ये योगिनी क्या होती हैं? जबलपुर के ६४ योगिनी मंदिर की क्या कहानी है?


जबलपुर के चौसठ योगिनी के मंदिर की क्या कथा है यह तो मैं नहीं जानता ।

लेकिन योगिनी क्या है इसके बारे में जो भी मेरा अध्ययन है उसके अनुसार जीव के मानसिक वैचारिक स्थिति ही उसके लिंग का निर्धारण करती है । कुछ लोग पैदा तो पुरुष रूप में होते हैं जो बाद में स्त्रियों के विचार अपनाकर स्त्रियों के जैसे हो जाते हैं ,जिन्हें हम एलजीबीटी कहते हैं इसी प्रकार कुछ स्त्रियां पैदा तो स्त्री रूप में होती हैं जो बाद में पुरुषोचित विचार अपनाकर अपनी मानसिक संरचना बदलकर पुरुषों के जैसे मन वाली हो जाती हैं ,इन्हें भी हम एलजीबीटी कहते हैं । एलजीबीटी पर स्पष्ट लिखना उचित नहीं है।। जिन लोगों की वैचारिक मानसिक स्थिति महिलाओं के समान हो जाती है जिनके समाहित सपनों में महिलाओं की स्थिति अधिकतम हो जाती है । ऐसे लोग अपने सपनों में अधिकतम तरह तरह की स्त्रियों कन्या गौरी भवानी निऋति/वृद्धा देखते हैं । मनुष्य के सपनों में अधिकतम स्त्री रूप दर्शन उसकी परिवर्तित मानसिकता स्त्रिय क्षेत्र मनोअवस्था में परिवर्तन है जबकि वह दिखने में पुरुष दिखाई देता है इसी प्रकार कुछ स्त्रियों को सपनों में अधिकतम पुरुष बाल युवा व्यस्क वृद्धदिखाई देते हैं यह उनकी मानसिकता वैचारिक परिवर्तन का द्योतक है ।ऐसे लोग प्रबुद्ध योगिनी के उपासक कहे जाते हैं या उन पर योगिनी की कृपा होती है । योगिनी का महत्व तंत्रोक्त शास्त्र में विशेष बताया गया है , जिसके लिए पुरुषों को योगिनी सिद्ध करने के लिए 4 तरह की स्त्रियां बालिका युवा अरोड़ा वृद्धा के साथ लंबे समय तक वनवास या संगवास करते हुए नारी सिद्धी मन करना पड़ता है । नारी सिद्धि कर लेने के बाद पुरुष के अंदर स्त्रियों के प्रति आकर्षण भाव समाप्त हो जाता है वह पुरुषों के प्रति आकर्षित होने लगता है ऐसे में वह विशेष ऊर्जावान बन जाता है। स्त्री के मन के अंदर इसके विपरीत कार्य होने लगता है वह इस्त्री पुरुषों की ओर से आकर्षित न होकर स्त्रियों की ओर आकर्षित होने लगती है ऐसे में उसकी अतिरिक्त योन क्षय ऊर्जा न होने से उसके अंदर यौन ऊर्जा संचित होने से वह भी विशेष ऊर्जावान हो जाती है । अतः योगिनी सिद्धि में यह जरूरी है कि साधक किसी विशेष प्रशिक्षित गुरु के नियंत्रण में रहते हुए अपने साथ उचित आयु की स्त्रियों के साथ रहते हुए तंत्रोक्त साधना करें यदि तंत्रोक्त साधना में स्त्री क्रम बदल जाता है तो वह पुरुष वृद्ध स्त्री सानिध्य से अति शीघ्र बुड्ढा होकर जल्दी मर जाता है इसी प्रकार से महिला भी पुरुष वृद्ध के सानिध्य से अतिशीघ्र योवन क्षय होने से जल्दी वृद्धा होकर मर जाती है । ऐसे में इस योगिनी सिद्धि को हमारे बुजुर्ग लोगों ने प्रतिबंधित कर दिया है ।परंतु फिर भी इस योगिनी सिद्धि को कुछ लोग अपेक्षित रूप में अपनाकर तरह-तरह के तंत्रों अपराध कर रहे हैं ।

