दार्शनिक है या आध्यात्मिक है यह दोनों दूसरे लोगों को मूर्ख बनाने के लिए अति बुद्धिमान लोगों ने शब्दों का निर्माण किया है जिसमें दार्शनिक लो वे लोग आते हैं जो अपने जीवन को अपने हित के अनुसार बने अपने हित कारक जीवन के अनुसार जीते हैं जबकि आध्यात्मिक वर्ग में वे लोग आते हैं जिन्हें अर्ध सत्य, अर्ध ज्ञान , भ्रम ज्ञान होता है । जिसमें आधा ज्ञान तम का वह दूसरों से लेते हैं और आधा ज्ञान सत्य का उनका अपना निजी होता है ।इसकी व्याख्या सभी लोगों ने अपने अपनी हिकमत के अनुसार की है दार्शनिक लोगों को आधुनिक सोच के अनुसार परम बुद्धिमान परम विवेकी कहा समझा माना जाता है जबकि आध्यात्मिक लोगों को अपना जीवन दूसरों के अनुसार जीने के कारण उन्हें भ्रम ज्ञानी समझा जाता है । जबकि आध्यात्मिक सोच के लोग अपने आप को ब्रह्म ज्ञानी समझते हैं वह समझते हैं कि उन्हें परम सत्य का दर्शन हो चुका है ईश्वर का दर्शन हो गया है।जबकि वे भूल जाते हैं कि उनके पास उनकी अपनी निजी मौलिक सोच तक तो नहीं है । उन्होंने सारा का सारा ज्ञान दूसरों के द्वारा सुनकर पढ़कर हासिल किया है । जिस वजह से वह आध्यात्म वादी अक्सर प्रेषित दुखी और परेशान रहे हैं । पुरानी सोच के अनुसार इसका उल्टा है आध्यात्मिक लो परम भक्त ईश्वर मार्ग्य होते हैं दार्शनिक लोग ईश्वर विरुद्ध मार्ग्य नास्तिक कहे गए हैं ।
बरहाल अभी तक मेरे विचार से यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो चुका हैःः कि आध्यात्मिकता क्या है ? दार्शनिकता क्या है ? और जीवन की वास्तविकता क्या है ? जिससे जानकर मनुष्य अपने जीवन के बारे में दूसरों के जीवन के बारे में पूर्ण रूप से जानकर ;; अपने आपको दुख कलेश दूर करके अपना जीवन सुख से जिये ; दूसरों के दुख कलेश को दूर करके दूसरों का जीवन सुख / खुशियों से भर दे ।
अब आते हैं आपकी शंका समाधान पर कि गूगल में इतिहास में संत लोगों को दार्शनिक बताया गया है क्यों इसके बारे में मैंने जगह-जगह एक ही बात कही है कि अपना जीवन अपनी क्षमता को पहचान कर अपनी सोच के अनुसार जिया जाता है तो जीवन में दुखों का प्रतिशत घटकर सुख का प्रतिशत बढ़ जाता है इसी सत्य को पुराने युग में इतिहास में जिन लोगों ने समझा पहचाना अपने जीवन को खुशियों की अधिकता से भर दिया । अपने जीवन की दुखों कठिनाइयों को कम कर दिया उनकी जीवनधारा से प्रभावित होकर दूसरे लोगों के जीवन में भी खुशियां बढ़ीं दुख परेशानियां घटी । , ऐसे में वे संसार में अभिशप्त जीवन जीने वाले लोग अपना जीवन दार्शनिकों और संतों के अनुसार जीने से सुखी समृद्ध हुए और वे दार्शनिक और संत लोग लोग सुख का मार्ग बताने वाले कहलाए । इसी सोच के चलते हुए संसार में आज तक नए-नए धर्म उत्पन्न होने नए धर्म के अनुसार नई नई संस्कृति बनी फैलने का सिलसिला बदस्तूर जारी है जिसमें