अंतिम संस्कार की हिन्दू मान्यता के अनुसार कपाल क्रिया क्या है?


वेदांत दर्शन और आत्म दर्शन के अनुसार सभी जीवो का आत्मा जब उनके शरीर से निकलने को तैयार होता है तो सबसे पहले वह अपने शरीर के समस्त इंद्रियों अंगों से प्राणों को खींचकर इकट्ठा करके उन्हें कपाल में सुरक्षित करके रख लेता है । कपाल में उसके बाद चिंतन मनन प्रक्रिया चल रही होती है जबकि समस्त शरीर निष्क्रिय हो चुका होता है । इसके पश्चात जब वह कपाल से बाहर निकलता है तो बड़े जोर का विस्फोट करता है । जिससे आत्मा का ग्रह त्रिकुटी कपाल के अंदर फट जाता है । जीव का आत्मा चार द्वारी त्रि कक्षी चार मुख्य द्वार * प्रथम द्वार त्रिकुटी के पार्श्व भेदन करके भेदन करके कानों के मार्ग से , द्वितीय द्वार ** त्रिकुटी भेदन से मुख मार्ग से, द्वितीय के निकट तृतीय द्वार *** नेत्रों के मार्ग से, चतुर्थ मार्ग सुषुम्ना मार्ग से कुंडीया मार्ग मल मूत्रमार्ग से , पंचम गुप्त मार्ग ***** ब्रह्मरंध्र भेदन सुषुम्ना और मस्तिष्क की संधि द्वार भेदन करके खोपड़ी के पीछे से, उसे जो भी द्वार कमजोर द्वार लगता है । वह उसी द्वार का भेदन करता हुआ निकल जाता है । शरीर के जिस भी मार्ग से आत्मा शरीर को छोड़कर बाहर निकल जाता है वह शरीर का अंग स्थान का आकार खुल जाता है या बड़ा हो जाता है । जिसके प्रभाव से अक्सर प्राकृतिक मौत मरते समय जीव का यदि आत्मा मुख से गया है तो मुंह खुल जाता है आंखों से गया है तो आंख खुल जाते हैं और कानों से गया है तो कांटे टेढ़े पर के खुल जाते हैं ।यदि मलद्वार से गया है तो मृतक का मल निकल जाता है मूत्र द्वार से गया है तो मृतक का मूत्र निकल जाता है ।मृतक के शरीर के क्षेत्र से निकले क्रियाकलाप से आत्मा के जाने की गति और वांछनीय लोक का पता चल जाता है कि व्यक्ति किस लोक में गया है जैसे ब्रह्मरंध्र बेदन से मोक्ष लोक में नेत्रों के द्वारा देवलोक में , कानों के द्वारा भूमि लोक में , मुख के द्वारा प्राण निकलने पर जीव के सजातीय लोक में जाने का , मल और मूत्र के निकलने से जीव के निम्न मूर्धा हीन योनियों में जाने का अनुमान लगाया जाता है । आत्मा की इस त्रिकुटी भेदन के होने वाले भयंकर शब्द विस्फोट को जो लोग अवचेतन स्तर से जीते हैं वह इसे मंन की अवचेतन अवस्था में आसानी से सुन लेते हैं। मैं इसे सुन लेता हूं परंतु प्रत्येक व्यक्ति में आत्मा के शरीर से निकलने के समय उत्पन्न ध्वनि को सुनने की योग्यता क्षमता नहीं होती ।