ऐसे में उस समय उस योगनी साधना को सुयोग्य प्रशिक्षित गुरु के निर्देशन में वह चारों तरह की स्त्रियों की मानसिक स्थिति को ठीक से समझते हुए अपने लिए उचित मानसिक स्त्री की वैकल्पिक मन रचना करके उत्तम स्त्रियों के साथ योगनी साधना करें । इसमें उल्लेखनीय तथ्य यह है कि जो लोग स्त्रियोंचित मानसिकता के हो जाते हैं उनकी आयु बढ़ जाती है घर में समृद्धि आती है और वह विशेष निरोग रहा करते हैं । विशेष तंत्र साधना विधि के द्वारा यदि लोग बिना तंत्रोक्त साधना विधि के अपनी मानसिक संरचना में स्त्रियोंचित करने का प्रयास करते हैं । ऐसे लोग बहुत जल्दी साधना के विचार से या साधना की शुरुआत में ही मर जाते हैं इसे योगिनी का शॉप कहा जाता है । ।

वैसे भी एक सामान्य नियम है कि मरते समय स्त्री पुरुष मंन की होकर मरती है जबकि पुरुष मरते समय स्त्री मन का होकर मरता है । अर्थात एक ही जीव नर दूसरे विपरीत लिगीय जीव नारी की भावनाओं की पूरिति के प्रयास में से जीता है। पुरुष आजीवन स्त्रियों के प्रति आसक्त भाव से जीता है तो स्त्रियां भी पुरुषों के प्रति आसक्ति भाव से जीती ह। मन में आ रहे परिवर्तित विचार भाव की प्रबलता से पता नहीं चलता , कि कब दूसरे के भाव अपने मन में आ जाते हैं । साथ साथ रहते हुए जिसके कारण से पुरुष में अंत समय में स्त्री मन भावनाएं हो जाती हैं और स्त्री में अंत समय में पुरुष मन भावनाएं हो जाती हैं।। पहले चरण में जो भी जीव जिस लिंग को लेकर पैदा होता है । वह उस लिंक के कार्य को सफल समाप्त समापन करने के बाद प्रथम जीव की लिंगीय भावनाएं उस लिंगीय कार्य को करने के बाद उस जीव में लिंगीय कार्य पूरा होने के बाद उस लिंग की प्रजनन क्षमता समाप्त हो जाती है । तो उसके बाद उसके अंदर दूसरे लिंग के नर में नारी के नारी में नर के गुण लक्षण चिन्ह पैदा होने लगते हैं । जब दूसरे लिंगीय के गुण लक्षण चिन्ह पैदा होने लगते हैं जैसे जैसे दूसरे लिंग के गुण लक्ष्यों में पूर्णता आती जाती है और जैसे ही दूसरे लिंग के गुण अपनी अधिकतम प्रतिशतता में जीव के मन में आ जाते हैं । वह मर जाता है अर्थात पुरुष मरते समय स्त्री बनकर मरता है और स्त्री मरते समय पुरुष मनसे मरती है ।

