क्या आप चान्द्रायण व्रत के बारे में बता सकते हैं?


व्रत का मतलब संकल्प /प्रण धारण करना ।। छंदोग्य उपनिषद के अनुसार श्रेष्ठ (श्रेय अष्ट / आठ उत्तम ) अष्टांग , योगसंकल्प धारण करते हुए आठ अधम संकल्प का त्याग करते हुए अपने मन मस्तिष्क की संरचना/बनावट में अपनी इच्छाओं के अनुसार परिवर्तन करते हुए श्रेष्ठ/उत्तम जीवन मार्गदर्शक बनते हुए अपने तन मन में शोधन करना जो अक्सर जीवन में भूल/गलतियां होते रहने जीव का जीवन बार बार बाधित होता रहते है ।अब यदि इस प्रतिक्रिया के लिए हम स्वयं को चंद्रमा के अनुसार प्रेरणा / प्रेरित होकर करते हैं तो यह चंद्रायण व्रत कहा जाता है ।

महर्षि धनवंतरी के अनुसार प्राणों का स्वामी सूर्य है । और शरीर का स्वामी चंद्रमा है ।।शरीर पर चंद्रमा का चंद्रकला ओं का प्रत्यक्ष विशेष प्रभाव पड़ता है जिसके अनुसार पूर्व चंद्रकला पूर्णमासी के समय जीवो के शरीर में जल / रज की मात्रा बढ़ जाने से वे हिंसक हो जाते हैं । अमावस्या के दिन जीवो के हिंसक भाव में कमी आ जाती है । इस प्रकार से जीव का शरीर चंद्रमा के अनुसार पूर्णमासी को हिंसा अमावस्या को अहिंसा के मध्य स्थिर रहते हुए सभी जीव अपना जीवन जीते हैं ।। जीवो को जीवन जीते समय अशुद्ध भोजन और जल ग्रहण करने पर तरह-तरह के रोग विकार पैदा हो जाते हैं । प्राचीन काल में लोग शरीर के विकारों का सामान भूखे रहकर करते थे उनका विश्वास था भूखे रहने पर रोग भूखा होकर कमजोर होकर मर जाता है । भूखा रहने से रोग के कारक कीटाणुओं का समुचित पोषण ना होने से रोग के कारक कीटाणु मर जाते हैं , कमजोर हो जाते हैं । इसी बात को ध्यान में रखते हुए पुराने ऋषि बुद्धि लोगों ने स्वस्थ लोगों को रोग होने से पहले चंद्रायण व्रत का सुझाव दिया था रोग होने के बाद चंद्रायण व्रत करना उचित बुद्धि की बात नहीं है अतः चंद्रायण व्रत वे लोग करें जिन्हें भूख विकार व्याप्त है जिनका भूख पर नियंत्रण नहीं जिन की भूख सही समय पर सही श्रम पर सही तरीके से खुलकर नहीं लगती है ।।

चंद्रायण व्रत का अर्थ है चंद्र कलाओं के अनुसार शरीर का शोधन करना ।। पहले शरीर को चंद्रकलाओं के अनुसार कृष्य / कमजोर करना और फिर बाद में शरीर को चंद्र कलाओं के अनुसार शरीर को वृष्य /वृद्धि करना शरीर के आयतन आकर में में वृद्धि करते हुए शरीर का पूर्व अवस्था में आ जाना ।। यह चंद्रायण व्रत पूर्णमासी के बाद शुरू होता है कृष्ण पक्ष की प्रथमा /पड़वा तिथि से , और इसका अंत होता है या पारण होता है शुक्ल पक्ष की पूर्णमासी को । चंद्रायण व्रत का विधान अपवित्र अन्नजल भक्षण कर लेने पर और अपवित्र मैथुन कर लेने पर शरीर शोधन मन शोधन के लिए किया गया है।।मनुष्य के भोजन के परिमाण की मात्रा उसके दांतों की संख्या पर निर्भर आधारित कही गई है जितने दांत उतने कौर /ग्रास /निवाला /गल्ला ।दोनों समय प्रातः काल और सायंकाल में कुल अन्न ग्रास की मात्रा 32 कही गई है ।प्रातःकाल में 16 सायंकाल में 16 कौर /ग्रास बताये गये हैं जिनको देखते हुए एक कौर एक समय दूसरा कौर दूसरे समय अन्न त्याग का विधान चंद्रायण व्रत में किया गया है।

