हिन्दूओं में छोटे बच्चों (शिशुओं) के मृत्यु पर उसे जलाने के बजाय दफनाया क्यों जाता है?

 


बृहदारण्यक उपनिषद के अनुसार ब्रह्म के दो अवस्थाएं हैं पूर्ण अवस्था जिसमें ब्रह्म युगल अवस्था मेंं या अर्धनारीश्वर के रूप में संपूर्ण ब्रह्म रूप से होता है जिसमें ब्रह्म स्वयं सृजन योग्य निर्माण अवस्था जिससे प्रजनन कहा गया है उसमें ब्रह्म को संपूर्ण ब्रह्म माना गया है । जिसमें वह अपने जैसी स्वफ्रेम कृति का सृजन स्व सृर्जन समर्थ कर्म कर सकने योग्य समर्थ होता है । वह अवस्था युगल अवस्था पोषक सपुंसक लिंंग कि कहीं गई है ।दूसरी ब्रह्म की अपूर्ण अवस्था जिसने ब्रह्म अपनी मात्र एक लिंगीय शरीर के रूप में नर लिंग या स्त्रीलिंग शरीर के रूप में होता है । वर्तमान के प्राणी शास्त्र के अनुसार, और प्राचीन प्राणी शास्त्र वृहदारण्यक उपनिषद के अनुसार उस्मानी प्रजनन गर्म करके संतान उत्पत्ति करते हैं वही प्राणी सपुंसक हैं । जब तक प्राणी प्रजनन कर्म करके संतान उत्पन्न नहीं करते तब तक उनका लिंगीय शरीर सपुंसक नहीं कहा जा सकता । ऐसे में उन्हें नपुंसक की श्रेणी में गिना जा सकता है जैसे बाल अवस्था और वृद्धावस्था जिसमें शरीर में लिंग लक्षण विद्यमान होते हैं परंतु प्रजनन कर्म में बाल और वृद्ध दोनों समर्थ नहीं होते ऐसे में कहा जाता है कि उनके अंदर अब कोई विशेष स्पष्ट नर लिंग या नारी लिंग लक्षण नहीं है । आता है हर हर जीव शरीर से सपुंसक लिंगीय परन्तु मन से नपुंसक लिंगीय पैदा होते हैं ।जो बाद में समाज में अन्य जीवो को देखकर अपने लिए एक विशेष लिंग मन में धारण करते हैं कि वह नर लिंग है यह नारी लिंग है ।यह जरूरी नहीं है कि जो नर्लिंग है वह नर हो उसके अंदर नारी भावना होने से वह जटिलतम लिंग जीव शरीर हो जाता है । इसी प्रकार से जो नारी लिंग है वह जरूरी नहीं उसके अंदर नर भावना होने से वह जटिनतम लिंग शरीर जीव हो जाता है । इस प्रकार से सपुंसक लिंगीय शरीर की पुष्टि तभी होती है ।जब उनके अपने अंश से बच्चे पैदा होते हैं । जिन्हें औरस संतति या अंगिरस /अंगों के रस से उत्पन्न पुत्र पुत्री कहा जाता है । इसलिए नर्लिंग हो या नारी लिंग दोनों ही अर्लिंग / अर्ध लिंग जाते हैं । एक पूर्ण लिंग वह सब बनते हैं जब वह दोनों मिलकर अपने जैसे स्वयं सृजन कृति निर्माण में समर्थ होते हैं । एक लिंगी है कर्म कृति बनाने के लिए दोनों जीवव परस्पर मिलकर मैथुन कर्म करके सृजन कार्य करते हैं अपने जैसा संतान उत्पत्ति करते हैं इसके लिए दो अलग-अलग विपरीत लिंगी है नर लिंंग नारी लिंग की शादी की जाती है । संतान उत्पत्ति कर्म ही 59 दिन की सार्थकता है। इसके लिए जिन लोगों की शादी हो जाती है यह माना जाता है कि वे अर्धनारीश्वर के रूप में संपूर्ण शरीर धारी हो जाते हैं या युगल अवस्था में संपूर्ण धारी हो जाती हैं ।क्योंकि वह वृहदारण्यक उपनिषद में स्पष्ट बताया गया है कि ब्रहम की पूर्णता तभी है जब ब्रह्म अपनी जैसा अपने जैसा जीव अपने आप रच सकने में निर्माण करने में समर्थ हो जाए ।यदि ब्रह्म अपने जैसा जीव रचने में अपने जैसा निर्माण करने में समर्थ नहीं हो पाता है तो तब तक ब्रह्म अपूर्ण रहता है । उस ब्रह्म की अपूर्णता को पूर्ण करने के लिए वह अपूर्ण लिंग शरीर जीव बार-बार दूसरे अपूर्ण लिंग यह जीव शरीर के पास जाकर एक पूर्ण ब्रह्म बनकर निर्माण कार्य में समर्थ होता है ।

वृहद अरण्यक उपनिषद् में सबसे पहले श्लोक है :- ओम ब्रह्म इदं पूर्णम् यद् इदं अपूर्णम् इदं अपूर्णात् मे वा वशिष्यते पूर्णम् ।

इसी कथन को ध्यान में रखते हुए आपका जो सवाल है कि छोटे बच्चों को मृत्यु पर जलाने के बजाय दफनाया क्यों जाता है तो इसका जवाब ऊपर पैराग्राफ में आ चुका है इसके लिए मनुस्मृति का भी आप संदर्भ देख सकते हैं जिसमें लिखा है केवल शादीशुदा या शादी आपका मनुष्य को ही संपूर्ण सोलह संस्कारों का अधिकार है जिन लोगों की शादी नहीं होती जिनके संतान उत्पन्न नहीं होती जो शादी से पूर्व बिना शादी के एवं अविवाहित अवस्था में या दुर्घटनाग्रस्त होकर मर जाते हैं तो उन सभी को दफनाया जाता है । जिससे वह अपने शरीर से लगाव रखते हुए अपने लिए शीघ्र दूसरी शरीर के निर्माण का प्रयास करें । जल्द से जल्द जन्म देकर अपनी शेष मनोकामना ओं को पूरा करें । देखा गया है जिस मनुष्य की शादी हो जाती है संतान परिवार बन जाता है वह पत्नी पुत्र और संतान के द्वारा जो विशेष ज्ञान प्राप्त करता है जिससे विशेष वैराग्य होता है उस वैराग्य की प्राप्ति संसार में अच्छे से अच्छा ज्ञानी श्रीमिश्राजी ब्रह्म पुरुष और कोई ऐसा ज्ञान नहीं करा सकता इसलिए मनुष्य को संतान उत्पत्ति पर विशेष जोर दिया गया है ।कि संतान हर किसी के होनी चाहिए अपनी औरस /अंगिरस हो और उस ना हो तो क्षेत्र संतान के अलावा अनेक तरीकों से संतान पैदा करनी चाहिए इसके लिए मनुस्मृति में 27 पुत्रों को वैध पुत्र का करार दिया गया है इस बात को ध्यान में रखते हुए बच्चों अविवाहितों को साधु सन्यासियों को जलाया नहीं जाता ह ।कि वह अभी आधे अधूरे हैं अपूर्ण हैं उन्हें पूर्ण होने तक उनके शरीर को नष्ट नहीं किया जाए।

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