित्त दुखी रहते हैं। ब्रह्म ज्ञानी लोग अपने जीवन को अपने विचार और अपने लिए उचित शिक्षा के अनुसार जिया करते हैं जिससे शांतसंतुष्ट और प्रसन्न चित्त रहते हैं जिससे उनके चेहरे पर जन सामान्य से अलग विशेष चमक असाधारण तः पाया जाता है क्योंकि वह व्यर्थ के संसारिक कार्यों में अपनी मानसिक ऊर्जा और शारीरिक ऊर्जा का अपक्षयण नहीं करते हैं । ब्रह्म ज्ञानी लोग फालतू सोच विचार नहीं करते ज्यादा बकवास नहीं करते व्यर्थ की बातों पर अमूर्त चिंतन सोच विचार नहीं करते और ना ही वक्त के सांसारिक कार्यों पर ध्यान देते हैं यह अमूर्त चिंतन को नियंत्रित रखते हैं।

ब्राह्मण जन /क्षब्रहम समाज साधारण सामान्य मानव पशु समाज को अपनी विशेष बुद्धि से संचालित करता है ।यदि समाज ब्राह्मण के बुद्धिस्ट के अनुसार बने श्रेष्ठ नियमों को सत्य नियमों को नहीं अपनाता है तो ब्राह्मण अपनी विनाश बुद्धि की योगिता से ऐसे अनियंत्रित समाज को लड़ा भला कर नष्ट कर दिया करता है । ।भिक्षुक का क्या है ना निर्माण करने में समर्थ ना विनाश करने में समर्थ ऐसा मनुष्य तो समाज पर बोझ बनकर जीता है पशुओं से भी गया गुजरा वृत्ति हीन धर्म कर्म हीन ,जबकि पशु भी वृत्ति धर्म धारण करके अपना जीवन जीते हैं ।

चर्चा पर आते हैं मन के आ आसक्ति विकार दूर होने की , यह मनुष्य के मस्तिष्क की संरचना की कठोरता पर निर्भर है । जो लोग कठोर मस्तिष्क वाले ब्रहम ज्ञान हीन अड़ियल स्वभाव के होते हैं ।जोअपने जीवन को दूसरे लोगों के ज्ञान आधारित तरीकों से जीते हैं जिनमें निजी चैतन्यता बोध स्तर न्यूनतम जैविक मात्र होता है। उनके दिमाग के न्यूरॉन को हेल्प देने वाली न्यूरोग्लियल सेल्स का लेयर स्तर पतला या हल्का होता है जो उनके न्यूरॉन को शीघ्रता से ऊर्जा नहीं दे पाता जिससे उनके न्यूरॉन मंदी गति से काम करते हैं जिससे वे अपनी वे अपनी वास्तविक आयु से पीछे की आयु में मंदसौर बुद्धि स्तर में अपना जीवन जीते हैं। उनके मस्तिष्क को निर्णय लेने निर्णय बदलने और नए निर्णय के अनुसार जीवन की नई परिपाटी को क्रियान्वित करने में समय लगता है ।। जिससे ऐसे लोगों के विकार जो उनके मन में भरे हुए हैं वह आसानी से नहीं निकल पाते हैं ।प्राय लोगों को अकल आने की आयु प्रज्ञान आयु 5, 7, 16 , 21 , 29, 41 ,50 , 55 , 60 , 75 , 90 ,101 वर्ष की कही जाती है इस आयु में सभी मनुष्य की न्यूरोग्लिया कोशिकाओं की संरचना में परिवर्तन होने से सभी की बुद्धि में परिवर्तन व्यक्तिव परिवर्तन की संभावनाएं बनती हैं लेकिन जो लोग कठिन कठोर अपरिवर्तनीय बदलाव रहित बुद्धि वाले हैं जिनके मन में दूसरों की अनुचित शिक्षा के अनुसार वृत्ति विकार भरे होते हैं । जो सत्य ज्ञान को आसानी से धारण नहीं करते अपनी मनमस्तिष्क संरचना में अपने ऑप परिवर्तन नहीं कर पाते हैं वे पशुजबुद्धी लोग ब्रह्म ज्ञान हीन होते हैं । जो लोग अपनी मनमस्तिष्क व्यक्त्तिव संरचना में समयानुसार अपनी इच्छाओं के प्रभाव से स्वयं परिवर्तन कर लिया करते हैं वे ब्रह्म ज्ञानी कहे जाते हैं । जो अपने प्रज्ञान के अनुसार अपने मन से अपनी बुद्धि चित्त में परिवर्तन करना सीख समझ लेते हैं वही दूसरे लोगों में समाज में परिवर्तन कर सकने में समर्थ होते हैं । ब्रहम ज्ञानी जन परिवर्तन की सही समझ होने से अपने चित्त को शांत निर्मल रखते हैं ।