हिंदू मान्यताओं के अनुसार यह माना जाता है की आत्मा तब तक शरीर का मोह नहीं छोड़ता जब तक कि शरीर को पूर्णतया नष्ट नहीं किया जाता ।तब तक वह शरीर के निकट जीवन की आशा में घूमता रहता है । इसी बात को ध्यान में रखते हुए हिंदू समाज में मृतक की कपाल क्रिया का विधान है। जो यह मानकर की जाती है की मृतक का आत्मा निवास केंद्र खोपड़ी या कपाल को पूर्णतया तोड़ कर नष्ट कर देने पर आत्मा का उस शरीर पर से विश्वास उठ जाता है । वह समझ जाता है कि जब मूर्धा केंद्र ही नहीं रहा तो इस शरीर में जीवन कैसा ??? इस बात को थोड़ा रीति रिवाज और परंपराओं में और आगे बढ़ाते हुए इस कपाल क्रिया को इस प्रकार से किया जाता है :—कि जब मृतक को दाह संस्कार करके अग्नि प्रज्वलित की जाती है तो जब उसका समस्त शरीर अग्नि से जल जाता है परंतु उसकी खोपड़ी आसानी से पूरी तरह जलकर नष्ट नहीं होती । ऐसे में मृतक का पुत्र या अंशज छोटा भाई वंश परंपरा के अनुसार उस खोपड़ी को मृतक की अर्थी के डंडे से चोट मारकर फोड़ता है और उसके पश्चात उस जली जली खोपड़ी में पुनः घी डालकर उस खोपड़ी को फिर से पूरी तरह से जलने दिया जाता है । जिससे मृतक की खोपड़ी पूरी तरह से भंगुर होकर बिखर जाती है । यह कपाल क्रिया विभिन्न परिवारों में विभिन्न जातियों में अलग-अलग रूपों में होती है । कुछ लोग खोपड़ी को पूरी तरह से फोड़कर भी से जलाकर नष्ट करते हैं ।तो कुछ लोग खोपड़ी को पूरी तरह से नष्ट नहीं करते चोट मारकर घी डाल कर छोड़ देते हैं । कुछ लोग खोपड़ी पर ममता वस चोट मारने के बजाए अर्थी के डंडे /बांस से स्पर्श करके छोड़ देते हैं । ऐसे लोगों की खोपड़ी मरने के बाद भी अक्सर चिता में सुरक्षित मिल जाती है । कपाल क्रिया से हिंदू संस्कृति का यह विश्वास है कि मृतक की कपाल क्रिया पूरी तरह से हो जाने के बाद मृतक के वर्तमान जन्म की संभावना पूरी तरह से नष्ट हो जाती है । और वह अगले भविष्य के जन्म के लिए पूरी निष्ठा के साथ तैयारी करके उस परिवार स्थान क्षेत्र को छोड़कर अन्यत्र परिवार की तलाश में अन्य क्षेत्रों में निकल जाता है ।

अपनी शेष मनोकामनाएं पूरी करने के लिए और वह उन लोगों के आसपास मंडराता रहता है जिन लोगों के द्वारा उसे अपनी मनोकामनाएं पूरी होने की संभावना दिखाई देती है । जिससे यह कहा जाता है कि ऐसा कोई स्थान नहीं जहां आत्मा का निवास ना हो अर्थात आत्मा सर्व व्यापक है जो अवसर मिलते ही उचित स्त्री पुरुष के समागम करने पर उस पोषित भ्रूण के निकट स्त्री के पास रहने लगता है । जिससे आत्मा के प्रभाव से गर्भवती स्त्री का शरीर तेज सामान्य से हटकर उसे तेजोमय हो जाता है । यह तेज प्रत्येक आत्मा के प्रभाव के अनुसार अलग-अलग होता है । जो विशेष महान आत्माएं महापुरुष युगपुरुष आदि होते हैं , जब भी वह जिस गर्भवती स्त्री के गर्भ में वास करते हैं तो उस पर सामान्य से हटकर कुछ अलग चमक आती है ।और साधारण आत्माओं के गर्भवास करने पर स्त्री पर सामान्य चमक आती है । और यदि गर्भवती स्त्री पर चमक नहीं है तो उस पर आने वाला जीव अच्छी श्रेणी का उच्च कोटि का नहीं होता है ।

इसी बात को ध्यान में रखते हुए आत्मा का पिछले परिवार पिछले लोग पिछले लोक क्षेत्र पर मोह ममता लगाव ना रहे कपाल क्रिया की जाती है । जिससे अशरीरी आत्मा को मृत्यु पश्चात अपनी कपाल क्रिया देखकर अशरीरी अवस्था में यह विवेक हो जाए कि जिन के लिए वह विशेष मोह ममता से , जिनके लिए जिया दुख झेले वही जीव उसके अंशज आज उसके मरे शरीर की दाह संस्कार से कपाल क्रिया से कैसी गति कर रहे हैं । अर्थात उस मरे शरीर को वह आग में जला रहे हैं इतने पर भी सब्र नहीं हुआ तो मरे शरीर की कपाल क्रिया की जा रही है । आत्मा जब ऐसे अपने अंशी छोटे भाई और पुत्र के द्वारा विचित्र कृत्य होते देखता है तो उसका मन अपने पूर्व के वंश कुल परिवार के लोगों से पूरी तरह से भर जाता है वह अपने लोगों से विरक्त हो जाता है और चल जाता है नए जीवन की आशा में नए लोगों को खोजने नए स्थानों में अपनों के द्वारा छले जाने पर… परलोक गमन मार्ग में सुखद शांत संतुष्टि के साथ ःःःःःःःःःःः

आत्मा में अपने पुराने लोगों के प्रति जरा भी अंश मात्र भी लगाव न बना रहे । उसकी पुरानी समस्त स्मृतियां संचित स्मृति केंद्र कपाल को नष्ट करके सदा सदा के लिए नष्ट कर दी जाती हैं । उसकी पुरानी समस्त स्मृतियां विस्मृत हो जाती हैं इसी बात को ध्यान में रखते हुए हिंदुओं में कपाल क्रिया का विशेष स्थान है ।

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