कुछ संस्कृतियों प्रेम और ज्ञान के प्रभाव से बड़ी जैसे ईश मत ईसाइयों का,क्ष ब्रह्म मत ब्राह्मणों का , वैदिक मत वेदांती यों का , तो कुछ संस्कृतियाँ हिंसा और अज्ञान के प्रभाव से बढ़ी । कारण कि उन लोगों ने अपने जीवन में उत्पन्न समस्याओं का हल हिंसा से करना सीख लिया और हिंसा को श्रेष्ठ मानते हुए दूसरे जीवों को हिंसा का कारण समझते हुए उन्हें नष्ट करने का प्रयास ज्ञान संघर्ष और युद्ध अच्छा लगा जिन्हें दूसरे लोग अपना जीवन जीने में बाधा उत्पन्न करने वाले नजर आते थे।इस प्रकार से तरह-तरह के धर्म संस्कृति उत्पत्ति प्रचार प्रसार का सिलसिला आज तक जारी है भविष्य में जारी रहेगा इसका मूल कारण है मानव जीवन को जीने में निजी सोच के कम होने से उत्पन्न हुई तरह-तरह की समस्याएं ःःःःःः
भारत का बुद्धिजीवी वर्ग आध्यात्मिक है वह आज भी अपने पूर्वजों के द्वारा बनाए गए जाति कर्म धर्म के ज्ञानमार्ग पर ज्यों का त्यों चल रहा है । वह अपने लिए नया मार्ग ज्ञान का कर्म का धर्म का खोजना उचित नहीं समझता और ना ही प्रयास करता है । जिससे जीवन पद्धति सरल और आसान हो सके वह आज भी अपना जीवन जीने के लिए दूसरे बुद्धिमान लोगों द्वारा बनाए गए तरह-तरह के जाति नियम , धर्म नियम , कर्म नियम के अनुसार दुखी और परेशान होता हुआ अपना जीवन दूसरे लोगों के द्वारा बनाए गए तरह-तरह के धर्म के ठेकेदारों के नियंत्रण में जी रहा है । भारतीय क्षेत्र में रहने वाला मनुष्य अपने हित के अनुसार अपने लिए अपना धर्म अपना कर्म अपना नियम अपना ज्ञान जिससे अपना जीवन सुविधा पूर्वक व्यतीत हो । भारत क्षेत्रों में रहने वाला अपने लिए अपना धर्म अपनाकर अपनी जाति का निर्माण खुद नहीं करता । वह अपना जाति धर्म कर्म अपना ज्ञान भी दूसरों के आश्रित होकर जीता है। दूसरों के ज्ञान के अनुसार जीता है उसमें अपने हित के लिए निजी सोच पैदा नहीं हुई है जिसके कारण भारतीय क्षेत्र में अनेक असंख्य धर्म मत , जात मत , कर्म मत चल रहे हैं और अनेक धर्म के संस्थापकों के अनुयाई अपने धर्म के मानने वालों से जीवन जब जीने दूंगा जब मेरे नियम कानून के अनुसार अपना जीवन जियो गे तो तुम्हें अपनी कमाई में से मुझे कुछ ना कुछ धन बिना कर्म किए देना पड़ेगा । जबरन जीवन जीना दंड (जजिया ) वसूल कर उन्हें अपने अपने धर्म में बांधकर उन दूसरे लोगों को अपने अपने धर्म के अनुसार उनका अपना जीवन जीने देते हैं । कहने का अभिप्राय है भारतीय क्षेत्र में लोगों को अपना जीवन अपना धर्म अपना कारण के अनुसार स्वतंत्र रूप से अपना जीवन जीने की आजादी अभिव्यक्ति का अधिकार जागरण जागरुकता नहीं है जिससे भारतीय आध्यात्म वादी दृष्टिकोण आधा अध्ययन आधा तम के अनुसार अपना अभिशप्त जीने को मजबूर हैं ।
