इसके लिए आप को पितर विद्या/अनुवांशिकता में मैंडल के नियम पढ़ने पढ़ेंगे कोशिका विभाजन की मिओसिस /अर्धसूत्रीविभाजन विभाजन की पहली स्टेज प्रोफेज 1के क्रोसिंग ओवर ,क्याजमैटा को पढ़ना
अनुवांशिक रोग वह रोग हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी दादा दादी नाना नानी से माता पिता में और माता पिता से उनके बच्चों में पीढ़ी दर पीढ़ी आते हैं /चलते रहते हैं । अनुवांशिक कई प्रकार के होते हैं प्रथम असाध्य अनुवांशिक रोग प्राय जीव विज्ञान की कक्षाओं में इन असाध्य अनुवांशिक रोगों के बारे में पढ़ाया जाता है जैसे हीमोफीलिया कलर ब्लाइंड हंटिंग डांस कोरिया एडिशन डिजीज मस्कुलर डिस्ट्रॉफी थैलसिमिया भैंगापन ,आंख फेरना फ्लैटफीट आदि इन अनुवांशिक रोगों का इलाज संभव नहीं ह आधुनिक चिकित्सा जगत में ऐसे लोगों की संख्या 160 से ज्यादा है इनका पता तब चलता है जब आधुनिक चिकित्सा जगत के चिकित्सक भी इनके इलाज में कामयाब नहीं हो पाते ।
इसके बाद कुछ अनुवांशिक बीमारियां ऐसी होती हैं जो कुसाध्य हैं जिन अनुवांशिक बीमारियों का निदान जो आयुर्वेदिक चिकित्सक हैं वे कर सकते हैं इनको कुसाध्य बीमारियों के निदान के लिए सबसे पहले रोग के वातावरण और खानपान का पता लगाना पड़ता है यह रोग परिवार मैं निर्धनता की कमी से जड़ जमाते हैं जो आर्थिक संपन्नता आने पर घर का वातावरण बदलने से खानपान बदलने से ठीक हो जाते हैं ।इनकी आयुर्वेदिक चिकित्सा एक साल से पांच साल तक नियमित रूप से आयुर्वेदिक दवाओं के अपने आप सेवन करने पर होती है शारंगधर संहिता के अनुसार सभी आयुर्वेदिक औषधि यां अन्नसार हैं जो उचित भोजन न करने से कुपोषण से उत्पन्न होती हैं।
इसके बाद कुछ अनुवांशिक बीमारियां साध्य होती हैं जो बच्चों में उनके पूर्वजों से निरंतर चली आती हैं जैसे जो रोग पितर पीढ़ी को था वह पिता पीढ़ी में आता है उसके बाद संतान पीढ़ी में चला जाता है यदि रोगी को रोग की आयुर्वेदिक दवा पता लग जाए या उसके खानपान में रहन-सहन के वातावरण में परिवर्तन हो जाए । परिवार और वातावरण जनित तनाव से मुक्ति मिल जाए तो ऐसी साध्यां बिमारियाँ व्यक्ति के थोड़ी से खानपान में परिवर्तन करने से और थोड़ी सी आयुर्वेदिक औषधि लेने से दबी रहती हैं उल्लेखनीय बात यह है की ऐसी अनुवांशिक बीमारियां मेटाबॉलिज्म डिसऑर्डर से पैदा होती हैं मेटाबॉलिज्म जो काफी हद तक खानपान पर निर्भर करता है ।
इसमें मेरा निजी अनुभव इस प्रकार है मेरे परिवार में पिताजी को मुंह के छाले पेचिश मलेरिया यह तीन रोग बहुत अधिक परेशान करते थे । यही तीन रोग मुझे भी परेशान करते रहे । और यही तीन रोग मेरे चार बच्चों (तीन पुत्री यां और एक पुत्र ) में से दो (बीच वाली मंझली बेटी और सबसे छोटे पुत्र ) में आ गए । मंझली बेटी में ज्यों के त्यों आ गए , दूसरे सबसे छोटे बेटे में मंद वेग से आ गए । जबकि मेरी बड़ी बेटी और छोटी बेटी पूर्ण रूप से स्वस्थ हैं ।