भगवान इंद्र को मंदिरों में क्यों नहीं पूजा जाता?


इंद्र के बारे में या ब्रह्मा के बारे में यदि आप जानना चाहते हैं तो छांदोग्य उपनिषद अध्याय 8 खंड 8 9, 10 ,11 12, 13 ,14, 15 को पढ़ें जिसमें इंद्र के बारे में इंद्र और प्रहलाद पुत्र विरोचन की कथा दी गई है जिसके अनुसार इंंद्र एक विशेष ज्ञानी, विशेष बली, विशेष उद्योगपति, सर्व समर्थ पुरुष को कहा जाता है । जो परम भोगी भी है ।।चूंकि वो कर्मा है धर्मा है तो भोक्ता/भोगी भी है कारण कि सभी कर्मों का कारण आधार परिणाम भोग पर आकर रुकता है ।। छांदोग्य उपनिषद के अनुसार इंद्र और ब्रह्म दोनों ही अदृश्य विद्युत चुंबकीय सूक्ष्म शरीर के नाम हैं , जिनके सक्रिय होने से इंद्रियां / इंद्राणी धर्म धारण कर जीव को कर्म में समर्थ बनाती हैं और इंद्र के ब्रह्म के निष्क्रिय होने पर इंद्रियां शरीर में मौजूद होने पर भी धर्म धारण नहीं करती जिससे जीव कर्म करने में समर्थ नहीं होता है ॥ जिस देवता के आकार आकृति के बारे में चरित्र चित्रण के बारे में कुछ भी निश्चित नहीं कहा जा सकता जो आकार आकृति चरित्र चित्रण को अपने प्रज्ञा विवेक के अनुसार करम धरम परिणाम बदलने में समर्थ हो ऐसे इंद्र और ब्रह्मा की मूर्ति कैसे बनाई जाए किस तरह की बनाई जाए और उसकी प्रतिष्ठा मंदिर में किस तरह से की जा है यह मानव बुद्धि विधान से परे एक बात है ऐसे में मंदिर में इंद्र और ब्रह्मा की मूर्ति नहीं बनाई जा सकती है वैसे पुष्कर में राजस्थान में एक ब्रह्मा का मंदिर है शेष भारत में ब्रह्मा का मंदिर या इंद्र का मंदिर कहीं पर भी मौजूद नहीं है ऐसे में ब्रह्मा के मंदिर की उपस्थिति पर प्रश्न सूचक छंद बनता है।

छांदोग्य उपनिषद के अनुसार देव /सुर और दानव /असुर दोनों ने श्रवण कला का परंपरा से आत्मा के बारे में जाना जो इस प्रकार है आत्मा जरा आयु रहित , जन्म रहित, मृत्यु रहित , शोकरहित ,क्षुधा रहित तृष्णा रहित , सत्य काम, सत्य संकल्प है वही जानता है अनुभव पड़ता है जब तक इस वाक्य को इंद्र और विरोचन नहीं समझ सके उन्होंने दूसरे प्रकार से समझाया जो आंखों में होते हुए आंखों से देखता है जिसके कारण आंख देखने में समर्थ है वह इंद्र /ब्रह्म है । प्रहलाद पुत्र विरोचन विश्वास कर गया तब से असुर संस्कृति मानने वाले लोग दृश्य जगत को सत्य मानते हैं अदृश्य जगत को अदृश्य जगत को नहीं मानते हैं । इंद्र को शंका हुई और वह वापस प्रजापति के पास गया प्रजापति ने ब्रह्म ज्ञान दिया प्रजापति ने कहा जो शंका करता है शंका का हल ढूंढने की कोशिश करता है वह ब्रह्म है जो स्वप्न बनाता है ब्रह्म है सुप्त अवस्था में आनंदित रहता है वह ब्रह्म है ।जो ब्रह्म का आश्रय स्थल शरीर है उस में ब्रह्म की स्थिति शरीर भ्रम है , शरीर जो मरण धर्मा है सदैव जन्म मृत्यु से आच्छादित है जरा जीर्ण आयु परिवर्तन से युक्त मनुष्य को भूमंडल का वास चेतावनी देने वाला स्थल शरीर है जिसमें आत्मा परमात्मा के नियमानुसार सीमित समय के लिए कर्म करते हुए विभिन्न तरह के शरीर में निवास करते हैं ।

