तलाकशुदा या विधवा स्त्री के पुनर विवाह के अवसर पर मात्र 1 फेरे का विधान है जिसे पुनरभू , धरेजा , कराब , या दो हरिया कहते हैं ।
परंतु वर्तमान समय में इन सब सात फेरों की प्रथा का मजाक सा उड़ा दिया गया है जिसके अनुसार कहीं पर भी आग जलाओ और आग के चारों ओर चाहे जितनी बार चक्कर लगाकर घूमते रहो यह सात फेरे नहीं अपितु अग्नि प्रदक्षिणा / अग्नि परिक्रमा या अलाव परिभ्रमण कहा जाता है ।
सात फेरे का अर्थ होता है सप्त चक्रा या जीव के सात शक्ति केंद्र बिंदुओं का मिलान जो अग्नि की उपस्थिति में ही संभव है । यह अग्नि अंतर रूप से प्राणियों के शरीर में होती है और वह बाहय रूप से अग्नि जलाकर अग्नि प्रतिष्ठित करके अग्नि साक्षी प्रथा मानकर सात फेरे कही जाती है ।
सामाजिक विधान स्मृति शास्त्रों /पुराणों / रामायण , मारकंडेय पुराण के सारांश/सारसंक्षेप के अनुसार विवाह देवतासम लोगों और समाज प्रेरक ब्राह्मण लोगों में व्यापक विवेचना समीक्षा विश्लेषण के अनुसार होता है ।जिसमें इसबात की आशा की जाती है कि विवाह पश्चात विवाह युगल के दोनों घटक /पात्र एक दूसरे के पूरक सहायक विश्वनीय बनकर संग संग मिलकर जीवनयापन करेंगे एक दूसरे की भावनाओं और आवश्यकता ओं को देखते समझते हुए । मात्र इन्हीं लोगों के लिए यह नियम मनुस्मृति में लिखा गया है । जिसे मनुज विवाह और देवविवाह कहा जाता है । सभी देवताओं के एक पत्नी का विधान है गणेश जी को छोड़कर । यह नियम पुरुष प्रधान समाज के लिए ह ।
अब एक विवाह के प्श्चात दूसरे विवाह में सात फेरे लेने का विधान राजाओं ,समृद्ध लोगों , क्षत्रप लोगों के लिए जितनी बार विवाह उतनी बार सात फेरे लिखे हैं कारण कि इनके जीवन में शांति स्थिरता नहीं है कब कौनसा सामाजिक जिम्मेदारी पूरी करने से पहले या बच्चों के पालनपोषण के पश्चात व्यस्क होने से पहले दुनिया छोड़कर चला जाय ऐसे में दूसरा जवान अकेले अपने जीवन को कैसे जियेगा ।ऐसे में उस अकेले विधुर विधवा विधवाव को अपना आधा अधूरा जीवन जीवन अभिशाप से बचने के लिए पुनर्भू विवाह की अनुमति दी गई है।
मनुजविवाह के पश्चात एक विवाह पशुज विवाह का भी है जिसमें स्त्री /मादा ,पुरुष अपनी अपनी यौनानुभूतियों यौनांनंद आवश्यकता के अनुसार जब चाहें जितनी बार चाहें सप्तचक्र मिलान /सातफेरे जब चाहें जितनी बार चाहें कहीँ पर भी अलावे जलाएं और आगे जितनी बार चाहें आग के चक्कर लगाते हुए घूमते रहें / परिक्रमा / परिभ्रमण करते रहें ,सृष्टि में अनियंत्रित अनियमित सृष्टि सृजन करते रहें बच्चे पैदा करते रहें ।यह नियम प्रकृति में पशुओं के समाजों में पाया जाता है अतः इसे पशुज विवाह कहा जाता है ।
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