इसमें मनुष्य चंद्र दर्शन करने के बाद ही रात्रि में अन्न जल ग्रहण करता है । दिन में अन्न जल ग्रहण नहीं किया जाता है ।यह इस्लाम के रमजान व्रत उपवास से अधिक कठिन ह । उसमें रमजान में सायंकाल को अन्नजल ग्रहण किया जाता है । और प्रातः काल में सूर्योदय से पहले अन्नजल करके पूरे दिन उपवास किया जाता है ।पूरे दिन अंजल ग्रहण नहीं किया जाता । जबकिचंद्रायण व्रत में अन्नजल ग्रहण का प्रावधान चंद्रकला के अनुसार चंद्र दर्शन करने के बाद अन्नजल किया जाता है और सूर्योदय से पहले प्रातःकाल में तारों की छांव में चंद्र दर्शन करके अन्न जल ग्रहण करके सूर्योदय होने के बाद अन्नजल ग्रहण नहीं किया जाता है ।। यह चंद्रायण व्रत निजी पातकी अपराध बन जाने पर जाने अंजाने मैं पातकी अपराध हो जाने पर किया जाता है ।

चाणक्य के अनुसार :— जो व्यक्ति अशुद्ध जल का भूल से सेवन कर लेता है जैसे मल शुद्धि के बाद बचा जल ,,या अन्य जंतुओं की विष्ठा कुत्ते बिल्ली आदि की , मनुष्य की विष्ठा मल मूत्र का अनजाने में सेवन / भोजन हो जाता है ।। रामचरित मानस के अनुसार :— अवैध अपवित्र नाखूनों वाले पशु बिल्ली परिवार पशु कुत्ता भेड़िया गीदड़ परिवार पशु , सरीसृप गोह ,कछुआ सांप परिवार पशु ,चमगादड़ बंदर , कौआ, गिद्ध हरियल मोर और मानव मांस आदि का मांस भक्षण /खा लेने पर मानव तनमन अपवित्र/ अशुद्ध हो जाता है । मनुस्मृति के अनुसार :— जाने अनजाने में पशुओं के साथ या पतित वर्णा स्त्रियों के साथ जानबूझकर यौन संबंध बना लेने के बाद मनुष्य अपवित्र /अशुद्ध हो जाता है । हातिमताई के अनुसार :- भूखे गाय ब्राह्मण कुत्ता बिल्ली की नजर से देखा हुआ , या सूंघा हुआ अन्न जल ग्रहण करने योग्य नहीं रहता है , इनकी नजर और श्वास विषाक्त होती है । छन्दोग्य उपनिषद के अनुसार पशुओं पक्षियों का झूंठा अन्न बिना शोधन किये खाने पर अपवित्र होता है।मलेच्छ का, चंडाल का झूंठा अन्नजल ग्रहण करने पर या इनके साथ सहभोज करने पर श्रेष्ठ मनुष्य अपवित्र /अशुद्ध हो जाता है । इनकी शुद्धि के लिए चंद्रायण व्रत का आर्य संस्कृति में विधान है मुझे इतना ही पता था । इससे ज्यादा जानकारी चाहिए तो किसी श्रेष्ठ कर्मकांडी शुक्ल ब्राह्मण से विचार विमर्श करें ।

आप आपके मन में यदि चंद्रायण व्रत करने का विचार आया है , तो स्थिति मैंने लिख दी है । आप जाने वैसे चंद्रायण व्रत करना हंसी खेल नहीं है , विशेष रूप से गर्मी और बरसात के मौसम में इससे ब्लड प्रेशर बहुत नीचे गिर सकता है ।। आगे आपका विवेक आप उत्तम जनों से परामर्श करके चंद्रायण व्रत का संकल्प लें वैसे मैं इसके पक्ष में कम हूं

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