हिंदू धर्म में भगवान के आराध्य के दो रूप दो अवस्थाएं हैं निराकार अवस्था जो अदृश्य होने के कारण शक्ति हीन कही जाती है दूसरी दृश्य होने से शक्तिमान प्रभावशाली श्रेष्ठरूप श्रेष्ठ अवस्था प्रत्यक्ष साकार अवस्था कही गई है । जिसमें जीव को अपने से बड़े को काल्पनिक को समर्थ प्रज्ञा वन बलशाली सहायक जीव का निकट होने का एहसास होता है जिसके अनुसार मनुष्य का भगवान बड़े समर्थ मनुष्य जैसा , भैंसे का भगवान भैंसे से भी बड़े समर्थ भैंसे जैसा , हाथी का भगवान उस हाथी से विशाल बड़े समर्थ हाथी जैसा , और शेर का भगवान शेर से भी बड़ा शेर से भी ज्यादा समर्थ बड़े शेर जैसा होता है । यानी भगवान की कल्पना मनुष्य अपनी बुद्धि के अनुसार अपने से बड़े समर्थ सहायक जीव के रूप में करता है । मानव मत के अनुसार देवताओं में अधिक विशेषशक्ति रूप होने से देवता आराध्य कहे गए जो दृश्य है ,मंदिर में मूर्ति रुप से । लेकिन जो दृश्य नहीं है तो क्या उसे आराध्नाय श्रेष्ठ न माना जाए । जैसे गायत्री देवी /देगी /देती है याज्ञवल्क्य विरचित गायत्री उपनिषद के अनुसार गायत्री गायन की त्रिविधा त्रिपाठी लोकोक्ति शैली कहीं गई है ।गायत्री गायन की विधा अदृश्य है परा (अदृश्य) ,पश्यन्ती (भावभ्रम ),बैखरी (प्रत्यक्ष ) ,के रूप में परा रुप में विचार , पश्यन्ति रुप में जीव के भाव विचार की निष्क्रिय सक्रिय भ्रमी अवस्था और बैखरी रूप में कर्म कृति अवस्था । लेकिन श्रीराम शर्मा ने गायत्री को भी एक स्त्री के रूप में देवी बनाकर लोगों के सामने प्रस्तुत करके गायत्री देवी प्रतिष्ठान खड़ा कर दिया ।। इसी प्रकार भारत माता का अस्तित्व सन 47 से पहले नहीं था लेकिन बंगाल में रविंद्र नाथ टैगोर के शांतिनिकेतन में भारत माता नाम की देविका चित्र शक्ति प्रदर्शन चित्रकार ने चित्र बनाकर कर दिया । देवताओं के बारे में गायत्री महाविज्ञान के अनुसार सभी देवता शब्द रूप हैं जिसके पास जैसे शब्द हैं उसको अपने दिमाग में भरे संचित शब्दों के अनुसार उपलब्धि प्राप्ति होती है बाद में इन शब्दों को कर्म प्रभाव के अनुसार इनके समझदार लोगों ने चक्र महाविज्ञान के शक शक भेदन कला विश्लेषण से इनका देवी दर्शन किया और देवी दर्शन के बाद यह शब्द शक्ति लोगों को देवता/दानव /राक्षस बनाती है ।

ऐसे में जब इंद्र और ब्रह्म दोनों ही विद्युत चुंबकीय शक्ति वाले अदृश्य शरीर धारी है तो ऐसे में इनका सही रूप चित्र चरित्र कैसे बनाया जाए परंतु कुछ भी निकृष्ट लोगों ने इंद्र और ब्रह्म का परम भोगी लालची स्त्री प्रिय नारी आसक्त पुरुष के रूप में चित्रण कर दिया कहानियां घड़ी गई । जैसे ब्रह्मा काम उन्मुक्त अवस्था में अपनी पुत्री अहिल्या को पत्नी बनाने को प्रेरित हुए थे इसमें दिमाग लगाने की जरूरत है ब्रह्मा किसी मनुष्य का नाम था जो उस समय मौजूद था जो अय्ययाश स्त्री लोलुपता पूर्ण विवेक हीन था मर्यादा हीन था उसका मन अपनी बेटी पर आ गया और वह अपनी बेटी को पत्नी बनाने लगा ।