परंतु जो लोग योगिनी साधन तंत्रोक्त विधि से करके योगिनी विद्या पारंगत हो जाते हैं । ऐसे अजयपाल जोगी लोग अपने जीवन को अधिकांशतः योगिनी की स्त्रियों के मन के अनुसार जीते हुए निरोग शरीर और अधिक आयु प्राप्त करते हैं । इसमें बहुत सारे ऐसे साधु महात्माओं का वर्णन है जैसे प्रहलादजानी गुजरात में , जो पुरुष होकर भी इस स्त्रियों चित भावव भंगिमा वेश में लाल वस्त्रों में इसके अलावा अन्य तंत्रोक्त साधु भी है जो पुरुष होते हुए भी चटक लाल रंग के नारी पसंद वेश में रहते हैं। यह लोग जनसाधारण से अलग रहते हैं और जनसाधारण को भी इनसे दूर रहने की जरूरत है क्योंकि यह स्त्रियों की मानसिकता के लोग होते हैं । पुरुष होते हुए स्त्रियों चित्र मानसिकता अपनाना वह भी युवावस्था में और स्त्री उचित होते हुए पुरुष मानसिकता अपना ना वह भी युवावस्था में समाज में अच्छा नहीं समझा जाता यदि ऐसा विचित्र कृत्य सभी करने लगे तो समाज में सृष्टि निर्माण कार्य का कर्म कैसे सफल होगा इसलिए समाज में इस अप्राकृतिक सोच को अपनाना उचित नहीं कहा जाता।यह अनुचित मानसिकता होती है।।

14 या 13 विद्या 64-कला पुस्तक में इन योगिनीओ के 64 नाम का अलग-अलग महत्तम है जो ब्रह्म की 12 + 1 = 13 कलाओं से संबंधित है जिसमें तीन link4u के विधान से 13 गुण बच्चे के 13 गुण युवा के 13 गुण वयस्क के और 13 गुणा वृद्धि के आयु के अनुसार 13 चौका 64 अर्थात किसी भी मनुष्य का आयु पर्यंत वृद्धावस्था में भी सुख भोग करते हुए निरोग शरीर से रहना योगिनी की कृपा माना जाता है । तंत्रोक्त शास्त्र में इसे योगिनी या पूर्व की मरे हुए सिद्ध स्त्री आत्माओं के सानिध्य से रहते हुए मनोकामना पूर्ति करते हुए जीवन को योगिनी कृपा कहते हैं यह योगिनी कृपा सिद्धि साधना बहुत भयंकर खतरनाक है जिसे करते समय अधिकतर साधक पहले चरण में मर जाते हैं दूसरे चरण में पागल हो जाते हैं बिना गुरु के सही सिद्धि करने से और जो तीसरा चौथा चरण सतगुरु की कृपा से पूरा हो जाता है तो मनुष्य जीते जी रिद्धि सिद्धि योग ऐश्वर्य पूर्ण जीवन जीता है।

