क्या विज्ञान के अनुसार पारस पत्थर संभव है?


विज्ञान के अनुसार पारस पत्थर की कल्पना एक असंभव मिथक है पहले यह कहा जाता था कि पारस पत्थर से लोहा लगने पर लोहा सोने में बदल जाता है। ऐसा ही एक दूसरा मिथक सुना था कीनियागर तांबे से सोना बनाते थे ।यह सभी बातें हैं समाज के उन निकम्मे लालची आलसी लोगों को मेहनत के मार्ग पर डालने के लिए बनाई गई है । इनके पीछे बहुत समझदारी भरा हुआ कदम होता है ।

लोहे से सोना बनना बिल्कुल असंभव है ,गलत है । कारण कि लोहे का एक निश्चित परमाणु भार (55.85) परमाणु क्रमांक(26) होता है । सोने का एक अलग निश्चित परमाणु भार (196.97)और परमाणु क्रमांक(79) होता है। किसी भी पदार्थ की शुद्धता उसके एक जैसे एक समान परमाणु भार और एक समान एक परमाणु क्रमांक पर निर्भर करती है । लोहे के परमाणु का आकार अलग होता है सोने के परमाणु का आकार अलग होता है । ऐसे में किसी भी तत्व का किसी दूसरे तत्वों में परिवर्तन होना उसके लिए बहुत जरूरी है , उसका परमाणु क्रमांक और परमाणु भार का बदल जाना । कहना बहुत आसान है लेकिन दैनिक व्यवहार में मनुष्य ने अभी तक ऐसी कोई विधि तकनीकी नहीं विकसित की है जो लोहे को सोने में बदल सके या ताबे को सोने में बदल सके। यह बात अलग है कि शुद्ध ताबा और शुद्ध सोना दोनों के गुण एक समान नहीं होते आपस में काफी हद तक मिलते हैं । लेकिन पारकी लोगों की नजर से सोना अलग पहचान लिया जाता है तांबा अलग पहचान लिया जाता है ।

इसकी वास्तविकता कुछ अलग है जो व्यापार पर निर्भर है जैसे मिश्र के लोग विश्व में जगह-जगह व्यापार करते थे । मिस्र के किमयागर रसायन विज्ञान के ज्ञाताओं ने तांंबे से कुछ मिश्र धातु ऐसी बनाई जिनका मूल्य सोने के मूल्य से अधिक था । आज भी सोने के आभूषणों में तांबा मिलाकर उन्हें कठोर किया जाता है और सोने में तांबे से टांका लगाकर जोड़ा जाता है । ऐसे में मिश्र के व्यापारी मिश्र के कीमियागरों (रसायनज्ञों ) तांबे की सोने जैसी मिश्र धातु बनवाया करते फिर अपनी तांबे की मिश्र धातु को बेचकर और सोना खरीदते थे । नैपोलियन के समय में जब एल्युमिनियम धातु का आविष्कार हुआ था जर्मनी के लोगों में इस एल्युमिनियम को खरीदने की होड़ मची वे अपनी चांदी को एल्युमिनियम से अधिक मात्रा में बदलने लगे ।जिससे एल्युमिनियम का व्यावसायिक व्यापारिक नाम जर्मन सिल्वर पड़ गया । इसी तरह मिश्र के व्यापारियों की दुनिया भर में अन्य लोगों से तांबे से या तांबा मिश्र धातु के सोने से धातु विनिमय करके बुद्धि चोरता से मिश्र के लोगों के पास और लोगों की तुलना में अधिक सोना इकट्ठा हो गया । और दुनिया भर में लोग इसे इस तरह से कहने लगे कि मिश्र के कीमियागर तांबे से सोना बनाते थे । यह मिथक आज भी किताबों में जो का क्यों चल रहा है । एसा ही करिश्मा दक्षिणी भारत के मसाला व्यापारी लोगों ने करके भारत देश को सोने की चिड़िया बना दिया था ।जिसका अर्थ होता है कि भारत में चिड़िया / निम्नस्तरीय लोगों के पास सोना होता था ।और अमीर लोग अपनी चिड़ियों को सोने की चोंच मंड़वा कर उनके पैरों में सोने के छल्ले बनवा कर रखते थे।

इसी प्रकार से पारस पत्थर का मिथक है कि पारस पत्थर को यदि लोहा छूते तो वह सोने में बदल जाता है । मैंने ऊपर पहले ही लिखा है सोने का परमाणु भार क्रमांक अलग है लोहे का परमाणु भार क्रमांक अलग है और दोनों के परमाणुओं की संरचना में बहुत अधिक अंतर है । सोने के परमाणु लोहे के परमाणु से बहुत अधिक बड़े होते हैं । ऐसे में हम यह कहें कि पारस पत्थर से लोहा सोने में बदल जाता है यह बिल्कुल गलत है इस घटना को इस प्रकार से समझा जा सकता है । कि जो लोग निगम्मे आलसी होते थे उन्हें सबसे आसान काम पशु चराने का दिया जाता था । वह पशु चराते और जब उनके पशु बढ़ जाते तो उस बड़े हुए पशुओं को बेचकर उनसे सोना खरीदते और इस प्रकार कहा जाता कि जंगलों में पारस पत्थर है जिस पर लोहा लगने से वह सोने में बदल जाता है । यह घटना की अभिव्यक्ति का शातिर आना धूर्तता पूर्ण तरीका है जिसमें रस छंद अलंकार कई तरह के वाकछल छिपे हुए हैं ।


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