जबकि पाश्चात्य बुद्धिजीवी वर्ग दार्शनिक है वह समाज को देखता है व्यवसाय को देखता है अपना हित ढूंढता है फिर उसके अनुसार अपना जीवन जीने का विकल्प खोजता है और अपने जीवन को अपने जीवन विकल्प के अनुसार अपना जीवन जीने का प्रयास करता है । कहने का तात्पर्य यह है कि वह दर्शन या दृष्टि प्रधान सोच का है जो देखे गए को दिखाई दिए को अधिक सत्य समझता है । पाश्चात्य बुद्धिजीवी वर्ग अपने लिए अपना सत्य को सर्वश्रेष्ठ सर्वोपरि मानते हुए अपने जीवन को अपने नियम कानून अपनी शर्तों के अनुसार जीता है पाश्चात्य बुद्धिजीवी वर्ग के लोगों में दूसरे लोगों के द्वारा दूसरी संस्कृतियों के द्वारा प्रेषित किए गए , थोपे गए धर्म जाति नियमों का प्रभाव कम होता है वह अपने जीवन को अपने क्षेत्र के अनुसार बनी अपनी धर्म संस्कृति के अनुसार अपना जीवन जीते हैं ।
जबकि भारतीय बुद्धिजीवी वर्ग सुने सुनाए को जो माता-पिता गुरुजन से सुना गया हो उसे अधिक समस्त सत्य समझता है , और जो वह देखता है उस पर वह शंका करता है उसकी पुष्टि के लिए वह माता-पिता , गुरुजन , मित्र मंडली , सुरेश शिक्षित सलाहकारों के सानिध्य में संगोष्ठी मंडली में जाकर उनके सामूहिक विचारों से मेल मिलाप करा कर अपने सत्य का अपने लिए निर्धारण करता है । उसके बाद अपना जीवन जीने के लिए वह अपने माता-पिता के अनुसार निर्धारित बना पितर मार्ग पर जीवन जीता है , या फिर सत्संग और गुरु धर्म के अनुसार बने निर्धारित गुरु धर्म मार्ग पर के अनुसार अपना जीवन जीता है ।जिसमें उसका अपना विवेक शामिल नहीं होता क्योंकि वह अपना जीवन अपनी ज्ञान क्षमता विवेक को पहचाने बिना अपने जीवन को अपने माता पिता के अनुसार निर्धारित पितर मार्ग के अनुसार जीता है या गुरु ज्ञान धर्म के अनुसार बने निर्धारित गुरु धर्म मार्ग के अनुसार जीता है । जिसमें उसकी अपनी इच्छाएं कामनाएं भावनाएं निरंतर दमन होती / क्लेशित होती रहती हैं । जिससे वह अपना जीवन पितर मार्ग या गुरु मार्ग के अनुसार जीने को अभिशप्त होता है ।अपने जीवन को अपनी सोच अपना हित अपना ज्ञान अपने विवेक के अनुसार नहीं जीता । उसके नित्य दैनिक जीवन में माता पिता पिता और गुरुजनों का नियम हस्तक्षेप निरंतर बना रहता है जिससे वह अपना जीवन जीने में माता पिता गुरु से तरह-तरह के नियमों से परेशान होता हुआ , बाधित होता हुआ , दूसरों के नियमों से बने अपने लिए नियम कायदे कानून के अनुसार जीवन जीने पर अक्सर गलत परिणाम पाता हुआ जीता है । जिससे वह कभी पितरों माता पिता , तो कभी गुरुओं को गलत ज्ञान देने का दोषी मानते हुए अपने माता-पिता और गुरुओं को अपनी जीवन पद्धति का जनक मानते हुए उन्हें तरह-तरह के दोषों का जनक मानते हुए तरह-तरह की सभ्य गालियां असभ्य गालियां भद्रेश भाषा के शब्दों में , स्वदेशी भाषा के शब्दों में , विशेष विदेशी भाषा के शब्दों में गालियां देता हुआ अपना जीवन जीता ह ।
No comments:
Post a Comment