दूसरा पॉइंट इन लोगों के शरीर की कार्यकि या फिजियोलॉजी की बनावट सामान्य से अलग होती है इनके शरीर में इनके शरीर के अनुसार लैंगिक हार्मोन का स्तर अधिक होता है जैसे स्त्री में एस्ट्रोजन , पुरुष में टेस्टोस्टेरोन । जिससे स्त्री स्त्रियों चित व्यवहार न्यूनतम मानसिक शारीरिक ऊर्जा प्रयोग करती है ।पुरुष पुरुषोचित व्यवहार करता है मानसिक शारीरिअ ऊर्जा का अतिरिक्त सक्रियता से दुर्पयोग । इनके शरीर में दूसरे लिंग का विपरीत लिंग हार्मोन का स्तर मानक से कम होता है जैसे जिन स्त्री में पुरुष उचित हारमोंस टेस्टोस्टरॉन का लेवल कम होता है वे भीरु स्वभाव की निक्ममी शर्मीली होती हैं । पुरुष में स्त्रियों चित हार्मोन एपीनेप्रिन कम होता है जिससे यह लोग क्रूर कठोर आक्रामक स्वभाव के होते हैं । आसानी से दूसरों की बात ना सुनते हैं ना समझते हैं ना सुनने का प्रयास करते हैं परंतु जब एक निश्चित आयु के पश्चात जब इनकी जवानी का नशा उतर जाता है तो इनके शरीर में विपरीत लिंगी हारमोंस अपनी उचित मानक स्तर पर आ जाते हैं स्त्री के मन में छिपा पुरुष जाग जाता है पुरुषों के मन छिपी हुई स्त्री जाग जाती है स्त्री पुरूष दोनों ही का व्यक्तित्व साम्य समसमान हो जाता है । जिससे यह और इनका स्वभाव व्यवहार बदलने लगता है । इनकी इस शान्त अवस्था के कारण हम इनको आयु के अनुसार अकल आना कहते हैं । अंत में मरते समय स्त्री पुरुष मन की होकर मरती है और पुरुष स्त्री मन का होकर मरता है ।जीवन की साम्य समयक् समसमान अवस्था .

इसमें ब्रह्म ज्ञान जैसी चर्चा लगाने या जोड़ने की जरूरत नहीं है इसके बारे में कहा जाता है कुछ लोग ज्ञान सीखकर पैदा होते हैं कुछ लोग पैदा होने के बाद ज्ञान सीखते हैं इनको अकल एक निश्चित आयु पर समय समय पर आती रहती है ।परन्तु कुछ ज्ञान की, ज्ञानी जनों की , ज्ञान स्रोत पुस्तकों की हर समय अवहेलना /बुराई / नफरत करते रहते हैं । इनको अकल जीवन में अंत तक नहीं आती है ।ये जैसे आये थे वैसे ही बालक बुद्धि रुप में मरकर चले जाते हैं ।इनका मानसिक विकास न्यूनतम हो पाता है । परंतु जब एक निश्चित आयु के पश्चात जब शरीर में जार्णता वृद्धावस्था आ जाती है इंद्रियां कमजोर हो जाती हैं शरीर अशक्त हो जाता है तो ऐसे में यह शांत रहने लगते हैं और हम समझते हैं कि इन के मानसिक विकार दूर हो गए । जबकि वास्तविकता कुछ अलग है शांत रहना इनकी मजबूरी है इनका कपटी व्यवहार है लेकिन इनका स्वभाव और मन नहीं इनके मन में कुटील कुचक्र विचार वृद्धावस्था में भी चलते रहते हैं । ऐसे में यह मान लेना कि यह ब्रह्म ज्ञानी हो गए यह गलत है ब्रह्म ज्ञान का मतलब है मस्तिष्क की क्षमता का उपयोग करना सार्थक आवश्यक ज्ञान अर्जित करना और जीवन के लिए सार्थक कर्म करना जिसका मानव समाज पर और अपने जीवन पर बुरा प्रभाव ना पड़े या कम से कम पड़े अर्थात दूसरों को कम से कम दुख दिया जाए कम से कम पीड़ित किया जाए यही ब्रह्म ज्ञान की सत्यता है ।पशुजबुद्धी लोग अपने जीवन को दूसरे लोगों के परिस्थितियों के अनुसार बार बार बदलाव करते हुए दुख क्लेशित होकर अपना जीवन जीते हैं जबकि प्रज्ञान लोग /प्रबुद्ध जन लोग अपने जीवन को अपने हितज्ञान के अनुसार जीते हैं वे बार बार समाज में परिस्थितियों में परिवर्तन होने पर सुख पूर्वक जीने के लिए अपने विचारों में बार बार अपनी इच्छाओं के अनुसार बदलाव करते हुए अपने जीवन को जीते हैं या फिर अपने विचारों की प्रबलता शक्ति के अनुसार समाज में बदलाव की कोशिश करते हैं ।या कह सकते हैं कि ब्रहमज्ञानी लोग ही अपने मन मस्तिष्क को अपने आप अपनी इच्छानुसार बदल सकते हैं ।ब्रह्म ज्ञानी लोग अपनी सोच आवश्यकता के अनुसार समाज परिस्थितियों में परिवर्तन/बदलाव किया करते हैं ।

मेरे अध्ययन रिकॉर्ड के अनुसार श्री कृष्ण ही एकमात्र पूर्ण ज्ञानी ब्रह्मज्ञानी हुए हैं जो कभी दुखी क्लेशित चित्त नहीं रहे इसके अलावा सभी मनुष्यों के , भगवानों के चित्त खिन्नता के बारे में साहित्य में लिखा गया है चित्तत खिन्नता पहचान है कि ब्रह्म ज्ञान में कुछ कमी है ।

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