इसका बहुत ही आसान सा नियम है :— विधाता ने हम सभी को भूमंडल पर भेजने के साथ ही यह नियम बनाया है कि उसने हमारे लिए सभी कर्म कार्य भोग भोजन क्रियाओं कलापों का कोटा सीमाएं निर्धारित की हैं । यदि हम उन सभी जैविक क्रियाओं को अति शीघ्रता से जल्दी जल्दी करने लगते हैं कि हम उन्हें औरों की तुलना में अधिक मात्रा में करके औरों की तुलना में अधिक यौनानंद प्राप्त करें तो हमसे हमारी वह क्षमता रोक दी जायेगी या फिर जीवन की निरंतरता को देखते हुए कम कर दी जायेगी जिसके कारण आज के किशोरों की प्रजनन क्षमता बाधित /कम हो गई है ।
जो लड़के लड़कियाँ समय से पूर्व जल्दी से यौनक्रियाएं सीखकर जल्दी से यौनाकर्षण में फंस कर जल्दी से यौनाचार में लिप्त हो जाते हैं उनके शरीर में यौनक्रिया कर्म का आधार यौवनरस पुरुषों में वीर्य स्त्रियों में रज स्राव की कमी हो जाती है । जिससे वे समय से पहले बूढ़े बुढ़िया होकर जल्दी से आयु पूरी करके जल्दी दुनिया में से चले जाते हैं। अल्पायु हो जाते हैं । पुरुष 45 से 50 की आयु में पुंसत्व हीन न्यून वीर्यवान हो जाते हैं स्त्रियों को 35 से 40 वरिष्ठ की आयु तक रजोनिवृत्ति संतान उत्पत्ति में अक्षमता आ जाती है ।परंतु जो लोग उचित सही यौन शिक्षा लेकर उचित समय पर उचित परिमाण में सीमित यौनक्रियाएं करते हुए सीमित मात्रा में यौनानुभूतियाँ यौवन आनंद लेते हैं उन पर यौवन /जवानी ज़िंदाबाद अधिक समय तक टिकती है ऐसे लोग 75 से 95 वर्ष तक यौवनरस क्षमता पूरित रहते हैं ,स्त्रियाँ 55 से 75 वर्ष तक यौवनरस क्षमता पूरित रहती हैं ।
ऐसे में खुद को बेहतर बनाने के लिए अपनी यौन शक्ति का इस्तेमाल बहुत ही सोच समझ कर करना चाहिए । अपने यौवनरस का अनावश्यक रूप से क्षय नहीं करना चाहिए हस्त मैथुन ,पशु मैथुन , समलैंगिक मैथुन , आयु अंतर भेद मैथुन से बचना चाहिए ।
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