इसमें सोचने की बात यह है मनुष्य का नाम भगवान का नाम रख देने से मनुष्य भगवान नहीं बन जाता और भगवान का नाम मनुष्य नाम रख देने से भगवान मनुष्य नहीं बन जाता । मेरे एक साथी शिक्षक का नाम ओमब्रहम था । पहली बार जब ऐसे नाम का पता चला तुम्हें प्राप्त हुआ सोचने लगा क्या ऐसा भी नाम रखा जा सकता है तो क्या ओमब्रहम भगवान का नाम शक्ति सम्मान ले पाया इसका जबाब है नहीं ।। कुछ शातिर लोग इस नाम विधा के उपयोग से तरह तरह का खतरनाक घटिया साहित्य घड़ कर लोगों को पागल कर देते हैं ।बरगला देते हैं इसमें दोष सुनने वाले का है ज्यादा और बोलने वाले कम है क्योंकि बुद्धि जैसी चीज सभी के पास है । अपनी निजी उपयोग के लिए । ऐसे में लोग अपनी बुद्धि को दूसरों को गिरवी रख कर सोचना बंद कर दें या ना सोचे दूसरे लोगों के अनुसार सोचें बोले ऐसे में कभी उन धूर्त वक्ताओं की तो है ही धूर्त श्रोता भी दोषी है । जरूरत है अपना दिमाग अपने हित में अपने अनुसार उपयोग करने की । मंदिर के अंदर देवी देवता में पूजा का विधान बड़े शातिर धूर्त निकम्मे लोगों की खुराफात है जिसमें वह तरह-तरह की मूर्तियां कलाकृतियां बनवाते हैं उन्हें अपने मंदिर / ड्राइंग रूम / कला कक्ष / म्ययूजियम / संग्रहालय में रखवाते हैं और लोगों को कलाकृति दर्शन :: मूर्ति दर्शन कला से धन कमाते हैं जो मंदिर कहे जाते हैं ।

जबकि मन मंदिर का अर्थ है अपने मन के भी अंदर एक ऐसा दृश्य जगत मौजूद है जो उस मनुष्य के लिए सत्य है परंतु दूसरे लोगों के लिए अदृश्य होने से असत्य है मन के अंदर भी ये ही कला कृतियाँ स्वप्निल अवस्था में सक्रिय हो जाती है तो ऐसे में मनुष्य अपने मन्दिर की हलचलों के सपने देखते हैं जिनसे दूसरे लोग अनजान रहते हुए दूसरे मनुष्य के सपनों को झूंठा/असत्य कहते हैं

। ऐसे में जिस एक स्थान विशेष पर तरह-तरह की कलाकृति मूर्तियां रखी हो जो निष्क्रिय मूर्तियां है निष्क्रिय मूर्तियों मैं जब तक श्रद्धा निष्ठा आस्था विश्वास नहीं है तब तक वे सिर्फ पत्थर की कलाकृतियां हैं जो मंदिर के मालिक /नियंता ने कारीगर ने बनवाई है । बाद में भक्तगण या दूसरे उचित बुद्धि वाले लोग अपनी श्रद्धा निष्ठा विश्वास से मैस्मर शक्ति/ जादुई शक्ति पैदा करते हैं । इससे भी अधिक प्रभाव मनुष्य यदि अपने मन के अवचेतन स्तर में सकारात्मक कथन / सत्य कथन पूजा अर्चना के द्वारा डालता है जैसे दुर्गा सप्तशती के देवी कवज अर्गलास्तोत्र आदि के द्वारा तो वह अधिक प्रभावशाली होता है। यदि अपनी इस मैस्मर शक्ति या जादूगर शक्ति का उपयोग मनुष्य यदि अपने हित में करने लगे तो परिणाम विशेष उत्तम मिलते हैं यह मनुष्य के निजी मानसिक शक्ति पर ऊर्जा पर निर्भर करता है ।ऐसे में मंदिर की मूर्तियों से ज्यादा उत्तम रहेगा कि अपने मन मंदिर की मूर्तियों के दर्शन ठीक तरह से किए जांय और यदि अपने मन्दिर की मूर्तियों में कोईं विकार है तो उसे अपनी मानसिक इच्छाशक्ति से ठीक किया जाय तो यह भौतिक जगत में दृश्य व्यवहार करनेवाली मूर्तियां भी बदल जाती हैं । जिससे ईष्ट देव/देवी सम्पर्क मानवों के व्यवहार में परिवर्तन आने से अपना जीवन शांन्त सुखमय हो सकता है ।इसके लिए अवचेतन मन की शक्ति जोसेफ मर्फी लिखित पढ़ें ।

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