आपके प्रश्न का जवाब का वैज्ञानिक आधार :— मन की तीन अवस्थाएं होती हैं 1:: सामान्य चेतन अवस्था 2:: विशेष अवचेतन अवस्था 3:: विशिष्ट सुपर चेतन अवस्था ।। 1. सामान्य चेतन अवस्था में मनुष्य का मस्तिष्क जो विचार ग्रहण करता है वही सही या गलत विचार समस्या समाधान के समय सुनकर मन पूर्व में डले विचार को दिमाग को भेजकर संचालन करता है यदि गलत विचार दिमाग में डाला गया है तो वही गलत विचार समस्या निदान के समय आ करके गलत सूचना देकर काम को बिगाड़ देता है । यदि सही विचार मस्तिष्क में डाला गया है तो समस्या समाधान के समय सही विचार आ कर सही समस्या समाधान कर देता है । परंतु अवचेतन मन की कार्यप्रणाली थोड़ा अलग है यह हजार लाख बार दी गई सूचना विचार को पकड़ता है उसके बाद अधिक संख्या में संग्रहित सूचना पर आधारित पर आदत बनाता है । सोच बनाता है । जब भी कोई समस्या सामने आती है तो उस समस्या के पैदा होने की भूमिका बनाने से पहले समस्या पैदा करने से पहले समस्या का निदान करने लगता है । जिससे मनुष्य समस्या उत्पन्न होने से पहले अवचेतन मन के द्वारा दी गई सूचना के आधार पर अपने आप को बचा लेता है जीवन क्षय नहीं होता और समस्या भी हल हो जाती है ।जिससे मनुष्य अपने जीवन में अधिकतर कामयाब होता रहता है । अवचेतन मन का संबंध अधिकतर सृष्टि नियंता संचालक से जुड़ा होता है यह स्वतंत्र नहीं होता अपने लिए विशेष कुछ नहीं करता सोचता जबकि सुपर चेतन का मन हमेशा अपने लिए सोचता है यह सुपर चेतन से तालमेल मिलाकर अपने लिए अधिक से अधिक गुण और गोपनीय सूचनाएं भी सृष्टि से निकाल लाता है । 84 योगिनी सिद्धि में इसी सुपर चेतन मंन की कार्य पद्धति के बारे में नारी रूपी देवी या नारी रूपी महिला का उससे दायित्व एवं वर्चस्व दिया जाता है ।जब सुपर चेतन मन वाला व्यक्ति अपने मन में नारी देवी मूर्ति का पूजा भाव से स्त्रियों चित भाव भरता है तो वह अवचेतन मन द्वारा मानसिक योगिनी निर्माण याअपने मन में का देवी निर्माण कहा जाता ह । जब सुपर चेतन मन वाला व्यक्ति अपने मन में नर देवता भगवान या विशेष पुरुष का भाव भरता है । तो ऐसे मैं उस विशेष सुपर चेतन मन वाले पुरुष में देवी या देवता के रूप में योगिनी के रूप में उसका अवचेतन मन उससे उससे संबंधित ब्रह्मांड की महत्वपूर्ण सूचनाएं दे देता है इसे योगिनी सिद्धि कहा जाता है । यदि उसे उसका मन आंखों के द्वारा दृश्य दिखा कर सूचना देता है तो इसे मानसिक दूर बोधता / टेलीपैथी तथा मन से दूर दर्शन कर लेने की क्षमता / टेलीविजन कहते हैं ।यदि उसे कानों के द्वारा शब्द बात बता कर सूचना देता है तो इसे कर्ण पिशाचिनी सिद्धि कहा जाता है। कर्ण पिशाचिनी सिद्धि में मनुष्य का अवचेतन मन उसे एक विशेष स्त्री बनकर ब्रह्मांड की गोपनीय सूचनाएं समय से पहले देता है जबकि उसका सामान यमन उस अवचेतन मन द्वारा दी गई सूचना को एक अन्य स्त्री या पुरुष द्वारा दी गई गुप्त सूचना कर्ण पिशाचिनी सिद्धि के रूप में ग्रहण करता है इसमें उसका अवचेतन मन का सामान्य अवस्था से अधिक सक्रिय हो जाना ही उसे सुपर चेतन अवस्था में ले जाता है अक्सर ऐसे लोग प्राथमिक लेवल पर अपने आप अपने मन से बातें करते हुए देखे जा सकते हैं जिनमें उनका मन दूसरा आदमी बनकर सूचना का जवाब देता है और उनका निजी मन प्रश्न समस्या सूचना देता रहता है जबकि अवचेतन मन का सुपर चेतन रूप उसे प्रश्न समस्या सूचना के जवाब देता रहता है यह सारी क्रियाकलाप एक मनुष्य की खोपड़ी में दोनों मनो के बीच आपस में होती है जबकि मनुष्य यह समझता है कि उसे कोई दूसरा बात कर रहा है। इस पर कहा गया है कि यदि आप बुद्धिमान होना चाहते हैं तो अपने मन से बातें करना सीखें यह विशेषता बाइपोलर डिसऑर्डर दिमाग वाले लोगों में राहु प्रधान लोगों में पाई जाती है।

ऐसी अनेक सिद्धियों के वर्णन चौसठ योगिनी विद्या में वर्णित हैं जिन्हें कुशल तांत्रिक गुरु के नियंत्रण में सीखना उचित है।

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