उन दोनों में यह शुगर जनित रोग समस्या नहीं हैं । उल्लेखनीय बात यह है कि मेरी माँ बच्चों की दादी में शुगर उच्च स्तर का था जिससे उन्हें त्वचा रोग अधिक होते थे ।। अब इसका निदान जब मैंने आयुर्वेदिक ग्रंथ साहित्य का अध्ययन किया तो पता चला कि हमारे शरीर वायु प्रधान हैं और वायु प्रधान शरीर में दृढ़ता लाने के लिए पितज और कफज भोजन किया जाना चाहिए । तथा आयुर्वेदिक औषधियां दवाइयां पितज और कफ़ज गुंण वाली लेनी चाहिए ।। मैंने इसका पहले अपने ऊपर प्रयोग किया फिर अपनी बेटी को सलाह दी मैं आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति से अब अधिकांशतः निरोग रहता हूं और मेरी बेटी भी अब निरोग रहने लगी है । बस मैंने त्रिफला आयुर्वेदिक औषधि को पढ़ा और उसका उपयोग किया पहले 2 साल तक हरण का उपयोग किया उसके बाद 1 साल बहेड़ा का फिर एक साल तक आंवलों उपयोग किया ।अब मैं मीठा भी खा लेता हूं और मुझे मींठा खाने से अब ज्यादा परेशानी नहीं होती , नहीं तो पहले मेरे लिए मीठा विष जैसा कार्य करता था मुंह में छाले 15 से 30 दिन बने रहते थे । कारण था मुख में ओरल प्रोटोजोआ की मौजूदगी और शरीर का शुगर लेवल बॉर्डर पर था कभी बढ़ जाती कभी सामान्य हो जाती सबसे पहले शुगर लेवल मेंटेन करना सीखा खानपान के द्वारा, और शारीरिक श्रम अधिक मानसिक श्रम उचित परिमाण में तथा अकारण अनावश्यक मानसिक तनाव कम से कम । उसके बाद आयुर्वेदिक औषधियां निरंतर लेनी शुरू कर दी जिससे मुझे कोई परेशानी वर्तमान में नहीं है ।।
अब आगे अनुवांशिक बीमारियां क्यों होती हैं इसका मैंने शुरू में विवरण दिया था । मनुष्य के शरीर में स्त्री हो या पुरुष सभी के शरीर में शरीर गुणसूत्र क्रोमोसोम्स की संख्या 46 होती है जो उनके बच्चों में भी प्रत्येक बच्चे में 46 होती है अब सोचने की बात यह है जब पिता ने 46गुणसूत्र हैं माता में 46 गुणसूत्र हैं तो बच्चे में 92 गुणसूत्र होने चाहिए लेकिन बच्चे ने भी 46गुणसूत्र होते हैं ॥ इसका कारण है बच्चे के शरीर के बनने से पहले पिता के शुक्राणु में गुणसूत्रों की संख्या 23 एक्स वाई होती है और मां के अंडाणु में गुणसूत्र की संख्या 23 एक्स एक्स होती है इस प्रकार दोनों के निषेचन से 46 गुणसूत्र वाली संतान पैदा होती है ॥ 46 गुणसूत्र वाले दूसरे क्रोमोसोम समाप्त हो जाते हैं । अब इस प्रकार से बच्चों में अनुवांशिक रोग आने का प्रतिशत सबसे पहले 50%यानि आधा रह जाता है । इस प्रकार से बच्चों में पिता के समस्त अच्छे बुरे गुंणों में से आधे अच्छे आधे बुरे या अच्छे बुरे दोनों तरह के मिश्रित गुंण आधे होकर बच्चों में आते हैं ।( 100–50 =50%या 50%+I've या 50%—या 25%ive +25%ive ) गुंणों का यही गणितीय अनुपात माता केअच्छे बुरे गुंणों को लेकर बच्चों में आता है । ( बुद्धिमानी मूर्खता ,रोग निरोग ,लम्बा बौना ,काला गोरा , पेशिय शरीर कमजोर पेशिय या पेशिय हीन शरीर आदि अंसंख्य मानव अनुवांशिकी गुंण विवेचना है जो पितर विद्या अनुवंशिकी विज्ञान में पढ़ने पर ज्ञात होता है )
जिस कारण से सभी मनुष्य हों या बच्चे सभी में पर्सनैलिटी स्पिल्ट विखंडित व्यक्तित्व या द्विव्यक्तित्व (बाईपोलर डिस्आर्डर ) का मानसिक रोग अपने अलग अलग अनुपात में पाया जाता है ।जिससे बच्चों की शैक्षिक उपलब्धि प्रतिशत 50%से भी नींचे रहता है । इसका कारण है अर्ध नारीश्वर /+ — द्विलिंगिय मिश्रण से सृष्टि में निर्माण का सिद्धांत । जो एक शरीर में द्विहार्मोन ( नर हार्मोन और नारी हार्मोन मिश्रित नियंत्रण ) नियंत्रण व्यवस्था । जिससे बच्चे कभी अपने शरीर लिंग के अनुसार उपलब्धि दिखाते हैं तो कभी विपरीत लिंग के अनुसार उपलब्धि दिखाते हैं । जिससे सृष्टि निर्माण बच्चों के शरीर लिंगिय उपलब्धि 50% या अर्धसत्य का नियम कहते हैं जो 50%+50% =100%ना होकर सदैव 51%+49%=100%होता है ।जिससे नर पूरा पूरा नर नहीं होता है उसमें कहीं न कहीं नारी अंश छिपा रहता है ।नारी पूरी तरह से नारी नहीं होती उसमें नर अंश छिपा होता है । अनुवांशिकता के गणित को शादी के समय माता पिता पंडितजी मौलवी साहब फादर अपने अपने हस्तक्षेप से और भी ज्यादा बिगाड़ कर खराब कर देते हैं ।अनुवांशिकता/पितर विद्या का ज्ञान न होने पर ।
उसके बाद दूसरा कारण शरीर से शुक्राणु बनने के दौरान विशेष अर्धसूत्री /मिओसिस कोशिका विभाजन होता है जिसमें क्रोमोसोम्स की संख्या 23:23 अलग अलग हो जाती है यदि अनुवांशिक रोग वाले गुणसूत्र शुक्राणु में आ गए तो बच्चों को अनुवांशिक रोग हो जाता है। ।। यदि 23 गुणसूत्र अच्छे वाले बिना अनुवांशिक रोग वाले आ गए तो बच्चों में गुणसूत्र उत्तम होने से अनुवांशिक रोग नहीं होता है ।। इसमें अर्धसूत्री विभाजन में पहले विशेष कोशिका विभाजन होता है ( लेप्टोटीन ,जाईगोटीन ,पैचाईटीन डिप्लोटीन डायकायनेसिस ) जिसमें कुछ क्रोमोसोम आपस में बुरी तरह चिपक जाते हैं और बाद में अलग होने पर किसी क्रोमोसोम्स में कुछ ऐसा ज्यादा आ जाता है तो किसी क्रोमोसोम्स में कुछ हिस्सा कम रह जाता है ।माना किसी क्रोमोसोम्स में कुछ हिस्सा अनुवांशिक रोग वाला बच्चे में ज्यादा आ गया है तो बच्चों को अनुवांशिक रोग होने की संभावना बढ़ जाती है और यदि बच्चे के क्रोमोसोम्स में निरोग वाला हिस्सा जींस का क्रोमोसोम्स में आया है तो बच्चे में रोग होने की संभावना घट जाती है इस प्रकार से बच्चों में रोग घटने की संभावना का अनुपात 25% तक कम हो जाता है या हम कह सकते हैं किअनुवांशिक रोग चौथाई बच्चों मेंआता है । इस कारण से बच्चों में अनुवांशिक रोग समान रूप से वितरित होकर सभी में समान बैठकर नहीं आता है कुछ बच्चे उग्र रूप से अनुवांशिक रोगी होते हैं जिनमें अनुवांशिक रोग भयंकर अवस्था में असाध्य या कुसाध्य. रूप से आता है इन बच्चों के माता पिता में अनुवांशिक रोग जीन्स गुप्त रूप से छिपे होने से ओटोसोमल रिसै्सिव या अनुवांशिक रोग वाहक हैटैरोजाईगस रिसै्सिव या होमोजाईगस रिसै्सिव होते हैं। कुछ बच्चों में अनुवांशिक रोग निम्न अवस्था में साथ्य रूप से आता है और कुछ बच्चों में अनुवांशिक रोग नहीं आता है , वह पूर्णता अनुवांशिक रोग मुक्त होते हैं । एक पीढ़ी तक ,, लेकिन उन रोगमुक्त बच्चों में भी अनुवांशिक रोग कैरियर चाइल्ड हो सकते हैं जो आगे शादी होने पर सामान्य युगल बनने पर भी उनके बच्चों में अचानक अनुवांशिक रोग पैदा हो जाते हैं इसका मतलब है की माता या पिता एक या दोनों में से कोई सा या दोनों अनुवांशिक रोग के वाहक थे जिनमें अनुवांशिक रोग मेंडल के हेटेरोजाईगयस जीन्स मौजूद थे । जो अनुवांशिकता के प्रभाविता जीन्स नियम के अनुसार छुप गया था ।। रोग दाई जींस को निरोग जींस में अपने बल प्रभाव से दवा लिया था यहां से ऑस्ट्रिया के अनुवांशिकी जनक जॉन ग्रेगर मेंडल के 3 नियम प्रभाविता का नियम पृथक्करण का नियम पूर्णतया अलग अलग होने का स्वतंत्र अभिवहन नियम लागू होते हैं इन्हें 12वीं की क्लास में आप अनुवांशिकी विज्ञान से विस्तार में पढ़ सकते हैं
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